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Yashwant Singh : इधर बीच 2 अफसरों से मिलना हुआ। एक आईएएस और दूसरे आईपीएस। क्या कमाल के लोग हैं दोनों। इनसे मिल कर ये तो संतोष हुआ कि ईमानदारी और दबंगई की जुगलबन्दी के जो कुछ स्पार्क शेष हैं इस महाभ्रष्ट सिस्टम में, वे ही जनाकांक्षाओं में उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। इन दोनों अफसरों के बारे में थोड़ा-सा बताना चाहूंगा। इनके नाम हैं- आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे। एक नोएडा के डीएम, दूजे गाजीपुर के पुलिस कप्तान।

NP Singh

SC Dubey

वैसे बता दूं, अफसरों से मिलना मुझे पसंद निजी तौर पर पसंद नहीं, मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं। चाहे दैनिक जागरण में रहा या अमर उजाला में या आई नेक्स्ट में... चाहे सिटी चीफ रहा या संपादक रहा... अफसरों के यहां खुद चल के एक्का दुक्का बार ही गया हूंगा... दिमाग में ज्यादातर अफसरों के रीढ़ विहीन और बेईमान होने की छवि गुंथे होने से शायद उनसे मिलने जुलने से परहेज रखता रहा हूं। पिछले 8 वर्षों में, भड़ास संचालित करने के दौरान, जिन कुछ ईमानदार और कलेजे में दम रखने वाले लोगों के बारे में सुना जाना उनमें से एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे भी हैं।

एनपी का पंगा आज़म खान से हुआ था, अखिलेश के सीएम बनने के ठीक बाद। ये अफसर डटा रहा। आज़म खान कोपभवन में जाकर ही अखिलेश को मजबूर कर पाए एनपी को उनके मंत्रालय से हटाने के लिए। लेकिन तब तक अखिलेश इस अफसर की ईमानदारी, लोकप्रियता और साहस के बारे में जान चुके थे। दंगा रोकने के लिए शामली भेजे गए एनपी। अभी डीएम नोएडा हैं, काजल की कोठरी में दामन दागदार होने से बचाए हुए हैं। इन्होंने गरीब बच्चों के लिए दो रोजगार परक तकनीकी स्कूल संचालित करके कमाल का काम किया है। एक चंदौली के नक्सल एरिया में। दूसरा बनारस के अपने पिंडरा इलाके वाले गांव में। इन स्कूलों के संचालन में अपने परिवार की संपत्ति होम की और भला किया उन बच्चों का जिनका समाज में कोई नहीं। दर्जनों इनके ऐसे सामाजिक काम हैं जिनको देख सुन के कहने का मन करता है कि क्या लूटतंत्र में ऐसे भी जन सरोकारी, ईमानदार और सोशल एक्टिविस्ट टाइप अफसर हैं, जो आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता का चुपचाप निर्वहन किए जा रहे हैं!

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे की ईमानदारी, जन पक्षधरता और सिस्टम से भिड़ जाने का माद्दा रखने के बारे में ज्यादातर लोगों को समय समय पर मीडिया से पता चलता ही रहता है। यही कारण है कि वो या तो सस्पेंड रखे जाते हैं या फिर प्रतीक्षारत। उन्हें अक्सर चुनाव आयोग याद करता है और चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण जिममेदारी देता है। इस दफे गाज़ीपुर भेजे गए। इनने फर्जी वोटिंग के खेल का ऐसा रैकेट पकड़ा कि सात बार चुनाव जीत चुके ओमप्रकाश सिंह इस बार तीसरे पोजीशन पर अटक गए। अपने करियर में हजार से ज्यादा निर्दोषों को जेल जाने से बचाया, निष्पक्ष पुलिसिंग के मिशन को मिशनरी भाव से जीते हुए। सुभाष चंद्र दुबे की हिम्मत और ईमानदारी के दर्जनों वाकये हैं। अदभुत जीवट का पुलिस अफसर है ये। न आका टाइप अफसरों के यहां सिर नवाया न मठाधीश टाइप मंत्रियों को सलाम ठोंका। हल्लाबोल अंदाज़ में, बिना भेदभाव किए, जो गुनाहगार मिला, उसे धर दबोचा। अजगरों को उनके बिलों में घुसकर पकड़ने वाले सुभाष को सत्ता जनित बदमाशी कमीनगी और धूर्तता के जाल में फांसकर साजिशन जो उत्पीडन उपेक्षा मुहैया कराए गए उसे उनने ईश्वर की नेमत / करियर का मेडल मान कर तहेदिल से कुबूला और भरपूर एन्जॉय किया।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं...

