हम एंकरिंग को गंभीर काम समझते थे : प्रभात डबराल

Prabhat Dabral : न्यूज़ चैनल्स की एंकरिंग इतनी आसान हो जायेगी, कसम से हमने सोचा भी नहीं था. अपन ने भी कुछ साल टीवी न्यूज़ में गुजारे हैं. खूब सारी रिपोर्टिंग और थोड़ा बहुत एंकरिंग भी की है. लेकिन आठ साल दूरदर्शन न्यूज़ में बिताने के बाद १९९६-९७ में जब प्राइवेट चैनल्स में आया और चैनल प्रमुख बना तो एंकरिंग के बारे में सोचा भी नहीं. आराम से कर सकता था, मुझे कौन रोकता.

लेकिन लगा कि ये सीरियस काम है, चैनल प्रमुख के रूप में आपको पचास और प्रशासकीय काम करने होते हैं आगे पीछे इतना सब देखना होता है ऐसे में किसी शो की तैयारी कैसे होगी – एंकरिंग से न्याय नहीं कर पाऊंगा. ऐसा सोचा, सो ये मोह छोड़ दिया.

अब सोचता हूँ कि कहीं कुछ गलत तो नहीं कर दिया. एंकरिंग के लिए तैयारी की क्या ज़रूरत है. आवाज़ भारी और तेज़ होनी चाहिए, वो अपने पास थी. थोड़ी थोड़ी देर बाद त्योरियां चढ़ा कर चेहरे पर गुस्से के भाव दिखने चाहिए, वो भी माशाल्लाह हम कर ही लेते थे. चीख-चिल्लाहट में अपन किसी से कम कभी नहीं रहे- यकीन न हो तो हमारे तब के सहकर्मियों से पूछ लीजिये.

हाँ, आजकल बीच बीच में ‘मोदी जी मोदी जी’ भी बोलना होता है, वो कौन सी बड़ी बात है कर लेते – फ़क़ीर, फ़क़ीरी सब बोल लेते. बाकी, पीसीआर (प्रोडक्शन कण्ट्रोल रूम) में रामजस या हिन्दू कॉलेज का कोई सिविल सर्विस रिजेक्ट प्रोड्यूसर तो बैठा ही होता. वो अपन को शालीन होने की गलती थोड़े ही करने देता- एयर पीस पर सावधान करता रहता कि ढीले मत पड़ो, मन में जो कुंठा है अभी के अभी यहीं पर निकाल दो.

गज़ब का सिस्टम डेवेलप हो गया है. कहीं कोई परेशानी है ही नहीं.

हम एंकरिंग को गंभीर काम समझते थे. हमें कहाँ पता था कि चेहरे पर गुस्से के भाव से ही गंभीरता झलक जाती है. रहा सवाल विषय के ज्ञान का तो आप को बस इतना करना है कि रह रह कर अपने मेहमानों को झिड़कते रहो, मौका लगे तो डांट दो. जितने ज़्यादा समझदार मेहमान को जितनी ज़्यादा बदतमीज़ी से डाँटोगे उतने ज़्यादा ज्ञानी दिखोगे. उन्हें देशद्रोही बोल दोगे तो सोने में सुहागा.

काश तब हमें ये सब पता होता. हमने खुद तो एंकरिंग नहीं ही की, अपने ऐंकरों को भी बहुत बाँध कर रखा, गाली गलौज तक नहीं करने दी. उनकी प्रतिभा को उभरने नहीं दिया. आज देखिये मौका मिलते ही उनमे से कुछ कैसे फल फूल रहे हैं. अपना उद्धार तो अब नामुमकिन है. लेकिन जिनके दो-चार साल हमने शालीनता के चक्कर में बरबाद कर दिए उनसे माफ़ी मांगनी तो बनती है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल की एफबी वॉल से.

कुछ प्रमुख टिप्पणियां….

