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भ्रष्ट अफसरों की पोषक उत्तर-प्रदेश की कोख से उत्पन्न एक मुख्य अभियन्ता अपने पद का दुरुपयोग कर अरबों की परियोजनाओं से करोड़ों की हेरा-फेरी कर अपना घर भरता रहा। काली करतूतों से कमाई गयी दौलत से चन्द वर्षों में ही यूपी और दिल्ली जैसे शहरों में अनगिनत जमीन-जायदाद का मालिक भी बन गया। आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की तरफ से जांच हुई तो भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ। लगभग छह माह तक जेल की सलाखों के पीछे रहे फिर भी तत्कालीन अखिलेश सरकार की आंख का तारा बने रहे। उपहार स्वरूप दोबारा उसी जगह पर तैनाती भी दे दी गयी। स्थिति यह है कि यह अभियन्ता अब खुलेआम भ्रष्टाचार के नए-नए आयाम स्थापित कर रहा है और योगी सरकार भी कमोवेश मूकदर्शक बनी हुई है।

ये हैं भ्रष्टाचार के पितामह उर्फ अरुण मिश्रा

यूपीएसआईडीसी का एक सामान्य अभियन्ता कौड़ियों से करोड़पति और फिर अरबपति का सफर महज चन्द वर्षों में पूरा कर लेता है। इस बीच आय से अधिक अकूत सम्पत्ति के मामले में याचिका भी दायर की जाती है। सीबीआई से लेकर प्रवर्तन निदेशालय भी अपनी जांच रिपोर्ट में अभियन्ता को दोषी पाते हैं। इसे भ्रष्ट अभियन्ता का दबदबा नहीं तो और कहेंगे कि जैसे-जैसे वह भ्रष्टाचार के दलदल में धंसता जाता है वैसे-वैसे उसे प्रोन्नति दर प्रोन्नति मिलती जाती है। तत्कालीन अखिलेश सरकार के कार्यकाल में यह अभियंता सुरसा के मुंह की भांति दिनों-दिन भ्रष्टाचार के नए-नए आयाम स्थापित करता रहा। अब सूबे में एक संत (योगी आदित्यनाथ) की सरकार है।

विभागीय कर्मचारियों को इस सरकार से काफी उम्मीदें हैं। योगी सरकार तकरीबन दो माह का कार्यकाल भी पूरा कर चुकी है लेकिन अरबों का घोटाला करने वाले इस मुख्य अभियन्ता (यूपीएसआईडीसी, कानपुर) के खिलाफ न तो मुख्यमंत्री की जुबां से इस कथित भ्रष्ट अभियन्ता का नाम सामने आया और न ही कार्रवाई की बात ही की गयी। अब तो आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कहीं भगवा वस्त्रधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कथित भ्रष्ट अभियन्ता के मायाजाल में न फंस गए हों? पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में जिस तरह से भ्रष्टाचार और आय से अधिक सम्पत्ति की जांच के दौरान यह अभियन्ता प्रोन्नति दर प्रोन्नति पाता गया, उससे तो कमोवेश यही लगता है कि योगी सरकार के कार्यकाल मे भी अरुण मिश्रा की जगलरी अपना काम दिखा जायेगी।

अरुण मिश्र से 36 का आंकड़ा रखने वाले अफसरों ने इतनी तेजी से कार्य किया की उसे बचने का कोई मौका न मिल सके। पर शातिर दिमाग रखने वाले अरुण ने कई बसपा नेताओं को मुंहमांगी रकम दी और मामला शान्त करा दिया। अरूण मिश्रा ने जिन बसपा नेताओं पर अपनी दरियादिली दिखाई उनमें  नसीमुद्दीन सिद्दकी व एक और वरिष्ठ पूर्व मंत्री का नाम शामिल है। अरूण कुमार मिश्रा की राजनीतिक हैसियत यह थी कि ट्रोनिका सिटी घोटाले के तत्कालीन प्रबंध निदेशक बलबिंदर कुमार ने जब उसे निलंबित कराया तो उन्हें खुद निलंबित होना पड़ा। वर्ष 2006-07 के कार्यकाल में इस इंजीनियर ने सबसे पहले गाजियाबाद और फिर ट्रोनिका सिटी के भूखंडों के आवंटन  और विकास कार्यों में चार सौ करोड़ से भी अधिक के घोटालों को अंजाम दिया था।

बसपा शासन काल में अरुण मिश्रा निलम्बित हुए और सीबीआई उन्हें गिरफ्तार कर जेल भी भेजा, लेकिन अखिलेश सरकार ने सत्ता में आते ही फिर परंपरागत मेहरबानी दिखाई और उसे बहाल कर दिया और यह दागी अभियन्ता 6 सितंबर 2013 को खुद ही आर्किटेकचरल एंड टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट का मुखिया बन बैठा। चीफ इंजीनियर अरूण कुमार मिश्रा के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अरुण कुमार मिश्रा की नियुक्ति को ही अनुचित ठहराते हुए उसे रद्द करने का आदेश दिया था। लेकिन शासन सत्ता पर मजबूत पकड़ वाले श्री मिश्रा को सभी सरकारों में कार्रवाई बजाय महिमामंडित कर नई नई जिम्मेदारियां मिलती चली गयी।

मुख्य अभियंता अरुण मिश्रा के खिलाफ गुण्डागर्दी और चरित्रहीनता के कई मामले लंबित है, जिनकी शिकायतें मुख्यमंत्री तक के पास भेजी जा चुकी है। उनके खिलाफ अपराध संख्या 32 के तहत आईपीसी की धारा 506 के तहत मुकदमा भी दर्ज है। यह मुकदमे उन्ही के विभाग में कार्यरत तत्कालीन सहायक अभियंता प्रदीप शर्मा ने दर्ज कराए थे। वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने चीफ इंजीनियर अरूण मिश्रा को पत्रावली संख्या सी 73.04 के तहत निलंबित तो किया,लेकिन निलंबन की प्रक्रिया पूरी हो पाती इससे पहले ही श्री मिश्रा ने अपने राजनीतिक आका अमर सिंह के जरिये निलंबन प्रक्रिया रूकवा ली और तब से लेकर आज तक अरुण कुमार मिश्रा अरबों रूपयों के घोटालों के आरोपों से घिरे होने के बावजूद सरकारी सेवा में बना हुआ हैं।

