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Yashwant Singh : कल शाम कामधाम निपटा कर टहलने निकला तो मन में आने वाले खयाल में क्वालिटेटिव चेंज / ग्रोथ देख पा रहा था. लगा जैसे अपन तो इस दुनिया के आदमी ही नहीं. जैसे किसी 'टाइम मशीन' पर सवार हो गया था. अगल-बगल दिख रही चुपचाप खड़ी कारों, मकानों, पेड़ों, सूनी सड़कों, गलियों से रूबरू होते गुजरते सोचने लगा कि मान लो यह सब जलमग्न हो जाए, किसी महा प्रलय के चलते तो मछलियां इन्हीं कारों में अपना घर बसाएंगी और ये बहुत गहरे दबे पेड़ नई सभ्यताओं के लिए कोयला तेल आदि का भंडार बनेंगे... मतलब, कुछ भी बेकार नहीं जाना है.. सब रीसाइकिल होना है...

इस धरती का तेजी से नए की ओर उन्मुख होना, वो नया भले ही हमारे आपके लिए विकास वाला या विनाश वाला हो, बताता है कि हमारे चाहने न चाहने के बावजूद चीजें अपनी स्पीड में चलती हैं और इससे जो कुछ नया रचता बनता बिगड़ता नष्ट होता है वह दरअसल बहुत आगे के जीवन, सभ्यताओं, समय के लिए पूंजी / थाती / आधार / नींव का काम करता है.. जो हमारे लिए विकास है, संभव है वह धरती की सेहत के लिए विनाश हो लेकिन यही विनाश संभव है आगामी सभ्यताओं के लिए अकूत उर्जा और जीवन का केंद्र बन जाए...

पहाड़ पिघल रहे हैं... समुद्र लपलपा कर फैलना चाह रहे हैं, जंगल कट कर ठूंठ मैदान में पसरते जा रहे हैं और मैदान धीरे-धीर नमी विहीन होकर रेगिस्तान में तब्दील होता जा रहा है... यह बदलाव अपनी नियति को प्राप्त होगा..

ये तो सब जान रहे हैं कि धरती का उर्जा भंडार, जल स्रोत समेत कई किस्म के वो स्रोत जो जीवन के लिए जरूरी हैं, तेजी से क्षरण की ओर उन्मुख हैं.. अचानक घड़ी की सुइयां बहुत तेज गति से टिक टिक करने लगी हैं... कैलेंडर में जो बारह महीने खत्म होकर एक साल गुजरने का एहसास कराते हैं, वैसा अब सब स्थूल / गणितीय भर नहीं है. अब जो साल बीतता है, वह अपने आप में दशक भर समेटे होता है. दशक भर में पहले जो उर्जा हम नष्ट करते थे, जो उर्जा हम उपभोग करते थे, अब वह साल भर में करने लगे हैं... अचानक जैसे कोई शरीर फुल स्पीड में दौड़ने लगे और हांफते हुए धड़ाधड़ उर्जा बर्न करने लगे...

जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं उसमें सोचने समझने नीति बनाने का काम बस चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथ है और बकिया जनता बस दौड़ने-हांफने, अपने पेट के वास्ते जीने और और निहित स्वार्थ के इर्द गिर्द सोचने-समझने के लिए बाध्य है. यह एक किस्म की गुलामी ही है लेकिन मजेदार यह कि इस गुलामी के शिकार खुद को गुलाम मानने को तैयार नहीं होते.

ये जो दिन-रात गुजर रहे हैं, बड़े कीमती हैं. एक दिन-रात कोई चौबीस घंटे की चीज भर नहीं.. थोड़ा स्लो मोशन में महसूस करिए तो इसमें पूरा महीने छह महीने निहित हैं... कुछ वैसे ही जैसे स्पेस में पहुंचे आदमी के दिन रात महीने अलग होते हैं और हम धरती वालों के अलग... लेकिन हम धरती वालों ने अपनी स्पीड जो तय कर दी है, खुद को टाप गीयर में जो डाल दिया है, इसका नतीजा है कि समय तेजी से गुजर रहा है लेकिन असल में वह तेजी अपने पीछे कई कई सालों की शांति-उर्जा को फूंक रहा है.