Golesh Swami Both are nice officers. Np singh is my good friend and subhash chandra dubey as younger brother. Np ki khasiyat yeh hai ki Lucknow mai DM koi bhee raha, jila NP singh ne hi chalya. Subhash bhai ke baare mai kya kahu heera officers mai se hai. NP aur subhash jaise officer u.p. mai unglio par ginne layak hai. Aise officer ho to u.p. sudhar jaye.

अशोक कुमार शर्मा सही बात की यशवंत आपने! मुझे मालूम है कि आप ताकत से प्रभावित नहीं होते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय के ओएसडी के रूप में मैंने दो मामलों में आपसे संपर्क किया. आपने सरकार का पक्ष तो दिया मगर कोई समझौता या मांग नहीं मानी. सूत्र भी नहीं बताया अपना. लालच में आप आये नहीं. मैंने भी अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यकाल में यही पाया कि इन दोनों अफसरों में अनेक ख़ास बातें है: एनपी साहब ओजस्वी और कड़क अफसर होकर भी आम आदमी के हक़ में सेवाभाव से खड़े रहते हैं. आसान नहीं उनको डिगाना. प्रेस क्लब के एक समारोह में मैंने उनको पहली बार बोलते सूना था. उन्होंने पत्रकारों को भी समझाया कि ईमानदारी और शासन के इकबाल का पुराना दौर वापस लाना है तो खबरों में 'लिहाज' ना करें किसी का. सुभाष जी क्रांतिकारी अफसर हैं. सीधे एक्शन लेते हैं. लपझप बिलकुल नहीं करते. उत्तर प्रदेश में इन जैसे अच्छे अफसरों की कमी नहीं है. लेकिन सत्ता को कदर कहाँ है? मैंने सूचना विभाग में ही देखाकभी वहां कमीशन और दलाली तंत्र शैशव और वामाना अवस्था में था. और अब? करप्शन का कारपोरेट..

Vinod Bhardwaj एन पी सिंह के बारे में खबरिया जानकारियां हैं , पर सुभाष चंद्र दुबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । आज के सड़ांध मारते सिस्टम में भी दोनों ने अपनी महक और चमक को बरकरार रखा है । ये दोनों ही एक शानदार नजीर हैं , इनको दिल से सलाम !  ... और जिसकी निष्पक्षता और काविलियत को लिखने के लिए यशवंत सिंह जैसे पत्रकार की कलम मचलने लगे , उसे किसी और के सर्टीफिकेट की जरूरत ही नहीं ! यशवंत भाई कभी मौका मिले तो डी जी सुलेखान सिंह से लखनऊ जाकर जरूर मिलना । उनसे मिलकर और उनका अतीत जानकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाओगे । ये मोस्ट सीनियर आई पी एस भी अब रिटायरमेंट के करीब ही हैं ।

S.p. Singh Satyarthi अगर यशवंत जी किसी का मूल्य लगा रहे हैं तो निश्चित ही वह हीरा होगा।

Care Naman अगर भड़ासी किसी अधिकारी की तारीफ़ कर रहा है तो सच में बंदे में है दम इस बात पर आँख बंद कर के यकीन किया जा सकता हैं

Shambhunath Shukla एनपी सिंह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर हैं। सुभाषचंद्र दुबे से कभी मिला तो नहीं पर उनके बारे में सुना अवश्य है।

Ramji Mishra हमारे महोली में एक उपजिलाधिकारी के एन उपाध्याय जी आये थे बहुत ईमानदार रहे लेकिन उनसे अतिरिक्त कमाई सपने में भी नहीं की जाती थी नतीजा यह हुआ प्रमोशन में लोहे लगते रहे हक़ मारा जाता रहा। बनारस भेज कर आबकारिविभाग में कर दिए गए लेकिन उपजिलाधिकारी का पद छीन लिया गया। और तो और अब उनकी जगह महोली की कमान उपजिलाधिकारी अतुल को दी गई है जो कई सालों से राज कर रहे हैं। अतुल इससे पहले गोरखपुर में तहसीलदार रहे हैं और वहाँ पर भी लोग दबी जुबान न जाने क्या क्या बातें इनके बारे में कहते थे। अब महोली में तो इनके संरक्षण में ही खुले आम खनन , घूसखोरी और दबंगई फलफूल रही है। यहीं नहीं अगर अतुल को जरा सा गुस्सा आता है तो सामने वाले को मारने और पीटने से भी उन्हें दनिक भी गुरेज नहीं है। फिलहाल जिन दो अधिकारियो के बारे में सर आपने लिखा उनको जय हिंद और आपकी पोस्ट सराहनीय है।

