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गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर (राजस्थान)

मेरी माँ थी। इसमें तो कोई खास बात नहीं, आप यही सोचेंगे। क्योंकि माँ तो जन्म लेने वाले हर जीव की होती है। रंग, रूप, सूरत भिन्न भिन्न होने के बावजूद सब माएं होती एक जैसी हैं, ममता, करुणा, दया, वात्सल्य, त्याग और उदारमना। कम शब्दों मेँ माँ जैसा कोई है ही नहीं। खैर, मेरी माँ थी। जैसे सबकी माँ होती है। माँ के पास एक खाट थी। लकड़ी के चार पाये वाली। एकदम मजबूत। कसी हुई। चारों पाये पूरी तरह चाक चौबन्द। पाये चमकते थे। खाट का वजन तो था ही, उनके ऊपर इसके साथ-साथ उस पर बैठने वालों का वजन भी उठाते पाये। बड़े होनहार थे। बड़े प्यारे और स्वाभिमानी भी। मजाल कोई उसमें कमी निकाल दे।

समय कहां रुकता है। सालों गुजर गए। माँ बड़ी  होती गई। खाट की उम्र भी माँ के साथ साथ बढ़ती रही। कसी खाट ढीली होने लगी। माँ पैर रख पांत को कस देती। नीवार होता तो बच्चों को साथ लगा, उसकी कसाई कर देती। फिर पायों मेँ दरार पड़ने लगी। किसी मेँ छोटी तो किसी मेँ बड़ी। खाट मेँ खटमल जा घुसते। पायों की दरारों मेँ घुन और कोई दूसरे जीव। माँ उनको थापी, जिससे कपड़े धोते थे, से खूब कूटती। खटमल निकल जाते। मर जाते। कुछ बचे हुए खटमल माँ की मार से शहीद हो जाते। पायों की दरारों मेँ घुसे घुन, दूसरे कीड़े मकोड़ों का इलाज भी माँ करती।

माँ की उम्र होने लगी थी। विभिन्न प्रकार के कीड़ों की वजह से पाये पहले जैसे मजबूत ना रह सके। कई बार माँ ने सोचा कि पाये बदल दूँ, किन्तु नहीं कर सकी। अब तो खाट के मूँज, नीवार मेँ खटमल के साथ साथ दूसरे कीड़े मकोड़े भी अपनी जगह बनाए रहते। माँ ने उसे घर के आँगन से निकाल चबूतरे ओर रख दिया। खाट पर हर पंथी आ बैठता।  दक्षिण पंथी भी और वाम पंथी भी। इधर का भी और उधर का भी। जिसके कोई विचारधारा नहीं होती वह भी जम जाता। कभी चौकड़ी मार के तो कभी पैर लटका के। बाज दफा तो सब आपस मेँ लड़ भी पड़ते। उनकी लड़ाई से पाये चूँ चूँ करते रहते। परंतु कुछ नहीं। ऐसा ही चलता रहा।

एक दिन माँ ने उनको ठोका। कई दिन बाद फाचर फंसा दी। उनमें सुधार नहीं हुआ। कद छोटा भी करवाया, लेकिन उनमें सिवाए बुरादे के कुछ नहीं था। एक दिन पायों के साथ ही खाट भी जमीन पर। माँ को आया गुस्सा, उसने नीवार/ मूँज को काट दिया। पायों को फेंक दिया। नए लगा दिये। दृश्य मेरे सामने आज भी हैं, लेकिन लोकतन्त्र को खाट तो नहीं कह सकता ना। खाट मेरी माँ की थी, उसे कुछ भी कहने का हक है मुझे।

जो माँ ने खाट के साथ किया वह लोकतन्त्र के साथ नहीं कर सकते। क्योंकि खाट खाट है और लोकतन्त्र लोकतन्त्र।  चारों पायों मेँ घुन लग गया तो लग गया। खोखले होते हैं तो होते रहें। हमें तो इन्हीं से काम चलाना पड़ेगा। अफसोस तो इस बात का है कि कह भी नहीं सकते कि ये खोखले हैं। क्योंकि पायों की ताकत बहुत अधिक है। ताकत इसलिए अधिक है, क्योंकि जो महापुरुष  खाट  पर बैठे हैं उनमेँ कोई भार नहीं है। वे खाली हैं। जो इनमें घुसे कीड़ों को निकालने की कोशिश करता है, घुन को मिटाने के वास्ते आगे बढ़ता है, खाट पर बैठे महापुरुष शोर मचाना शुरू कर देते हैं। पायों मेँ घर बनाकर बैठे कीड़े, मकोड़े और दूसरे जन्तू काटना शुरू कर देते हैं। कोई इनका सामना नहीं कर पाता ।

....मेरी माँ थी। माँ के पास एक खाट थी। खाट के चार पाये थे। जिसे माँ ठीक कर सकती थी। बदल सकती थी।  ....मेरे पास लोकतन्त्र है। पाये तो उसके भी चार हैं। लेकिन माँ की तरह पायों को बदल नहीं सकता। बदलना तो बहुत दूर की बात है, उनको ठीक भी नहीं कर सकता। ठीक करने का भाव भी बड़ा गुनाह है। दो लाइन पढ़ो-

प्रेम नदी बहे बीच मेँ जिसके दो हैं छोर
तुम्हारा छोर ये रहा मेरा है उस ओर।

गोविंद गोयल
वरिष्ठ पत्रकार
श्रीगंगानगर
राजस्थान

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