अरूण कुमार मिश्रा के खिलाफ तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव को जो शिकायती पत्र भेजा गया था, उसके मुताबिक अरुण मिश्र ने पद पर रहते हुए 30 करोड़ का फर्जी भुगतान कई फर्मों को किया था। यह भुगतान नवंबर वर्ष 2003 से जून 2004 के दौरान महज आठ महीनों में किया गया। जबकि शेष 26 करोड़ रुपए 11 निर्माण खंडों द्वारा मिलाकर किया गया था। एक अभियंता द्वारा इतनी बड़ी राशि का भुगतान किया जाना सीधा बडे पैमाने पर घोटालों का संकेत दे रहा था। जिसकी जांच कराई जानी चाहिए थी। लेकिन सरकार ने इस मामले में कोई रुचि नही दिखाई। सत्ता से इनके संबन्धों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चीफ इंजीनियर अरूण मिश्रा यूपीएसआईडीसी के आफिस माह में दस से बारह दिन जाते हैं। बाकी दिनों में वह बिना किसी अधिकारिक अवकाश लिए ऑफिस से गायब रहते हैं। शीर्ष अधिकारियों में कार्रवाई करना तो दूर इतनी भी हिम्मत नही है कि श्री मिश्रा से पूछ सके कि कहां थे। कथित भ्रष्ट अधिकारी के प्रति  अखिलेश सरकार सरकार के समर्पण का उदाहरण इससे बड़ा क्या हो सकता है कि मार्च 2015 में अरुण मिश्र एक बार फिर से बहाल कर दिए गए। जबकि भारी विभागीय विरोध और प्रदर्शन के बाद 2013 में ही उनके समस्त  अधिकार छीन लिए गए थे।

अरुण मिश्रा, यानि यूपीएसआईडीसी के इस चीफ इंजीनियर ने सरकारी खजाने को अंजुली भर-भरकर लूटा। जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने वाले इस शख्स के साथ उसके नाते-रिश्तेदार और यहां तक कि परिवार के सदस्य तक शामिल रहे। पाप का घड़ा जब भ्रष्टाचार से आकंठ डूबने लगा तो वर्ष 2011 (तत्कालीन मायावती सरकार का कार्यकाल) में शिकंजा कसा गया। वर्ष 2011 में सीबीआई ने अरुण मिश्रा पर पांच फर्जी खाते खोलकर करोड़ों की रकम हेरफेर के मामले में एफआईआर दर्ज करके गिरफ्तार किया था। अरूण मिश्रा के साथ ही उन बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों को भी शिकंजे में लिया गया था जिन्होंने अरुण मिश्रा की काली करतूतों में बराबर का साथ दिया।

सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की तो चौंकाने वाले मामले प्रकाश में आते चले गए। सीबीआई तो यह मानकर चल रही थी कि अरुण मिश्रा ने आधा दर्जन खातों के सहारे करोड़ों की रकम का हेरफेर किया है लेकिन जब जांच का सिलसिला आगे बढ़ा तो अरुण मिश्रा बेनामी नामों से 71 खातों का संचालन करते पाए गए। उस वक्त इन खातों में 26 करोड़ रुपए जमा थे। इतना ही नहीं लगभग दो दर्जन खाते कानपुर की बैंकों में भी प्रकाश में आए। सरकारी खजाने में सेंध लगाने वाले इस अभियन्ता के घर और अन्य ठिकानों पर छापा मारा गया तो 30 करोड़ की अचल सम्पत्ति और और 14 करोड़ की अन्य सम्पत्तियां भी प्रकाश में आयीं। इतना ही नहीं एक 21 करोड़ की रजिस्ट्री भी मिली जो दिल्ली की किसी प्रॉपर्टी की थी। सीबीआई ने आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर अरुण मिश्रा और परिवार के खिलाफ दो चार्जशीट लगायी थीं। कई महीने जेल में रहने के बाद अरुण मिश्रा जेल से जमानत पर रिहा हुए थे। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (दिल्ली) ने इन पर शिकंजा कसा।

ईडी की जांच में और भी चौंकाने वाले मामले प्रकाश में आते चले गए। इससे पूर्व अरुण मिश्रा वर्ष 2007 में ट्रॉनिका सिटी ग्रुप ऑफ हाउसिंग आवंटन में फर्जीवाड़ा करने के मामले में निलम्बित किए जा चुके हैं। एसआईटी की जांच में करीब ढाई सौ करोड़ के घपले का दावा किया गया है। सरकारी खजाने में सेंध लगाने वाला यह शख्स वर्तमान समय में एक हजार करोड़ की हैसियत रखता है। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि लूट की पुष्टि होने और कई महीने जेल में बिताने के बावजूद अरुण मिश्रा का निलम्बन न तो तत्कालीन मायावती सरकार के कार्यकाल में किया गया था और न ही पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल में। इसके विपरीत अखिलेश सरकार अरुण मिश्रा नाम के इस लुटेरे पर हर सम्भव अपनी कृपा बरसाती रही। इतना ही नहीं विभागीय जांच तक नही करवायी गयी। वर्तमान योगी सरकार में भी अरुण मिश्रा यूपीएसआईडीसी (मुख्य अभियन्ता, परियोजना) में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान करने वालों को चुनौती देता नजर आ रहा है। आखिर अरुण मिश्रा (यूपीएसआईडीसी का मुख्य अभियन्ता ‘परियोजना’) में ऐसा क्या है कि प्रदेश सरकारें जिन्दा मक्खी निगलने को विवश हैं। आखिर वे कौन लोग हैं जो प्रत्येक सरकार के कार्यकाल में उसकी ढाल बने हुए हैं?

कानपुर में तैनात यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियन्ता (परियोजना) अरुण मिश्रा के भ्रष्टाचार और लूट का खुलासा (प्रवर्तन निदेशालय की जांच रिपोर्ट के आधार पर) करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आखिर अरुण मिश्रा कौन है जो भ्रष्टाचार में लिप्त होने के बावजूद अब तक की सरकारों का प्रिय बना हुआ है। आखिर क्यों सीबीआई की चार्जशीट, ईडी की रिपोर्ट में दोषी पाए जाने और जेल जाने के बावजूद अरुण मिश्रा के खिलाफ सरकारें प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रही हैं? आखिर क्यों जेल से जमानत पर छूटने के बाद उन्हें बहाल करने में तनिक भी देरी नहीं लगायी गयी?

