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छायाकार साथी मंसूर आलम के इंतकाल की खबर अंदर तक हिला गई। हिंदुस्तान की लांचिंग के वक्त हमने साथ काम किया था। बेहद सरल और भावुक मंसूर को कभी किसी भी कवरेज के लिए कह दीजिए, ना मना करते थे और ना ही चेहरे पर कोई शिकन लाते। ऐसे शख्स को कोई संपादक टेंशन कैसे दे सकता है। वैसे संपादक को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। कारण पुराना है। फौज में जिस तरह ट्रेनिंग होती है और फिर वो रंगरूट ट्रेनर बनता है तो वही करता है। कुछ ऐसा ही उसके साथ है।

कानपुर अमर उजाला में स्थानीय संपादक हुआ करते थे प्रदीप कुमार। उनकी मीटिंग से पहले और बाद में ये सज्जन ठंड में भी पसीना साफ करते नजर आते थे। लिहाजा एक तो वो असर और दूजे मौजूदा हिंदुस्तान के सबसे बड़े मुखिया व बनारसी इसी शैली को पसंद करने वाले महाशय जी का असर सब पर आ ही जाता है। रहा हिंदुस्तान की ओर से मदद का तो वहां ऐसा कोई खाना मेरे समय में संस्थान की ओर से नहीं था।

दशक भर से पहले की बात है जब एचआर के एक साथी की बनारस में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। तब भी इस संस्थान ने कोई मदद नहीं की थी। व्यक्तिगत स्तर पर पटना में बैठे मुखिया (वाईसी सर) ने मदद की थी। लिहाजा ना संस्थान को दोष दीजिए और ना ही बनारस के संपादक जी को। ये समय मंसूर जैसे साथी को खोने के गम में डूबने का है। अल्लाह उन्हें जन्नत बख्शे और उनके परिवार को हिम्मत व हौसला दे।

कई अखबारों के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार देशपाल सिंह पंवार की एफबी वॉल से.

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