Poonam Scholar ऐसे समाज सुधारकों और अफसरों से अन्य समाजसेवियों और भावी अफसरों को अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए। आभार साझा करने के लिए।

Siddhartha Malviya ई सही पकडे हैं... दुबे जी बड़े रॉयल आदमी हैं। अच्छो के अच्छा और बुरो के लिए बहुत बुरा।

Kumar Anup Jha सर मैंने तो अभी इन दोनों सर को नहीं देखा हूँ.. नोएडा में ही रहता हूँ. जब बिहार में था तो वहां शिवदीप लांडे सर को देखा था.. वो मुझे अब तक काफी अच्छे अफसर लगे. हालांकि मैने कुछ अफसर को ही देखा है.

Varun Panwar एनपी सिंह शामली में जिलाधिकारी रहे, बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता, कुशल अधिकारी और एक अच्छे दोस्त... वैसे तो उनमें अनेको ऐसी प्रतिभा है जो शब्दों में व्यक्त करेगे तो काफी लंबा चौड़ा लिखना पड़ेगा... शामली में वो लगभग डेढ़ वर्ष रहे.. यहां के लिये उन्होंने बहुत कुछ किया... सुभाष जी मुज़फ्फरनगर में कुछ ही दिनों के लिये एसएसपी बनकर आये थे, दंगो के दौरान, एक बार मुलाकात हुई, अपने कार्य के प्रति सजग थे, जो कि वहाँ के सत्ता धारी नेताओ को रास नहीं आये.. दोनों की जोड़ी बहुत कुछ करने का माद्दा रखती है

Shahnawaz Qadri श्री एन पी सिंह के बारे मे जो आपने लिखा है वह कम है... उत्तर प्रदेश मे इस तरह के अधिकारी देखने को कम ही मिलते हैं..

Chandan Srivastava मान लीजिए मैं दिलीप मंडल हूं। तो मेरा फीड बैक यह है कि आप अव्वल दर्जे के जातिवादी, सवर्णवादी हैं। आपको दो अफसर ईमानदार मिले, एक ब्राह्मण दूसरा ठाकुर।  क्या आप यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों दलितों में कोई ईमानदार अफसर ही नहीं। :)

Shyam Singh उप्र. के डाकू छविराम और पातीराम गैंग को ध्वस्त करने वाले तथा दो-दो बार राष्ट्रपति पदक हासिल करने वाले तेज-तर्रार आइपीएस. विक्रम सिंह जी जब नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था। बाद में उन्हें कुमाऊं का डीआइजी. भी बनाया गया। मैंने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार पाया। अन्य पुलिस अधिकारियों की तरह उन्होंने किसी नेता को दंडवत् नहीं किया होगा। अध्यात्म में रुचि के कारण वे यहां स्थित अरविन्द आश्रम में जाकर उसके साधना व अन्य दैनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। उन्होंने मेरे से भी अध्याम विद्या सम्बंधी कुछ पुस्तकें लेकर पढीं। पुलिस में ऐसे अधिकारी मैंने कम ही देखे हैं।

Hero Dubey एनपी सिंह से तो परिचित नहीं हूँ सर! लेकिन सुभाष चंद्र दुबे कन्नौज के एसपी रहे हैं। वह बहुत ही शानदार अफसर हैं। जय हिन्द

Pranay Batheja सर आपको पहली बार देखा ऊपर की चंद लाईने पढा कि जिससे इतना पता चला आप पत्रकार हैं अफसरों से मिलना आपको पसंद नहीं फिर भी आप मिले शायद उनकी ईमानदारी आपको उनके ओर आकर्षित करके ले गई। इनके बारे में आप आगे विस्तार से लिखेंगे। लेकिन कोई पत्रकार के वर्तमान स्थिति को क्यों नहीं लिखता उन्हें क्यों नहीं परिभाषित करता जिसे सरकार, सरकारी तंत्र और जनता के बीच सेतु व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जो पत्रकारिता हमारे वीर क्रांतिकारी करते थे और जो पत्रकारिता वर्तमान में हो रही है इसकी वास्तविकता क्या है?