अरुण मिश्रा एक सामान्य परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। उनके पिता एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक थे। उनके पास पैतृक सम्पत्ति के नाम पर ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे वे चन्द वर्षों में ही अरबपति बन गए। वर्ष 1986 में अरुण मिश्रा ने सहायक अभियन्ता के रूप में नौकरी शुरू की। महज तीन दशकों में सरकारी नौकरी के बूते अरुण मिश्रा कौड़ियों से अरबपति बन गए। ऐसा लगता था, जैसे सरकारी नौकरी उन्होंने सरकारी खजाने में सेंध लगाने के लिए ही की हो। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि नौकरी ज्वाइन करने के महज तीन वर्षों में ही वे पहली बार भ्रष्टाचार के आरोप में 1989-1990 में सस्पेंड किए गए। सरकारी सेवा की चरित्र पंजिका में प्रतिकूल प्रविष्टि के बावजूद उन्हें वर्ष 1998 में सेलेक्शन के आधार पर एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया। उस वक्त सूबे में कल्याण सिंह कि सरकार थी।

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को आज भी ‘गुड गवर्नेंस’ वाली सरकार माना जाता है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है की क्या तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी कथित भ्रष्ट अभियन्ता के मुरीद हो गए थे? इसके बाद इस कथित भ्रष्ट अभियन्ता का कद सुरसा के मुंह की तरह दिनों-दिन बढ़ता गया। जैसे-जैसे यह अभियन्ता भ्रष्टाचार और लूट-खसोट में और गहरे धंसता गया वैसे-वैसे उसे पदोन्नति मिलती गयी। तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार (वर्ष 2003) के कार्यकाल में इन्हें मुख्य अभियन्ता बना दिया गया। यूपीएसआईडीसी के इस महत्वपूर्ण पद पर बिठाते वक्त जिम्मेदार अधिकारियों ने अरुण मिश्रा की न तो चरित्र पंजिका देखी और न ही भ्रष्टाचार के बाबत विभाग की फाईलों में कैद रिपोर्ट को पढ़ा। विभागीय कर्मचारियों का दावा है कि अरुण मिश्रा के भ्रष्टाचार की फाईल तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पास भी भेजी गयी थी। फाइल पढ़ने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से इन्हें तलब भी किया गया लेकिन अरुण मिश्रा ने मामले को कैसे मैनेज किया? इसका खुलासा तो नहीं हो सका अलबत्ता जिस अरुण मिश्रा को भ्रष्टाचार के आरोप में सस्पेंड कर दिया जाना चाहिए था वह अरुण मिश्रा तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद पाकर मुख्य अभियन्ता बन गया। इतना ही नहीं, जब यह पद भी उसे अपने कद के आगे छोटा लगने लगा तो उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री को विश्वास में लेकर अपना पदनाम बदलवाकर स्वयं को डिप्टी एमडी घोषित कर दिया।

अरुण मिश्रा किसी समय तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार में मैनेजमेंट गुरु रहे अमर सिंह के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। अमर सिंह की सिफारिश पर ही तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में अरुण मिश्रा को मुख्य अभियन्ता के पद पर सुशोभित किया गया। यही वह वजह रही है कि जब-जब यूपी में सपा की सरकार रही है तब-तब अरुण मिश्रा को पदोन्नत किया जाता रहा है। इसके बाद तो अरुण मिश्रा ने कथित भ्रष्टाचार की काबिलियत से अपनी जगह खुद बनानी शुरू कर दी। उसके बाद अरुण मिश्रा को किसी सहारे की आवश्यकता नहीं रही। यही वजह है कि तमाम पुख्ता शिकायतों के बावजूद वर्ष 2003 से लेकर वर्ष अब तक अरुण मिश्रा यूपीएसआईडीसी के चीफ इंजीनियर पद पर बने हुए हैं। अखिलेश सरकार के कार्यकाल में ही अरुण मिश्रा को लैण्ड एक्विजीशन और मैप अप्रूवल के अधिकार मिले हुए थे। फिर क्या था? अरुण मिश्रा ने जमकर पद और अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया।

‘सैंया भए कोतवाल तो अब डर काहे का’ की तर्ज पर जब सत्ताधारियों ने उनकी पीठ पर हाथ रखा तो अरुण मिश्रा जैसे अभियन्ताओं को मनमानी करनी ही थी। लैण्ड एक्विजीशन और मैप अप्रूवल के नाम पर अरुण मिश्रा ने दोनों हाथों से सरकारी खजाने को लूटा। कुछ पार्टी फण्ड में गया तो एक बड़ा हिस्सा अरुण ने अपनी माली हैसियत संजोने में खर्च कर दी। वर्ष 2007 में सत्ता परिवर्तन के साथ ही अरुण मिश्रा की मुश्किलें बढ़नी शुरू हुईं। आय से अधिक सम्पत्ति के आरोप लेकर अरुण मिश्रा के खिलाफ जांच के लिए एसआईटी बनी। एसआईटी की जांच में अरुण मिश्रा दोषी सिद्ध पाए गए और सस्पेंड हुए। बाकायदा प्राथमिकी भी दर्ज की गयी। कानपुर के बैंकों में तकरीबन 65 बैंक खाते सील किए गए। एकाएक न जाने ऐसा क्या हुआ कि अगले ही वर्ष (वर्ष 2008) मायावती सरकार ने उन्हें बहाल भी कर दिया। चूहा-बिल्ली के खेल की तर्ज पर मायावती सरकार के कार्यकाल वर्ष 2011 में सीबीआई की टीम ने कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान अरुण मिश्रा के 70 बैंक खातों का विवरण प्रकाश में आया। सीबीआई की रिपोर्ट के आधार पर ही अरुण मिश्रा के खिलाफ केस दर्ज करने के बाद उन्हें जेल भेजा गया था। लगभग छह माह तक जेल में रहने के बाद वे जमानत पर बाहर आए।

