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गुजरात के चुनाव और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना इतनी बड़ी खबरें हैं कि लगता है देश भर की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं, सारे मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। राजनीतिज्ञों को तो जनता को अंट-शंट बातों से मुद्दे भुलाकर फुसलाने की आदत थी ही, अब मीडिया भी इस आदत का शिकार हो गया है और जनता के पास इसी मीडिया को बर्दाश्त करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। खुद मीडिया से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों ने इस पर चिंता जाहिर की है, लेकिन इस स्थिति को बदलने के लिए मीडिया में कोई व्यवस्थित चिंतन हो रहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं लगता। हम भूल गए हैं कि ट्विटर और मीडिया में काफी नाटकबाज़ी के बाद आखिरकार अरविंद केजरीवाल 15 नवंबर को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिलने चंडीगढ़ आये थे।

उस मुलाकात के बाद दोनों मुख्यमंत्रियों ने सांझा बयान जारी करके जनता को आश्वासन दिया था कि दोनों सरकारें दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण की समस्या को लेकर गंभीर हैं और इस समस्या से निपटने के लिए सतत प्रयास करेंगे। बयान में यह भी कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अगले साल की सर्दियों में प्रदूषण की स्थिति की पुनरावृत्ति न हो। हमें नहीं मालूम है कि वे "सतत प्रयास" क्या होंगे, कब से शुरू होंगे, कैसे शुरू होंगे, उसमें शामिल दोनों सरकारों की भूमिका क्या होगी, किसानों द्वारा भूसा जलाने की समस्या से पार पाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे, उद्योगों और वाहनों के लिए क्या नियम बनाए जाएंगे, नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का रुख क्या होगा, आदि-आदि। दोनों सरकारें इन सभी मुद्दों पर फिलहाल खामोश हैं, पंजाब के मुख्यमंत्री ने तो खैर बैठक में शामिल होने से ही इन्कार कर दिया था। इसलिए पंजाब सरकार की ओर से इस समस्या के समाधान के लिए फौरी तौर पर किसी कदम की अपेक्षा तो की ही नहीं जा सकती। मज़ेदार बात यह है कि मीडिया भी इस मामले पर खामोश है। नहीं, नहीं, मीडिया खामोश नहीं है, वह चीख-चीख कर हमें गुजरात और राजधानी नई दिल्ली के अकबर रोड की खबरें बता रहा है।

कुछ वर्ष पूर्व भारतीय मौसम विभाग तथा अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लीकेशन सेंटर) के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया था कि तमाम तरह के प्रदूषण के कारण सूर्य की रोशनी के पृथ्वी तक सीधे पहुंचने का समय लगातार घटता जा रहा है जिसके कारण धूप और रोशनी का तीखापन प्रभावित हो रहा है जिससे दिन की लंबाई का समय घट जाता है। इससे शाम जल्दी ढलती है और हमें सूर्य की ऊर्जा का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, बल्कि इससे स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। आधुनिक जीवन शैली ने हमसे कई और सुविधाएं भी छीन ली हैं। शहरी जीवन में ऊंची अट्टालिकाओं में बने कार्यालय, एक ही मंजिल पर कई-कई कार्यालयों के होने से हर कार्यालय में सूर्य के प्रकाश की सीधी पहुंच की सुविधा नहीं है। यही नहीं, जहां यह सुविधा है, वहां भी बहुत से लोग भारी परदों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को बाहर रोक देते हैं और ट्यूबलाइट तथा एयर कंडीशनर में काम करना पसंद करते हैं। घर से कार्यालय के लिए सुबह जल्दी निकलना होता है। हम बस पर जाएं, ट्रेन पर जाएं या अपनी कार से जाएं, गाड़ी में बैठे रहने पर सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होता, अधिकांश कार्यालयों में सूर्य का प्रकाश नहीं होता और शाम को दफ्तर से छुट्टी के समय भी फिर गाड़ी का लंबा सफर हमें सूर्य के प्रकाश से वंचित कर देता है। घर आकर हम परिवार अथवा टीवी में यूं गुम हो जाते हैं कि सूर्य के प्रकाश की परवाह नहीं रहती। इस प्रकार हम प्रकृति के एक अनमोल उपहार से स्वयं को वंचित रख रहे हैं और अपने स्वास्थ्य का नुकसान कर रहे हैं।

अब वैज्ञानिकों ने एक और चेतावनी दे डाली है। "साइंस अडवांसेज" नामक पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में कहा गया है कि धरती के सबसे ज्यादा आबादी वाले इलाकों में रातें खत्म होती जा रही हैं। मतलब यह कि रात तो हो रही है लेकिन अंधेरे में कमी आई है, कालिमा घट रही है। इसका कारण है कृत्रिम प्रकाश में हो रही बढ़ोतरी। इसका इंसान की सेहत और पर्यावरण पर खतरनाक असर पड़ सकता है। जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज के क्रिस्टोफर काएबा और उनकी टीम ने सैटलाइट की मदद से रात के वक्त धरती पर बल्ब, ट्यूबलाइट जैसी चीजों से विभिन्न इलाकों में होने वाली रोशनी को मापा और पाया कि धरती के एक बड़े हिस्से में रात के समय कुछ ज्यादा रोशनी रहने लगी है। वैज्ञानिक हमें याद दिला रहे हैं कि रात और दिन का बंटवारा यूं ही नहीं है बल्कि इसके पीछे प्रकृति का एक निश्चित प्रयोजन है।

चुनावों के इस दौर में शोर ही शोर है। हमें इस शोर से उबर कर सोचना होगा कि जीवन में और क्या आवश्यकताएं हैं? सुविधा और विकास के नाम पर हम अपने ही साथ क्या खिलवाड़ कर रहे हैं? हमारे नेताओं का, बुद्धिजीवी वर्ग का, और मीडिया का ध्यान इन मुद्दों से क्यों भटक जाता है? क्यों हम सिर्फ उथली राजनीति और पेज-3 के समाचारों तक सीमित हो जाते हैं? विकास की इस दौड़ में हम अंधेरा और उजाला दोनों खोते जा रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में आ जाए तो हमें विकास की योजनाएं बनाते समय नागरिकों के स्वास्थ्य को भी केंद्र में रखना होगा और यह हम सब की जि़म्मेदारी है कि हम किसी को भी यह सच भूलने न दें। आशा की जानी चाहिए कि नेतागण, बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया सभी मिलकर इस दिशा में सार्थक प्रयत्न करेंगे। 

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। सन् 1999 में उन्होंने अपनी जनसंपर्क कंपनी "क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड" की नींव रखी। उनकी दूसरी कंपनी "दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड" सोशल मीडिया के क्षेत्र में है। उनकी एक अन्य कंपनी "विन्नोवेशन्स" राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों के लिए कांस्टीचुएंसी मैनेजमेंट एवं जनसंपर्क का कार्य करती है। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं। 

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