उन्नीस का चुनाव बीजेपी जीत गई तो हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संविधान संशोधन हो जाएगा! देखें वीडियो

जाने-माने राजनेता और चिंतक शशि थरूर का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी अभी केवल राज्यसभा में बहुमत में नहीं है इसलिए वह संविधान संशोधन अपने मन मुताबिक करके इसका हिंदूकरण नहीं कर पा रही है. Continue reading

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फेसबुक के फ्री बेसिक्स प्लान को ट्राई ने दिया झटका

कई महीनों से फेसबुक जिस फ्री इंटरनेट बेसिक का अभियान चला रहा था, ट्राई ने उसकी हवा निकाल दी. ट्राई यानि टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने डेटा सर्विसेज की भेदभावपूण दामों पर अंतिम दिशानिर्देश की घोषणा कर दी है. ट्राई ने एक बयान में कहा, “कोई भी सेवा प्रदाता किसी भी ऐसी व्यवस्था या अनुबंध को जारी नहीं करेगा जिससे डाटा सेवाओं पर भेदभावपूर्ण शुल्कों का असर हो”. ट्राई के अनुसार, सेवा प्रदाताओं को अलग-अलग शुल्क के लिए अनुमति देना पूरी इंटरनेट डेटा संरचना के साथ समझौता कर हो सकता है. ट्राई ने कहा कि किसी भी वर्जित नया लॉन्च पैकेज/ प्लान या वाउचर को अनुमति नहीं दी जाएगी.

ट्राई ने कहा, “अलग-अलग टैरिफ के लिए आवश्यक है कि सेवा प्रदाताओं इंटरनेट ओपेन और गैर भेदभावपूर्ण सेवा जारी रखते हुए दायित्वों को पूरा करने के लिए सुनिश्चित करें”. इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाएगा और हर दो साल में इसकी समीक्षा होगी. इस निर्देश के साथ ही फेसबुक को भी बड़ा झटका लगा है. कुल मिलाकर टेलीकॉम रेगुलटर ट्राई ने भारत में इंटरनेट डाटा के लिए अलग-अलग चार्ज को नामंजूर करते हुए फेसबुक के फ्री इंटरनेट बेसिक अभियान को तगड़ा दिया है. इसका मतलब है एयरटेल जीरो और फेसबुक के फ्री बेसिक को देश में अनुमति नहीं दी जाएगी. ट्राई ने यह भी कहा, यदि इन नियमों का उल्लंघन किया जाता है तो कंपनियों को 50 हजार रुपए से लेकर 50 लाख रुपए तक का दंड राशि का भुगतान करना होगा.

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छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर ज्यादती रोकने और दर्ज प्रकरणों की उच्च स्तरीय समीक्षा के लिए समिति गठित

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। उन्हें कर्तव्य निर्वहन के दौरान पूर्ण रूप से हर प्रकार का कानूनी संरक्षण मिलेगा। डॉ. सिंह ने बताया कि छत्तीसगढ़ में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की स्वस्थ परम्परा को निरंतर बनाए रखने के लिए गृह (पुलिस) विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं। 

इन दिशा-निर्देशों में सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति के गठन का भी प्रावधान किया गया है। यह समिति पत्रकारों पर ज्यादतियों को रोकने और उनके विरूद्ध चल रहे आपराधिक प्रकरणों की उच्च स्तरीय समीक्षा करेगी। इस संबंध में गृह (पुलिस) विभाग ने यहां मंत्रालय से कल एक विशेष परिपत्र जारी कर दिया है।

परिपत्र में कहा गया है कि प्रदेश में समय-समय पर पत्रकारों के विरूद्ध आपारिधक प्रकरण दर्ज करने या गिरफ्तार करने की स्थिति में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मुद्दे पर सवाल उठते हैं। शासन को कई बार इस प्रकार की शिकायतें भी प्राप्त होती हैं कि किसी पत्रकार पर पुलिस कर्मियों द्वारा ज्यादती की गयी है, या उनके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है।

परिपत्र में यह भी बताया गया है कि पूर्व में मध्यप्रदेश शासन के गृह (पुलिस विभाग) द्वारा भोपाल से 24 दिसम्बर 1986 को जारी परिपत्र के तहत इस पर अंकुश लगाने की कार्रवाई की गयी थी, जिसे पुनः पुलिस महानिदेशक छत्तीसगढ़ द्वारा तीन फरवरी 2006 को सभी पुलिस अधीक्षकों को पालन करने के लिए जारी किया गया था। इस परिपत्र में दी गयी व्यवस्था छत्तीसगढ़ में यथावत लागू रहेगी, जो इस प्रकार होगी- 

(1) पत्रकारों पर ज्यादतियां होने की शिकायतों को संचालक जनसंपर्क विभाग एकत्रित कर पुलिस मुख्यालय में कार्यरत उपपुलिस महानिरीक्षक (शिकायत) को भेजेंगे। संचालक जनसंपर्क से प्राप्त प्रकरणों में पुलिस मुख्यालय द्वारा आवश्यक कार्रवाई किए जाने के बाद इसकी सूचना संचालक जनसंपर्क को और प्रतिलिखि गृह विभाग को दी जाएगी। 

(2) जहां तक पत्रकारों के विरूद्ध कोई प्रकरण कायम किए जाने का प्रश्न है, इस संबंध में राज्य शासन ने यह निर्णय लिया है कि यदि किसी भी (चाहे वह अभी स्वीकृत पत्र प्रतिनिधि हो या न हो) के विरूद्ध कोई प्ररकण कायम किया जाता है, तो उन प्रकरणों में चालान किए जाने के पहले उन पर उपलब्ध साक्ष्य की समीक्षा संबंधित पुलिस अधीक्षक और क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षक कर लें और स्वयं को आश्वस्त कर लें कि कोई भी प्रकरण दुर्भावनावश या तकनीकी किस्म के स्थापित नहीं किए जाए। यदि उप महानिरीक्षक के मत में यह पाया जाए कि कोई प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है, तो तत्काल उनको समाप्त करने के निर्देश दिए जाएं और संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई की जाए। इस कंडिका में यह भी कहा गया है कि बगैर समीक्षा किए हुए प्रकरणों का चालान न्यायालय में प्रस्तुत न किया जाए। प्रत्येक तिमाही में क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षण इस प्रकार के प्रकरणों की समीक्षा करेंगे और वे पुलिस महानिदेशक को सूचना भेजेंगे। पुलिस महानिदेशक से यह सूचना गृह विभाग को भेजी जाएगी। 

(3) यह व्यवस्था यथावत जारी रहेगी। इसके अन्तर्गत उप पुलिस महानिरीक्षक के स्थान पर अब पुलिस महानिरीक्षक (रेंज) कार्रवाई करेंगे। 

(4) उपरोक्त व्यवस्था के अतिरिक्त शासन स्तर पर एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति का भी गठन किया गया है, जो पत्रकारों और शासन के बीच आपराधिक प्रकरणों और संबंधित विषयों में आवश्यक समन्वय स्थापित करने की कार्रवाई करेगी। समन्वय समिति के अध्यक्ष सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव होंगे। समिति में गृह (पुलिस) विभाग के सचिव, पुलिस मुख्यालय की अपराध अनुसंधान शाखा के प्रभारी अधिकारी और शासन द्वारा नामांकित दो वरिष्ठ पत्रकार सदस्य होंगे। समन्वय समिति में जनसंपर्कविभाग के संचालक सदस्य सचिव होंगे। समिति द्वारा संबंधित रेंज पुलिस महानिरीक्षक को भी आवश्यकतानुसार आमंत्रित किया जा सकता है। 

(5) उपरोक्त समन्वय समिति के संदर्भ की शर्ते इस प्रकार होंगी- परिपत्र की कंडिका-2 में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार यदि कार्रवाई से संतुष्टि नहीं होती है, तो उन प्रकरणों में उच्च स्तरीय समन्वय समिति द्वारा विचार किया जाएगा। समिति द्वारा विचारण से संबंधित मामले के चयन का अधिकार संचालक जनसंपर्कके पास रहेगा।  पत्रकार के रूप में किए गए किसी कार्य के कारण पत्रकारो के विरूद्ध दर्ज आपराधिक प्रकरणों के संबंध में यह उच्च स्तरीय समन्वय समिति पुलिस और पत्रकारों के बीच समन्वयक की भूमिका का निर्वहन करेगी। समिति पुलिस और पत्रकारों की ओर से आवश्यक सूचना और जानकारियों को आदान-प्रदान करेगी। इसके लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त करने और प्रकरण से जुड़े पक्षो को बुलाने के लिए समिति आवश्यक निर्देश भी जारी करेगी। 

परिपत्र की प्रतिलिपि पुलिस महानिदेशक और सामान्य प्रशासन विभाग तथा जनसंपर्कविभाग के सचिवों सहित समस्त संभागीय कमिश्नरों, कलेक्टर और जिला दण्डाधिकारियों, रेंज पुलिस महानिरीक्षकों और सभी पुलिस अधीक्षकों को भी भेजी गयी है।

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सुब्रत राय की रिहाई के लिए अपनी संपत्तियों को बेचेगा सहारा

2 साल से जेल में बंद सहारा प्रमुख की रिहाई के लिए धन का बंदोबस्त करने हेतु सहारा समूह ने अपनी संपत्तियों को बेचने के बारे में सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को नया प्रस्ताव पेश किया. इस प्रस्ताव के आधार पर प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर, न्यायमूर्ति ए आर दवे और न्यायमूर्ति ए के सीकरी की पीठ ने सेबी से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है.

सहारा के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि समूह अपना मुंबई का होटल सहारा स्टार, फार्मूला वन में कंपनी के 42 फीसदी शेयर और चार विमानों को बेचने के लिए बातचीत कर रहा है. समूह ने यह भी कहा कि विदेश में तीन होटलों लंदन में ग्रोवेनर हाउस होटल, न्यूयार्क प्लाजा तथा ड्रीम न्यूयार्क होटल बेचने के लिए भी बातचीत जारी है. वकील ने कहा कि ग्रोसवेनर हाउस होटल के लिए कतर से बातचीत चल रहा है जिससे करीब 2300 करोड़ रुपये मिलेंगे.

यही नहीं, समूह ने अमेरिका में उसके दो होटलों के लिए रशियन बैंक को फिर वित्तीय मदद के लिए राजी किया है. सहारा समूह ने बेंगलुरू में भी अपनी संपत्तियों को बेचने की अनुमति मांगी है. समूह को अपने निवेशकों को धन लौटाने के लिए सेबी-सहारा खाते में भुगतान के लिए 36000 करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी है.