जैजै

@स्वामी भड़ासानंद

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क :

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं...

Praveen Jha  आपने जो बात लिखी है, उसके लिए साधुवाद। यह जनचेतना से ही संभव है। नॉर्वे ने ठान लिया है कि २०२५ से कारें बंद कर देंगी। ओस्लो में २०१९ से ही। २ साल ही बचे हैं, पर जनता में कोई विद्रोह नहीं। कई लोगों ने कार डंप भी कर दिए। बस से जाते हैं। मेरा छोटा शहर है, वहाँ कंपनियों ने गाड़ी की पार्किंग खत्म करनी शुरू कर दी। बस साइकल पार्किंग रहेगी। कोपेनहेगन में साइकल के 'सुपर हाइ-वे' बन रहे हैं। फ्लाईओवर जिस पर बस साइकल जाएँगीं। गाड़ी पर टैक्स हर साल बढ़ रहा है। पर यह तभी संभव हुआ जब हर व्यक्ति साइकल चालक है, पहाड़ पर साइकल दौड़ा देते हैं। महिला-पुरूष सब। यह सरकार के बस का नहीं, यह जनचेतना से ही संभव है।

Ashok Anurag यशवंत जी, 60, 70, 80 के दशक तक तरक़्क़ी की रफ़्तार तो थी लेकिन एक सामान्य गति में 90 के दशक में जो तेज़ी आई है, वो तरक़्क़ी और विनाश साथ लाई है, आपके विचारों से सहमत हूँ

Arvind Kumar Singh जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं। वाह!

Harish Pant बन्धु ! अब सिर्फ पृथ्वी को बचाने की सोच को विस्तृत आयाम देने की बात कही जाए?

Ghanshyam Dubey आज सही और यथार्थ के फुलफार्म मे विचारों की गाड़ी दौड़ी है । खैर - विचार हैं तो विचार ही ! निर्विचार मन की स्थिति चाहिए आगे कुछ और देखने के लिए ...!

Rajesh Somani First time realised that yaswant Singh sir name have different different meaning

Kashi Prasad Yadav Jaswant bhai..sach likh diya hai aapne..jara shaant man se sochne bhar se hi cheezein saaf saaf nazar aane lagtu hain...badhai..

Yogesh Bhatt स्वामी जी.. दिशा व दशा भी बदलिए उन सबकी जिनके लिए लिखते हैं ...

राजीव चन्देल Very perfect analysis about life and nature.

Yashwant Singh Bhandari कल लगता है अकेलेपन और गहरी सोच लिए निकले थे रोड में,

Aryan Kothiyal प्रकृति स्वयं सब ठीक करेगी।

Braj Bhushan Dubey यथार्थ से आच्छादित पक्ष।

Puneet Sahai सच को निकट दृष्टि से देख ही लिया आपने

लोकेश सलारपुरी खबरनवीस अगर फिलॉस्फर भी हो तो ये ही हाल होता है

Naresh Sadhak क्या क्या न सहे हम विकास के नाम पर , जाने कहाँ आ गये हम ,चलते चलते ! घडी भर तू कर ले आराम जाना है कहाँ , यहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जाना है कहाँ!

Shwetank Ratnamber JAI BHOKAL .... JAI BADHAS .... AAJ SE YAHI JAIKARA.... BHADAS BHADAS YAR TUMHARA..... NIKALIYE NISHULK BHADAS PAIYE ACHHI SEHAT BINDAS

Ashok Thapliyal Shaandaar future study aapki... Shayad cheekh bhi shoony, Maun bhi shoony hota Jaa Raha hai...... Sampoorn Jagat mein sabsay taakatwar..... prakriti aur shabd...Lekin, abki baar pralay Kay Baad Manu & shradhha sambhav hai Aisa kuch kahain sabhyataoon Kay malbay Kay beech say nikalkar...... +++kuchh to bachana thaa, Laava ugal Kay kya Kiya hamnay...!!!!!

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