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Ashwini Kumar Srivastava : 315 करोड़ रुपये का मोबाइल...3 लाख रुपये की चाय...40 लाख का पर्स....पूंजीवाद का असली और घिनौना रूप अगर देखना है तो इस खबर को पढ़िए। इनका बस चलता तो ऊपरवाले से यह धूप और हवा भी ब्रांडेड खरीदते ताकि करोड़ों-अरबों खर्च करके यह महज इतना दिखा सकें कि ये धरती के बाकी इंसानों से अलग हैं। सरकार की मेहरबानियों से जनता की गाढ़ी कमाई को अपनी कंपनियों के जरिये चूस कर और फिर पानी की तरह बहाकर ये पूंजीपति बेहिसाब अय्याशियां करते हैं...वह भी उस देश और समाज में, जहां एक टाइम का खाना-पानी, कपड़े और सर पर छत के लिए न जाने कितने लोग रोज अपनी जान गंवा रहे हैं...

कितने बच्चे शिक्षा के लिए तरस रहे हैं तो कितने गरीब स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। ऐसे संवेदनहीन और अय्याश पूंजीपतियों को भी सरकार तमाम रियायतें देकर, हजारों-लाखों करोड़ के इनके कर्ज माफकर, इनके साथ गलबहियां और सांठगांठ कर असमान पूंजी वितरण का यह वीभत्स तमाशा जनता को दिखा रही है। काश कि ऐसा हो पाता कि हर कंपनी के मालिक, निदेशक या उच्च अधिकारियों की निजी तनख्वाह या पूंजी पर किसी तरह की लिमिट लगाई जा सकती ताकि बेहिसाब और अकूत सम्पति का मालिक बनकर उसे इस कदर वाहियात तरीकों से लुटाने की बजाय उसे तनख्वाह या मुनाफे के रूप में कर्मचारियों, शेयर धारकों तक समान रूप से बांटा जा सकता। कुछ नहीं हो सके तो कम से कम किसी चैरिटी संस्थान तक ही यह धन पहुंचाया जा सकता ताकि जरूरतमंद और गरीब ही इस अकूत संपदा और लूट की रकम से अपना जीवन तो बचा सकें।

पूंजीवाद का बस चले तो पूंजीपतियों के जरिये वह धूप, हवा और हरियाली भी ब्रांड में बदल दे। वैसे भी भारत में पूंजीवाद से अब बचा ही क्या है? इंसान की चमड़ी, खून या कोई भी अंग-प्रत्यंग हो, प्रकृति में कल कल बहता पानी हो ..सब अब बिक्री के लिए उपलब्ध है...बाजार में अलग अलग ब्रांड इस सृष्टि के कतरे कतरे को ज्यादा से ज्यादा दाम में बेचने की होड़ में हैं। जिनके पास पैसा है, वह प्रकृति के दिये हुए मुफ्त उपहारों को भी महँगे दामों में खरीद कर अय्याशियां कर रहे हैं...जिनके पास नहीं है, वह या तो घुटन भरी जिंदगी जी रहे हैं...या जरूरी सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ दे रहे हैं। नीता अंबानी की तरह कोई दिनभर में करोड़ों की चाय पी या पिला रहा है तो कोई इस लिए दम तोड़ दे रहा है कि उसके पास दवाई खरीदने के पैसे नहीं हैं...पूंजी का असमान वितरण होना अवश्यम्भावी है इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि सबके पैसे या सम्पति छीन कर गरीबों में बांट दो...लेकिन सरकार इतना तो कर ही सकती है कि निजी पूंजी या वेतन पर पदों के हिसाब से निजी क्षेत्र में भी कोई लिमिट तय कर दे।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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