न्यायालय ने 67 वर्षीय सुब्रत राय को अंतरिम जमानत के लिए कुछ शर्तें लगाईं थीं जिनमें पांच हजार करोड़ रुपये नकद और इतनी ही राशि की बैंक गारंटी देना तथा निवेशकों को ब्याज सहित 36000 करोड़ रुपये लौटाना शामिल हैं. सुब्रत राय सहारा की कंपनियों के दो निदेशकों रवि शंकर दुबे और अशोक राय चौधरी के साथ 4 मार्च, 2014 से तिहाड़ जेल में बंद हैं.

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अमर उजाला पर विज्ञापन न मिलने से डीजीपी के खिलाफ खबर छापने का आरोप

अमर उजाला को विज्ञापन न देने पर डीजीपी के खिलाफ 31 जनवरी और 1 फरवरी को प्रकाशित खबरों के मामले ने तूल पकड लिया है। पुलिस अधिकारियों ने अमर उजाला न पढ़ने की चेतावनी जारी कर दी है। साथ ही अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ नगर कोतवाली देहरादून में मुकदमा दर्ज कर लिया है। सूत्रों की मानें तो अब अमर उजाला के पदाधिकारी मुख्यमंत्री हरीश रावत से मिलकर मामले में समझौता कराने के प्रयास में लगे हैं।

पुलिस विभाग की तरफ से जारी यह पत्र चर्चा में है…

महिला दरोगा भर्ती से सम्बंधित विज्ञापन न मिलने से बौखलाए अमर उजाला अखबार ने डीजीपी उत्तराखंड महोदय के सम्बन्ध में पहले 31.1.16 को देहरादून में तथा 1.2.16 को हरिद्वार में, फिर उसका फॉलोअप छापा जो काफी भद्दा गैरजिम्मेदाराना तरीके से छापा है. इतने बड़े अखबार को ऐसी ओछी हरकत शोभा नहीं देती. एक ही खबर को ज्यों का त्यों दो दिन प्रदेश में अलग स्थानों में छापा गया। प्रदेश पुलिस के मुखिया के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी करना पूरे पुलिस विभाग के लिए गंभीर चिंता और मनन का विषय है जो कि सीधे तौर पर उत्तराखण्ड पुलिस के मान सम्मान को ललकारते हुऐ पीत पत्रकारिता का जीता-जागता उदाहरण है।

पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर द्वारा किये गए विभागीय अच्छे कार्यों को तो कभी भी अमर उजाला ने तार्किक जगह नहीं दी। यदि कभी-कभार ऐसी ख़बरें छापी भी हैं, तो बाद के पन्नों में वो भी बेमन से, और बहुत कम शब्दों में। परंतु विज्ञापन न मिलने की खबर को अमर उजाला ने फ्रंट पेज की खबर बनाया है। सही में देखा जाये तो अमर उजाला का कुछ सालों में पैटर्न पूरी तरह से पुलिस विभाग के एंटी अखबार का है, और मात्र एक ही बदनाम पुलिस अधिकारी का व्यक्तिगत अखबार तक सीमित होकर रह गया है।

पुलिस विरोधी नकारात्मक खबरें इसमें बड़ी बड़ी और पुलिस विभाग के गुड वर्क की ख़बरें बहुत छोटी छोटी छापी जाती हैं। वर्तमान खबर तो मात्र सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन न मिलने के कारण छापी गयी है जबकि खबर में जमीन से जुड़े जिस केस को उछालकर जिक्र किया गया है, उस केस के करंट अपडेट को तो जानने की कोशिश तक नहीं की गयी और केस से जुड़े अधिकारीयों को सजा दिए जाने के बारे में लिखा है।

हकीकत में इस केस में धोखाधड़ी तो हमारे डीजीपी सर के साथ हुई है। अपने हक़ के लिये जमकर लड़ना कोई गलत बात नहीं। लेकिन अमर उजाला डीजीपी सर के विरोध में ख़बरें छाप कर उनकी छवि ख़राब कर पूरे पुलिस विभाग को छोटा करने की कोशिश कर रहा है। पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर ने पुलिस परिवार का मुखिया होने की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और अपने अधीनस्थों के भलाई के लिए स्वयं व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासन में लंबे समय से लटकी पड़ी तमाम फाइलों की पैरवी की गयी तथा सिपाहियों की वेतन विसंगति, प्रमोशन, स्थायीकरण, नये पदों और पुलिस विभाग के आधुनिकीकरण आदि मामलों का बहुत तेजी से निस्तारण करवाया।

वर्ष 2015 में वेतन विसंगति एवं एरियर को लेकर काली पट्टी बांधने एवं सोशल मीडिया पर मेसेज फॉरवर्ड करने के मामले में जब सिपाहियों पर कार्यवाही की बात कई पुलिस अधिकारी कर रहे थे, अकेले डीजीपी सर ही थे, जिन्होंने किसी भी निर्दोष सिपाही पर कार्यवाही नहीं होने दी। उन्होंने किसी निर्दोष के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी, जबकि उस मामले में सैकड़ों सिपाहियों पर कार्यवाही की तलवार लटकी हुई थी। यहाँ तक कि डीजीपी सर ने सिपाहियों के हक़ के लिए वेतन विसंगति समय से ठीक न होने की स्थिति में अपना इस्तीफा तक देने की बात कही थी। यह डीजीपी सर के व्यक्तिगत प्रयासों का ही नतीजा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने एरियर के भुगतान के लिए अलग से बजट स्वीकृत किये जाने की बात कही है और जल्द ही सभी सिपाहियों को एरियर मिल भी जायेगा।  

साथियों, हम अपने पैसों के लिए तो एकजुट होकर लड़ते हैं, तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं परंतु हमारी हक़ और इज़्ज़त की लड़ाई में हमारे साथ खड़े होने वाले डीजीपी सर जब दो महीने में रिटायर होने वाले हैं, तो ऐसे समय में एक अखबार की मनमानी के कारण क्या हम उनकी, अपने विभाग और वर्दी की छवि को धूमिल होते हुए हाथ पर हाथ रखकर यूँ ही देखते रहें? क्या हमें उनके साथ, उनके समर्थन में एकजुट होकर खड़े नहीं होना चाहिए?

यह समय एकजुट होकर पुलिस विभाग को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने का है। यह समय डीजीपी सर के साथ उनके समर्थन में खड़े होने का समय है। ऐसा लगता है कि अमर उजाला के पत्रकार अपनी मर्जी के मालिक हैं, जो मन में आया छाप दिया। जब प्रदेश पुलिस के मुखिया को ही यह अखबार कुछ नहीं समझ रहा है, तो आने वाले दिनों में छोटे अधिकारियों और सिपाहियों का क्या हाल होगा, जरा सोचो। विचार करो। एकजुट होकर इस अखबार के विरोध में खड़े हो जाओ। दिखा दो इन्हें उत्तराखंड पुलिस की एकता और हमारी ताकत। इसलिए इस अखबार को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी है कि इस अखबार का विरोध हर स्तर पर किया जाये।  

साथियों, आज से इस अखबार का विरोध शुरू कर दो और यह विरोध तब तक करते रहो, जब तक यह अखबार हमारे डीजीपी सर से इस खबर के बारे में माफ़ी न मांग ले। जिसके भी घर में, परिवार में, रिश्तेदारी में अमर उजाला अख़बार आता है, आज ही उसे बदलवाकर दूसरा अखबार लगवाओ और अपने हॉकर को तथा पत्रकारिता से जुड़े जिस भी शख्स को जानते हो, उसे भी बताओ कि तुमने यह अखबार क्यों बंद किया है? 

साथियों, यह पुलिस की एकजुटता दिखाने का समय है। मीडिया की दलाली को जवाब देने का समय है। हमारे सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले डीजीपी के स्वाभिमान की लड़ाई में साथ खड़े होने का समय है। ये दिखाने का समय है कि हम एक हैं और कोई भी हमें हल्के में नहीं ले सकता। देखना है, कौन जीतता है। हमारी एकता या बिकाऊ मीडिया।

जय हिन्द
जय उत्तराखंड पुलिस।

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पुलिस ने निकालनी शुरू की खुन्नस

अब पुलिस ने खुन्नस में अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि विज्ञापन वाला पीएचक्यू में घुसा। विज्ञानकर्मी पर 384, 385, 120 बी, 185, 186 की धारा लगायी गई है। देहरादून यूनिट में कार्यरत विज्ञापन के अभिषेक शर्मा के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा।

देहरादून से एक मीडियकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मुंबई में वरिष्ठ पत्रकार रवि किरण देशमुख का सम्मान

मुंबई : सरकार के बदलते ही मुंबई विश्वविद्यालय में बनने वाले हिंदी भवन का कार्य रुक गया. कांग्रेस-राकांपा सरकार के दौरान भवन निर्माण के लिए भूमिपूजन किया गया था. काम रुकने के बाद में एक बार फिर हिन्दीभाषी समाज ने राज्यमंत्री विद्या ठाकुर के सामने यह मांग रखी है कि हिंदी भवन बनाने का कार्य जल्द से जल्द शुरू किया जाए. इस पर उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस बारे में वे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवनीस से चर्चा करेंगी. मौका था मुंबई हिंदी पत्रकार संघ की तरफ से आयोजित समारोह का. समारोह में मुंबई के मीडिया सलाहकार वरिष्ठ पत्रकार रवि किरण देशमुख का सम्मान किया गया.

इस मौके पर राज्य की महिला व बाल कल्याण राज्य मंत्री विद्या ठाकुर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकार समाज का दर्पण होता है. राज्य सरकार हमेशा पत्रकारों के साथ है. मुंबई हिंदी पत्रकार संघ तरफ से गणतंत्र दिवस के मौके पर आयोजित समारोह में श्रीमती ठाकुर ने कहा कि रवी किरण सूझबूझ वाले पत्रकार रहे हैं. उनके अनुभव का लाभ हमारी सरकार को जरूर मिलेगा. उन्होंने कहा कि मुंबई विश्वविद्यालय के कालिना परिसर में डा राम मनोहर त्रिपाठी के नाम पर बनने वाले हिंदी भवन का शिलान्यास होने के बाद निर्माण कार्य रुका हुआ है. इस संबंध में मुख्यमंत्री से चर्चा करुंगी. हमारी कोशिश होगी कि यह कार्य जल्द से जल्द पूरा किया जाए.

