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बेंगलुरु में केंद्रीय सरकार में कौशल विकास राज्यमंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भारत के संविधान की धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे बेहद घटिया और असंवैधानिक टिप्पणी की है। इसे गुलाम मीडिया द्वारा मात्र विवादास्पद बयान बताकर मंत्री को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। राज्यमंत्री हेगड़े ने कहा कि ''धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील होने का दावा वे लोग करते हैं, जिन्हें अपने मां-बाप के खून का पता नहीं होता। लोगों को अपनी पहचान सेक्युलर के बजाय धर्म और जाति के आधार पर बतानी चाहिए। हम संविधान में संशोधन कर सेक्युलर शब्द हटा सकते हैं।''

अपने मंत्री पद की शपथ और संविधान के उपबन्धों के विरुद्ध दिये गये, इस बयान के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से हेगड़े अपने पद पर बने हुए हैं! मीडिया इसे केवल विवादास्पद बयान बता रहा है और संविधान की रक्षा की गारण्टी देने वाली न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर हेगड़े को मंत्री पद से बर्खास्त करने की जिम्मेदारी निभाने के बजाय मौन है! जबकि इससे भी कम गंभीर मामलों में न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर दिशानिर्देश जारी करती रही है।

संघ की साम्प्रदायिक नीतियों के क्रियान्वयन के लिये अग्रसर केन्द्र सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि संविधान का अपमान करने वाले लोगों को मंत्री पद से बर्खास्त किया जा सके? बल्कि मेरा तो स्पष्ट मत है कि हेगड़े के बयान के द्वारा संघ भारत के संविधान को तोड़ने और बदलने से पहले देश के लोगों और संवैधानिक संस्थानों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।

ऐसे असंवैधानिक और अपमानकारी बयानों के माध्यम से संघ द्वारा यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि यदि भाजपा द्वारा संविधान के साथ खिलवाड़ किया जाये तो देश के लोग क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? हेगड़े के इस बयान से एक बार फिर से यह बात सिद्ध हो गयी है कि भारत का संविधान इतना कमजोर है, कि वह खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ है। यदि संविधान निर्माताओं ने संविधान के उल्लंघन और अपमान को दण्डनीय अपराध घोषित किया होता तो आज संविधान का मजाक उड़ाने की हेगड़े जैसों की हिम्मत नहीं हो पाती?

इन हालतों में यदि संविधान के अनुसार संचालित लोकतांत्रिक गणतंत्रीय व्यवस्थाओं और संस्थानों को बचाना है तो भारत के संविधानविदों को इस बात पर गम्भीरता पूर्वक विमर्श करना होगा कि संविधान के उल्लंघन और अपमान को रोकने के लिये संविधान में कठोर दण्डात्मक प्रावधान किस प्रकार से लागू किये जावें? इन हालातों में, मैं इस तथ्य को दोहराने को विवश हूं कि देश के सभी समुदायों के प्रबुद्ध लोगों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिंतन, मंथन और विमर्श करने के सख्त जरूरत है। अन्यथा भारत भी उन देशों में शामिल हो सकता है, जहां पर जनता को दशकों से फासिस्ट लोगों के अधिनायकतंत्र से मुक्ति मिलना असंभव हो चुका है! आखिर हम कब तक यों ही चुपचाप सिसकते रहेंगे? देशवासियों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, क्योंकि बालेंगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' सामाजिक संगठन हक रक्षक दल के प्रमुख हैं और जयपुर में पदस्थ हैं. उनसे संपर्क 9875066111 के जरिए किया जा सकता है.

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