सूबे में सत्ता परिर्वन के बाद भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन का नारा बुलन्द करने वाली अखिलेश सरकार के कार्यकाल में अरुण मिश्रा का सस्पेंशन खत्म करके नवम्बर 2012 में उन्हें पुनः बहाल कर दिया गया। इसके बाद अरुण मिश्रा ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। रुतबे के साथ ही वे भ्रष्टाचार की तमाम सीमाएं लांघते चले गए। फिर किसी ने उन्हें सरकारी खजाना लूटने से नहीं रोका। वर्तमान समय मंे भी अरुण मिश्रा यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियन्ता (परियोजना), कानपुर के पद पर विराजमान हैं। कहने में गुरेज नहीं है कि प्रबन्ध निदेशक अमित कुमार घोष पहले ऐसे एमडी रहे हैं जिन्होंने अरुण कुमार मिश्रा के घोटालों पर अपनी नजर तिरछी की और घोटाले के विरुद्ध नियमानुसार जंग छेड़ी। श्री घोष ने सर्वप्रथम अरुण मिश्रा से परियोजना का काम वापस लिया। विभाग में हो रही चर्चा को आधार मानें तो श्री घोष के इस कृत्य से उन लोगों तक संदेश पहुंच गया था जो अरुण मिश्रा को भ्रष्टाचार के आरोप में सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं। उन लोगों ने भी राहत की सांस ली थी जो श्री मिश्रा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी ओर अरुण मिश्रा भी नयी सरकार में अपनी पैठ बनाकर अपना खोया अधिकार वापस पाने की जुगत लगाते रहे।

विभागीय कर्मचारियों से लेकर अधिकारी भी कहते रहे कि विभाग में दो अधिकारियों के बीच प्रतिष्ठा की जंग सा माहौल बन गया था। इसी बीच अरुण मिश्रा ने हाईकोर्ट को गुमराह करके एक ऐसा आदेश पास करवा लिया है जिसमें उसे परियोजना का अधिकार वापस मिल गया है। कोर्ट के आदेश के अनुपालन में श्री घोष को मजबूरी में अरुण मिश्रा से छीना गया अधिकार वापस करना पड़ा। अरुण मिश्रा को फिलहाल यूपी के 9 मण्डलों की परियोजना का कार्य सौंपा गया है। इसके कुछ ही समय बाद अमित कुमार घोष का तबादला कर दिया गया। विभाग में एक बार फिर से चर्चा तेज हुई कि अरुण मिश्रा ने अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अख्तियार की और श्री घोष का तबादला करवा दिया। यहां तक कहा जा रहा है कि अरुण मिश्रा एक बार फिर से यूपी के समस्त मण्डलों का कार्य-भार हथियाने के लिए भाजपा में शामिल अपने आकाओं की इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। इस वक्त यूपीएसआईडीसी में एमडी के पद पर रणवीर प्रसाद को नियुक्त किया गया है। श्री प्रसाद को साफ छवि का अधिकारी माना जाता है। इनके पास पहले से ही केस्को के एमडी, आयुक्त एवं निदेशक (हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग) की जिम्मेदारी पहले से ही है।

अरुण मिश्रा पर जिन कम्पनियों को टेकओवर करने का आरोप है उसमें अजंता मर्चेट प्राइवेट लिमिटेड में 53.88 करोड़ का निवेश, भारतीय बचत लिमिटेड में 13.63 करोड़ का निवेश, गंगोत्री टारकन प्राइवेट लिमिटेड में 15.37 करोड़, जेएम टेक्सटाइल प्राइवेट लिमिटेड में 28.22 करोड़ का निवेश, मरुभूमि टारकन प्राइवेट लिमिटेड में 27 करोड़ का निवेश, निशेल इंवेस्टमेंट एंड ट्रेडिंग कंपनी व विवेक ट्रेडिंग एंड क्रेडिट प्राइवेट लिमिटेड में 73.30 करोड़ का निवेश प्रमुख रूप से जांच के दौरान सामने आया है। इसके साथ ही हिमालया व्यापार प्राइवेट लिमिडेट, शत इंटरप्राइजेज, श्रीप्रकाश टारकन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसी कई कम्पनियांे में अरुण मिश्रा की काली कमाई लगी हुई है। जांच के दौरान यूपीएसआईडीसी में चीफ इंजीनियर के पद पर रहते हुए अरुण कुमार मिश्रा पर अरबों  की काली कमाई करने का आरोप है।

अरुण मिश्रा ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए जमकर अचल सम्पत्तियां बटोरीं। बाराबंकी में कुर्सी रोड पर 52 एकड़ के 2 प्लॉटों पर अरुण मिश्रा ने एक कॉलेज बनवाया है। कालेज की आड़ में करीब 8 एकड़ सरकारी जमीन और हथिया ली। आरोप है कि नदी का एक हिस्सा पाटकर नालानुमा बना दिया। अरुण मिश्रा पर तालाब पर भी कब्जा करने का आरोप है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि बाराबंकी के डीएम ने इसकी रिपोर्ट बनाकर यूपीएसआईडीसी को दी थी लेकिन कार्रवाई शून्य रही। कार्रवाई होती भी कैसे जब विभाग के शीर्ष पद पर आरोपी का ही कब्जा हो। गौर करने वाली बात यह है कि स्कूल के नाम पर रियायती दरों में मिला 60 एकड़ का प्लॉट अब तक खाली है। नियमानुसार तय समय मे निर्माण न होने की स्थिति में आवंटन रद्द कर दिया जाना चाहिए था लेकिन मजाल है कि कोई आवंटन रद्द करने की हिमाकत करे। विभागीय कर्मचारियों की मानें तो नाला पाटने में यूपीएसआईडीसी के खजाने से 10 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इसके अतिरिक्त उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के राजपुर रोड पर 1 और बलवीर रोड पर अरुण की 2 आलीशान कोठियां हैं। यूपी की राजधानी लखनऊ में भी विशाल खंड और विनय खंड में अरुण मिश्रा की करोड़ों की लागत वाली हवेलियां हैं। दिल्ली में पृथ्वीराज रोड पर भी अरुण मिश्रा की आलाशान कोठी मौजूद है। इसी कोठी पर ईडी ने छापा मारकर महत्वपूर्ण दस्तावेज इकट्ठे किए थे।