विद्या ठाकुर ने कहा कि किसी समाज विशेष पर चर्चा के बजाय महाराष्ट्र के विकास के बारे में भी चर्चा होनी चाहिए. इसके पहले पूर्व मंत्री व कांग्रेस विधायक नसीम खान ने कहा कि रवी किरण एक अच्छे पत्रकार के साथ- साथ अच्छे इंसान भी हैं. उन्होंने कहा कि उत्तर भारतीय समाज के लोग यहां की मिट्टी में रच-बस गए हैं. मंत्री रहते मुंबई विश्वविद्यालय में डा. राममनोहर त्रिपाठी हिंदी भवन के लिए भूमिपूजन करने वाले खान ने कहा कि मौजूदा सरकार हिंदी भवन का निर्माण कार्य पूरा कराए. इसके लिए पिछली सरकार के समय ही 3 करोड़ की निधि आवंटित की गई थी, जो खर्च नहीं हो पा रही है.

पूर्व मंत्री कृपा शंकर सिंह ने कहा कि पत्रकार नहीं होते तो पता नहीं हम राजनेता न जाने कितनी गलतियां करते. श्री सिंह ने कहा कि हमारी इच्छा है कि मुंबई में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ का भवन हो. मुख्यमंत्री से हम मांग करेंगे कि इस बारे में विचार करें. वरिष्ठ पत्रकार ब्रजमोहन पाण्डेय ने कहा कि हमारे पत्रकार साथी रवि किरण देशमुख को इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलने से हम सब गर्व महसूस कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हम चाहेंगे कि मुंबई हिंदी पत्रकार संघ के अगले कार्यक्रम में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी शामिल हों. इस मौके पर सम्मानमूर्ति रवि किरण देशमुख ने कहा कि आज का दिन हमारे जीवन का महत्वपूर्ण दिन है. उन्होंने कहा कि इस शहर में हर कोई एक सपना लेकर आता है. मुझे हमेशा हिंदीभाषी पत्रकारों का सहयोग- समर्थन मिलता रहा है. मैं सरकार और मीडिया के बीच पुल का कार्य करता रहूँगा. जिम्मेदारी काफी बड़ी है, जिसमें आप सब पत्रकारों का सहयोग जरूरी है.

इस अवसर पर संघ के अध्यक्ष संदीप शुक्ल, महासचिव विजय सिंह कौशिक, वरिष्ठ पत्रकार रामकिशोर त्रिवेदी, द्विजेंद्र तिवारी, ओमप्रकाश तिवारी, नवीन कुमार, सुनील सिंह, आदित्य दुबे, जयप्रकाश सिंह, प्रकाश तिवारी, राजकुमार सिंह, शशीकांत सिंह मुन्ना, सुबोध मिश्र, सुरेंद्र मिश्र, अनिल तिवारी, प्रेमचंद्र शर्मा, हरिगोविंद विश्वकर्मा, श्रीश उपाध्याय, शिवम पांडेय, अखिलेश तिवारी, पुष्पराज मिश्र, शीतला प्रसाद, सोनू श्रीवास्तव, पंकज पांडेय, मुंबई कांग्रेस के उपाध्यक्ष जाकिर अहमद, राकांपा नेता उदय प्रताप सिंह, लाल बहादुर सिंह आदि मौजूद थे. कार्यक्रम का संचालन पत्रकार अभय मिश्र ने किया.

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Assam newspapers are more workers friendly

Two major newspaper houses of Assam namely; Assam Tribune Pvt. Ltd., the publishers of ‘Assam Tribune’, ‘Dainik Asom’, ‘Asom Bani’ and ‘Gariyashi’ and Omega Printers & Publishers Pvt. Ltd., which publishes ‘Sentinel’ (English) and ‘Sentinel’ (Hindi) have implemented the Majithia Wage Board Award. The ‘Joint Inspection Team’ (JIT) constituted by the Govt. of Assam in compliance with the order of the Supreme Court of India has said in its report.

The Joint Inspection Team (JIT) consisted of the officials of the Labour Department of the Government of Assam and ‘All Assam Media Employees Federation’ (AAMEF), headed by Shri Keshab Kalita, who is also the President of ‘Assam Union of Working Journalists’ (AUWJ). It may be noted here that the ‘Assam Tribune’ was the first newspaper of the country to have implemented the Majithia Award, immediately after its notification by the Government of India on 11.11.2011. It may be of interest to know that during the course of hearings of the bunch of the Writ Petitions filed by the newspaper owners, the Supreme Court had asked them that if the Assam Tribune Group of Newspapers could have no difficulty in implementing the Award, why should the big newspapers of the country make hue and cry over the financial burden? The counsel for the owners did not have any reply to the query.

Although the report of the Labour Commissioner is yet to be filed in the Supreme Court yet a copy of it has been made available to us by the ‘Assam Union of Working Journalists’, a constituent of the joint inspection team. The JIT report further says that the news agencies, the PTI and the UNI have also claimed to have implemented the Award. Surprisingly, an important newspaper group, G.L. Publications Ltd. the publishers of ‘Amar Asom’ (Assamies), ‘Purbanchal Prahari’ (Hindi), ‘Meghalaya Guardian’ and ‘North-East Times’ (English) has failed to implement the Award. Most of the newspapers like the ‘Dainik Jugasankh’, ‘Dainik Prantojyoti’ (Bangali Dailies), ‘Agradoot’, ‘Asomiya Khabar’, ‘Jansadharan’ and ‘Dainik Batori Kakot’ (Assemies) have been candid to give in writing that they have not been able to implement the Award fully due to the financial constraints. It is quite significant the newspapers of Assam have not resorted to the nasty tactics of the newspapers of the Hindi heartland, like those of ‘Dainik Jagran’, ‘Rajasthan Patrika’ and ‘Dainik Bhaskar’, who coerced their employees in obtaining undertakings under Section 20-J of the Award to deny them the benefits of the Award.

It is strange that a panic is being created by some people with regard to the Section 20-J but there is nothing to be scared of it. The Wage Board is the creation of the Working Journalists Act,1955 and any recommendation or any interpretation of the recommendations of the Award, that is contrary or inconsistent with the provisions of the Act would be ‘null and void’ to that extent. Therefore, the employees of the newspapers should harbour no fear or panic with regard to the Section 20-J of the Majithia Award even if the managements have forced them to sign on any undertaking.

Section 20-J is, in fact, to protect the benefits of those employees, who have been getting more than what the Wage Board has given and not to deny the wages and allowances of those employees, who draw less wages than what the Majithia has recommended.

Parmanand Pandey
Secretary General
IFWJ

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बारहवीं विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए आवेदन आमंत्रित  

भोपाल : विकास और जनसरोकार के मुद्दों पर दी जाने वाली विकास संवाद मीडिया लेखन और शोध फैलोशिप की घोषणा कर दी गई है। फैलोशिप के बारहवें साल में पोषण सुरक्षा पर चार फैलोशिप के साथ प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर भी एक फैलोशिप के लिए आवेदन किए जा सकते हैं। फैलोशिप के चार विषय पिछले दो साल की तरह वंचित, उपेक्षित या हाशिये पर खड़े समुदाय की पोषण सुरक्षा पर केन्द्रित होंगे।

इस साल एक और नया विषय विषय प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर केंद्रित होगा। फैलोशिप के लिए मुख्यधारा या स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाले इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल , समाचार एजेंसी और प्रिंट माध्यम के पत्रकार 20 फरवरी 2016 तक अपने आवेदन कर सकते हैं। फैलोशिप मध्यप्रदेश के पत्रकारों के लिए है।

फैलोशिप के पत्रकारों का चुनाव करने वाली समिति में एक नया नाम इस बार जोड़ा गया है। समिति में डाउन टू अर्थ पत्रिका के संपादक रिचर्ड महापात्र को शामिल किया गया है। समिति के बाकी सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार श्री गिरीश उपाध्याय, सुश्री अन्नू आनंद, सुश्री श्रावणी सरकार, श्री अरुण त्रिपाठी तथा ज्यूरी सदस्य सचिव राकेश दीवान शामिल होंगे।

फैलोशिप के दौरान पत्रकार को सम्बंधित विषय पर 10 समाचार आलेख प्रकाशित करवाने होंगे। इनमें नीतिगत मुद्दों पर 3 विस्तृत आलेख 1500 शब्दों में होना अनिवार्य है। फैलोशिप की समाप्ति पर 10,000 शब्दों की एक शोध रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। फैलोशिप के दौरान चयनित पत्रकारों को कुल 84000 रुपए की सम्मान निधि शोध कार्य और लेखन के लिए दी जायेगी।

फैलोशिप से संबंधित विस्तृत जानकारी और आवेदन पत्र विकास संवाद, ई -7/226 प्रथम तल, धनवंतरी काम्प्लेक्स, अरेरा कॉलोनी, शाहपुरा , भोपाल (फोन – 0755 – 4252789) से भी लिए जा सकते हैं। आवेदन फार्म और प्रपत्र विकास संवाद की वेबसाइट www.mediaforrights.org  से  भी डाउनलोड किए जा सकते हैं।

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गैर-मान्यता प्राप्त पत्रकारों को नाकाफी मदद

वाराणसी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों को लेकर की गयी घोषणा के सम्बन्ध में शुक्रवार को पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमण्डल कमिश्नर नितीन रमेश गोकर्ण से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में पत्रकारों ने मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि मान्यता प्राप्त पत्रकार व गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को दो भाग में बांट दिया गया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मान्यता प्राप्त पत्रकारों को घटना, दुर्घटना होने पर 20 लाख की आर्थिक मदद देने की घोषणा की है, जबकि उनके घोषणा पत्र में गैर मान्यता प्राप्त मीडियाकर्मियों के लिए नाकाफी मदद की बात कही गयी है।

मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या कम है जबकि गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार अपनी जान की बाजी लगाकर समाज की सेवा करता है। अत: मुख्यमंत्री से निवेदन है कि वह अपने घोषणा पत्र पर पुन: विचार करे। इस सन्दर्भ में कमिश्नर ने आश्वासन दिया कि उनकी बात सीएम तक जरूर पहुंचाई जायेगी। प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व पत्रकार प्रेस परिषद के जिलाध्यक्ष घनश्याम पाठक ने की। इस दौरान खबर विजन अख़बार के संपादक विनय कुमार मौर्या, मुकेश मिश्रा, मदन मोहन शर्मा, सोनू सिंह, विरेन्द्र उपाध्याय , बृजेश कुमार ओझा, पवन त्रिपाठी, आनंद त्रिपाठी, चंद्रमोहन सिंह, भरतनिधि त्रिपाठी, दीपू अग्रहरी, संजय चौरसिया, उमाशंकर वर्मा, राजीव सेठ आदि पत्रकार शामिल रहे।

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पत्रकार के घर चोरी मामले में बागपत पुलिस की सुस्त कार्यवाही के खिलाफ मीडियाकर्मियों का धरना

बागपत कलक्‍ट्रेट पर धरनारत पत्रकारों से वार्ता करते डीएम व एसपी

बागपत पुलिस की सुस्त कार्यवाही के खिलाफ पहली फरवरी को बागपत के सभी मीडियाकर्मियों ने धरना दिया. ज्ञात हो कि दैनिक जनवाणी के प्रभारी अमित पंवार के आवास पर 13 जनवरी की रात में तकरीबन 8 लाख रुपये की चोरी हुई थी. इस घटना का बागपत पुलिस द्वारा अब तक कोई खुलासा नहीं किया गया है. इसके विरोध में जिले के समस्त पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के बैनर तले बागपत कलक्ट्रेट पर धरना प्रदर्शन किया. धरने के दौरान उपजा के जिलाध्यक्ष व हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ नाजिम आजाद ने बताया कि पहले भी पुलिस कप्तान व जिलाधिकारी बागपत से मिलकर घटना के जल्द खुलासे की मांग की गई थी. परंतु 17 दिन गुजर जाने के बाद भी बागपत पुलिस आश्वासन देने के अलावा और कुछ नहीं कर पाई.

