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जी हां, सही पढ़ा आपने...दरअसल, इन दिनों मायानगरी मुंबई में पतरकारों (पत्रकार नहीं) का धड़ल्ले से सनमान होने का मौसम चल रहा है... पत्रकारों को कभी कोई रेप और कास्टिंग काउच में फंसे छिनास्वामी सन्मान दे रहे हैं तो कभी कोई नशेड़ी, गरदुल्ले, चरसी और वसूलीबाज लकड़े का चमकीला तख्ता पकड़ा रहा हैं... दिलचस्प तो ये है कि इसे देने, मतलब पकड़ाने के लिए ये सो कॉल्ड छिनास्वामी, दलाल और महिलाओं का शोषण करने वाले आयोजक मुम्बई में सोशल मीडिया और माउथ पब्लिसिटी माने मुंह से, या कभी-कभी फोन कर पूछते हैं- भैया जी, आप पतरकार हो, आपको सन्मान करना है...

अगर सामने वाले से स्वीकार करने वाला जवाब नहीं मिलता है, तो ये आयोजक निराश, हताश या चिंता करने के बजाए किसी और "सेटरबाज" को कॉल कर इन पतरकारो को समारोह में बुलाने का "ठेका" दे देते हैं- भईया, इस बार जो अपना प्रोग्राम हो रहा है, उसके लिए 12 से 15 पतरकार लगेंगे, अपुन को इतने पतरकार चाहिए... आयोजन समिति का कॉल आने पर ठेकेदार गद-गद...क्योंकि उसे भी हर पतरकार पर कमीशन मिलता है जिससे प्रति आयोजन कमाई 5-10 हजार तक हो जाती है और पतरकारों से जान-पहचान अलग...कुछ पतरकार तो अपनी जेब से पैसा देकर नाम शामिल करवाने के जुगाड़ में रहते हैं, जिन्हें लकड़े पर स्टील मारकर बड़े-बड़े मोटे नाम मे अपना गोल्डन नाम देख कर दुकान चलाने की आदत और शौक है। ऐसे में, जब इन पतरकारो को तमगा मिलता है तो ये भैया जी खुश, इनकी पत्नी माने भाभी जी खुश, इनके चमचे दोस्त खुश और इनकी दुनिया भी खुश...माने पर्सनल से लेकर सोशल लाइफ तक... सबके सब खुशहाल... क्योंकि भैया जी बड़क्का पतरकार हो हो गए।

एतना बड़ा पतरकार की भईया जी को समाचार तो क्या, हिंदी में अपना नाम लिखने को बोलो, तो उसे सही-सही लिखना तो दूर, बोलने भी नहीं आता है...फिर भी भैया जी, पतरकारों का सरदार....और सरदार के साथ चेला-चमचों की बहार...ऐसे में अब मुंबई में आलम यह हो गया है कि जब कोई प्रतिष्ठित संस्थान किसी प्रतिष्ठित पत्रकार को सन्मान करना चाहते हैं, तो पत्रकार तपाक से आयोजकों से पहले ही पूछ डालता है- सर जी, नमस्कार!!! आपके यहाँ भी "भईया जी" आ रहे हैं सम्मानित होने के लिए!

मुंबई से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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  • Guest - mumbai ka ek patrakar

    खान साहब खेल रहे है नवभारत टाइम्स में "ब्राह्मणवाद" का खेल... मुंबई का सो कॉल्ड नँबर वन अखबार नवभारत टाइम्स का रंग भी इन दिनों सांप्रदायिक रंग में रंगा हुआ नजर आ रहा है। किसी को मोदी के "मन की बात" भाता है तो किसी को "पप्पू की आलोचना" करना भी फूटी आंख नहीं सुहाता है। इसके वजह से नवभारत टाइम्स का माहौल सांप्रदायिक बन गया है, जिसके लिए कुछ कथित देशभक्त, मोदीभक्त, कांग्रेस भक्त, सोनीया भक्त, पप्पू भक्त और पाकिस्तान के अलावा हुर्रियत भक्त हैं। खबर है कि पिछले कई दिनों से नवभारत टाइम्स की कमान एक खान साहब के हाथ मे है, जो खुद को इंडिया का कम, हुर्रियत का अधिक नुमाइन्दगी पसन्द है। इसकी वजह से जहां NbT मुंबई का वातावरण दिन ब दिन हिन्दू-मुस्लिम होते जा रहा है। वहीं कुछ दिन पहले खांसाहब ने नवभारत टाईम्स परिवार पर "ब्राह्मणबाद" का आरोप लगाते हुए गरियाया है। इस वजह से NBT का अंदरखाने तिलमिलाए हुए हैं, लेकिन अधजल गगरी संपादकीय पैनल होने की वजह से खान साहब की मुल्लागिरी पूरे उफान पर है और बहुमत वाले हिन्दू कर्मचारी खामोश तमाशा देखने को मजबूर हैं। इस सबके पीछे nbt के कर्ताधर्ता जिम्मेदार है, जिसकी अफसरशाही और लालफीताशाही से अखबार की माँ-बहन हो चुकी है। इसके बावजूद मैनेजमेंट मूकदर्शक बन अखबार के बन्द होने की प्रतीक्षा में है, ताकि न रहेगी बांस, और न बजेगी बांसुरी...

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