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आज विश्व रेडियो दिवस है। रेडियो यानी आवाज़ की वो दुनिया जिसमे बातें हैं कहानियां हैं गीत संगीत है नाटक है रूपक है बाल कार्यक्रम है महिलाओं का कार्यक्रम है बुज़ुर्गों का कार्यक्रम है युवाओं का कार्यक्रम है सैनिक भाइयों का कार्यक्रम है किसानों का भी कार्यक्रम है समाचार है और है वो सब कुछ जो हमारी इस दुनिया में है। रेडियो के आविष्कारक मारकोनी ने जब पहली बार इटली में 1895 रेडियो सिग्नल भेजा और उसे सुना तो भविष्य का इतिहास वहीं अंकित हो गया था। एक कमरे में किया गया ये प्रयोग जब 1899 में इंग्लिश चैनल को रेडियो सिग्नल पार करता दूसरी छोर पर चला गया तो हंगामा मच गया। लेकिन रेडियो सिग्नल मात्र भेजना एक उपलब्धि तो थी लेकिन सवाल ये था कि क्या आवाज़े भी इस माध्यम से जा सकेंगीं।

1906 में कनाडा के फेसिडेन ने भी रेडियो में नए प्रयोग किये लेकिन मारकोनी और फेसिडेन से ही प्रेरणा लेकर न्यूयॉर्क अमेरिका के आर्मस्ट्रांग ने 1913 में पहली बार रेडियो सर्किट को डिज़ाइन किया और रेडियो के सिग्नल को स्पीकर द्वारा सुना गया यानि रेडियो सिग्नल अब आवाज़ का रूप ले चुकी थी, यानी आवाज़ की दुनिया का आग़ाज़ हो गया था, लेकिन इसकी बेहतरी और दूसरे रिसर्च में और भी वक़्त लगा, फिर 31 अगस्त 1920 से रेडियो पर समाचारों का प्रसारण डेट्रॉइट मिशिगन में शुरू हुआ, लेकिन ये प्रसारण भी प्रयोग के तौर पर ही था, 1922 में चेम्सफोर्ड इंग्लैंड के मारकोनी रिसर्च सेंटर से रेडियो का विधिवत प्रसारण आरम्भ हुआ।

जुलाई 1923 में जब भारत पर ब्रिटिश का राज था उसी समय भारत में रेडियो प्रसारण की बात शुरू हुई जो 23 जुलाई 1927 को बम्बई में (आज का मुम्बई) इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के नाम से शुरू हुई, 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता से (आज का कोलकाता) भी रेडियो प्रसारण शुरू हो गए। 8 जून 1936 को रेडियो को एक नया नाम मिला यानि "ऑल इंडिया रेडियो" जिसे हम आकाशवाणी के नाम से भी जानते हैं।

देश का तब बटवारा नहीं हुआ था और कला के गढ़ के रूप में लाहौर जो अब पाकिस्तान में है वो सबसे आगे था, रेडियो का असर भी इन शहरों पर हुआ और लाहौर, पेशावर और करांची में भी रेडियो स्टेशन खोले गए। वक़्त तेज़ी से बदल रहा था, मनोरंजन के रूप में ग्रामोफ़ोन के बाद रेडियो का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था, कमरे में एक कोना रेडियो के लिए सुरक्षित था, तब के रेडियो बहुत बड़े और भारी भरकम होते थे, आवाज़ ऐसी की कुछ दूर तक आवाज़ सुनाई दे, इसी बीच रेडियो सिलोन का प्रसारण शुरू हुआ और रेडियो का दायरा और बढ़ गया, प्रायोजित कार्यक्रम और विज्ञापन भी आये, सिलोन की लोकप्रियता के कारण ऑल इंडिया रेडियो को नयी राह खोजनी पड़ी औरus राह का नाम था विविध भारती, 3 अक्टूबर 1957 को विविध भारती आरम्भ हुआ जो आज तक देश की सुरीली धड़कन बना हुआ है।

अब बातें आज के रेडियो की - रेडियो का मतलब बिजली से या बैटरी से चलने वाला उपकरण नहीं था, रेडियो का मतलब ही आकाशवाणी था , रेडियो उद्घोषक किसी भी बड़ी सेलिब्रिटी से कम नहीं होता था। यादों के झरोखों से जब देखता हूँ तो मैं आज भी नतमस्तक हो जाता हूँ इनके लिए जिन्होंने अपनी ऊँगली पकड़ कर आकाशवाणी की भाषा और सलीका सिखाया, जिसके लिए मैं आजन्म ऋणी रहूँगा... कुछ नाम- जगत कुमार निगम (उद्घोषक), सुरेन्द्र कुमार उपाध्याय (उद्घोषक), पुष्पा आर्याणी (उद्घोषिका), एसपी किरण (केंद्र निदेशक), मंजू श्री वर्मा, सुमन कुमार, सुषमा शुक्ला, गुप्तेश्वर नाथ श्रीवास्तव, अरुण कुमार सिन्हा, स्नेहलता पारुथी, सरिता शर्मा, बद्री प्रसाद यादव, शंकर प्रसाद, किरण घई, सत्या सहगल, कृष्णा कुमार भार्गव, मनोज कुमार मिश्र, अन्नत कुमार, जयनारायण शर्मा , निर्मल सिकदर (केंद्र निदेशक), विजय लक्ष्मी सिन्हा (उप महानिदेशक), ग्रेस कुजूर (उप महानिदेशक), रोज़लिन लकड़ा (केंद्र निदेशक), माधुरी चतुर्वेदी (उद्घोषिका), विजय कुमार सिन्हा मंटू, राधाकृष्ण (केंद्र निदेशक, जाने माने लेखक), रवि खन्ना, उमेश अग्निहोत्री, जगदीश वशिष्ठ, गुलशन मधुर, रामेश्वर सिंह कश्यप (लोहा सिंह के नाम से विख्यात), जनार्दन राय , बांके नंदन प्रसाद सिन्हा (केंद्र निदेशक) और भी कुछ आवाज़ें जिनके बिना ये आलेख अधूरा रहेगा, रेडियो की आवाज़ अमीन सयानी, ब्रिज भूषण, मनोहर महाजन, दलवीर सिंह परमार, विजय लक्ष्मी, कव्वन मिर्ज़ा, शमीम फ़ारुक़ी, एस. एम. शफ़ीक़, बीना होरा, शीला डायसन, बालेंदु बडोला, सुषमा आहूजा और वो सभी जो रेडियो के लिए ही बने थे उन सभी को मेरा प्रणाम।

और, चलते-चलते रेडियो के लिए दो नाम कैसे भूल जाऊं, महान भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस और जर्मन वैज्ञानिक हेनिरिक रुडोल्फ हर्ट्ज़, भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस रेडियो तरंगो के बारे में जानने वाले पहले वैज्ञानिक थे लेकिन मारकोनी बाज़ी मार गए। आज रेडियो स्टेशन का मीटर बोलते समय जिस हर्ट्ज़ की बात हम करते हैं वो हेनिरिक रुडोल्फ हर्ट्ज़ के नाम से ही लिया गया है।

रेडियो किलो हर्ट्ज़ से अब मेगा हर्ट्ज़ तक जा पहुंचा है, मीडियम वेव, शार्ट वेव, और अब एफ एम की तरंगो पर रेडियो घर के कोने से निकल कर आपकी जेब में आपके मोबाइल में भी आ गया है, ये रेडियो की लोकप्रियता का ही कमाल है। चलते-चलते एक और बात आकाशवाणी के अलावा भी बी बी सी और  जर्मन रेडियो डायजेवेले, रेडियो ताशकंद, रेडियो पेकिंग और रेडियो जापान ने भी प्रसारण में अहम् भूमिका निभाई है और वो भी हिंदी प्रसारण में।

आज प्राइवेट एफ एम चैनल उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, लोग कहते हैं प्राइवेट एफ एम चैनल आकाशवाणी जैसी शालीन भाषा का प्रयोग नहीं करते, मैं इतना ही कहूंगा आज से कुछ वर्ष पहले जब टेलीविज़न ने रेडियो का घर का कोना हथिया लिया था तब धीरे धीरे रेडियो हमारी ज़िन्दगी से बाहर होता गया लेकिन एफ एम रेडियो आने के बाद रेडियो न सिर्फ वापस हुआ बल्कि इसने टेलीविज़न से बराबरी का हक़ भी वापस ले लिया, आज एफ एम रेडियो मनोरंजन के साथ साथ रोज़गार भी दे रहा है।

लेखक अशोक अनुराग आकाशवाणी दिल्ली एवं आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा में कैज़ुअल हिंदी रेडियो उद्घोषक हैं. आकाशवाणी पटना से 1967 में शिशु महल कार्यक्रम से जो रिश्ता रेडियो से जुड़ा वो आज तक चल रहा है. अशोक अनुराग से संपर्क के जरिए किया जा सकता है.

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