धरने में शामिल हुए उपजा के प्रदेश महामंत्री रमेश जैन ने जानकारी दी कि उपजा का प्रतिनिधिमंडल लखनउ में डीजीपी व एडीजी से मिलकर बागपत पुलिस की निष्क्रियता की शिकायत कर चुके हैं लेकिन इसका भी अब तक कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिला. इसके चलते पत्रकारों को धरना प्रदर्शन के लिए मजबूर होना पड़ा. दोपहर को डीएम और एसपी धरनारत पत्रकारों के बीच पहुंचे और चोरी के जल्द खुलासे का आश्वासन दिया. बाद में प्रशासनिक अधिकारियों के आग्रह पर पत्रकारों ने एक सप्ताह का समय देते हुए चेतावनी दी कि अगर तय समय में घटना का खुलासा नहीं किया गया तो पत्रकार सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे. एक सप्ताह में खुलासा नहीं होने पर एसपी ने बागपत कोतवाल को भी हटाने का भी आश्वासन दिया.

पत्रकारों के धरने में रालोद और बसपा विधायक के साथ-साथ जाट महा सभा, बागपत बार एसोसिएशन, सर्व सुधार समाज आदि संगठनों के लोग भी शामिल हुए और घटना के शीघ्र खुलासे की मांग की. धरने में उपजा के अलावा बागपत प्रेस क्लब, इलेक्ट्रानिक मीडिया क्लब, बागपत फोटो जनर्लिस्ट एसोसिएशन के पदाधिकारी भी शामिल हुए. इस दौरान जागरण के ब्यूरो चीफ योगेश चौहान, उजाला के प्रभारी अवधेश पचौरी, पंजाब केसरी के प्रभारी बाबर जैदी, सहारा टीवी के अनवर बेग, मनुदेव उपाध्याय, गौरव तोमर, नरेश तोमर, फोटो सिंह धामा, विश्वबंधु शास्त्री, राजवीर तोमर, राजीव पंडित, जहीर हसन, यशवीर सिंह, कुलदीप चौहान, महबूब अली, विपुल जैन, कपिल त्यागी आदि सैंकडो पत्रकार मौजूद थे.

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इन 23 मौतों पर मीडिया चुप क्यों है?

जेसिका लाल हत्याकांड पर आए कोर्ट के फैसले को लेकर नाखुश मीडिया ने इसे यूं सुर्खी बनाया- “नो वन किल्ड जेसिका”. इसके बाद मीडिया सहित तमाम लोगों की आत्मा जाग उठती है और नतीजा जेसिका को इंसाफ के रूप में सामने आता है. उपहार सिनेमा कांड में भी मीडिया की सक्रियता से अंसल बंधुओं को 60 करोड़ रुपए का जुर्माना होता है लेकिन जालंधर में एक फैक्ट्री की छत गिरने से हुई 23 मजदूरों की मौत के मामले में जब अदालत का फैसला आता है तो न तो नेशनल मीडिया की आत्मा जगती है और न ही इस खबर को रिपोर्ट करने लायक तक समझा जाता है.

कारण सिर्फ एक है कि यह हादसा जालंधर में हुआ और जालंधर दिल्ली नहीं है. दिल्ली के लोगों की जान जान है और जालंधर के लोग कीड़े मकोड़े. शीना बोरा हत्या कांड पर छाती पीट पीट कर टी वी पर डिबेट करने वाले संपादक अब कहाँ है? क्यों नहीं उन 23 लोगों की मौत पर कोई बहस हो रही. 2012 में 15 और 16 अप्रैल की रात हुई इस घटना में 23 लोगों की मौत हो गयी थी जबकि 27 अन्य घायल हुए थे. अदालत ने इस मामले में सारे छह आरोपियों को बाइज्जत रिहा कर दिया. इस पूरे मामले में सिर्फ अंग्रेजी अख़बार ट्रिब्यून ने विश्लेषण छापा जबकि अन्य अख़बार इस मामले में चुप ही रहे. शायद किसी भी अख़बार को उन लोगों के दर्द से दर्द नहीं जो इस हादसे में मारे गए. टीवी चैनल्स को मजदूरों की मौत से टीआरपी नहीं मिलेगी, इसलिए इनने भी ध्यान नहीं दिया.

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पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कार्ट ने कमेटी बनाई

हाल ही में करीब 50,000 करोड़ रूपये की हेराफरी के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी ने पर्ल ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू को गिरफ्तार किया था. उन पर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगा था. अब खबर आ रही है कि पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बना दी है. कोर्ट ने पूर्व जज आर एम लोढा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई. सेबी के जरिये लोगों को पैसे लौटाया जाएगा और यह कमेटी इस बात की निगरानी रखेगी कि किस तरह अगले 6 महीनों में लोगों के कर्ज को चुकाया जा सके. सेबी को इस केस से जुड़े सारे दस्तावेज़ इस कमेटी को सौंपना होगा.

कंपनी पर पोन्जी योजना के जरिए निवेशकों के 55 हजार करोड़ रुपये की ठगी का आरोप है. P7 न्यूज़ चैनल और पर्ल्स ग्रुप के चेयरमैन निर्मल सिंह भंगू के साथ सीबीआई ने 4 दूसरे लोगों को भी गिरफ्तार किया है. कंपनी पर आरोप है कि इसने करीब 6,00,00,000 निवेशकों से 49,100 करोड़ रुपए जुटाये हैं. सेबी के आदेश के मुताबिक अगर पीएसीएल ब्याज समेत ये रकम रिफंड करती है तो उसे करीब 55,000 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी होगी.

इस मामले की जांच सेबी के अलावा सीबीआई और ईडी भी कर रहे हैं. सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि कंपनी के चारों कार्यकारियों को सीबीआई के मुख्यालय पर गहन पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के दौरान उन्होंने बिना तालमेल वाले जवाब देने शुरू किए और साथ ही सहयोग करना भी बंद कर दिया, जिसके बाद उन्हें अरेस्ट कर लिया गया। इनके खिलाफ IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) तथा 420 (धोखाधड़ी) की धाराओं में मामला दायर किया गया है। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच देकर उनसे धन जुटाया गया था.

सीबीआई ने 19 फरवरी, 2014 को पर्ल्स के 60 साल के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू पर देश के इतिहास में सबसे बड़े चिटफंड घोटाले को चलाने की आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी करने के आरोप में मामला दर्ज किया था। करीब 2 साल बाद अब उसे सीबीआई गिरफ्तार करने में सफल हुई है। घोटाले की रकम 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 5 करोड़ से ज्यादा छोटे निवेशकों से पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड और पर्ल्स गोल्डन फॉरेस्ट लिमिटेड के नाम पर धोखे से ली गई थी। पर्ल्स की ये दोनों कंपनियां जमीन-जायदाद का कारोबार करती दिखाई गईं थीं।

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गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर लेखक-संगठनों और पत्रिकाओं की ओर से रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या पर एक बयान

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर हम लेखक और संस्कृतिकर्मी भारतीय गणतंत्र की संकल्पना पर आये उस संकट के प्रति अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हैं जिसे हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या ने एक बार फिर गहरे अवसादपूर्ण रंगों में रेखांकित कर दिया है. एक-के-बाद-एक जिस तरह के तथ्य सामने आये हैं, उन्हें देखते हुए रोहित की आत्महत्या को हिन्दुत्ववादी गिरोह, शासन में घुसे उसके नुमाइंदों और उनके इशारे पर काम करते मंत्रालयी एवं विश्वविद्यालयी प्रशासन द्वारा अंजाम दी गयी एक सुनियोजित हत्या कहना ही न्यायसंगत लगता है. इस रूप में यह घटना हिंसक और हत्यारी असहिष्णुता के एक चले आते सिलसिले की सबसे ताज़ा कड़ी है, और शायद सबसे खौफ़नाक भी.

डॉ. भीमराव आम्बेडकर के नेतृत्व में हमारे संविधान को आकार देनेवालों ने आज से 66 साल पहले जिस तरह का भारत बनाने का सपना देखा था, उसके हक़ीक़त से लगातार दूर होते जाने का यह पीड़ाप्रद दृश्य हम सबके लिए अत्यंत चिंताजनक है. संविधान की किताब में धर्म, जाति, लिंग, वर्ग और प्रान्त के भेदभाव से परे एक समतामूलक भारतीय समाज के निर्माण की जो दिशा दिखाई गयी है, हिन्दुत्ववादी शक्तियां हमें उससे ठीक उल्टी राह पर ले जाने के लिए कृतसंकल्प हैं. यह कोई दबी-छुपी बात नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के संविधान में कभी आस्था नहीं रखी और एक समय तक मनुस्मृति को भारतीय संविधान का आधार बनाने की खुल कर वक़ालत की. आज उनका राजनीतिक धड़ा संविधान दिवस मनाने की नयी परम्परा डाल कर इस सच्चाई को भले ही दबाना चाहता हो, व्यवहार में उसके सारे काम संविधान की भावना और आत्मा के प्रतिकूल हैं, यह बात रोहित वेमुला की हत्या से बेनक़ाब हुई है.

रोहित वेमुला हत्याकांड की असलियत पर पर्दा डालने या उसकी ओर से ध्यान बंटाने के लिए जिस तरह मानव संसाधन विकास मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने अवांछित प्रयास किये, हम उसकी कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. मानव संसाधन विकास मंत्री ने बाकायदा प्रेस-कांफ्रेंस कर रोहित और उसके साथियों के निष्कासन से जुड़े तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने और प्रेस को बरगलाने की कोशिश की. आज उनके सारे झूठ सार्वजनिक संज्ञान में हैं. दूसरी ओर, प्रधानमंत्री ने भावुकतापूर्ण वक्तव्यों की आड़ में ‘भारत माता के एक लाल’ के खोने के पीछे की उस दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठभूमि को दबाने का प्रयास किया जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से लेकर बंडारू दत्तात्रेय और स्मृति ईरानी जैसे मंत्रियों, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों और हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति तक की भागीदारी रही है.