अरुण मिश्रा की इस लूट में उस बैंक को भी नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता जिसने अरुण मिश्रा की काली कमाई को खपाने में दिल खोलकर मदद की। ईडी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सीबीआई देहरादून शाखा को एक सूचना मिली, जिसमें पंजाब नेशनल बैंक के पांच कर्मचारी (बाद में ‘पीएनबी’ के रूप में संदर्भित किया गया) और कई अन्य व्यक्तियों ने नवम्बर 2005 से दिसंबर 2006 तक की अवधि के मध्य एक आपराधिक साजिश में लिप्त होकर खातों में प्रविष्टियां दर्ज की। फर्जी खातों में जमा गयी यह रकम पीएनबी, विधान सभा शाखा, देहरादून में पकड़ में आयीं। इसी तरह से पीएनबी, आर्य वानप्रस्थ आश्रम शाखा, ज्वालापुर, हरिद्वार में पांच फर्जी खातों से जमा और निकासी की का काम होता रहा जबकि जिस नाम-पते से खाते खोले गए थे, भौतिक सत्यापन में सब फर्जी पाए गए। साफ जाहिर है कि बैंक कर्मियों की मिली-भगत के कारण काला धन तो सफेद हुआ ही साथ ही ब्याज के रूप में बैंक को भी आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया।

दावा किया जा रहा है कि अरुण मिश्रा की काली कमाई को सफेद करने के लिए बैंक कर्मचारियों को रिश्वत के रूप में मोटी रकम मुहैया करायी गयी थी। फर्जी खातों में तीन करोड़ तीस लाख ब्यासी हजार एक सौ पांच रुपये जमा किए गए थे जिन्हें बाद में बैंक कर्मियों की मदद से वापस निकाल लिया गया। रिश्वत के तौर पर उक्त रकम से मिला ब्याज बैंक कर्मियों ने बांट लिया। इसी आधार पर सीबीआई, एसपीई, देहरादून ने पांच व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत किया गया था। नामजद बैंक कर्मियों में एम.एम. शर्मा प्रबंधक (सेवानिवृत्त, पीएनबी विधानसभा शाखा देहरादून), हरीश कंबोज (उप प्रबंधक, पीएनबी, विधान सभा शाखा, देहरादून) ए.के. बंसल (प्रबंधक, पीएनबी, आर्य वानप्रस्थ आश्रम शाखा, ज्वालापुर, हरिद्वार), संजीव कुमार (क्लर्क पीएनबी, आर्य वानप्रस्थ आश्रम शाखा, जवालपुर, हरिद्वार) ए.के. चड्ढा (सेवानिवृत्त क्लर्क, पीएनबी विधानसभा शाखा देहरादून) के साथ ही अन्य अज्ञात व्यक्ति शामिल थे। इन सभी के खिलाफ धारा-13 (2) के तहत भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के 13 (एल) (डी) और धारा 120 बी, 409, 477 ए भारतीय दंड संहिता में मामला दर्ज किया गया था। यह प्राथमिकी उन 71 बैंक खातों से संबंधित है जो फर्जी तरीके से खोलने के बाद फर्जी तरीके से संचालित किए जाते रहे। यह प्राथमिकी 24 फरवरी 2011 में दर्ज करवायी गयी थी।

उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में 24 खाता धारकों में से 17 खाताधारकों ने स्टेट बैंक ऑफ इंदौर (शाखा गुमटी नं. 5), पंजाब नेशनल बैंक, स्वरुप नगर, कानपुर और सिंडिकेट बैंक में खाता खोला गया था। भ्रष्टाचार का जीता-जागता सुबूत और क्या होगा कि इन खाता धारकों को एस.एन. राम द्वारा परिचित करवाया गया था। एस.एन. राम मैनेजर अकाउंट्स यूपीएसआईडीसी के पद पर तैनात थे। ईडी की रिपोर्ट कहती है कि उपर्युक्त खातों को खोलने के लिए 12 जाली ड्राइविंग लाइसेंस दिए गए थे और 12 पैन कार्ड जमा कराए गए थे। जांच में यह बात सामने आयी है कि उपर्युक्त खातों से करीब आठ करोड़ 20 लाख का लेनदेन किया गया था।

प्रवर्तन निदेशालय को जांच के दौरान धारा 420/467/471/201, आईपीसी की धारा 120 बी के तहत एक और मामला प्रकाश में आया। यह मामला भ्रष्टाचार प्रतिरोधी अधिनियम, 1988 के तहत किसी चंचल कुमारी तिवारी के नाम से पंजीकृत किया गया था। इसके अतिरिक्त पंजाब नेशनल बैंक विधानसभा मार्ग, मॉल देवता, अजबपुर, गौवाला, नया गांव और दकराणी में दो खाता धारकों की रकम जमा थी। श्री मदन मोहन शर्मा, प्रबंधक ने पंजाब नेशनल बैंक, विधानसभा (मार्ग, देहरादून) केवाईसी के नियमों के खिलाफ (अपने ग्राहक को जानिए) खाते खोले थे। कड़ी पूछताछ के दौरान जो बातें निकलकर सामने आयी हैं वे बेहद चौंकाने वाली हैं। इन फर्जी खातों में अरुण मिश्रा ने फर्जी नामों से रकम जमा करवायी थी। खाते का संचालन स्वयं अरुण मिश्रा किया करते थे।

उस वक्त अरुण मिश्रा यू.पी. औद्योगिक विकास समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। मदन मोहन शर्मा ने ईडी को जो जानकारी दी है उसके मुताबिक, ‘उन्हें सूचित किया गया था कि अरुण कुमार मिश्रा के माता-पिता एसपी मिश्रा और श्रीमती तारा देवी सहित उनके भाई अनुराग मिश्रा ने उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में एक बंगला खरीदा है। इस मामले में बैंक ने आनन-फानन में लोन की मंजूरी भी दे दी। इक्कीस लाख (21,00,000) रुपए के लिए लोन अकाउंट नंबर एनसी 5962, 20 लाख 90 हजार का लोन एनसी 5941 और 21 लाख 10 हजार का लोन एनसी 5950 से स्वीकृत किया गया। खास बात यह है कि 63 लाख,16 हजार की यह रकम एक ही दिन 6 अगस्त 2004 में स्वीकृत कर ली गयी। ऋण राशि पंजाब नेशनल बैंक, विधानसभा मार्ग, देहरादून के खाते में जमा की गई थी।