Pravin Bagi आपने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है। अब एंकरिंग कहां, वहां तो झांव -झांव का बाजार है। जो एक लाइन भी सही नहीं बोल सकते, वो एंकर बन या बना दिये जा रहे हैं। इससे चैनलों की और डिबेट्स की गंभीरता घटी है। वह एक नौटंकी बन कर रह गया है। वैसे लोग आत्ममुग्धता के शिकार हैं। हालांकि इस ‘झांव -झांव बाजार’ में कुछ एंकर बहुत अच्छा कर रहे हैं। नए लोग भी अपनी प्रतिभा और कुशलता से अपनी छाप छोड़ रहे हैं। वैसे लोगों को आगे बढ़ाने की जरुरत है।

Saleem Saifi आज का एंकर होने के लिए अशिक्षित होना ही काफ़ी नही है, अज्ञानी और जाहिल होना भी ज़रूरी है. आपने अपना दौर खुद लिखा है, शानदार था और आप खुशनसीब.

Rajeev Mittal प्रभात..खैर तुम में तो एंकर वाले सारे गुण थे..लेकिन वो गुण तुमने मेरे अंदर क्यों न तलाशे…

Prabhat Dabral गुरु, मुझे धन्यवाद् दो तुम्हे बरबाद होने से बचा लिया…

Maheruddin Khan अब पछताए होत का एंकर बने महान।

Prabhat Dabral अब पछताए का होत है एंकर बने महान, लाला से मिल रहा रोटी कपड़ा और मकान. रोटी कपडा और मकान सब पैसे की माया है, सत्ता है बलवान, सत्य तो बस छाया है.

Madhaw Tiwari याद है मुझे किस तरह आपकी भारी आवाज़ न्यूज़ रूम में गूंजती थी और अगर आप केबिन से बाहर आ गए तो सब समझ जाते थे कि कुछ ग़लत हो गया और क्लास लगने के डर से चैनल हेड तक सिस्टम के पीछे छुप जाते थे. लगता था जैसे शेर अपनी मांद से बाहर निकल आया हो. आज अगर एंकर होते तो स्क्रीन के आप बादशाह होते सर, लेकिन आपकी अनुशासन की ज़िद आपको ऐसा होने ना देती. टीवी की छोटी और बारीक चीज़ें जिसे आज हर कोई रेस में रहने के लिए नज़रअंदाज़ कर देता है, हम भी उसमें शामिल हैं, उन पर आप बेहद गंभीर थे. और ऐसा कर के हम नए टीवी पत्रकारों को नियमों की जानकारी नहीं देते, उनको ग़लत ही सही लगने लगता है. कुछ तो ऑन एयर गाली दे देते हैं और उन्हें रिग्रेट भी नहीं होता. एक लाइव रेसक्यू के 20 सेकंड के शॉट्स हमने लूप में एडिट कराया था. आपने जमकर मेरी क्लास लगाई थी. ये आपका आशीर्वाद था और मेरा सौभाग्य कि मुझे आप जैसे गुरू मिले. समझ में नहीं आता आपकी दी शिक्षा कैसे आगे बढ़ाएं, जब न्यूज़ चैनल ही ऐसे हैं जहां एथिक्स का कोई मतलब नहीं.

Sunil Pandey सहमत हूं। आप कई एंकरों के जनक रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि एंकरों के जिन गुणों का बखान आप अभी कर रहे हैं , वो सभी गुणों से आप तब सराबोर थे। लेकिन तरीका अलग, प्यार था, अपनापन था। आपसे डर था और सीखने की प्रवृति थी हम जैसे सैकड़ो सहकर्मियों में। सच कहूं तो जो बोल्डनेस आप में था, हर स्तर पर वो फिर आज तक कहीं नहीं दिखा। अब तो केवल शोर शराबे के बीच नौकरी बचाने की जुगत में सभी लगे हैं

Vipin Dev Tyagi Shouting, high pitch drama, shallow knowledge are basic requirements for being an anchor today.But even then there are few finest of Tv anchor that are brilliant with their work on screen.

Devesh Gupte Loving this post ….. Remembering the Sahara days when there was more thn a month training and audition and audition and audition to qualify to be an anchor.

Triveni Prasad Pandey गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारिता संस्थान उग आये हैं..और उनमें से निकलने वाले नौजवान सिर्फ और सिर्फ एंकर ही बनना पसंद करते हैं…ऐसे संस्थानों के विज्ञापन में लिखा होता है–एंकरिग का 3 महीने का कोर्स..!!