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि एक ओर मा.सं.वि. मंत्री और प्रधानमंत्री तो दूसरी ओर आरएसएस और भाजपा के प्रवक्ता, सभी इसे दलित-उत्पीड़न का मामला बनने से रोकने में तत्पर हैं. इसके लिए इन्होंने जो-जो कुतर्क इस्तेमाल किये हैं, वे न सिर्फ़ इनकी वैचारिक दरिद्रता का प्रमाण हैं बल्कि दलित समुदाय के लिए घोर अपमानजनक भी हैं. नमूने के तौर पर, इनका कहना है कि रोहित और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के उसके साथी चूँकि याकूब मेमन की फांसी और ‘मुज़फ्फ़रनगर बाक़ी है’ की स्क्रीनिंग जैसे मसायल उठाते थे, इसलिए उनके दलित-पक्ष को चर्चा में लाने की ज़रूरत नहीं. यह तर्क इस बात की सिफारिश करता है कि दलित के दलित होने को तभी तक मान्यता दी जाए जब तक वह सख्ती से अपने को पहचान की राजनीति के दायरे में महदूद रखता है और एक बेहतर समाज को बनाने की लड़ाई के किसी और पहलू का साझीदार नहीं बनता. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस अपमानजनक तर्क के द्वारा हिन्दुत्ववादियों ने अपने दलितविरोधी रवैये को ढंकने की बजाय और उघाड़ने का काम किया है.

हम रोहित हत्याकांड को एक मुकम्मल हिन्दुत्ववादी हमला मानते हैं, क्योंकि रोहित और ए.एस.ए. की गतिविधियों से ज़ाहिर है कि उनकी राजनीति हिंदुत्व की पूरी कार्यसूची के ख़िलाफ़ रही है. आरएसएस और उससे जुड़े संगठन एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जो हिंदुत्व की एकरूपता के सांचे में ढला होगा, जहां अन्य धर्मों को माननेवाले लोग दोयम दर्जे के नागरिक होंगे, जहां सदियों से कायम उत्पीड़नकारी जाति-व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्राप्त होगी और हर व्यक्ति को वही काम करने होंगे जो सनातन धर्म के अनुरूप उसकी जाति के लिए निर्धारित हैं. ये शक्तियां जितनी इस्लाम और ईसाइयत की विरोधी हैं, उतनी ही दलित विरोधी भी. कोई आश्चर्य नहीं कि हिंदुत्व का आन्दोलन उसी महाराष्ट्र से शुरू हुआ जहां ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले से लेकर बाबा साहेब आम्बेडकर तक, दलित उभार के सबसे मज़बूत स्तम्भ उभर कर आये. इसीलिए हेडगेवार का आधिकारिक जीवन-चरित्र लिखने वाले चं. प. भिशीकर ने संघ की स्थापना के कारण बताते हुए एक तो इस बात का उल्लेख किया कि ‘यवनों का ज़ोर बढ़ रहा था, दंगे हो रहे थे’, दूसरे, पश्चिम भारत में आकार ले रहे ‘ग़ैर-ब्राह्मण आन्दोलन’ का ज़िक्र किया जिससे समाज में ‘विघटन बढ़ रहा था’.

जिन लोगों की आँखों में सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सौहार्द की ज़मीन तैयार करनेवाला हमारा संविधान खटकता है, उनके बरखिलाफ़ रोहित भारतीय संविधान की मूल भावना का जीता-जागता प्रतीक था. उसकी सुनियोजित हत्या हमारे गणतंत्र की संकल्पना पर मंडराते खतरे की सबसे कर्कश घंटी है. हम शासन और प्रशासन द्वारा इस घटना पर लीपापोती के तमाम प्रयासों की कठोरतम शब्दों में निंदा करते हैं और मांग करते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रियों समेत दोषियों की उस पूरी शृंखला को क़ानूनी जांच के दायरे में लाया जाए जो रोहित वेमुला की खुदकुशी के लिए ज़िम्मेदार है. हम इस ताज़ा घटना-विकास की भी निंदा करते हैं कि हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अप्पा राव को छुट्टी पर भेजने के बाद उन्हीं विनय श्रीवास्तव को कार्यवाहक कुलपति बनाया गया है जो रोहित वेमुला समेत पांच विद्यार्थियों के निष्कासन की सिफारिश करने वाली समिति के अध्यक्ष थे. यह घटना-विकास अपने-आप में लीपापोती के सरकारी रवैये का पुख्ता सबूत है. हम यह मांग भी करते हैं कि शिक्षा संस्थानों में जातिवाद का ख़ात्मा करने के लिए तत्काल कारगर क़दम उठाये जाएँ और इस मक़सद से थोराट समिति की सिफारिशें अविलम्ब लागू की जाएँ.
 
दलित लेखक संघ | जनवादी लेखक संघ | प्रगतिशील लेखक संघ | जन संस्कृति मंच । साहित्य संवाद | कदम | कथादेश | अनभै साँचा

सपर्क: ९८१८८५९५४५ (मुरली मनोहर प्रसाद सिंह), ९८६८८५५२९६ (अली जावेद), ९८९९७००७६७ (अनिता भारती), ९९१०५२२४३६ (हीरालाल राजस्थानी), ९८११५७७४२६ (संजय जोशी), ९८६८२६१८९५ (बजरंग बिहारी) ९२१२०२६९९९ (कैलाश चंद चौहान)     

प्रेस विज्ञप्ति

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भास्कर ने शोलापुर से रांची तबादला किया तो हेमंत कोर्ट से स्टे ले आए

भास्कर समूह डीबी कार्प को उसके इंप्लाई हेमंत चौधरी ने तगड़ा सबक सिखाया है. मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले भास्कर के मीडियाकर्मी हेमंत चौधरी को प्रबंधन ने प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट उमेश शर्मा के माध्यम से मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अवमानना याचिका लगाने वाले हेमंत चौधरी का पिछले दिनों भास्कर प्रबंधन ने शोलापुर से रांची तबादला कर दिया.

यह तबादला परेशान करने की नीयत से किया गया था ताकि वह मजबूरन दूर जाकर नौकरी करने की जगह नौकरी से इस्तीफा दे दें या फिर प्रबंधन के कदमों में झुक जाएं और याचिका वापस ले लें. पर हेमंत चौधरी ने झुकने की जगह लड़ना पसंद किया. उन्होंने एडवोकेट उमेश शर्मा की सलाह के बाद एक स्थानीय वकील से स्टे के लिए याचिका तैयार कराई व कोर्ट में लगा दिया. उन्होंने याचिका में सुप्रीम कोर्ट में केस लगाए जाने और केस लगाने पर प्रताड़ित करने के मकसद से तबादला किए जाने का उल्लेख किया. हेमंत ने महाराष्ट्र के इंडस्ट्रियल कोर्ट में याचिका दायर कराई. कोर्ट ने पूरे मामले का गहराई से अध्ययन करने के बाद उनके ट्रांसफर पर स्टे आर्डर दे दिया यानि उनके तबादले पर रोक लग गई है.

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हमने कोई मिस्ड काल नहीं किया लेकिन भाजपा का मेंबर बनाकर बधाई तक मैसेज कर दिया!

Badal Saroj : दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी…. जिसे ढंगढौर से चोट्टयाई करना भी नहीं आता…  हमने कोई मिस्ड काल नहीं किया – कोई बटन नहीं दबाया, किसी मेल में दिए ऑप्शन को क्लिक नहीं किया। मगर हमारे दोनों सेल फ़ोन नंबर्स पर हमें भाजपा का सदस्य बनने के लिए बधाई दी जा चुकी है। इनके अलावा दो और नंबर्स हैं हमारे पास – जिन्हे हम फिलहाल इस्तेमाल नहीं कर रहे है, संभवतः उन पर भी इसी तरह की सदस्यता प्राप्ति के मेसेज आये होंगे। इस तरह हम एक ऐसी पार्टी के चार बार सदस्य बन चुके हैं, जिसकी किसी भी बात से हम सहमत नहीं हैं।

इन संदेशों में रिप्लाई-बैक का कोई प्रावधान नहीं है। इस बेहूदगी के बारे में आपत्ति जताने का कोई स्थान नहीं है। बहरहाल इसे हम सड़क पर चलते समय कौओं के झुण्ड द्वारा उड़ते में की गयी निवृत्ति से कपड़ों पर पड़ी छींट की तरह नव-तकनीक से उपजी निजी त्रासदी के रूप में ले लेते हैं।  मगर इस लिहाज से भी तो अमितशाह-मोदी की भाजपा का सदस्यता अभियान अभी बहुत पीछे है। इन्हे तो ढंगढौर से चोट्टयाई करना भी नहीं आता।

दिसंबर 2014 में देश में कुल जीवित मोबाइल कनेक्शन्स थे 970.97 मिलियन अर्थात 97+ करोड़। इनमे प्रतिमाह औसत बढ़ोत्तरी 5.88 मिलियन की दर से होने के रुझान के हिसाब से तीन माह में कुल नए कनेक्शन्स जुड़े 17.64 मिलियन। कुल हुए 988.61 मिलियन अर्थात 98 करोड़ 86 लाख 10 हजार। (Source : Telecommunications in India)  इन 98 करोड़ 86 लाख 10 हजार मे से फर्जी मेसेज भेजने का काम अभी तक ये भाई लोग – दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के साथ होने के बावजूद – केवल 8+ करोड़ फोन तक ही कर पाये हैं! यार किसी काम में तो अपना नाकारापन झुठलाओ!!

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ सीपीएम नेता बादल सरोज के फेसबुक वॉल से.

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जानिए, अंकित लाल ने क्यों दिया ‘आप’ के सोशल मीडिया प्रमुख पद से इस्तीफा

अंकित लाल ने आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया है. इस तरह उन्होंने आम आदमी पार्टी के फेसबुक ग्रुप की एडमिनशिप छोड़ दिया है. इसके पीछे क्या कारण रहे, इसे अंकित लाल ने एक पत्र के जरिए स्पष्ट किया है जो उन्होंने फेसबुक पर शेयर किया है. अंकित ने आहत मन से पार्टी संग अपने सफर को याद किया और कार्यकर्ताओं के नाम चिट्ठी लिखी जिसमें अन्ना आंदोलन से लेकर केजरीवाल के दूसरी बार सत्तारोहण व झगड़े का जिक्र है. अंकित की मूल चिट्ठी अंग्रेजी में है.