प्रवर्तन निदेशालय की सूचना रिपोर्ट के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बैंक कर्मियों ने अरुण मिश्रा के काले धन को सफेद में तब्दील करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस फर्जीवाडे़ के लिए बैंक कर्मियों ने सस्पेंस एकाउंट (असमंजस/दुविधा खाता) संख्या 4422005, खाता संख्या 711320 और शाखा के सिन्ड्री एकाउण्ट (संसूचक खाता) संख्या 4422003171109 का नाजायज इस्तेमाल किया। बैंक कर्मियों ने आर्य वानप्रस्थ आश्रम शाखा पीएबी, जवालपुर, हरिद्वार के इंटरसोल एकाउण्ट नम्बर 1064003171160 में उसी राशि को हस्तांतरित कर दिया। इस इंटरसोल खाते से 72 लाख 82 हजार 105 रुपया पंजाब नेशनल बैंक, आर्य वानप्रस्थ शाखा, ज्वालापुर, हरिद्वार में अंजान व्यक्तियों के खातों में स्थानान्तरित कर दिया। गौरतलब है कि ये वही खाते थे जिन्हें अरुण मिश्रा ने फर्जी तरीके से बैंक कर्मियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर खुलवाए थे।

कहा तो यह भी जा रहा है कि बैंक कर्मियों ने इस काम के लिए मोटी रकम रिश्वत के रूप में ली थी। इस मामले में बैंक अधिकारी ए.के. बंसल पूरी तरह से दोषी माने जा रहे हैं। जो पांच खाते फर्जी तरीके से खोले गए थे उनमें से पहला  खाता संख्या 106400101206702 किसी रामेश्वर के नाम पर था। दूसरा खाता संख्या 106400101206641 श्रीप्रकाश के नाम से खोला गया था। तीसरा खाता संख्या 106400101206687 श्रीमती किरनोदेवी के नाम पर, चौथा खाता संख्या 106400101206669 कौशिक ए. कुमार के नाम पर और पांचवा खाता संख्या 1064001206596 सुश्री तारा देवी के नाम पर खोला गया था। उपरोक्त समस्त खाते केवाईसी के बगैर ही खोले गए थे। बताया जाता है कि जब कि इन खाताधारकों का भौतिक सत्यापान किया गया तो सभी खातों के फर्जी होने की पुष्टि हुई। खाता खोलेन के लिए जो फार्म भरवाए गए थे उन फार्मों पर कोई नमूना हस्ताक्षर नहीं थे। बिना नमूना हस्ताक्षर के बावजूद खातों से रकम का आदान-प्रदान होता रहा। प्रवर्तन निदेशालय की रिपोर्ट बताती है कि 28 नवम्बर 2005 को 75 लाख रुपए पीएनबी की मुद्रा केन्द्र में जमा किया गया था। फिर इस रकम को पीएनबी, विधानसभा शाखा के अंतर्सल खाते में स्थानान्तरित किया गया। 30 नवम्बर 2005 में 72 लाख 82 हजार 105 रुपया शाखा के सस्पेंस एकाउण्ट में मौजूद शो करता रहा। उस शाखा के खाते को तत्कालीन प्रबंधक एम.एम. शर्मा और तत्कालीन बैंक मैनेजर हरीश कंबोज (उस वक्त उप प्रबंधक के रूप में तैनात थे) ने पर्दा डालने की नीयत से समायोजित कर दिया था। इस गोलमाल में बैंक के बाबू ए.के. चड्ढा की भूमिका महत्वपूर्ण बतायी गयी है।

आर्य वानप्रस्थ आश्रम, शाखा जुवालपुर, हरिद्वार के तत्कालीन प्रबन्धक ए.के. बंसल की भूमिका भी अरुण मिश्रा के काले धन को सफेद में बदलने में सामने आयी। खेल कुछ इस तरह से हुआ। पीएनबी की इस शाखा के सिंदरी एकाउण्ट (संसूचक खाता) में 60 लाख की रकम जमा की गयी। इसके बाद उक्त रकम को बिना किसी नियमित प्रक्रिया (हस्तांतरण आदेश, जमा राशियों की पर्ची के बगैर और बाउचर-चालान के बगैर) का पालन किए दोबारा वितरित करके उपरोक्त पांच फर्जी खातों में जमा कर दिया गया, जिसका संचालन स्वयं अरुण मिश्रा के द्वारा करना बताया गया है। इसी तरह से एक करोड़ से भी ज्यादा की धनराशि के साथ भी कुछ ऐसा ही खेल किया गया। यह राशि पर उपरोक्त नियमों का पालन किए बगैर उन्हीें पांच खातों में वितरित करके जमा दिखायी गयी तो खाता श्री मिश्रा ही संचालित करते रहे हैं।

इसके बाद 19 दिसम्बर 2005 में उन्हीं काल्पनिक खातों में कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने 25 लाख की रकम जमा करवायी। जांच के दौरान बैंक कर्मी कोई भी रिकार्ड प्रस्तुत नहीं कर सके। तत्कालीन शाखा प्रबन्धक श्री बंसल के निर्देश पर ही उपरोक्त खातों से 3 करोड़ 41 लाख 71 हजार 92 रुपए और मूल राशि का ब्याज जो लगभग 10 लाख के आस-पास था, उसे विड्राल फार्म से ही निकाल लिए गए। इतना ही नहीं मामले को दबाने की गरज से खाते भी बन्द कर दिए गए। खाता बन्द करने के लिए किसी से अनुरोध/प्रार्थना पत्र तक नहीं लिया गया, वैसे भी अनुरोध पत्र लेते भी किन व्यक्त्यिों से जब खाता ही फर्जी नामों पर खोला गया था तो अनुरोध पत्र किस व्यक्ति से लिया जाता? बस यहीं से ईडी ने पूरे मामले को शीशे की तरह साफ कर दिया। कहने में कतई संकोच नहीं है कि अरुण मिश्रा के करोड़ों के काले धन को सफेद करने में बैंक कर्मियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। साफ जाहिर है कि अरुण मिश्रा की काली कमाई को सफेद करने में बैंक कर्मी इतने अन्धे हो गए थे कि उन्होंने भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्वयं के बचाव के लिए कोई तैयारी तक नही की थी। शायद उन्हें अरुण मिश्रा के राजनीतिक और प्रशासनिक रुतबे पर पूरा भरोसा था कि भविष्य में कोई जांच नहीं होने वाली।