Rajendra Prasad प्रभात भाई चाइना गेट फ़िल्म में डाकू जगीरा का एक डायलॉग बरबस याद आता है कि “मुझसे लड़ने के लिए हथियार और गोला-बारूद तो ले आओगे पर कमीनापन कहाँ से लाओगे”? आज चेहरे पर इतना भक्तिभाव कहां से आता?

Sanjeev Bhagat ई एंकर तो सामान्य जानकारी से भी दूर है। पढाई लिखाई, अध्ययन से इनका कोई नाता नहीं। बस बक बक बक बक। इसी कारण समाचार चैनल से लोग दूरी बनाने लगे है।

Rajkumar Pandey आपके साथ काम करना एक बेहतरीन अनुभव है सर। आपने बिल्कुल ठीक लिखा है, अब कोई भी कैमरे के सामने बैठ जा रहा है। लेकिन बहुतायत में बेअसर हो रहे हैं।

Kavindra Sachan सर आपके दिये सुझाव और मार्ग दर्शन से ही आज मैं यहां तक पहुच पाया हूं..आज के दौर में पीछ मुड़ के देखता हूं तो 2002 आता है…आज बिरादरी के लोग क्या कर रहे है कैसे कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं समझना मुश्किल नही..लेकिन मैं हमेशा गर्व करता हूं कि मैं आपकी छाया में बड़़ा हुआ और पत्रकारिता के गुण अवगुण सीखे..जो आज भी काम के दैौरान मानसिक सुकून देते है

Vinnet Richhariya जानकारियो के अभाव में चल रही है दुकान एंकरिग की चीखो चिल्लाओ और कुछ लोगो के गुणगान गाओ जनता को ये दिखाओ

Sanjay Khare इस दौर का सफल एंकर वह है,जो पीटने वाले की बजाय पिटने वाले से पूछे-‘पर आप क्यों इतनी जोर से रोये और चिल्लाये’!

Bhola Thakur इसीलिए तो आज भी आपकी अहमियत और सम्मान यथावत है बड़े भैया….मैं आपकी छत्रछाया में रह चुका हुँ, सहारा समय का वह सुनहरा दौर… जब आपका अनुशासन और कार्य-दक्षता सारे साथियों का अपना जुनून हुआ करता था…..आज के चैनल्स ……? उसके एंकर्स…..?जो टास्क उन्हें अपने ‘माल’ फिनांसर आकाओं से मिलते हैं,वही वे परोसते हैं और लाठी लेकर धमकाते हैं देशवासियों को, जो हम परोस रहे हैं…. वही सच है….. इसे स्वीकारो…….वरना……

Bhavna There’s a huge difference between class and crass, Sir. You were and are the former!

Gyanendra Pandey सच्चा ( कच्चा ) चिट्ठा) खोल दिया आजकल के खाफ फोडू बुद्धू टीवी सूत्रधारों का .अब तो सरकारी चेनलों में भी इन्ही का बोलबाला है .

Alok Tiwari कुछ पुराने एंकर कल गाजियाबाद कोर्ट में सरेंडर किए रहे…..उनकी कहानी भी कभी हो जाए।

Sher Bahadur Singh सर जी प्रणाम…आपने जो किया किसी के बूते की बात नहीं थी। आप से लोगो को सीख लेना चाहिए। आपने सहारा को मुकाम पर पहुंचाने के लिए क्या नहीं किया। साधना न्यूज़ को आपने ही पहचान दिलवाई। लेकिन जब ए चल निकले तो दुकान दारी शुरू हो गई। हम लोग गवाह है कि आप सच्चे और ईमानदार पत्रकार का हमेशा साथ दिए हैं और वे सभी आपको हमेशा याद करते रहते हैं ।उनमें से एक मैं भी हूँ।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

One comment on “हम एंकरिंग को गंभीर काम समझते थे : प्रभात डबराल”

  • प्रभात सर आप जिस जगह पे थे वही ठीक थी आज भी हम जैसे लोगों को ये आभास होता है कि आप के सानिध्य में काम करने का मजा ही कुछ और होता था अब तो एंकर से लेकर चैनल हेड तक चिल्ला चोटी मची हुई है या यूं कहूँ की खबर बाद में पहले कुछ देखो क्या हो सकता है

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *