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विष्णु गुप्त

क्या लखनऊ की पत्रकारिता अखिलेश सरकार की रखैल है? लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर क्यों बना हुआ रहता है? अखिलेश सरकार के खिलाफ लखानउ की पत्रकारिता कुछ विशेष लिखने से क्यों डरती है, सहमती है? अखिलेश सरकार की कडी आलोचना वाली प्रेस विज्ञप्ति तक छापने से लखनऊ के अखबार इनकार  क्यों कर देते हैं? अब यहां प्रष्न उठता है कि लखनऊ के अखबार अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने से डरते क्यों हैं? क्या सिर्फ रिश्वतखोरी का ही प्रश्न है, या फिर खिलाफ लिखने पर अखिलेश सरकार द्वारा प्रताडित होने का भी डर है?

सही तो यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने पर लखनऊ की पत्रकारिता को प्रताड़ित होने का भी डर है और रिश्वतखोरी से हाथ धोने का भी डर है। अखिलेश सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों तरह के हथकंडे अपना रखे है। एक हथकंडा पत्रकारों और अखबार मालिकों को रिश्वतखोरी कराने और दूसरे हथकंडे में खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करना।

अखिलेश सरकार के इस दोनों हथकंडों की परिधि में लखनऊ की पत्रकारिता पूरी तरह चपेट में हैं। ईमानदार और स्वतंत्र पत्रकारों की हत्या हुई, उत्पीड़न हुआ पर लखनऊ में अखिलेश सत्ता के खिलाफ पत्रकारों की कोई सशक्त आवाज नहीं उठी। यूपी के पत्रकारों की हत्या और उत्पीडन की आवाज दिल्ली तक तो पहुंची और दिल्ली में अखिलेश सरकार के खिलाफ पत्रकारों की आवाज भी उठी थी पर लखनऊ में सषक्त आवाज नहीं उठी। पत्रकारिता हमेशा सत्ता को आईना दिखाने के लिए जानी जाती है और यह धारणा विकसित है कि स्वच्छ और निडर पत्रकारिता ही अराजक, भ्रष्ट और निकम्मी सत्ता की कुंभकर्णी नींद से जगाती है और जन चेतना का संचार कर ऐसी सत्ता को जनाक्रोश का सामना कराती है। पर पत्रकारिता के इस धर्म का कहीं कोई वीरता है नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए यह चितांजनक स्थिति है, जिस पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

अभी-अभी हमने लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर देखा है, अखिलेश सरकार की शरणागत पत्रकारिता को देखा है। कैसे एक मामूली प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम का अखबार या चैनल संज्ञान लेने से इनकार कर देते हैं कि वह प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम अखिलेश सरकार के खिलाफ था। प्रसंग मेरी पुस्तक से जुड़ा हुआ है। सर्वविदित है कि अखिलेश के गुंडा राज पर एक मेरी पुस्तक आयी है, पुस्तक का नाम है, 'अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार'। लोकशक्ति अभियान द्वारा लखनऊ में मेरी पुस्तक पर एक परिचर्चा कार्यक्रम रखा गया था। परिचर्चा कार्यक्रम में कई हस्तियां शामिल थीं, कई पत्रकार भी शामिल थे। परिचर्चा कार्यक्रम में लोगों ने पुस्तक पर खट्टी-मिटठी चर्चा की। हमने यह सोचा था कि परिचर्चा कार्यक्रम को एक समाचार दृष्टि से जरूर जगह मिलेगी। जिन अखबारों के प्रतिनिधि नहीं पहुंचे थे उन अखबारों को परिचर्चा कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति कार्यक्रम के आयोजक लोकशक्ति अभियान द्वारा भेज दी गयी थी। पर परिचर्चा कार्यक्रम की खबर कहीं भी नहीं छपी।   

मैं एक कॉलमनिष्ट हूं। लखनऊ के कई अखबारों में मेरा कॉलम भी छपता है। इसलिए मैने कई संपादकों को कॉल कर पूछ लिया कि भाई परिचर्चा कार्यक्रम की खबर क्यों नहीं छापी? यह तो साधारण और सूचनात्मक खबर थी। पहले तो आनाकानी हुई फिर संपादकों का कहना था कि अखिलेश सरकार से कौन बैर लेगा, अखिलेश के गुंडों से कौन लडाई मोल लेगा, आप तो दिल्ली वाले हैं, लखनऊ से सीधे दिल्ली पहुंच जायेंगे, आपको डर नहीं है पर हमे तो लखनऊ में रहना है, अगर अखिलेश सरकार की वापसी हो गयी तो फिर अगले पांच साल तक हमारा अखबार निशाने पर रहेगा। संपादकों की यह चिंता और डर के पीछे एक नहीं कई अन्य रहस्य भी है जिन्हें बेपर्दा करना जरूरी है।

अब यहां प्रश्न उठता है कि अखबारों और संपादकों के डर के पीछे अन्य रहस्य क्या है? संपादकों ने पूरा सच नहीं बताया। यह सही है कि राज्य सत्ता के खिलाफ लिखने और अभियानरत रहने से उत्पीड़न का खतरा रहता है। पर पत्रकारिता तो खतरों से खेलने का नाम है, पत्रकारिता तो जान पर खेलकर खबरें निकालने और सभी को सच का आईना दिखाने का नाम है? राज्य सत्ता से डरने वाले, गुंडों से डरने वाले, समाजविरोधी से डरने वाले, भ्रष्ट अधिकारियों से डरने वाले और ऐेसे लोगों के सामने शरणागत होने वाले लोग पत्रकार हो ही नहीं सकते हैं, ऐसे लोग चरणपादुका संस्कृति के होते हैं, दलाल किस्म के होते हैं, इनके लिए पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक सशक्त माध्यम भर होती है, पत्रकारिता को सरकार, गुंडों, असामाजिक तत्वों और भ्रष्ट अधिकारियों का चरणपादुका बना कर अपनी झोली भरते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता में लोग एक मिशन के तहत नहीं आते हैं, वीरता दिखाने के लिए नहीं आते हैं, परिवर्तन के लिए नहीं आते हैं, क्रांति के लिए नहीं आते हैं। सिर्फ और सिर्फ पेट पालने और नौकरी करने आते हैं। फिर अन्य लोगों और पत्रकारों में अंतर क्या रह जायेगा? पत्रकार फिर अपने को विशेष क्यों और कैसे कह पायेंगे।

जब हमने जानने की यह कोशिश की आखिर असली रहस्य क्या है तो पता चला कि यह रहस्य रिश्वतखोरी का है। लखनऊ में पत्रकारों को रिश्वतखोरी कराने की एक बडी विषैली संस्कृति बन चुकी है। रिश्वतखोरी कराने के लिए प्रतिस्पर्द्धा होता रहा है। प्राय: सभी सरकारो में यह संस्कृति रही है। पर अखिलेश की सरकार मे यह संस्कृति और भी विषैली बन गयी है। लखनऊ ही नहीं बल्कि नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों में सैकडों पत्रकारों को अखिलेश सरकार ने आवास की सुविधा दी है। सरकारी नियम के अनुसार जिसका जिस शहर में अपना आवास होता है उस शहर मेें ऐसे पत्रकार को सरकारी आवास नहीं मिल सकता है। पर दर्जनों-दर्जनों ऐसे पत्रकार हैं जिनका खुद का मकान है पर सरकारी मकान भी आंवटित करा रखे हैं। कई ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होने वर्षों पहले पत्रकारिता छोड रखी है, जिनका अब पत्रकारिता से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है फिर पत्रकार कोटे से सरकारी आवास की सुविधा भोग रहे हैं। कई ऐसे लोग भी है जिनकी जिंदगी कब्र में लटकी हुई है फिर भी पत्रकार के नाम पर सरकारी मकान की सुविधा से अपनी दो पीढियों को लाभार्थी करा रहे हैं। ऐसे लोग अखिलेश सरकार से डर कर पत्रकारिता का गला तो घोटेंगे ही, यह तय है।

सरकारी विज्ञापन एक बड़ा कारण है। छोटा-बड़ा सभी अखबार और चैनल आज सरकारी विज्ञापन पर निर्भर हैं। सरकारी विज्ञापन के लिए अखबार और चैनल फर्जी सर्कुलेशन दिखाते हैं। लखनऊ में कई ऐसे अखबार हैं जिनका सर्कुलेशन लाख-लाख तक है पर ऐसे अखबारों का कार्यालय भी ढंग का नहीं है, नियमित कर्मचारी तक नहीं है, पत्रकार के नाम पर ऑपरेटर रख कर अखबार निकाल लिया जाता है। बडे़ अखबार भी कोई दूध के धोये हुए नहीं है। बडे़ अखबारों के कई धंधे होते हैं, बडे अखबारों के मालिक पैरवी और दलाली का कार्य करते हैं। बडे़ अखबारों के वैध और अवैध धंघे तभी तक चलते रहेंगे और इनकी पैरबी और दलाली तभी तक चलती रहेगी जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। विज्ञापन भी तभी तक मिलते रहेंगे जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। अगर अखबार और चैनल सत्ता के साथ मधुर संबंध नहीं रखेगे तो फिर सत्ता इनकी फर्जी सर्कुलेशन की पोल देगी और सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया जायेगा। सरकारी विज्ञापन बंद होने से छोटे अखबार बंद हो जायेगे और बडे अखबारों का भी बुरा हाल हो जायेगा।

जिन लोगों ने अखिलेश सरकार के खिलाफ जाकर लिखने का साहस दिखाया है उन सभी पत्रकारों को अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पडा है। एक पत्रकार है जिनका नाम अपूप गुप्ता है, वे एक पत्रिका निकालते है, जिनका नाम दृष्टांत है। दृष्टांत नामक पत्रिका पिछले 15 सालों से सत्ता के खिलाफ बुलंदी के साथ लड रही है। अनूप गुप्ता और उनकी पत्रिका दृष्टांत की खासियत यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ आग उगलती रही है, अखिलेश सरकार के कुनबेवाद, गुंडावाद, भ्रष्टचारवाद के खिलाफ लिखते रहे हैं, एक पर एक भ्रष्टाचार, गुडागर्दी की कहानियां खोलते रहे हैं। पर इसकी कीमत अनूप गुप्ता को चुकानी पडी है।

पहले तो अखिलेश सरकार और उनकी भ्रष्ट नौकरषाही का बदबूदार चेहरों ने अनूप गुप्ता पर लालच का हथकंडा अपनाया। जब लालच के हथकंडे में अनूप गुप्ता नहीं फंसे तो फिर उन पर तरह तरह के जुल्म ढाये गये, उत्पीडन की कोई कसर नहीं छोडी गयी। अनूप गुप्ता की पत्रिका का निबंधन रद करा दिया गया, अनूप गुप्ता की हत्या तक कराने की कोषिष हुई। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रातोरात अनूप गुप्ता का आंवटित आवास का आंवटन रद कर दिया गया। अनूप गुप्ता का आवास से सारा सामान सडक पर फेक दिया गया। अगर अनूप गुप्ता भी अखिलेश सरकार की चाटुकारिता पंसद कर ली होती तो फिर न तो उनसे आवास छीना जाता और न ही उनका उत्पीडन होता। अखिलेश की सत्ता में एक पत्रकार को कैसे जला कर मार डाला गया था, यह भी उल्लेखनीय है।

लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता की जगह ईमानदार, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता की स्थापना की उम्मीद भी तो नहीं बनती है।

लेखक विष्णु गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और इनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। लेखक से मोबाइल नंबर 09968997060 या मेल आईडी के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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