पढ़िए अंकित की चिट्ठी….

आज मैं आपको एक कहानी सुनाऊंगा. कहानी जो बताएगी कि मैंने किस तरह आम आदमी पार्टी (AAP) के एक फेसबुक पेज की एडमिनशिप छोड़ दी. यह वह जिम्मेदारी थी, जो मैं कभी उठाना नहीं चाहता था. लेकिन जब मुझे इसके लायक पाया गया तो मैं बचकर भाग नहीं सका. और यह कहानी थोड़ी सी बड़ी होगी, प्लीज बर्दाश्त कीजिएगा.

2009 में बीटेक कंप्लीट करने के बाद मैं बतौर ERP कंसल्टेंट जॉब करने लगा था. अप्रैल 2011 में मैंने दफ्तर से छुट्टी ली थी. मकसद था एक बार फिर जीआरई (ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जाम) देने का. 2009 में भी मैंने जीआरई का एग्जाम दिया था और मेरा स्कोर 1290 था. मुझे लगा कि मैं इससे बेहतर कर सकता हूं. इसलिए नौकरी से छुट्टी ली. लेकिन वह इम्तहान मैं कभी नहीं दे सका, क्योंकि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (IAC) की एक फेसबुक पोस्ट ने मुझे जंतर-मंतर पहुंचा दिया. मैं इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) से बतौर वॉलंटियर जुड़ चुका था. इस दौरान मैंने पानी बांटा, अनशनकारियों की देखभाल करते हुए आरएमल अस्पताल में रातें बिताईं और वो सारे काम किए जो ‘एक्टिविस्ट’ किया करते हैं.

मेरे मैनेजर ने फेसबुक प्रोफाइल पर आंदोलन की तस्वीरें देख छुट्टियां रद्द कर दीं. यह 20 अप्रैल के आस-पास की बात होगी. तब तक मुझे आईएसी के ऑफिशियल ईमेल का जवाब देने का काम दे दिया गया था. हमारी टीम ने अप्रैल के महीने में ही करीब 12 हजार ईमेल के जवाब दिए थे.

छुट्टियों से लौटकर मैंने नौकरी जॉइन की. फिर गाजियाबाद की ग्राउंड टीम का हिस्सा बन गया (क्योंकि मेरा घर वैशाली में है.) मई से अगस्त 2011 तक इस ग्राउंड टीम का नेतृत्व किया. मकसद- जनलोकपाल!!

क्योंकि मैं ईमेल टीम का नेतृत्व कर रहा था, इसलिए मेरे पास ढेर सारी तस्वीरें आया करती थीं. इन तस्वीरों को फेसबुक पेज पर पोस्ट करवाने के मकसद से मैं शिवेंद्र के संपर्क में आया. शिवेंद्र IAC का फेसबुक पेज संभाल रहे थे. मुझे IAC की वेबसाइट की जिम्मेदारी भी दे दी गई क्योंकि मैं उनमें तकनीकी बैकग्राउंड का इकलौता कार्यकर्ता था. ज्यादातर काम ऑनलाइन होता था, यानी मैं जॉब करते हुए भी आंदोलन में सहयोग कर सकता था.

15 अगस्त को (अन्ना और केजरीवाल की गिरफ्तारी से एक दिन पहले) मैं उस 12 सदस्यीय टीम का हिस्सा था जो कम्युनिकेशन बैकबोन के रूप में काम करने के लिए अंडरग्राउंड हो गई थी. यह अरविंद केजरीवाल का ही आइडिया था, जो सफल रहा. इसने हमें हमारे प्लान में बनाए रखा.

मैंने दफ्तर से 15 दिन की छुट्टी मांगी थी, पर वह नहीं मिली. मैंने इस्तीफे की पेशकश कर दी. बाद में मैनेजर ने मुझे 10 दिन की छुट्टी देना स्वीकार कर लिया. 15 से 18 तारीख तक हम अंडरग्राउंड रहे, उसके बाद मैंने रामलीला मैदान में ही डेरा डाल लिया. वहीं रहा, खाया और सोया. यही वह समय था जब मैंने IAC के फेसबुक पेज के लिए भी पोस्ट लिखनी शुरू कर दी थी.

आंदोलन खत्म हो गया था. मैंने नौकरी शुरू कर दी और फिर आगे की पढ़ाई की तैयारियों में जुट गया. फिर दिसंबर का आंदोलन हुआ और नाकाम रहा. इसके बाद बहुत कुछ धुंधला हो गया.

20 जनवरी 2012. यह वो तारीख थी जब मुझे अरविंद केजरीवाल का बुलावा आया. उन्होंने मुझे नौकरी छोड़कर अपना एनजीओ PCRF जॉइन करने का प्रस्ताव दिया. एनजीओ के सदस्य के नाते मुझे 20 हजार रुपये हर महीने का स्टाइपेंड ऑफर किया गया, जो मेरी पिछली सैलरी से काफी कम था. केजरीवाल को भी एनजीओ से इतना ही स्टाइपेंड मिलता था. 22 जनवरी को मैंने नौकरी छोड़ दी और अगले दिन उनके एनजीओ से जुड़ गया. लगभग इसी समय दिलीप पांडे भी नौकरी छोड़कर केजरीवाल से जुड़ने भारत आ गए थे.

फरवरी में MS के लिए मेरी एप्लीकेशन न्यूजर्सी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में स्वीकार कर ली गई. मेरे लिए फिर असमंजस की स्थिति थी. लेकिन मैंने यहीं रुकना तय किया. इसके कुछ समय बाद मैंने एक लड़की से शादी कर ली. उससे मैं IAC में ही मिला था. ये दोनों काम परिवार को बिना बताए किए गए थे.

मैं अब भी IAC का सोशल मीडिया मैनेज कर रहा था. लेकिन अप्रैल में शिवेंद्र ने IAC के सारे अधिकार अपने पास रख लिए. अब हमें सब कुछ जीरो से शुरू करना था. इसके बाद मैंने FWAC बनाया और नई टीम बनानी शुरू की. फिर मैं उस टीम का हिस्सा बना जिसने उन 15 मंत्रियों के खिलाफ रिसर्च की, जिनके खिलाफ केजरीवाल जुलाई-अगस्त 2012 में अनशन पर बैठे. इसके बाद ही आंदोलन के नेताओं के बीच मतभेद उभरने शुरू हो गए.

समस्याओं के हल के लिए अरविंद जो मुहिम चला रहे थे, मैं उनसे जुड़ा रहा, क्योंकि मैं यही सपना लेकर आया था. सितंबर 2012 में जब नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात आई तो हमने अपनी सोशल मीडिया की टीम नए सिरे से बनानी शुरू की. सुधीर, उज्ज्वल, प्रणव और बहुत सारे लोग इससे जुड़े. हमने राष्ट्रीय से लेकर, प्रदेश और जिला स्तर तक 800 से ज्यादा फेसबुक पेज बनाए और जीरो लाइक से सब कुछ शुरू किया. यह ग्रुप भी उसी समय सोमू ने बनाया था. नवंबर में जब पार्टी बनी तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी (NE) ने मुझे आधिकारिक रूप सोशल मीडिया की कमान सौंपी.

एक बड़ी दुविधा पार्टी के लॉन्च (26 नवंबर) से पहले मुंह बाए मेरे सामने खड़ी थी. पीसीआरएफ में स्टाइपेंड लेकर काम कर रहे ज्यादातर लोग अब पार्टी दफ्तर में कर्मचारी की हैसियत से ही जुड़ रहे थे. ऑफिस ब्वॉय को मिलाकर इनकी संख्या 17 थी. चूंकि ये लोग कर्मचारी थे, लिहाजा वे पार्टी का हिस्सा नहीं हो सकते थे.

असमंजस यह था कि मैं अपना करियर छोड़ चुका था, जहां मैं अपनी जरूरत से काफी ज्यदा कमा सकता था और अब ये 20 हजार रुपये महीने की छोटी सी रकम मेरे सपने के आड़े आ रही थी. मैंने फैसला लिया. मैंने पार्टी से जुड़ने के लिए पीसीआरएफ से इस्तीफा दे दिया. इस तरह मैं पार्टी की नेशनल काउंसिल का सदस्य बना. नवंबर 2012 से फरवरी 2014 तक मेरा घर पत्नी की कमाई से ही चला जो एक मीडिया हाउस में नौकरी करती थी. वह मुश्किल समय था, पर धीरे-धीरे बीत गया.

फिर संतोष (कोली) के एक्सीडेंट की खबर आई तो मैं हैरान रह गया. मैं उनके साथ 5-6 दिनों तक अस्पताल में रहा. उस सदमे से उभरने में मुझे कुछ समय लगा, तब तक सोशल मीडिया की हालत बिगड़ चुकी थी. ऐसे गुट बन गए थे जो खुलेआम एक-दूसरे से गाली-गलौज कर रहे थे. एक-दूसरे पर प्रहार और व्यक्तित्व पर कमेंट किए जा रहे थे और यह सब कुछ लोगों की वजह से हो रहा था. इन्हीं लोगों में वह ‘डॉक्टर’ भी शामिल हैं जो आजकल बड़े एक्टिव रहते हैं.

हमने टीम भंग कर दी और इसे दोबारा बनाना शुरू किया. इसमें पंकज, प्रत्यूष, आरती, मलय और महेंद्र जैसे लोग लाए गए. करीब दो सालों से यह टीम ‘वॉर मशीन’ की तरह काम कर रही है. 2013 और 2015 के चुनाव में हमने बीजेपी के लिए जो चुनौती पेश की, वह इससे पहले कोई पार्टी नहीं कर पाई. चरणजीत, अरशी और अभिनव हमारे अहम योद्धाओं में से थे, जिन्होंने अपने दिन और रातें AAP के सोशल मीडिया को समर्पित कर दिए.

लोकसभा चुनाव के बाद मैंने अपना सोशल मीडिया बिजनेस शुरू कर दिया. लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही मुझे पार्टी की ओर से बुला लिया गया. तब मेरे दोस्त आगे आए. उनके उधार के पैसों से मेरा घर चला. उम्मीद करता हूं कि अपनी नई शुरुआत से मैं बहुत जल्द उनका पैसा लौटा दूंगा.

इस टीम ने BAAP, अवाम और बीजेपी से लड़ाई लड़ी है और उन्हें हराया है. यह अपने रास्ते में आने वाली हर चुनौती से पार पा सकती है. मैं बस यही सुनिश्चित करूंगा.

