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मृणाल जी को असहमति से सख्त एतराज है... एक पुराना वाकया बताता हं....उन दिनों मृणाल जी हिंदुस्तान की संपादक (विचार) थीं और मैं हिंदुस्तान के पटना संस्करण में मुख्य उपसंपादक. एक दिन संपादकीय पेज देखने वाली कनीय सहयोगी एक पत्र लेकर आई और पूछी कि इसे लोकवाणी (संपादक के नाम पत्र) में छाप सकते हैं? मैंने पत्र को पढा. पत्र में मृणाल जी के एक लेख में कही बातों की आलोचना की गई थी.

मैंने सहयोगी से कहा, निश्चित रूप से छाप सकती हो. ऐसे पत्रों को तो प्राथमिकता दी जाती है. पत्र दूसरे दिन छप गया. उसके दो-तीन दिन बाद वह सहयोगी मेरे पास आई और कहने लगी, "संपादक जी बुलाकर पूछ रहे थे कि वह पत्र कैसे छाप दी, तो मैंने कह दिया कि आपसे (मुझसे) पूछ कर छापी थी. फिर संपादक जी ने कहा आगे से ऐसा पत्र नहीं छापना."

संपादक जी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा लेकिन कुछ दिन बाद एक दिन मैं उनके कमरे में था तो उन्होंने अपने दराज से एक कागज़ निकाला और कहा, ''इसे पढिये.. आप लोगों को लगता होगा कि सबकुछ मैं अपने मन से ही करता हूं."

वह तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मोहन का पत्र था जिसमें पूछा गया था कि अपने ही संपादक के लेख के ख़िलाफ़ अख़बार में कैसे छप गया. ज़ाहिर है नरेश मोहन ने तो खुद पत्र पढ़ा नहीं होगा. मृणाल जी ने ही शिकायत की होगी. इस घटना का उल्लेख बस मृणाल जी के ट्वीट का फ़ोटो देख कर दिया. और आगे कुछ कहना शालीनता के ख़िलाफ़ होगा.

पटना के वरिष्ठ पत्रकार विपेन्द्र कुमार की एफबी वॉल से.

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