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बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

अखबार मालिक ही नहीं मालिक का एजेंट संपादक भी यही सवाल दाग देता है कि अखबार निकालने में करोड़ों खर्च होते हैं कोई करोड़ों रुपए समाजसेवा पर क्यों खर्च करेगा। बस यही से शुरू होता है खेल। पहले विज्ञापन के नाम पर या आड़ में होता था अब पेड न्यूज जैसी तमाम चीजें शामिल हो गई है। इन्ही तमाम चीजों में एक है लठैती। मीडिया धीरे-धीरे ही सही पेशेवर लठैत होता जा रहा है। एक कहावत है कि," पूत के पांव हमेशा पालने में ही नहीं रहते"। विज्ञापन के मायाजाल से ही इसने केंचुल बदलना शुरू किया। पाठकों को सूचना देना, गरीबों-मजलूमों की आवाज बनने के बजाए मालिकों, नेताओं की ढाल बनने लगा। अब यह ढाल वार रोकने तक ही सीमित नहीं वह प्रहार भी करने लगा। यह प्रहार गरीब निरीह जनता के लिए नहीं मालिकों और नेताओं के लिए होने लगी। यानी मीडिया लठैत हो गया। सामंतयुगीन व्यवस्था में लठैत अपने मालिक के लिए " कुछ भी" करने को तैयार रहते थे वो भी सेवाभाव से। आज मीडिया भी तैयार रहता है सेवाभाव से। आज का मीडिया लाठी लिये मालिक के धंधों को हांकता रहता है।

आज एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है वह है कारपोरेट मीडिया। अब ये काँपोरेट मीडिया क्या है अपुन अभी तक नहीं समझ पाये हैं। जब बड़े घराने मीडिया के "धंधे" में आये तो मोटामोटी एक ही बात भेजे में घुसेड़ी जाती थी कि, ये अपने अन्य धंधों की रक्षा के लिए अखबार (तब टीवी चैनल नहीं थे) निकालते हैं। अपने अन्य धंधों के होने वाले मुनाफे का कुछ प्रतिशत अखबार को दे दें तो वह चाहे घाटे में रहे या फायदे में कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब बिड़ला के हिंदुस्तान अखबार को ही ले लें। बिड़ला जी के पचासों धंधे थे उसके मुनाफे से कुछ फीसद अखबार को दे दिया तो अखबार चाहे जैसे चले कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे घाटे में ही रहे। लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि बंटवारे के बाद एक पारिवारिक सदस्य को सिर्फ अखबार ही मिला है।

बात लठैत की। हाल के चुनावों व उसके मीडिया की भूमिका किसी लठैत से कम नहीं रही। लठैत की सबसे बड़ी खूबी यह भी होती है कि वह अपने मालिक के इशारों को अच्छी तरह से समझता है। मीडिया भी समझने लगा है। मसलन कब उसे किसे कितना महत्व देना है। किसकी रैली, रोड शो या जनसभा को कितना कवर करना है। बसपा का एक नारा था, ''जिसकी जितनी आबादी, उतनी उसकी हिस्सेदारी''। मीडिया भी पार्टी प्रचारकों की लाइव कवरेज भी कुछ इसी आधार पर करता रहा। भाजपा का सबसे ज्यादा, बाकी में कांग्रेस, सपा और बसपा ही होते थे जबकि चुनाव में आरएलडी, जेडयू, राजद, यूकेडी, अकाली और वामपंथी भी थे। नेताओं के साथ विशेष कवरेज भी विशेष तक ही सीमित रही। गोया अन्य दलों के प्रमुख गाजर-मूली हैं।

ये तो रही चुनाव के आगे-पीछे की कवरेज। उसके बाद भी मीडिया की भूमिका लठैत की ही होती है। वह कौन सा अखबार और चैनल है जो अपने मालिक के खिलाफ एक लाइन भी लिख दे। दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन के खिलाफ कभी एक लाइन छपा है। राष्ट्रीय सहारा के सहारा श्री लखनऊ में गिरफ्तार हुए किसी संस्करण में एक लाइन खबर नहीं थी, क्यों। क्योंकि लठैत कि यह भी खूबी होती है कि वह मालिक के आगे शीश नवाये रखता है। मालिक तो मालिक के करीबी के खिलाफ भी तब तक खबर नहीं छपती जब तक की वह बुरी तरह से फंस न जाए। रामदेव के करीबी बाल कृष्ण फर्जी डिग्री के मामले में देहरादून में गिरफ्तार हुए। राष्ट्रीय सहारा के अन्य  संस्करण की जाने दीजिए देहरादून में भी एक लाइन खबर नहीं छपी। हां इंदौर से रामदेव का खंडन हर अंक के पहले पेज पर छपा। (अखबार की फाइल गवाह है)

यही लठैत कभी भी विज्ञापन देने वाले पर तब तक खबर नहीं लिखते जब तक वह बुरी तरह से घिर न जाए या मालिक हरी झंडी न दे दे। विज्ञापन देने वाले इनके लिए पार्टी होते हैं। आजकल एक नया रिवाज शुरू हो गया है। स्क्रीन पर एक ही नेता की दो-दो फोटो वो भी एक साथ। मसलन, विज्ञापन की जगह एल बैंड के रूप में आदित्य नाथ और समाचार में भी वो भी एक ही समय में। आने वाले दिनों में दांये-बांये, ऊपर नीचे भी हो सकती है। अखबार का मास्टहेड एक ही दिन तीन-तीन होता है यानी  पहले पेज की तरह तीन तो कभी चार पेजों पर अखबार का नाम होता है।

यह भी एक तरह से मीडिया की लठैती ही है। कभी मीडिया की लाठी कमजोरों के लिए, उत्पीड़ितों के लिए उठती थी अब किसके लिए उठती है और क्यों उठती है सब जान गये हैं। भाजपा से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने वाले जी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा के खिलाफ जीटीवी की लाठी जीटीवी के लठैत उठा सकते हैं क्या?

अरुण श्रीवास्तव
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