मैं इस ग्रुप के सोशल मीडिया की जिम्मेदारी किसी को देकर अलग हो जाऊंगा. मैं भी अपनी जिंदगी और परिवार के लिए कुछ समय चाहता हूं. उम्मीद करता हूं एक दिन मैं इस लायक भी हो जाऊंगा.

तब तक, मैं काम करता रहूंगा, इस बात की परवाह किए बगैर कि कौन क्या कह रहा है!

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श्री ग्रुप चेयरमैन मनोज द्विवेदी मेरा पैसा दबाए है, मैंने खुद नोटिस देकर इस्तीफा दिया : पंकज वर्मा

Dear Yashwant ji, Apropos our telecon of date I am forwarding you the copy of my E-mail dt 12.02.15 addressed to Mr Manoj Dwivedi, Chairman-Shri Group indicating my willingness to part from the Orgn on my own due to non-payment of salary and other expeses for over 6 months. The news carried by you quoting a so called letter dt 20.02.15 of Mr Umesh Azad, ED regarding my termination from the Orgn is totally wrong as no such letter whatsoever has been either served on me or intimated to me so far.

I have opted for one month notice period (1st March to 31 st March, 15) on my own due to acute financial crisis in Shri Group for the last one year or so. As discussed I will again request you to cross check with the concerned target audience before carrying such frivilous news item in your reputed News Portal known for its tremendous credibility. I am likely to join a leading News TV Channel shortly once my long pending dues are settled in Shri Group and you will be intimated about it in due course.

Warm Regards

Pankaj Verma

Sr Journalist
Lucknow

Mob No:

+919415011122

+919838311122

श्री न्यूज और श्री ग्रुप के चेयरमैन मनोज द्विवेदी को लिखा गया पत्र इस प्रकार है….

—– Forwarded Message —–

From: pankaj verma (pankajkverma1@yahoo.co.in)

To: Manoj Dwivedi ( chairman@shrigroup.co.in, chairman@shriinfratech.in )

Cc: Rishi Arora ( rishi@shrigroup.co.in ); rishi@shriinfratech.in ; Sharad Kesharwani ( sharad@shrigroup.co.in ); sharad@shriinfratech.in

Sent: Thursday, 12 February 2015 3:02 PM

Subject: Reg; Parting

Hon’ble Chairman,

I have been closely observing the recent development in the Group and continued financial constraints which has adversely affected not only the Media wing including Shri News & Shri Times but Infra Projects and Solar Venture of the Group as well.The Organisation has not able to utilize properly the services of professionals like us for which I was hired initially.It not only created frustrations at times but I really feel sorry for you as due to lack of professional support at the top level,there was a breakdown of your own speed as well.There is complete dearth of seasoned professionals at Sr level to match your speed and their inability to translate your vision into a ground reality.

I was earmarked by you for the Core Team 2.5 years back inspite of stiff resistance at the top and I continued to survive their onslaughts only because I had your complete trust and support.Whatever little I could contribute for the Orgn was only due to your confidence and faith in my abilities and competence, be it handling Shri News / Shri Times Affairs with UP / UTKD Govt Depts, Revenue oriented Deals, Himachal Election Venture, Haryana Project, Earmarking key personalities for Board of Director’s positions, Image / Brand Building exercises of the Group at the creamy level of Govt / Bureacracy / Corporate world, Misc Ventures including the Cooperative Bank Projects spreading over 7 virgin states including troublesome Maharastra & Kolkata to your utmost satisfaction. My greatest satisfaction remains in the fact that you still rate me very high and has been proudly saying on different occasions that no one in the Group can match my Performance level, Communication Skills, Competence level and ability to handle even the top brass of the Govt and Corporate world.

But I wonder how long you could have put a break on these disgruntled elements who were after my life and always tried to convince you for getting rid of me.I will not like to name them at this juncture but I had the privilege to get your views in confidence at times about their continued moves every now and then. Please recollect you at the time of my joining the Orgn had told me that this was the last Orgn of my professional career and “Shri Group” would take care of me and my family forever and some percentage of Share/Stakes would be passed on to me like others at the top,in case I match your expectations in due course.But today I realise you have to carry on with the Founder members of the Group and professionals like us can always be hired and fired on their whims and fancies.

In light of the financial constraints and inability of the Group to sustain continuance of Sr Staffs like us (though I being the exception one as all others in my level have remained Scot free so far) I intend to part with the Orgn with heavy heart.The period from 1st March to 31st March’15 may please be treated as mandatory one month’s Notice Period and I may please be relieved w.e.f. 1st April’15. Will request you to settle my dues at the earliest which amounts to roughly over 13 lacs (Salary for 6 months: 9 lacs,Routine Office Exps for last 1.5 yrs: 3.75 lacs,Office Car Driver’s salary for 5 months: 40K).

I am grateful to you for your complete trust in my abilities and competence and providing me a wonderful platform.I am thankful to all the Directors and colleagues,specially Alvina ji for extending their cooperation and it will be a great memory which I will cherish all along my life.Last but not the least,my personal loyalty for you will remain intact all along my life.

Warm Personal Regards
 
Pankaj Verma

1, Rajbhawan Colony

Lucknow


मूल खबर…..

सीओओ पंकज वर्मा को श्री मीडिया ग्रुप से बाय बाय कर दिया गया

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पुलिस विभाग में “लीडरशिप” को कुत्सित प्रयास बताने पर आईपीएस का विरोध

लखनऊ पुलिस लाइन्स के मुख्य आरक्षी बिशन स्वरुप शर्मा ने अपने सेवा-सम्बन्धी मामले में एक शासनादेश की प्रति लगा कर अनुरोध किया कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश जारी होने के 33 साल बाद भी इसका पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस विभाग के सीनियर अफसरों को श्री शर्मा की यह बात बहुत नागवार लगी कि “उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है” और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है.

एएसपी लाइंस, लखनऊ मनोज सी ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर इसे लीडरशिप करने का “कुत्सित” प्रयास बताते हुए इस “अनुशासनहीनता” के लिए श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की बात कही. आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर वरिष्ठ अफसरों को घिसीपिटी सोच छोड़ने और अकारण अनुशासनहीनता और दंडात्मक कार्यवाही के हथियार का प्रयोग बंद करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस में कामकाज का बेहतर माहौल पैदा हो.

IPS raises voice against “leadership” in police called dirty

Head Constable Bishun Swarup Sharma from Lucknow Police Lines had presented a Government Order in one of his service matters, showing his pain at the GO not being enforced for policemen evenh after 33 years of its promulgation. Senior Officers of police department found it completely improper that “he made an attempt to gain sympathy of the departmental policemen” and asked in writing for collective welfare of police persons.

ASP Lines Lucknow Manoj C wrote to SSP Lucknow considering this a “despicable” attempt of leadership, categorizing it as “gross indiscipline” and seeking disciplinary action against Sri Sharma. IPS Officer Anmitrabh Thakur has written to DGP requesting him to direct the senior officers to get over their old mindset and stop using the tool of indiscipline and disciplinary action unnecessarily, and help create a better work enivironment in UP Police.

डीजीपी को लिखा गया पत्र….

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- वरिष्ठ अधिकारियों की अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति सोच बदलने हेतु अनुरोध

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे पुलिस विभाग के सूत्रों से श्री मनोज सी, सहायक पुलिस अधीक्षक, लाइंस, लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ को प्रेषित पत्र दिनांक 17/02/2014 की प्रति प्राप्त हुई (प्रतिलिपि संलग्न). इस पत्र में मुख्य आरक्षी 348 स०पु० श्री बिशुन स्वरुप शर्मा, पुलिस लाइंस, लखनऊ के आकस्मिक अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में श्री शर्मा को भेजे कारण-बताओ नोटिस पर उनके द्वारा दिए जवाब में उनके द्वारा शासनादेश और पुलिस मुख्यालाय के परिपत्र की प्रति संलग्न कर यह टिप्पणी अंकित बतायी गयी है कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश के जारी होने ने 33 साल बाद भी इस शासनादेश का पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया.

श्री शर्मा के इस कथन पर एएसपी श्री मनोज सी की टिप्पणी निम्नवत है-“इस तथ्य से उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है”. उन्होंने यह भी कहा कि श्री शर्मा ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है, जो लीडरशिप करने का “ कुत्सित” प्रयास है और “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आता है. उन्होंने इसके लिए एसएसपी लखनऊ से श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की संस्तुति की. साथ ही उन्होंने प्रतिसर निरीक्षक को अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को अनुशासन में रखने हेतु उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दिए जिसपर  प्रतिसर निरीक्षक ने निर्देशों के अनुपालन में कार्यवाही के लिए अपने अधीनस्थ हो लिखा.

मैंने एसएसपी लखनऊ कार्यालय से इस सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु मुझे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. निवेदन करूँगा कि श्री शर्मा के व्यक्तिगत प्रशासनिक/विभागीय मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह उनके और विभाग के बीच का मामला है जिसमे मुझे कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है पर जिस प्रकार से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा इस पत्र के माध्यम से पुलिस के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा शासनादेश का पालन नहीं होने पर उनके कष्ट व्यक्त करने को ‘कुत्सित प्रयास’ और ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है और उनके विरुद्ध मात्र इस कारण से दंडात्मक कार्यवाही की बात कही गयी है, यह प्रथमद्रष्टया ही हमारे लोकतान्त्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान प्रदत्त अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारी के रूप में प्रदत्त अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने का उदहारण दिख जाता है जो चिंताजनक है.

हम सब इस बात से अवगत हैं कि अन्य नागरिकों की तुलना में पुलिस बल को एसोसियेशन बनाने के लिए कतिपय बंदिश हैं जो पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 में दी गयी हैं. इसी प्रकार पुलिस बल में विद्रोह/असंतोष के लिए उकसाने के सम्बन्ध में पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 है. लेकिन इन अधिनियमों में द्रोह उत्पन्न करने के लिए किये गए कार्यों अथवा बिना सक्षम प्राधिकारी के अनुमति के एसोसियेशन बनाने पर रोक है, इसमें कहीं भी एक वाजिब बात को कहने या सामूहिक हित की बात सामने रखने को मना नहीं किया गया है. इसके विपरीत पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा 4 (Saving of acts done by police associations and other persons for certain purposes.—Nothing shall be deemed to be an offence under this Act which is done in good faith.— (a) for the purposes of promoting the welfare or interest of any member of a police-force by inducing him to withhold his services in any manner authorised by law; or (b) by or on behalf of any association formed for the purpose of furthering the interests of members of a police-force as such where the association has been authorised or recognised by the Government and the act done is done under any rules or articles of association which have been approved by the Government) में तो इससे बढ़ कर गुड फैथ (सद्भाव) के साथ पुलिस बल के कल्याण अथवा हित में उनकी सेवाओं तक को रोकने को अनुमन्य किया गया है जबकि इस मामले में श्री शर्मा द्वारा मात्र पूर्व में पारित एक शासनादेश के उसकी सम्पूर्णता में पालन कराये जाने की बात कही गयी है.