दुर्भाग्य ने बैंक कर्मियों का साथ दिया और सारे के सारे ईडी की जांच में फंस गए। मुख्य अभियन्ता अरुण मिश्रा का प्रकरण खुलने के बाद श्री मिश्र के साथ ही उक्त बैंक कर्मियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था। पुख्ता प्रमाण के बावजूद अरुण मिश्रा के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई तो दूर की बात वह अभी तक यूपीएसआईडी में मुख्य अभियन्ता के पद पर विराजमान है। हाल ही में तबादले का शिकार हुए एमडी ने श्री मिश्रा से परियोजना का सारा काम छीन लिया था लेकिन श्री मिश्र न्यायपालिका की शरण में जाकर दोबारा काबिज हो गए। विभागीय कर्मचारियों को वर्तमान योगी सरकार से न्याय की उम्मीद है। कर्मचारियों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि यदि अरुण मिश्रा को जल्द से जल्द यूपीएसआईडी से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया तो निश्चित तौर पर यूपीएसआईडी में इसी तरह से सरकारी योजनाओं का धन डकारा जाता रहेगा।

सरकारी खजाने को पहुंचायी चोट
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, ट्रॉनिका सिटी गाजियाबाद में 96,600 वर्ग मीटर ग्रुप हाउसिंग के प्लॉट और 76,640 वर्ग मीटर कमर्शियल प्लॉट एलॉट किए गए। ग्रुप हाउसिंग प्लॉट का रिजर्व प्राइज 12-13 हजार रुपये के बीच रखा गया था। अरुण मिश्रा ने अवैध कमाई की गरज से उन प्लॉटों को 3,200 से 4,475 की दर पर बेच दिया। इसी तरह से कामर्शियल प्लाट का रेट 15 हजार रुपये प्रति वर्ग गज तय किया गया था। अरुण मिश्रा ने इसमें भी कमाल दिखाया। 15 हजार की कीमत वाले प्लाटों को मात्र 5,500 से 11,500 रुपये की दर पर बेच दिया। सरकार को नुकसान हुआ 152 करोड़ से भी ज्यादा। कमाई का एक बड़ा हिस्सा अरुण मिश्रा की जेब में चला गया जबकि शेष रकम संतरी से लेकर मंत्री तक बंट गयी। इस मामले में चीफ इंजीनियर अरुण मिश्रा को सीधे तौर पर दोषी माना गया।

मुम्बई वाले नेता का सानिध्य काम आया
मुम्बई वाले नेता, यानी अमर सिंह। समाजवादी पार्टी में अमर सिंह की हैसियत किसी समय मुलायम सिंह यादव के बाद नम्बर दो की मानी जाती रही है। अमर सिंह से बेहद करीब का रिश्ता रखने वाले अरुण मिश्रा ने अपना कद बढ़ाने और भ्रष्टाचार में नए-नए आयाम स्थापित करने के लिए अमर सिंह को विश्वास में लिया। अमर सिंह के सहारे ये सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के करीब पहुंच गया। यही यह कहा जाए कि मुलायम ने भी अरुण मिश्रा के कथित भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से आंखें बन्द कर ली थीं तो शायद कुछ भी गलत नहीं होगा। दो शीर्ष नेताओं से करीब का रिश्ता रंग लाया और एक सहायक अभियन्ता न सिर्फ मुख्य अभियन्ता के पद तक पहुंच गया बल्कि असीमित अधिकारों का मालिक बन गया। विधानसभा में रखी गई सीएजी रिपोर्ट भी इन आरोपों की पुष्टि करती हैं। नियमविरुद्ध तरीके से श्री मिश्रा को लैंड एक्विजिशन और मैप अप्रूवल का अधिकार मिला हुआ था। जमकर लूट खसोट हुई। इस दौरान शिकायत दर शिकायत का सिलसिला भी चला।

जब विपक्ष तत्कालीन सरकार पर आरोपी की झड़ी लगा बैठा, तब कहीं जाकर वर्ष 2007 में मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गयी। एसआईटी जांच रिपोर्ट में आरोप सिद्ध होने पर अरुण मिश्रा को सस्पेंड किया गया, साथ ही 2 एफआईआर भी दर्ज की गयीं।  कानपुर में उनके 65 बैंक खाते सीज किए गए। इतना सब कुछ होने के बावजूद श्री मिश्रा को तत्कालीन मायावती सरकार के कार्यकाल वर्ष 2008 में पुनरू बहाल कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 2011 में सीबीआई ने अपनी जांच में 100 फर्जी बैंक खातों का पता लगाया। सीबीआई ने अपनी जांच में आरोप लगाया था कि ये सभी खाते अरुण मिश्रा के हैं। आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में वर्ष 2011 में ईडी ने अरुण मिश्रा के खिलाफ केस दर्ज किया। 2011 में ही सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा। लगभग छह महीने जेल में बिताने के बाद अरुण मिश्रा जमानत पर बाहर आए। जेल से बाहर आते ही उन्होंने एक बार फिर से मुलायम परिक्रमा शुरू की। मुलायम परिक्रमा परिणाम भी जल्द नजर आ गया। मुलायम के निर्देश पर अखिलेश सरकार ने नवम्बर-2012 में उनका सस्पेंशन खत्म करके फिर से उन्हें उनके स्थान पर तैनाती दे दी। सत्ता से करीब का रिश्ता रखने वाले अरुण मिश्रा के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच चुके थे। सत्ता के सम्बन्ध ने अपना रंग दिखाया और विभागाध्यक्ष की अनुमति के बगैर ही 6 सितंबर 2013 को उन्होंने खुद को आर्किटेक्चरल एंड टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट का मुखिया घोषित कर दिया। इसकी एक कॉपी उन्होंने तत्कालीन एमडी मनोज सिंह को भेजी, वह भी सिर्फ सूचना देने के लिए।

