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खबर भले नहीं छपी, गुजरात में अमित शाह के दंगे वाले भाषण पर हंगामा तो है!

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अमित शाह ने 25 नवंबर को कहा, 2002 में ‘सबक सिखाने’ के बाद बीजेपी ने स्थायी शांति कायम की

नरेन्द्र मोदी ने 27 नवंबर को कहा,
जब तक वोटबैंक की राजनीति तब तक आतंक का खतरा

स्थाई शांति के बाद आतंक का खतरा कौन सी राजनीति है?
साध्वी प्रज्ञा के बाद अब दंगे के दोषी की बेटी को टिकट किसने दिया है?

छोटे अपराधियों को नेता कौन बना रहा है? इससे स्थायी शांति कायम रहेगी?

संजय कुमार सिंह-

मैं पहले लिख चुका हूं कि गुजरात में अमित शाह का भाषण, “2002 में ‘सबक सिखाने’ के बाद बीजेपी ने स्थायी शांति कायम की” घोर आपत्तिजनक है लेकिन अखबार में इसे महत्व नहीं मिला। फिर भी मांग की गई है कि इस भाषण के मद्देनजर गुजरात चुनाव टाल दिए जाएं और अन्य संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई चल रही है। आज द टेलीग्राफ में इस पर खबर है (और कहीं होती ही नहीं है) लेकिन उसकी चर्चा से पहले भाषण क्या था उसे जान लीजिए।

bhaskar.com के अनुसार शुक्रवार, 25 नवंबर को अमित शाह ने गुजरात विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान 2002 का साल याद दिलाया। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, शाह ने खेड़ा की एक रैली में कहा, 1995 से पहले जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, तब असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद थे। 2002 में हमने उन्हें ऐसा सबक सिखाया कि वे हिंसा करना भूल गए। इसके बाद भाजपा ने पूरे गुजरात में स्थायी शांति ला दी। इस दावे के आधार पर कुछ लोगों का कहना है कि अपराधियों को ठीक किया गया और इसमें कोई बुराई नहीं है। मेरा मानना है कि तरीका गलत है और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई कानून सम्मत होनी चाहिए और सरकार का काम समाज के दो वर्ग के लोगों को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करना नहीं है। बल्कि लड़ाई हो तो निपटाना है, लड़ाई के कारणों को खत्म करना है।

वैसे भी, अपराधियों को सबक सिखाना था तो धर्म विशेष के 2000 लोग क्यों मर गए। सच यही है कि दूसरे धर्म के लोगों को उकसाया गया या मौका दिया गया कि वे कथित अपराधियों के धर्म के लोगों से बदला लें। ऐसे लोगों को संरक्षण दिया गया, बचाया गया, सजा नहीं होने दी गई, हुई तो जमानत दिलवाई गई, सजा माफ हुई और एक मामले में तो बेटी को विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया गया। यह बहुत ही असामान्य और शर्मनाक स्थिति थी और वोट के लिए इसे याद दिलाना या इसके बदले वोट मांगना चुनावी नैतिकता को ताक पर रख देना है।

यही नहीं, शाह ने कहा कि, “गुजरात में सांप्रदायिक दंगों को भड़काने का काम कांग्रेस ने किया। मैं आज भरूच जिला में हूं। मैंने यहां बहुत दंगे देखे हैं। 2002 में इन्होंने हिंसा करने की हिम्मत की थी, इनको ऐसा पाठ पढ़ाया, चुन-चुन कर सीधा किया। जेल में डाला तो उसके बाद से 22 साल हो गए, कहीं कर्फ्यू नहीं लगाना पड़ा। उन्होंने कांग्रेस पर राज्य में दंगे करवाकर अलग-अलग समुदाय और जाति के लोगों को एक-दूसरे से लड़ने के लिए भड़काने का आरोप भी लगाया। कांग्रेस अपने वोट बैंक के लिए लोगों को हिंसा करने के लिए शह दिया करती थी। कांग्रेस ने सिर्फ अपने वोट बैंक को मजबूत किया और समाज के एक बड़े वर्ग के साथ अन्याय किया।”

कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस ने अगर बड़े वर्ग के साथ अन्याय किया और फिर भी जीतती रही तो अन्याय चुनावी मुद्दा नहीं है। ना ही इसका मतलब यह हो सकता है कि आप छोटे वर्ग के साथ अन्याय करें और बड़े वर्ग का समर्थन लें। लेकिन भाजपा उसी बड़े वर्ग को न्याय दिलाने का दावा कर रही है तो चुनाव सामान्य कहां रह गये? चुनाव का मतलब इतना जानना ही है कि बड़ा वर्ग भाजपा के इस दावे को कितना मान रहा है। लेकिन भाजपा के इस रूप को अखबार दिखा ही नहीं रहे हैं और यह मैं पहले लिख चुका हूं। अब यह बता दूं कि गुजरात दंगे की जांच में कांग्रेस को दोषी नहीं माना गया था, उसके नेता एहसान जाफरी और उनके समर्थकों की भी हत्या हुई थी। दूसरी ओर दंगे में भाजापइयों और परिवार समर्थकों के नाम थे, उन्हें दोषी पाया गया। इनमें मंत्री माया कोडनानी भी थी जो बाद में हाईकोर्ट से छूटीं।

ऐसे में प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले प्रधानमंत्री के चाणक्य कहे जाने वाले गृहमंत्री झूठ बोल रहे हैं या ‘मन की बात’ कर रहे हैं। अखबारों ने भले इसे ढंग से नहीं छापा लेकिन इसकी शिकायत हुई है और कार्रवाई चल रही है। भले फैसले में किसी कार्रवाई की उम्मीद न हो। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, आर्थिक मामलों के पूर्व केंद्रीय सचिव ईएएस शर्मा ने चुनाव आयोग से मांग की है कि अमित शाह के खिलाफ मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के उल्लंघन की शिकायत की जांच की जाए और राज्य में 1 व 5 दिसंबर को होने वाले चुनाव टाले जाएं। चुनावों पर नजर रखने वाले एसोसिएशन फर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म के जगदीप चोकर ने भी इस मामले में शिकायत की है।

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