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आलोक सिंह क्यों और कैसे गए नोएडा से, जानिए अंदर की पूरी कहानी

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यशवंत सिंह-

नोएडा के पुलिस कमिश्नर आलोक सिंह डीजीपी आफ़िस से अटैच कर दिये गए। सीएम योगी के ख़ास माने जाने वाले आलोक सिंह को कोई सम्मानजनक पद नहीं दिया गया। प्रतीक्षारत रखा गया है। लखनऊ के पूर्व पुलिस आयुक्त डीके ठाकुर महीनों से प्रतीक्षा में हैं।

कहा जाता है कि बाबा की नज़रों से जो एक बार उतरा तो उसके पटरी पर आने में बहुत वक़्त लगता है। आलोक सिंह को लेकर एक चर्चा ये है कि उन्हें आगरा का पुलिस कमिश्नर बनाये जाने की तैयारी थी। ये भी कहा जा रहा है कि आलोक सिंह ख़ुद चाहते थे ग़ाज़ियाबाद का पुलिस कमिश्नर बनना। ये सब चर्चाएँ हैं। चर्चाओं के सिर पैर नहीं होते।

तो आगे एक चर्चा ये भी है कि आख़िरी वक्त में कोई खेल हुआ। इसको लेकर दो बातें सामने आ रहीं हैं।दिल्ली से सुपर बॉस का बाबा को फ़ोन गया। दुखी महेश शर्मा ने दिल्ली के बॉसेज में आलोक सिंह के ख़िलाफ़ तगड़ी फ़ील्डिंग बिठा रखी थी। यहाँ तक कह दिया था कि आलोक सिंह ख़ुद के लिए नोएडा को तैयार कर रहे हैं ताकि चुनाव लड़ सकें। एक सांसद का एक अफ़सर से इस कदर दुखी हो कर द्वारे द्वारे फ़रियाद करना देर सबेर असर तो करेगा ही। आंसू ने असर दिखाया। बीजेपी सांसद जो केंद्रीय मंत्री रहा हो और सुपर बॉस की टीम के ख़ास लोगों का ख़ास हो तो उसका दुख देर तक टिक नहीं सकता।

Alok Singh

एक अन्य चर्चा ये है कि आलोक सिंह का विरोधी ख़ेमा जो लखनऊ में पदस्थ है, नोएडा के मामलों की फाइल लगातार तैयार करवा रहा था। इस काम में काफ़ी कुछ मदद ख़ुद आलोक सिंह ने की। वे अच्छे टीम लीडर नहीं रहे हैं या यहाँ भी नहीं साबित हुए, ये उतनी बड़ी बात नहीं है। ख़राब बात ये है कि आलोक सिंह के साथ जिन जिन पीपीएस-आईपीएस अफ़सरों ने काम किया, उनमें से ज़्यादातर को अपमानित होना पड़ा, बेहद तनाव में जीना पड़ा, उन पर शक किया गया, उनके ख़िलाफ़ जाँच कराने की कोशिश की गई, उन्हें छोटी छोटी बातों पर इतना टार्चर किया गया कि उनका जीना मुहाल हो गया।

कहा तो यहाँ तक जाता है कि एक डीसीपी ने ये तक लिख कर अपने परिजनों को दे दिया था कि अगर उनकी मौत तनाव दबाव डिप्रेशन बीपी सुगर से होती है तो इसके लिए बॉस को ज़िम्मेदार माना जाए।

तो आलोक सिंह द्वारा जबरन दुखी की गईं ये सब आत्माएँ लखनऊ ख़ेमे की तरफ़ भटकने लगीं और मजबूरी में उन्हें मज़बूत बनाने लगीं। सबने दुखड़ा लखनऊ रोया। नोएडा की हक़ीक़त बयान की। आलोक सिंह के ख़िलाफ़ फाइल मोटी होती गई।

कुछेक अनमैनेज्ड छोटे बड़े मीडिया संस्थान लखनऊ ख़ेमे के इशारे पर नोएडा पुलिस कमिश्नरेट की गाहे बगाहे सच्चाई बताते रहे। तो इस तरह मीडिया कवरेज भी मूल फाइल के साथ नत्थी की जाने लगी।

नोएडा में भले कमिश्नरेट सिस्टम रहा हो और काम सबका बँटा रहा हो लेकिन असल में सारे फ़ैसले ख़ुद आलोक सिंह ही लेते थे। बाक़ी लोग रबर स्टांप बना कर रखे गये थे।

सबको इंतज़ार था। कब जाएँगे आलोक सिंह। तीन साल पूरे हुए और आलोक सिंह गए। प्रदेश में सबसे लम्बे समय तक एक जगह सीपी के रूप में टिके रहने का रिकॉर्ड आलोक सिंह के नाम बन चुका है। तो आलोक सिंह एक कीर्तिमान भी क़ायम करके गए हैं जो उनके लिए एक जश्न का मौक़ा है।

इधर नोएडा पुलिस के लोगों में जश्न का माहौल है। सबने राहत की सांस ली है। कई लोगों ने कल रात में पार्टी की। आलोक सिंह भले ही सीएम के ख़ास रहे हों या हैं, वे अपने किसी अधीनस्थ को अपना ख़ास नहीं बना पाए। जिसने भी आलोक सिंह के अधीन काम किया, वो ज़रूर बुरे अनुभवों की दास्तान सुनाएगा। जो जो नोएडा आया, यहाँ की चक्की में पिसते ही भागने के लिए आकुल व्याकुल हो गया। लम्बी लिस्ट है।

आईपीएस-पीपीएस छोड़िए, दरोग़ा इंस्पेक्टरों तक से निजी ख़ुन्नस मानने लगते थे आलोक सिंह। एक ऐसे ही इन्सपेक्टर को सबक़ सिखाने के लिए उसके ख़िलाफ़ जाँच बिठा दी। जाँच रिपोर्ट इन्सपेक्टर के प्रतिकूल न आने पर दुबारा जाँच के आदेश दिए। वो फाइल आती जाती रहती है। इन्सपेक्टर दोषी नहीं है, उसे जबरन दंडित करना है। इसके लिए कोई जाँच अधिकारी तैयार नहीं होता। तो फाइल या तो होल्ड रहती है या फिर सही निष्कर्ष के साथ आलोक सिंह के यहाँ जाती है फिर दुबारा जाँच के निर्देश के साथ वापस हो जाती है।

अपनी कुर्सी, अपनी छवि के लिए सतत चिंतित आलोक सिंह के लिए ये आत्ममंथन का समय होना चाहिए।

उम्मीद करते हैं कि कर्मठ और प्रतापी अफ़सर लक्ष्मी सिंह बेहाल नोएडा पुलिस कमिश्नरेट को पटरी पर ले आ पाने में सफल होंगी। पीड़ितों की सुनवाई हो, पुलिस टीम का मनोबल उच्च रहे, दो सबसे बड़े तात्कालिक काम होंगे नई सीपी के लिए।

यशवंत भड़ास के संपादक हैं.


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