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अनेहस शाश्वत
बुढ़ापे को लोग बुरा कहते हैं, लेकिन दरअसल ऐसा है नहीं. इस अवस्था के बहुत लाभ भी हैं, खास तौर से हिंदुस्तान में. यहाँ कोई बुड्ढा आदमी कितनी भी बेवकूफी की बात करे, लोग उसका प्रतिवाद नहीं करते बल्कि हाँ में हाँ मिलाते हैं. इधर थोड़ा बदलाव आया है, देश से प्रेम करने का पेशा करनेवाले कुछ युवा जरूर, उनकी बात नहीं मानने वाले बुड्ढों को भी धमका देते हैं, लेकिन ख़ुदा का शुक्र है ऐसे लोग बहुत कम हैं. बुढ़ापे का एक दूसरा बड़ा लाभ ये भी है कि जीवन की संध्यावेला के पर्याप्त ख़ाली टाइम में पीछे छूट गई मूर्खताओं और मनोरंजक घटनाओं का काफी मज़ा नए सिरे से लिया जा सकता है. इस लेख में भी वही किया जा रहा है.

पढाई-लिखाई के बाद जब कुछ नहीं मिला, तो एक अच्छा-खासा अरसा अपने घर पर रह कर काटा. कसबे में मेरे जैसे खलिहर काफी थे सो सुबह-शाम बैठकी लगने लगी जिसमे एक से एक ज्ञानीजन भी शिरकत करते थे, जिनको अपने ज्ञान पर अगाध भरोसा था लेकिन इस बात का मलाल भी की इस कसबे में उनके ज्ञान की कोई कदर नहीं है. उनके ज्ञान की एक-दो बानगी देखना गैरमुनासिब नहीं होगा. राजीव गाँधी की हत्या हो चुकी थी लेकिन उन ज्ञानियों का मानना था कि उनको अगवा कर लिया गया है और उचित समय पर वे फिर से प्रकट होकर देश का कल्याण करेंगे. ऐसे ज्ञानिओं से मिलने के बाद एकाएक मुझे बचपन के वे ज्ञानी याद आ गए जो निक्सन और इंदिरा गाँधी की बात-चीत का आखों देखा हाल चौराहों, पान की दुकानों या दूसरी सार्वजनिक जगहों पर बेधड़क सुनाया करते थे. उनकी शुरुआत आम तौर से पुष्पक विमान से होते हुए सी.आई.ए के कार्यकलापों तक आती थी और उनका बतकही का अंदाज़ इतना रसभरा होता था,मानो ज्यादातर घटनाओं के वे चश्मदीद गवाह हों.

लेकिन कहीं न कहीं वे भले लोग थे. ऐसी बतकही के दौरान अगर कोई सच में पढ़ा-लिखा आदमी आ जाता था तो वे टॉपिक बदल देते थे या दायें-बाएं हो जाते थे, लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि उनको अपने ज्ञान पर संदेह था वे सिर्फ व्यर्थ की टकराहट से बचते थे. बहरहाल बेरोजगारी के दिनों की बैठकों में भी जब अंदाज़े बयां वही बचपन वाला ही दिखा तो बैठकी में शामिल एक ज्ञानी से मैंने इस ख़ास अंदाज़े बयां का राज़ पूछा. उन्होंने हंसते हुए बताया इस अंदाज़े बयां को बोकरादी बोलते हैं.

उन्होंने पूरा भाष्य किया कि बोकरादी शब्द, प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से निकला है. सुकरात तथ्यपूर्ण बातें करते थे लेकिन बोकराद अनर्गल बात करने में माहिर होते हैं और बात-चीत के इसी अंदाज़ को बोकरादी कहते हैं. उन्होंने ये भी कहा कि बेकारी के दिन काटने के लिए बोकरादी से ज्यादा मनोरंजक दूसरा और कोई उपाय नहीं है क्योंकि इसमे सिवाए कुछ प्याले या गिलास चाय के खर्चा भी कुछ नहीं है.बात पते की थी और उसी कसबे में रहकर ताजिंदगी बोकरादी का मज़ा लेने का अवसर भी था लेकिन मूर्खता के आवेग में मै अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए निकल पड़ा,लेकिन अच्छा ये रहा कि मूर्खता के उस दौर में भी खासे दिलचस्प अनुभव हुए जो शायद कभी काम आयें.

