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माखनलाल विवि के शिक्षक आशीष जोशी ने रखा अपना पक्ष- ‘उस वीडियो में कुछ उदाहरण दिए गए हैं, क्या उनमें कुछ ग़लत है?’

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आशीष जोशी-

व्यंग्य या Satire एक ऐसा माध्यम है जिससे बड़े गूढ़ विषय भी आसानी से लोगों तक पहुंचाए जा सकते हैं। इसमें शर्त सिर्फ़ यह होती है व्यंग्य पैदा करने के लिए अनावश्यक रूप से किसी व्यक्ति या समुदाय को निशाना न बनाया जाए। मैंने एक व्हाट्सएप ग्रुप में एक वीडियो शेयर किया, जो किसी ने मुझे भेजा था।

इसकी भाषा से कुछ लोगों को असहमति हो सकती है। लेकिन इसका मुख्य विषय यह है कि भारतीय फ़िल्मों में क्यों खेलों के बड़े नायकों के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही है? क्या कारण है कि पदक विजेताओं को कुछ साल बाद फ़िल्म में एक मज़हब विशेष के चरित्र में दिखाया जाता है? यह भी दिखाया जाता है कि मज़हब के कारण उन पर बहुत अत्याचार हुए? उस वीडियो में कुछ उदाहरण दिए गए। क्या उनमें कुछ ग़लत है?

  • क्या लगता है कि ‘चकदे इंडिया’ में क्यों शाहरुख़ खान ने मीर रंजन नेगी के चरित्र में कबीर खान को फ़िट किया होगा? क्यों दिखाया कि एक बार हारने पर मोहल्ले के हिंदुओं ने उनके घर पर ‘ग़द्दार’ लिख दिया?
  • क्या लगता है कि क्यों आमिर खान ने ‘दंगल’ में फोगाट बहनों को मांस खाने वाला दिखाया होगा?
  • क्यों फरहान अख़्तर ने भारत को पहली ओलिंपिक जीत दिलाने वाले कप्तान और कोच के नाम और धर्म बदल दिए? क्या सोचकर उन्होंने उस काल्पनिक कप्तान का घर हिंदुओं और सिखों द्वारा जलाए जाते दिखाया होगा?
  • सलीम-जावेद जैसे स्वघोषित नास्तिक क्यों अपनी फ़िल्मों में बिल्ला नंबर-786 के चमत्कारों पर विशेष जोर देते हैं?

मुझे पता है कि आप लोग इसे क्रिएटिव फ़्रीडम बताएँगे। लेकिन उस स्थिति की कल्पना कीजिए, जब ऐसी ही स्वतंत्रता दूसरा पक्ष भी दिखाने लगे? यह भी विचित्र है कि सारी क्रिएटिव फ़्रीडम एकपक्षीय है।

फ़िल्में जनसंचार का एक बहुत बड़ा माध्यम हैं। उनका अच्छा और बुरा दोनों तरह का प्रयोग हो सकता है। वीडियो में इस पैटर्न की तरफ़ ध्यान दिलाया गया है कि खेल जगत के नायकों की पहचान बदलकर कुछ कट्टरपंथी फ़िल्मकार अपना एजेंडा चला रहे हैं।

यही काम स्वतंत्रता से पहले जिन्ना और मुस्लिम लीग किया करती थी। वो मुसलमानों को बताते थे कि तुम भारत में पीड़ित हो इसलिए तुम्हें अलग पाकिस्तान माँगना चाहिए। आज वही काम फ़िल्म उद्योग के कुछ इस्लामिस्ट कर रहे हैं। समझना कठिन नहीं कि उनका उद्देश्य समाज में दरार डालना है ताकि देश को एक और बँटवारे के लिए तैयार किया जा सके। इसके विरुद्ध बोलने वालों को कब तक बल-पूर्वक चुप कराया जाता रहेगा?

