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Amitabh Thakur :  हे राम! मैंने “गाँधी और उनके सेक्स-प्रयोग” शीर्षक एक छोटा सा लेख लिखा. उसमे अन्य बातों के अलावा मैंने जो शब्द प्रयोग किये वे थे “यदि हर व्यक्ति प्रयोग के नाम पर दूसरी महिलाओं के साथ सार्वजनिक रूप से सोने की मांग करने लगेगा”, “अन्य विवाहित/अविवाहित महिलाओं के साथ इस प्रकार नंगे अथवा अन्यथा सोना”, “विवाह-बंधन से बाहर इस प्रकार खुले रूप से गैर-औरतों के साथ शयन” अर्थात गाँधी जी के अन्य महिलाओं के साथ निर्वस्त्र या अन्यथा शयन.

#AmitabhThakur

एक साहब (गाँधी भक्त इसीलिए नहीं कहूँगा क्योंकि वे यदि कथित रूप से गाँधी का थोडा सा भी अनुश्रवण कर रहे होते तो मेरे लिए वह सब स्पष्टतया अनुचित शब्द नहीं कहते जो उन्होंने धाराप्रवाह कहा) ने मेरे इन शब्दों पर अपना मुलम्मा किस तरह चढ़ाया वह देखें. उन्होंने अन्य बातों के साथ अपने मन से, अपनी इच्छा से और अपनी कल्पना से यह भी जोड़ दिया कि अमिताभ ठाकुर ने कहा कि “महात्मा गाँधी विवाहित और अविवाहित महिलाओ के साथ शारीरिक संबध बनाया करते थे” और “उनके साथ बगैर उनकी पूर्वानुमति लिए उनके साथ सोते थे और शारीरिक सम्बन्ध बनाते थे.”

गांधीजी अन्य महिलाओं के साथ निर्वस्त्र या अन्यथा सोते थे यह बात उन्होंने कई बार स्वयं स्वीकारी और यह विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों के माध्यम से भी सामने आया. उन्होंने ना तो शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बात कही और ना ही मैंने अपने लेख में ऐसा कहा. मैं तब से सोच रहा हूँ कि उनका निर्वस्त्र होने का प्रयोग सही था अथवा नहीं इस पर अलग-अलग विचार तो संभव हैं और मेरा अभी भी यह स्पष्ट व्यक्तिगत विचार है कि यह सर्वथा अनुचित था पर निर्वस्त्र सोने को “शारीरिक सम्बन्ध” बनाने की अपने स्तर पर परिकल्पना इन कथित गांधीवादी गाँधी के कथित अनुनायी ने किन तथ्यों के आधार पर मनमर्जी कर ली मैं यह अभी तक नहीं समझ पा रहा हूँ.

मैं तो जितना इस विषय पर जानता हूँ वह यही है कि संभवतः गाँधी ब्रह्मचर्य को जीवन की सबसे बड़ी नेमत और चुनौती मानते थे और इसी की कथित प्राप्ति हेतु वे निर्वस्त्र या अन्यथा सोने का उपक्रम करते थे जिसे वे सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी करते थे लेकिन यदि ऐसे महान गांधीवादी विचारक इस संसार में हों जो इस तथ्य के उद्धरण को स्वयं दस कदम आगे बढ़ कर “शारीरिक सम्बन्ध” बनाने तक परिकल्पित करने लगें तो इस पर क्या कहा जा सकता है?

इसके अलावा मैं यह भी निवेदन करूँगा कि वो जिनके लिए महात्मा गाँधी एक वाद या धर्म या संप्रदाय बन चुके हैं उन सभी से मैं उनकी भावना और आस्था आहात होने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ पर साथ ही इस घटना से यह बात भी मन में दृढ हुआ है कि अब शेष जीवन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दिशा में भी काम करूँगा और जम कर और खुल कर काम करूँगा. मुझे कई लोगों ने चुनौती दी कि यदि इतने शूरमा हो तो मुहम्मद साहब पर लिखो तो उनसे वादा करता हूँ कि अभी तो नहीं, अभी कुछ दिन और जीने का मन है पर जीवन के आगे के किसी मोड़ पर उनपर भी तात्विक, तथ्यपरक और ऐतिहासिक अनुसन्धान कर बिना लाग-लपेट के खुशवंत सिंह के शब्दों में “ना कहू से दोस्ती ना कहू से वैर” की तर्ज पर सत्यपरक बातें लिखूंगा भले वे मेरे मरण का कारक ही क्यों ना हो जाएँ क्योंकि एक जीवन है, मरना वैसे भी है तो फिर मन मसोस कर क्यों जीया और मरा जाए, जो मन हो और सत्यपरक और ऐतिहासिक हो उसे लिखो क्योंकि मुक्तिबोध के शब्दों में “उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे”

बाकी रही नौकरी, तो नौकरी कभी किसी के ऐतिहासिक, बौद्धिक और सत्यपरक सामाजिक-सांस्कृतिक अन्वेषण और प्रस्फुटन को नहीं बांधती. जब पूरी ईमानदारी से अपनी बाकी नौकरी कर रहा हूँ और वह जीवन यापन को अच्छी तनख्वाह दे रहा है तो उसे क्यों छोडूं.

ना नौकरी छोडूंगा, ना सत्यपरक अन्वेषण और प्रस्तुतीकरण, जब तक उपरी ताकत या प्रकृति को वैसा मंजूर हो.

रही बात आवश्यकता कि तो मेरा यह मानना है कि विवाद अपनी जगह हैं पर सत्य का संधान विवादों के कारण रोका नहीं जाना चाहिए और सत्य निश्चित रूप से सामने आना चाहिए भले वह कटु हो. मैं इस सम्बन्ध में अपने खिलाफ भी प्रत्येक कटु सत्य का निरंतर स्वागत करता हूँ क्योंकि यदि गाँधी भगवन नहीं थे तो मैं तो बहुत छोटा आदमी हूँ, फिर अकारण दोषरहित बनने का स्वांग कैसा, क्यों और किसके लिए?

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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