A.k. Roy वैसे मुझे भी अफसरों से मिलना अच्छा नहीं लगता मैं राजनीति एवं पत्रकारिता में रहते हुए कम से कम इन लोगों से मिलना चाहता हूं अब आपने बताया है तो कभी किसी एक कार्य हेतु मिलना हुआ अभी इनके बारे में कोई अपनी राय दी जा सकती है अगर इमानदार है तो इन्हें उसकी सजा भी आज के भ्रष्ट सिस्टम से मिलेगी चाहे वह सरकार किसी भी पार्टी की है..

Singhasan Chauhan सलाम है ऐसे ऑफिसर्स को , ऐसे ही एक IPS श्री प्रभाकर चौधरी आये थे हमारे बलिया में | काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ , कच्ची दारू, सड़कों पर अतिक्रमण, थाने में दलाली वगैरह सब बंद करवा दिए थे मगर भ्रष्ट नेताओ ने 2 महीने में ही उनका ट्रांसफर करा दिया .....इमानदारी अभी भी जिन्दा है .

Ramhet Sharma आपने जो लिखा है, उससे उनका का मऩोबल बढता है.. अच्छे अधिकारियों के अच्छे कार्य की सराहना की जानी चाहिए...

Ashwani Tripathi एनपी सिंह जी, शामली के डीएम रहे। बेहद गजब की नेतृत्व क्षमता है उनमे। एक अफसर और नेता दोनों की कुशल प्ररिभाओं का समावेश है, उनके अंदर। जब तक शामली में रहे, सभी नेताओं के घरों में बने चौपाल खाली रहे। वहां तो यह कहा जाने लगा था कि इस जिले में एक ही नेता है वो है एन पी सिंह। एन पी सिंह के दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले रहते थे। पत्रकारों के लिए भी एन पी सिंह से अच्छा कोई अफसर नहीं हो सकता। पत्रकारों के मान सम्मान को हमेशा उन्होंने बढ़ाया। रास्ते में भी कोई पत्रकार मिलता तो गाड़ी रोक कर पत्रकारों से हाल लेते। भाषण देने की उनकी क्षमता तो गजब है।

Ghanshyam Dubey N. P से सिर्फ पाला ही नहीं पड़ा , निजी तौर पर उन्हें जानता हूँ । वह एक रीढ़ की हड्डी रखने वाले कर्मठ अफसर हैं। सुभाष से कभी मिला नहीं हूँ , स्टेट लॉ एंड आर्डर देखने वाले कुछ कनिष्ठ पर काम मे तेज पत्रकारों से उनके बारे मे सुना है । सबने उनके काम - स्वभाव की तारीफ ही की है।


भड़ासानंद कहिन...

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  • Guest - MOHAN TIWARI

    आईएएस एन पी सिंह के बारे मे मैंने सुना है लोग अक्सर उनके ईमानदारी के मिशाल देते है। आईपीएस सुभाष चन्द दूबे के कार्यकाल को मेैने दो बार देखा और महशुस किया है। जिनसे मिलने के बाद आमजन की राय पुलिस के बारे में बदल जाती है। अपराधी शहर छोड़कर फरार हो जाते है। अपराधियो की पैरवी करने वाले भी सहम जाते है। आमजन के अधिक से अधिक मामले में सुलझाने का प्रयास करते है। अच्छे पुलिसिंग व्यवस्था का एहसास आमजन कों अपनी नकारात्मक राय बदलने को विवश कर देता है। पिछले शासनकालो में खटकती अच्छे पुलिसिंग का खामियाजा कालरबैण्ड से दूर रह कर भी सुभाष चन्द दूबे के कार्यशैली में कोई बदलाव नही ला सका। इनके अधिनस्थ भी अपने डयूटी पूरी मुस्तैदी से करने मेे स्वंय को गोैरवान्वित महशुस करते है। इनके बुलंद हौसलो के चलते रोजाना अपराधिक घटनाओ के खुलाशो की झड़ी लगी है। ऐसे आईएएस और आईपीएस की मांग आमजन में अधिक होने लगी है।

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