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Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती... ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है... एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे... उसमें से एक ये भी है... एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता... आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं... सब बेशर्म हैं... आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं...

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय... बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा... बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी... हम सब के लिए शर्म का दिन है... खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है... क्यों न कभी इनके धरने पर गया... क्यों न कभी इनकी मदद की... ओफ्ह.... शर्मनाक... मुझे खुद पर घिन आ रही है... दूसरों को क्या कहूं... हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है... किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय...

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो...

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख... "कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।"

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti...

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद...

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ....sb kuch fix hota h....kuchh bhi fair nhi hota...

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद.....

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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