पक्की नौकरी चाहते हैं राजस्थान के पत्रकार, APRO के पद बढ़वाने में जुटे

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जयपुर : पत्रकार चाहते हैं कि उन्हें पक्की सरकारी नौकरी मिले। राजस्थान सरकार ने हाल ही में सहायक जनसंपर्क अधिकारी के पदों पर भर्ती निकाली है जिसमें कुल 76 पद शामिल हैं। राजस्थान सरकार ने इस भर्ती को पूरे दस साल बाद दोबारा निकाला है। इससे पहले प्रदेश में APRO के पदों पर 2012 में भर्ती हुई थी।

इस भर्ती की खास बात ये है कि इसमें केवल पत्रकारिता से डिग्री रखने वाले युवा ही आवेदन कर सकते हैं। इसमें कुल लगभग 7 हजार लोगों ने आवेदन भरा है। इससे स्पष्ठ हो जाता है कि महज 76 पद इस भर्ती के लिए बेहद कम हैं। दोबारा से ये भर्ती फिर कई सालों बाद आएगी। इसके चलते कई महीनों से बेरोजगार पत्रकार मांग कर रहे हैं कि इस भर्ती के पदों की संख्या में सरकार बढ़ोत्तरी करे ताकि आज के समय में जिस तरह से पत्रकार बेरोजगार घूम रहे हैं, उन्हें रोजगार मिल सके। साथ ही नई पीढी जो कि लगातार पत्रकारिता से दूर होती जा रही है वो पत्रकारिता में रुचि दिखाए।

खास बात ये है कि जिन 76 पदों पर भर्ती निकाली गई है उन पदों को 40 साल पहले सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में स्वीकृत किया किया गया था। इसके बाद से विभाग का काम तो बढ़ता गया। प्रदेश में नए विभाग भी बनाए गए परन्तु APRO के नए पदों को अभी तक किसी तरह की स्वीकृति नहीं प्रदान की गई है जिससे बेरोजगार पत्रकार बेहद नाराज हैं।

बेरोजगार पत्रकार आए दिन राजस्थान में सड़कों पर भी उतर रहें हैं और सरकार को ज्ञापन भी सौंप रहे हैं ताकि सरकार उनकी मांग पर किसी तरह से विचार करे और पदों में कुछ बढ़ोत्तरी करे। परन्तु कई हफ्ते बीत जाने के बाद भी सरकार की तरफ से ना तो किसी तरह का बयान आया है, ना ही बेरोजगार पत्रकारों को बातचीत के लिए बुलाया गया। सरकार के इस रवैए से बेरोजगार पत्रकार बेहद दुखी हैं क्योंकि राजस्थान के मुख्यमंत्री खुद कहते हैं कि वो पत्रकारों से अच्छी मित्रता रखते हैं, पर आज उन्हीं के प्रदेश के पत्रकार अपनी मांग मनवाने के लिए दर दर की ठोकरें खा रहे हैं।

बेरोजगार पत्रकारों का कहना है कि पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जाने जाते हैं। हमेशा वो जनता और सरकार के बीच सेतु बनकर खड़े रहते हैं। परन्तु जिस तरह से सरकार बेरोजगार पत्रकारों की मांग पर गौर नहीं कर रही है वो बताता है कि राजस्थान की गहलोत सरकार भी बेरोजगार पत्रकारों की हितैषी नहीं है। ना ही उसे पत्रकारों की दर्द और पीड़ा से कोई मतलब है। जबकि दूसरी तरफ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भाजपा शासित राज्यों पर आए दिन निशाना साधते रहते हैं। कहते हैं कि भाजपा के नेता और मंत्री जमीन से नहीं जुड़े हैं। जबकि राजस्थान में इस समय राज्य का सूचना एंव जनसंपर्क विभाग सीएम गहलोत के अधीन आता है, तो भी बेरोजगार पत्रकारों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। ये बताता है कि उन्हें दूसरे राज्यों से ध्यान हटाकर एकबार अपने प्रदेश के बेरोजगार पत्रकारों की मांग पर भी विचार करना चाहिए ताकि राजस्थान में जो पढ़े लिखे पत्रकार बेरोजगार घूम रहे हैं, उनके घर भी रोजगार का उजाला फैल सके।

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