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आखिरकार भारी विरोध के बाद वसुंधरा सरकार बैकफुट पर आ गई... विवादित विधेयक सेलेक्ट कमेटी को भेज दिया गया...  पिछले पांच दिनों से राजस्थान सरकार की किरकिरी हो रही थी... वसुंधरा सरकार ने लोकसेवकों के करप्शन पर मीडिया में लिखने पर पाबंदी लगाने और लोकसेवकों पर बिना इजाजत मुकदमा नहीं दर्ज करने वाले विवादित बिल को अब प्रवर समिति में भेजने के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया है. इस विवादित अध्यादेश को बिल के रुप में सोमवार को वसुंधरा सरकार के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने विधानसभा में रखा था. उसके बाद देश भर में हंगामा मचा हुआ था.

सोमवार को इस विवादित अध्यादेश की लड़ाई राजस्थान हाईकोर्ट भी पहुंच गई. इस अध्यादेश को एक वकील ने चुनौती दी है. जानकारी के मुताबिक वकील ए. के. जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट में वसुंधरा राजे सरकार के अध्यादेश को चुनौती दी है. उधर आज जयपुर के पत्रकारों ने भी इस बिल का विरोध किया और काली पट्टी बांध कर प्रेस क्लब से विधानसभा तक मार्च किया और गिरफ्तारियां दीं. सेशन कोर्ट में वकीलों ने भी इस बिल के खिलाफ प्रदर्शन किया.

द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राजस्थान सरकार से उस हानिकारक अध्यादेश को वापस लेने की मांग की जो लोकसेवकों, न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों के खिलाफ आरोपों पर उसकी मंजूरी के बिना रिपोर्टिंग करने से मीडिया को रोकता है. गिल्ड ने एक बयान में कहा कि यह अध्यादेश मीडिया को परेशान करने वाला एक खतरनाक यंत्र है. बयान में कहा गया है, "ऐसा दिख रहा है कि राज्य सरकार का पिछले महीने जारी अध्यादेश बजाहिर फर्जी प्राथमिकी से न्यायपालिका और नौकरशाही की रक्षा करने के लिए लाया गया है."

सोमवार देर शाम वसुंधरा राजे ने अपने मंत्रियों की बैठक बुलाकर इस विधेयक में परिवर्तन की बात कही थी. मंगलवार को जैसे ही विधानसभा कार्यवाही शुरू हुई, विपक्ष ने इस बिल के विरोध में बेल में आकर विरोध करना शुरू कर दिया. हंगामे के बीच गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने घोषणा की और सदन के सदस्यों की मांग पर इस बिल को प्रवर समीति को भेजने का एलान किया. कटारिया ने घोषणा की कि दो महीने के अंदर 15 सदस्यों की प्रवर समिति बनेगी जिसके अध्यक्ष गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया रहेंगे और इसमें सभी दलों के सदस्य रहेंगे. प्रवर समिति के सुझाव के बाद अगले सत्र में संसोधित बिल पेश किया जाएगा. लेकिन कटारिया ने साफ किया कि अगले 42 दिनों तक ये विवादित अध्यादेश जारी रहेगा जब तक प्रवर समीति में ये विधेयक नहीं जाता है.

इससे पहले संसदीय कार्यमंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि सरकार के बारे में ऐसा भ्रम फैला था कि वो मीडिया और ज्यूडिश्यरी को काबू में करना चाहती है जबकि ऐसा नहीं था. इसीलिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसमें बदलाव के लिए कहा है. कांग्रेस ने इस बिल को ही वापस लेने के लिए सदन के बेल में हंगामा किया जिसके बाद सदन को एक बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा. बिल को पारित नहीं होने को कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने कांग्रेस पार्टी और जनता की जीत बताया और कहा कि जब तक ये बिल वापस नहीं होता कांग्रेस इसका विरोध करती रहेगी.

राजस्थान विधानसभा में आज गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने विपक्ष के भारी हंगामे के बाद दंड विधियां राजस्थान संशोधन विधेयक को विधानसभा की प्रवर समिति के पास भेजने का प्रस्ताव रखा जिसे ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई. बैठक शुरू होते ही विपक्ष ने किसानों की पूर्ण कर्ज माफी का मुद्दा उठाया और हंगामा शुरू कर दिया। इसी बीच गृहमंत्री कटारिया ने दंड विधियां राजस्थान संशोधन विधेयक को प्रवर समिति (सिलेक्ट कमेटी) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा जिसे सदन ने ध्वनिमत से मंजूरी दे दी.

कटारिया ने कहा कि प्रवर समिति अपनी रिपोर्ट विधानसभा के अगले सत्र में पेश करेगी. इससे पहले, संसदीय कार्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने विधेयक पर कल रात मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई एक बैठक की जानकारी देते हुए कहा कि गृहमंत्री इस संबंध में सदन में वक्तव्य देना चाहते हैं. कटारिया ने कहा कि सरकार ने दंड विधियां संशोधन अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही जारी किया है. गृहमंत्री की अपनी पार्टी के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाडी से नोंकझोंक भी हुई.

क्या हैं बिल के प्रावधान

इस बिल के पास हो जाने के बाद मौजूदा और पूर्व जजों, सरकारी अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराना आसान नहीं होगा. एफआईआर करने से पहले सरकार की मंजूरी लेनी होगी. पुलिस अपनी तरफ से लोकसेवकों के खिलाफ न एफआईआर कर पाएगी और न ही इनके खिलाफ मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए जा सकेंगे.  7 सितम्बर को जारी अध्यादेश के अनुसार, सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत अदालत किसी की शिकायत पर सीधे जांच का आदेश नहीं दे पाएगी. राज्य सरकार से अनुमति मिलने के बाद ही अदालत जांच के आदेश दे सकेगी. इसके तहत आरोपी लोकसेवकों की तस्वीर, नाम-पता सार्वजनिक करना भी अपराध होगा और इसमें 2 साल तक की कैद का प्रावधान है. सरकार की मंजूरी मिलने तक इनसे जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करना भी गैरकानूनी होगा और इसके लिए भी सजा का प्रावधान है.

उधर, डीयूजे ने भी बिल को ठंडे बस्ते में डालने का स्वागत किया है. ये है डीयूजे की प्रेस रिलीज... RAJASTHAN GAG BILL DEFERRED : DUJ, NAJ, LAWYERS UNION HAIL VICTORY OF DEMOCRATIC FORCES... The Delhi Union of Journalists(DUJ) , the National Alliance of Journalists and All India Lawyer’s Union have congratulated the democratic opinion that demanded that the Criminal Laws(Rajasthan Amendment) Ordinance 2017 placed by Smt. Raje Government in Rajasthan assembly for converting it in to a statute should be withdrawn lock-stock and barrel .

A small beginning has been made by its deferment they said. Continued vigilance is the need of the hour as other cases of brow beating the media remain, they added. The bill in our opinion was tantamount to gagging the media and saving corrupt elected representatives who are held to be the public servants. A key purpose of the law seemed to be to save corrupt politicians and corrupt bureaucrats connected with the ruling party in the state. The legislation following curbs on ‘The Wire’ for their reportage of shady business dealings made  it all the more sinister and a dangerous portent, the statement added.

The joint statement points out that it is a psychological victory of the democratic forces against forces that sought to stifle democracy and dissent and muzzle the media.  An extended executive meeting of the Delhi Union of Journalists already slated to decide future course of action will however be held as per schedule.

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