दूसरा पहलू यह है कि फ़िल्मों का प्रयोग लगातार एक धर्म को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। यह दिखाया जा रहा है कि वे आक्रमणकारी और असहिष्णु हैं। कम से कम उपरोक्त सभी उदाहरणों में ऐसा नहीं है। इसे Stereotyping कहते हैं। हमारी फ़िल्में इस काम में कुख्यात रही हैं। कहिए तो ऐसी फ़िल्मों की लिस्ट आपको दे दूँ, जिनमें सिखों और दक्षिण भारतीयों को हर बार हास्यास्पद रूप से दिखाया गया है। कम से कम आज के प्रगतिशील युग में इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

एक बिंदु और है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि पहले ओलिंपिक गोल्ड के विजेता कप्तान किशनलाल और कोच हाबुल दादा के परिवार वालों पर क्या गुजरती होगी, जिनके चरित्रों के साथ ‘गोल्ड’ फ़िल्म में इतना भद्दा मज़ाक़ किया गया है?

कुछ दिन पहले ही आपने तालिबान के आतंकवादियों के हाथों कॉमेडियन नज़र मोहम्मद की हत्या का वीडियो देखा होगा। उस पर भारतीय कलाकारों और पत्रकारों के एक वर्ग विशेष का मौन भी हम सबने देखा है। कट्टरपंथियों के लिए व्यंग्य को समझना और सहना सरल नहीं होता। इस वीडियो में भी फ़िल्म उद्योग के कट्टरपंथियों पर व्यंग्य है। जिन्हें व्यंग्य समझ में नहीं आया, तो ये उनकी समस्या है।

किसी को इच्छा हो तो तथ्यों पर बहस कर सकता है। किसी व्यंग्य पर गर्दन काटने के लिए उतावले लोगों को भारत में तालिबान के आने की प्रतीक्षा करनी होगी। भारत का संविधान किसी के स्टीरियोटाइपिंग की अनुमति नहीं देता, चाहे वो किसी भी मत, पंथ या संप्रदाय के हों। पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र के रूप में हम सभी को इसका ध्यान रखना चाहिए।

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  • आशीष जी, यही सवाल आपसे भी हो सकता है कि आखिर क्या वजह रही कि आजकल बनने वाली तमाम फिल्मों और सीरियलों में मुस्लिम किरदारों के चरित्र बदलने लगा है? क्यों मुस्लिम मोहल्लों को चांद तारे बनी हुई फररियां लगाए दर्शाया जाता है? क्यों हर मुस्लिम किरदार को कांधे पर रुमाल ओर टोपी पहने दिखाया जाता है? क्यों हर मुस्लिम किरदार को गुंडा, टपोरी, आवारा ओरभाईगिरी करते हुए दिखाया जाता है? क्यों हर आजकल हर मुस्लिम ऐतिहासिक मुस्लिम राजाओं का चित्रण क्रूर, वहशी, अत्याचारी, जुल्मी, आक्रांता, ओर दगाबाज बताया जाता है? क्यों हर आतंकवादी को मुस्लिम के रूप में पेश किया जाता है? जबकि 85-90 के पूर्व तक मुस्लिम किरदारों के साथ समानता का व्यवहार होता था। उन्हें भी बाकी पात्रों की तरह समान ओर ईमानदारी के साथ दिखाया जाता था।
    क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस तरह के एक ही वर्ग-धर्म-समुदाय के लोगों के किरदारों के इस प्रकार के चित्रण से अन्य समुदायों के मुस्लिम समुदाय के प्रति क्या धारणा बनती होगी? वे लोग लगातार इस प्रकार का चित्रण देखकर मुस्लिम समुदाय के लिए क्या सोचते-समझते ओर नजरिया बनाते होंगे? और खुद मुस्लिम समुदाय के लोगों खासकर युवाओं के मन मस्तिष्क पर इसका क्या असर होता होगा? कभी इस बारे में भी निष्पक्ष होकर सोचिएगा। जिस दिन आप निष्पक्ष होकर इस पर मंथन करेंगे, तब आपको अहसास होगा कि भद्दा मजाक ओर सोच समझकर छवि खराब करने का खेल किसके साथ खेला जा रहा है।

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