एक अनुभव बताता हूँ, बनारस का है. वहां के पत्रकारिता जगत में कई साथी आपसी बात-चीत में कभी-कभी किन्हीं-किन्हीं सज्जन को पेलपालदास कह कर बुलाते थे. जब मुझे पता चला तो मैंने बनारस के एक स्थानीय ज्ञानी से इसका मतलब पूछा तब उन्होंने एक कथा सुनाई. किसी समय वाराणसी नगरी में ब्रिजपालदास नाम के एक रईस रहते थे, वो तो पुश्तैनी रईस थे ही सो ठाठ से रहते थे, लेकिन उनकी नक़ल ऐसे भी तमाम लोग करते थे जो रईस नहीं थे, ऐसे ही लोगों को तब के बनारस में पेलपालदास कहने की परंपरा चल पड़ी. उन्होंने ही बताया कि बनारस के पुराने और नए पेलपालदासों में फर्क है.पुराने पेलपालदास जानते थे कि वे क्या हैं लेकिन नए पेलपालदास, ब्रिजपालदास सरीखी अकड़ दिखाते हैं, इसलिए ज्यादा हास्य के पात्र हैं.

अब जरा इस पूरी कथा को एक रूपक मान कर आज के भारत को इस रूपक के सापेक्ष देखें.मुझे अच्छी तरीके से याद है, मेरे बचपन में इंदिरा गाँधी प्रगतिशील विचारों और नीतियों की प्रतीक थीं और तत्कालीन जनसंघ पुराने विचारों का समर्थक. अड्डेबाज़ी उस समय खूब होती थी, जिसमे इंदिरा गाँधी के समर्थक उनके कामों मसलन बैंक के राष्ट्रीयकारण, परमाणु विस्फोट और बांग्लादेश के निर्माण की चर्चा कर उनकी तारीफ़ करते थे. तो जनसंघ समर्थक उन्हें किसी बात का श्रेय नहीं देते थे. उनका कहना था की पुष्पक विमान बनाने वाले हमारे देश में पहले ही सब कुछ किया जा चुका है और इंदिरा गाँधी जो कुछ भी कर रही हैं, उसका कोई मतलब ही नहीं है.

बावजूद ऐसी बहसों के कम से कम एक मुद्दे पर मतैक्य रहता था की देश में गरीबी बहुत है और आम आदमी का जीना दुश्वार है. बहरहाल समय बदला और देश में थोड़ा पैसा दिखा. फिर से दो तरह के लोग सामने आए. एक वे जो आपे में रहे दूसरे वो जो बेकाबू हो गए. बेकाबू लोगों का मानना है देश सुपर पॉवर बन चुका है और पाकिस्तान की औकात नहीं जो भारत को आँखें दिखाए. ऐसे लोग ही पेलपालदास हैं. भारत पहले के मुक़ाबले शक्तिशाली जरूर हुआ है लेकिन सुपर पॉवर नहीं. इसीलिए ऐसे पेलपालदास तब कुछ नहीं कर पाते,जब पाकिस्तान अक्सर दो –चार भारतीय जवानों को मार डालता है. ऐसे में भारत के हुक्मरानों को असली ब्रिजपालदास यानि अमेरिका से गुहार लगानी पड़ती है.

पेलपालदास जो पाकिस्तान को चीर डालने को उतावले रहते हैं, चीन का प्रसंग आते ही चुप्पी साध जाते हैं. और भी ऐसे तमाम प्रसंग हैं जो पेलपालदासों की कलई गाहे-बगाहे खोलते रहते हैं, लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी. लेकिन दाद तो पेलपालदासों को देनी ही पड़ेगी जो जानते हैं कि वे ब्रिजपालदास नहीं हैं, लेकिन वैसा दिखने का नाटक करते हैं और हंसी के पात्र बनते हैं.

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों लखनऊ में रहने वाले अनेहस शाश्वत से संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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