जलवा कायम है...
सीबीआई की जांच और प्रवर्तन निदेशालय की जांच में भी यह अभियन्ता दोषी पाया जा चुका है। यहां तक कि इसके काले धन को सफेद करने वाले वह बैंक अधिकारी भी कानून की जद में आ चुके हैं जिन्होंने अरुण मिश्रा को काले धन को सफेद करने में बैंक नियमों का जमकर उल्लंघन किया। फर्जी बैंक एकाउण्ट और उन खातों से करोड़ों का लेन-देन सम्बन्धी रिकॉर्ड भी जांच एजेन्सियों के पास हैं फिर भी यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियन्ता (परियोजना) अरुण मिश्रा को बर्खास्त नहीं किया गया। गौरतलब है कि मायावती सरकार के कार्यकाल में अरुण मिश्रा जेल भी जा चुके हैं। वे जमानत पर बाहर हैं। सरकारी सेवानियमावली तो यही कहती है कि जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच चल रही हो उसे जांच पूरी होने और निर्दोष सिद्ध होने तक सेवा में नहीं रखा जाना चाहिए, अन्यथा वह जांच प्रभावित कर सकता है लेकिन अरुण मिश्रा के मामले में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता। ऐसा लगता है कि एक कथित भ्रष्ट अभियन्ता के समझ पूरी नौकरशाही और यहां तक कि वर्तमान योगी सरकार भी नतमस्तक नजर आ रही है।

कौन है अरुण मिश्रा!
आखिरकार ये अरुण मिश्रा है कौन! जो अब तक की सरकारों के लिए चुनौती साबित होता आया है। जो जांच एजेंसियों द्वारा मुलजिम बनाए जाने के बाद भी अपनी कुर्सी पर डंटा हुआ है, जो महीनों जेल में रहने के बाद भी विभाग में सीना तानकर अपने रुतबे की पहचान कराता है। जिसके आगे विभाग का आला अधिकारी भी नतमस्तक है। जिस किसी ने इस अभियन्ता के खिलाफ सिर उठाया, उसका तबादला कर दिया गया। जो तत्कालीन अखिलेश सरकार की नाक का बाल बना रहा तो दूसरी ओर वर्तमान योगी सरकार के कार्यकाल में भी कथित भ्रष्टाचार की मिसाल बना हुआ है। जब इस सम्बन्ध में ‘दृष्टान्त’ ने विभाग में खोज-खबर ली तो कई आवाजें एक साथ सुनने को मिलीं, ‘अरुण मिश्रा को यदि जानना है या उनके बारे में समझना है तो आपको कानपुर यूपीएसआईडीसी के मुख्यालय में पड़ताल करनी होगी। तभी यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियन्ता (परियोजना) के बारे में जान पाओगे।’ आसान नहीं था, फिर भी ‘दृष्टान्त’ ने विभाग में चोरी-छिपे घुसपैठ बनायी।

बातों-बातों में यहां के कर्मचारियों से पता चला कि 1986 में बतौर सहायक अभियंता (यूपीएसआईडीसी) के पद पर कदम रखने के बाद से अरुण मिश्रा के रुतबे को कोई चुनौती नहीं दे पाया है। यहां तक कि विभाग के एमडी भी अरुण मिश्रा के खिलाफ कुछ भी बोलने से कतराते रहे हैं। नौकरी ज्वाइन करने के महज तीन वर्ष बाद ही श्री मिश्रा को 1989-90 में अनियमितता के मामले में सस्पेंड किया गया था। श्री मिश्रा के रुतबे का ही परिणाम था कि चरित्र पंजिका में प्रतिकूल प्रविष्टि के बाद भी वर्ष 1998 में सेलेक्शन के आधार पर अरुण मिश्रा को एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया। महज 5 वर्ष बाद ही वर्ष 2003 में तथाकथित भ्रष्ट अभियन्ता को मुख्य अभियन्ता के पद पर प्रोन्नत कर दिया गया। कथित भ्रष्टाचार के परिचायक अरुण मिश्रा को जब यह लगा कि उसका बाल-बांका करने की हैसियत किसी में नहीं है तो श्री मिश्रा खुलकर भ्रष्टाचार को अंजाम देने में जुट गए। आरोप है कि श्री मिश्रा ने अपना रुतबा बढ़ाने की गरज से तत्कालीन सरकार को विश्वास में लेकर अपना पदनाम तक बदलवा लिया था और स्वयं को डिप्टी एमडी कहलवाने लगे। ये दीगर बात है कि अखिलेश सरकार के कार्यकाल में इस पद को खारिज कर दिया था।

हरित क्रान्ति का दुश्मन
यूपीएसआईडीसी के औद्योगिक क्षेत्र मसूरी गुलावटी रोड, जिला गाजियाबाद में हजारों की संख्या में दशकों पुराने हरे-भरे पेड़ों को अरूण मिश्रा के निर्देश पर कटवा दिया गया। इस काम के लिए श्री मिश्रा ने बेहद चालाकी से समस्त कार्यविधि को अंजाम दिया। बताया जाता है कि क्षेत्र में महज 2950 पेड़ दर्शाए गए जबकि उस वक्त इस क्षेत्र में पेड़ों की संख्या अभिलेखों में 31 हजार 766 के आस-पास थी। श्री मिश्रा ने फर्जी नीलामी के सहारे समस्त पेड़ महज 4 लाख 60 हजार में बेच दिया जबकि अभिलेखों के अनुसार उस वक्त इन पेड़ों की अनुमानित कीमत 8 करोड़ से भी ज्यादा थी। विभागीय कर्मचारियों का आरोप है कि जंगल माफिया ने इस कार्य के लिए श्री मिश्रा को करोड़ों की भेंट चढ़ायी थी। इस अनियमितता की शिकायत भी तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिवों से की गयी थी, लेकिन सत्ता में मजबूत पैठ और धन के बल पर श्री मिश्रा के विरूद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

लेखक अनूप गुप्ता लखनऊ के चर्चित खोजी पत्रकार हैं. यह स्टोरी उनकी मैग्जीन दृष्टांत में कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित हो चुका है.

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