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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह उन दिनों आई-नेक्स्ट अखबार के कानपुर एडिशन के लांचिंग एडिटर हुआ करते थे. एक फरवरी 2007 को यह लेख आई-नेक्स्ट में ही एडिट पेज पर छपा था. पेश है वही आलेख, हू-ब-हू...

इतने भले न बन जाना साथी

यशवंत सिंह

वह डंडे की तरह सीधा-साधा, चाकलेट की तरह प्‍यारा है और गुब्‍बारे की तरह innocent - सुई गड़ाओ- हवा निकालो. न उलटा-सीधा काम करता है और न ऐसा करने वालों को पसंद करता है, ऐसे लोगों से दोस्‍ती रखना तो दूर की बात है. दिल का धनी है, रिश्‍तों को emmotionaly जीता है. घर-परिवार और मां-पिता की दुआएं हर रोज लेता है. उसे लोग मूर्ख बना जाते हैं और वो बन भी जाता है, लेकिन इसमें उसे कुछ भी खराब नहीं लगता. बस, मन ही मन इतना जरूर कहता है, हे ईश्‍वर उन्‍हें माफ कर दे, वे नहीं जानते कि वे क्‍या कर रहे हैं. उसके दिल में प्‍यार, ईमानदारी, नैतिकता लबालब भरी है. वो बदमाशी के बारे में सोच तक नहीं सकता, करना तो बहुत दूर की बात है... ऐसे नौजवान के बारे में आपकी क्‍या राय है?

ज्‍यादातर का दिल कहेगा, बहुत अच्‍छा बंदा है. ऐसे हीरे आज के दौर में मिलते कहां हैं. इसे तो म्‍यूजियम में संजोना चाहिए. पर मेरी राय पूछेंगे, तो मैं अब ऐसा हरगिज नहीं मानता. मतलब, पहले ऐसा मानता था, इनको चाहता था, इनके लिए दिल से दुआएं करता था, इनसे इतर सोचने पर अपने चालाक मन को पापी-पापी कहकर गरियाता था.

आज की तारीख में बात करें, तो मैं बिल्‍कुल उलट सोचने लगा हूं. आंधी-तूफान style में देश में घुंसकर हर मानव मात्र के दिलों में छा जाने वालीं market मैया के सत्‍संग से मेरे maturity lavel में जो तथाकथित growth हुई है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि उपरोक्‍त गुणों को धारण करने वाला नौजवान वर्तमान काल में बिल्‍कुल नहीं चलेगा. उसे लोग नाना प्रकार के संबोधनों से नवाजेंगे. मसलन- बिलकुल गधा है, आंख का अंधा है, रोएगा, झेलेगा, पछताएगा, धक्‍के खा-खाकर किनारे हो जाएगा, तब समझ में आएगा, लात खा लेगा तब अक्‍ल आएगी, कहीं adjust नहीं कर पाएगा, बिल्‍कुल practical नहीं है, बेवकूफों की तरह बात करता है, जब देखो तब भाषण देता है. Course complete करने के बाद भी किताबों में लिखी सिद्धांतों की बातें बताता है. Modern नहीं है, उसकी thinking set है. इसे तो साधु हो जाना चाहिए क्‍योंकि दुनिया इसके लिए नहीं बनी है और वो दुनिया के लिए नहीं बना है. उसे थोड़ा दंद-फंद तो जानना ही चाहिए था. घरवालों को थोड़ी practical knowledge तो सिखानी ही चाहिए थी. काम निकालने की बात तो बतानी ही चाहिए थी. किताबी सिद्धांतों पर जीने से रोटी थोड़े ही मिलती है. Life में कभी-कभी झूठ को सच की तरह सुना जाता है और कभी-कभी मौका देखकर झूठ को सच की तरह बोला जाता है, कभी अच्‍छी खासी आंख होते हुए भी अंधे होने की बेहतरीन acting करनी पड़ती है तो कभी अंधों के आगे बैठकर उनकी बड़ी-बड़ी आंखों में झलकने वाले vision की तारीफ करनी पड़ती है. कभी बकरी की तरह मिमियाना पड़ता है, तो कभी शेर की तरह दहाड़ना पड़ता है. बस, बात है तो मौके और बे-मौके की. इतनी अकल तो होनी ही चाहिए. वरना किसी कंपनी में trainee की भी नौकरी नहीं मिलेगी. गलती से मिल भी गई तो उससे आगे नहीं बढ़ेगी. ज्‍यादा दाएं-बांए रोया-गाया तो तड़ाक से चली भी जाएगी.

