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Jaishankar Gupta : मृणाल पांडेय कभी हमारा आदर्श नहीं रहीं। हिन्दुस्तान के संपादक के रूप में एक सहकर्मी के तोर पर हमारे सामने उनका क्षेत्रवादी-जातिवादी चेहरा ही नजर आया। लेकिन जिस बात को लेकर उनकी आलोचना के स्वर तेज और तीखे हो रहे हैं, उनका हम समर्थन नहीं कर कर सकते। लोकतंत्र में इतनी आलोचना बर्दाश्त करने की क्षमता तो होनी ही चाहिए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को उस समय के मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर ने अपने कार्टून में गधा बनाकर दिखाया था। लेकिन उस समय शंकर के बारे में नेहरू और उनके समर्थकों की इस तरह की कोई प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई थी। अलबत्ता तब नेहरु ने फोन पर यह कहते हुए कि "क्या आप एक गधे के साथ चाय पीना पसंद करोगे?' शंकर को चाय पर आमंत्रित किया था! लेकिन यह बीते जमाने की बातें हैं।

इस बार भी हम-आप मृणाल जी की भाषा से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनके विरोध में जिस तरह की भाषा और शब्द गढ़े जा रहे हैं क्या उनसे सहमत हुआ जा सकता है! मृणाल जी की भाषा से परेशान लोगों को किसी को 'मौन मोहन'और 'पप्पू' कहने में कितनी गर्वानभूति होती है!

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से.

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