अरुण पुरी थोड़े बहुत पत्रकार रह गए हैं या पूरे बनिया हो चुके हैं?

Employees of Mail Today, published by the India Today Group, were informed over the phone by the company’s HR that the tabloid will suspend publishing beginning Saturday, 8 August. Around 35–40 will be affected by the closure.

उपरोक्त वाट्सअप मैसेज पूरे दिन मीडियाकर्मियों के बीच घूमता रहा. आज कनफर्म भी हो गया. अरुण पुरी ने मेल जारी कर दिया. अखबार बंद कर दिया. दर्जनों मीडियाकर्मियों के पेट पर लात मार दिया.

कहने को तो वो देश का सबसे बड़ा, सबसे तेज, सबसे प्रतिष्ठित, सर्वाधिक पठनीय, सर्वाधिक दर्शनीय आदि इत्यादि के दावे वाले मीडिया संस्थान संचालित करते हैं लेकिन जहां बात वैल्यूज-एथिक्स की आ जाती है, इनके भी मीडिया हाउस की मनुष्यता चली जाती है तेल लेने. अरुण पुरी इंडिया टुडे ग्रुप और टीवी टुडे ग्रुप के मालिक हैं. बुजुर्ग हो गए हैं. इनके बच्चे-बच्चियां अब सारा कामकाज देखते हैं. लेकिन अब भी ये कुछ ‘महान’ काम कर लेते हैं.

जैसे एक ‘महान’ काम इन्होंने हाल में ही किया है. अपने मेल टुडे अखबार को बंद करने का और इसमें कार्यरत चालीस मीडियाकर्मियों की छंटनी का. इनके लेटर में छंटनी के मुद्दे को शब्दों की चाशनी में लपेटकर माइल्ड कर दिया गया है. बाकी सब बड़ी बड़ी बातें हैं.

कहने को अरुण पुरी सबसे ज्यादा रेवेन्यू मीडिया में कमाते हैं लेकिन कोरोना काल का आड़ लेकर ये एक चैनल पहले ही बंद कर चुके हैं, अब अपना एक अखबार भी ठिकाने लगा दिया. इंडिया टुडे मैग्जीन सेक्शन से दो सौ लोगों की छंटनी पहले ही ये कर चुके हैं.

मतलब करीब पांच सौ लोगों के पेट पर ये लात मार चुके होंगे. इस तरह इन्होंने खुद की तिजोरी के करोड़ों रुपये बचा लिए लेकिन सैकड़ों घरों का चूल्हा बुझा दिया. ये होती है बड़े लोगों की नैतिकता. जब इतने बड़े मीडिया हाउस का मालिक ये सब कुकृत्य धड़ल्ले से कर सकता है तो छुटभैय्यों के क्या कहने!

अरुण पुरी पत्रकार हुआ करते थे. इंडिया टुडे मैग्जीन में संपादकीय लिखा करते थे. अब भी लिखते होंगे. पर ये जो कुछ कांड उन्होंने किया है, वह उन्हें मनुष्यता विरोधी, मीडिया विरोधी, लोकतंत्र विरोधी और जन विरोधी साबित करता है. वे अगर अपने यहां कार्यरत सभी मीडियाकर्मियों को समायोजित करते, उन्हें नए सिरे से ट्रेंड करते, उन्हें सेलरी वगैरह कम करके साथ जोड़े रहते, उन्हें नए कामकाज के लिए प्रेरित करते तो उन्हें रीयल पत्रकार माना जाता जो केवल बड़ी बड़ी बातें लिखता बोलता ही नहीं बल्कि उसे जीता है, उसे व्यवहार में लाता है. पर उनने ऐसा न किया. उनने भी पूंजीपतियों वाला शार्टकट अपनाया.

इससे साबित होता है कि कभी पत्रकार रहे अरुण पुरी अब पूरी तरह एक लोभी बनिया में तब्दील हो चुके हैं जो अपनी तिजोरी में नोटों की गड्डियां बढ़ाने के लिए लात-हाथ सब चलाता है. इनके यहां काम करने वाले एक से बढ़कर एक वैचारिक पुरोधा भी इस महाछंटनी पर चुप्पी साधे हुए हैं क्योंकि उनकी लाखों की नौकरी जो बची हुई है!

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