जीवन अब उतना सरल-सहज नहीं रहा. बदलते दौर में हर चीज ने अपने को नया और नुकीला बना लिया है. पुराने दौर की सादगी को केंचुल की शक्‍ल देकर उससे बाहर निकलने का दौर चल पड़ा है. Original होना, original जीना और original सोचना संभव नहीं रहा. सब कुछ copy किया हुआ, नकली, dramatic, कृत्रिम, थोपा हुआ और आरोपित किया हुआ सा लगता है. सबने चाल, चरित्र और चेहरा बदला है. सफलता अब हर किसी का मूल मंत्र है- आम हो या खास. होना भी चाहिए. इसमें कोई गलत बात नहीं. यहां तक तो ठीक है, लेकिन सफल होने के लिए कोई भी तरीका चलेगा, हर कीमत पर इसे पाना ही पाना है. इसके लिए बदमाश और चतुर सुजान बनना ही पड़ेगा. सफल होने के लिए हम अपनी हड्डियां तोड़ देंगे, अपनी आत्‍मा बेच देंगे, दूसरे की आत्‍मा खरीद लेंगे.. यहीं आकर एक चीज जन्‍म लेती है जो पूरे समाज के कैरेक्‍टर में अभूतपूर्व (positive या negative, इसे खुद तय करें) बदलाव को जन्‍म देती है. इसी के कारण अपने India का मूल स्‍वभाव खत्‍म होता सा दिखता है, खासकर शहरों में तो बहुत ज्‍यादा. ऐसा नहीं कि गांव वाले पवित्र गाय हैं. उन्‍हें भी पता है कि पुलिस में बेटे की भर्ती करानी है तो लाख-दो लाख की भेंट उचित जगह चढ़ानी ही होगी. परसों गांधी जी का बलिदान दिवस मनाते वक्‍त हम जल्‍दी-जल्‍दी उनकी जिन कुछ बातों को याद कर रहे थे, उनमें एक था साध्‍य और साधन वाला सिद्धांत. साध्‍य के लिए उचित और पवित्र साधन बहुत जरूरी है. पर Market मैया ने इस बड़े नियम को इतने आराम से पूरा का पूरा निगल लिया कि किसी के पास डकार की आवाज तक नहीं पहुंची.

Branded के दौर में smile करने के भी नियम बने हुए हैं. कब, कहां और कितना smile करना है, इसे तय कर लो बंधु, वरना बहुत पछताओगे. सफलता के लिए मची झोंटा-नोचव्‍वल के इस दौर में अव्‍वल रहना है तो यूं ही बेवजह किसी बात को सोच-सोचकर दिल खोलकर हंसने की आदत से बाज आओ वरना दहाड़ें  मारकर रोना पड़ेगा. अपने प्रिय कवि वीरेन डंगवाल की वो कविता है न, इतने भोले न बन जाना साथी, जैसे सर्कस का हाथी. तो, थोड़ी चालाकी और चतुर-सुजानी जरूरी है वरना जी नहीं पाओगे. उठते-जागते जमाने वालों को गरियाओगे. बस एक गुजारिश है - इतने बदमाश न बन जाना साथी कि तुम अपने मानव जात के दुश्‍मन बन जाना. आखिरकार मनुष्‍यता ही वो मंजिल है, जहां सभी धर्मों, सभी विचारधाराओं और सभी वादों से निकले निष्‍कर्ष पर पहुंचते है. कम से कम इसे तो बचाकर रखेंगे ही, हम सब.

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