मैं नहीं समझ पा रहा कि एक पूर्व पारित शासनादेश के पालन के लिए आग्रह करना और उसके कथित रूप से अनुपालन नहीं होने को किस प्रकार से कुत्सित कार्य और घोर अनुशासनहीनता माना जा सकता है जिसके लिए उन्हें दण्डित किया जाए. साथ ही अब जब पूरी दुनिया में लीडरशिप की जरुरत बतायी जाती है और स्वयं हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में हर जगह लीडरशिप के गुणों के बढ़ोत्तरी की बात कही जाती है, उस पर बल दिया जाता है, उसके लिए सेमिनार और ट्रेनिंग कराये जाते हैं, ऐसे में लीडरशिप के कथित प्रयास को “कुत्सित प्रयास” कहे जाने की बात भी अपने आप में विचित्र और अग्राह्य है.

मैंने उपरोक्त उदहारण मात्र इस आशय से प्रस्तुत किया कि यह उदहारण यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अफसर किस प्रकार से अनुशासन के नाम पर किसी भी आवाज़ और किसी भी सही बात को दबाने और उसे अनुशासनहीनता या अपराध घोषित करने का कार्य कर रहे हैं जो न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि प्रदेश पुलिस की क्षमता और प्रभावोत्पादकता के लिए भी अहितकारी है. अतः मैं आपसे इस प्रकरण को एक गंभीर उदहारण के रूप में आपके सम्मुख इस निवेदन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इसे एक दृष्टान्त बताते हुए समस्त अधिकारियों को मार्गदर्शन देने की कृपा करें कि वे अनुशासनहीनता और सही/वाजिब कहे जाने के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और घिसी-पीटी सोच के तहत अधीनस्थ अधिकारियों की प्रत्येक बात को अनुशासनहीनता बता देने की वर्तमान मानसिकता को समाप्त करें क्योंकि यह छद्म-अनुशासन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब समय आ गया है जब पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के इस युग में पुरातनपंथी मानसिकता का त्याग कर वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के मध्य अकारण ओढ़ी गयी दूरी समाप्त की जाए और इस प्रकार अनुशासन के नाम पर दण्डित किये जाने की परंपरा का पूर्ण परित्याग हो ताकि पुलिस विभाग में कामकाज का बेहतर माहौल तैयार हो और अकारण पैदा हुई दूरी समाप्त हो.

भवदीय,
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
पत्र संख्या- AT/Complaint/104/2015
दिनांक- 03/04/2015

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Newspapers readership IRS 2014 Download

Download Topline Newspapers Readership numbers… देश के बड़े अखबारों, मैग्जीनों आदि की लैटेस्ट या बीते वर्षों की प्रसार संख्या जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों या लिंक्स पर क्लिक करें…

IRS 2014 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2014.pdf

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IRS 2013 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2013.pdf

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IRS 2012 Q4 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2014q4.pdf


इन्हें भी पढ़ें….

कई दिन चुप्पी साधे रहे जागरण और अमर उजाला का आज एक साथ आईआरएस रिपोर्ट पर अटैक, निशाने पर ‘हिंदुस्तान’

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See list of top publications / dailies, top language dailies, top english dailies and top magazines in india

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रीडर सर्वे : जागरण, हिंदुस्तान, भास्कर की शीर्ष अग्रता बरकरार, पत्रिका चौथे, अमर उजाला पांचवें पायदान पर

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अमर उजाला ने लखनऊ में दैनिक जागरण को पटका, बना नंबर वन

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हिंदुस्‍तान ने लिखा – बड़े अखबारों का विरोध बेकार, इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट सही

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पिंकसिटी प्रेस क्लब चुनाव नतीजे घोषित, राधारमण शर्मा अध्यक्ष और हरीश गुप्ता महासचिव निर्वाचित

जयपुर : पिंकसिटी प्रेस क्लब लि. जयपुर की प्रबन्ध कार्यकारिणी वर्ष 2015-16 के चुनाव नतीजे घोषित कर दिए गए है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल.एल.शर्मा ने बताया कि अध्यक्ष पद पर श्री राधारमण शर्मा और महासचिव पद पर श्री हरीश गुप्ता निर्वाचित घोषित किए गए है। श्री शर्मा अध्यक्ष पद पर लगातार दूसरी बार चुने गए है। श्री हरीश गुप्ता राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के भी अध्यक्ष है।

इसी प्रकार उपाध्यक्ष पद पर श्री मुकेश कुमार मीणा और राहुल जैमन तथा कोषाध्यक्ष पद पर श्री डी. सी. जैन निर्वाचित घोषित किए गए है। जैन कोषाध्यक्ष पद पर तीसरी बार निर्वाचित हुए है। श्री जैमन पूर्व में कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। कार्यकारिणी के दस पदों के लिए श्रीमती जूही औदिच्य, श्रीमती बबीता शर्मा, श्री मुकेश चौधरी, श्री जयसिंह गौड़, श्री निखलेश कुमार शर्मा, श्री बाबूलाल भारती, श्री अभिषेक सिंह तंवर, श्री महेन्द्र कुमार शर्मा, श्री अशोक कुमार भटनागर और छगन लाल शर्मा निर्वाचित घोषित किए गए है।

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Main Kuch Bhi Kar Sakti Hoon back with season 2 on Doordarshan National!

New Delhi, 1st April 2015: After the impressive success of season one of Main Kuch Bhi Kar Sakti Hoon (MKBKSH), which was telecast last year with 52 episodes, Doordarshan National is all set to launch season two, starting April 4, 2015 from 7:30 pm onwards. The curtain raiser of the show will be telecast this Friday at 7:30 pm.

The half an hour show, Main Kuch Bhi Kar Sakti Hoon, challenges prevalent social norms on child marriage, early pregnancies, contraceptive use, women’s education, health and empowerment so as to change existing mindsets to bring forth a positive change in the society.

As per the assessments by TAM and IRS data, the serial was watched by over 58 million viewers and PFI received as many as 6 lakh phone calls from people across the country, wanting to engage on the issues it had raised, and to share their own experiences.

Season two of ‘Main Kuch Bhi Kar Sakti Hoon’, focuses on Sneha’s (the protagonist) continuing story, the drama, dreams as she moves on from Maanavta Hospital to serve her community.  She starts the Manaavta Health Centre and brings people together to aspire for better lives. Preeta, Sneha’s younger sister, starts a girls football team. These young women use sports to demand for equal opportunities and rights for girls.  In the process, Preeta is attacked, but the girls team fights on in spite of family pressure, ridicule and threats of violence and they go on to win the football tournament.
In parallel, there are dimensions of deceit, violence, corruption and romance all rolled into this entertainment pot-boiler.

The serial is scripted, produced and directed by the renowned director Feroz Abbas Khan. He says, “Main Kuch Bhi Kar Sakti Hoon is not just a television series; it is entertainment with social responsibility… Through Season One, people realized that there was more to family planning methods than sterilization. And that prenatal care is necessary to ensure healthy pregnancy. People were able to find the voice to protest against the gender based violence and mobilize support… The story of Main Kuch Bhi Kar Sakti Hoon revolves around the inspiring journey of Dr Sneha who represents the young Indian woman of today, emotionally torn between family and society,  professional aspirations and personal commitment. Her struggles and triumphs form the core of this memorable soap opera. It will make you laugh, it will make you cry, but it will also make you think. It is a television series like you’ve never seen before.”

Tune in ‘Desh Ka Apna Channel- DD National’ every Saturday& Sunday at 7:30 pm, to watch this women-centric series.

प्रेस रिलीज

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Excuse Me MR. PM, Passengers to starve in Non VVIP trains as my Wife does in Amritsar Express for your Bullet PPP Dream!

My wife Sabita Biswas,aged 56 is travelling by 13049 Amitsar Express. Coach B-one,Berth number 48.She is in mourning as her elder brother died and she has to join her family in Bijnore. I saw her leaving Howrah on 13:50 by the train.Since,I could not go,we opted for 3A ticket and it was only available as all trains remain full until May 2nd. We could not manage a return ticket as she has to look for Tatkal on her return.

Amritasar Express has no Pantry Car and travellers have to starve as they are not getting even drinking water as hawkers are not allowed and IRTC has to do nothing with serving food to Amritsar Express.They could not manage even drinking water. On stations you may not get anaything thanks to catering privatisation.It is being proved to be horrible expreince to feel good about your Bullet PPP model for general pubic. My home State Uttarakhand is no more a part of the most powerful Uttarpradesh and is neglected by Indian government.

Potentially,the most beautiful Hill stations and most holy pilgrimage, Uttarakhand destinations have very selected connectivity in every means.Power equations have not to change just because of Uttarakhand in New delhi and hence, Uttrakhand people have not to get the Railway Booty which other states have.We have no direct train for Nainital from Mumbai while have only one weekly Lalkuan Express and a Horrible long distance slowest train Bagh Express from Howrah.

The trains going through Uttarakhand have nothing to offer. Every train is super slow and almost none of them have any facility for travellers and those have to travel in Uttarakhand have to feel  the Hell losing. Even the Punjab bound trains have nothing, we could realise this time only. Others may share their experience and we may publish.

Railway Budget has been claimed to be focused on traveller`s security and better food and facilities. Yes, while you travel by Rajdhani or Durnta and some other VVIP trains bound to super Smart Metro cities, you have on to complain.

If a train bound to the holy city, Amritsar where the Golden Temple is situated,means hell losing,your claim to make religious journey seems to be business friendly Five Crore endorsement for Celebs as Aamir Khan paid,only which means just starving for general taxpayers. I am just sharing this to highlight the resultant dreams exposed naked which have everything for Desi Videshi Capital inflow for Complete Privatization of Railway at the cost of Taxpayer Indian citizens.

I know, the PM, the Railway Minister, Railway Board and Railway officials have nothing to do with public grievances. I am sharing this horror for those who have to travel by Indian Railway to become Bullet literally as it means.

Palash Biswas
Senior Journalist and Social Activist
palashbiswaskl@gmail.com

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किताब के रूप में उतरी प्रभात खबर की उपलब्धियां, सीएम ने किया लोकार्पण

रांची में ‘प्रभात खबर : प्रयोग की कहानी’ पुस्‍तक के विमोचन के अवसर पर मुख्‍यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि ‘प्रभात खबर’ की सोच के अनुसार राज्‍य का विकास करेंगे. उन्‍होंने कहा कि समय-समय पर मीडिया की सलाह पर सरकार अमल करेगी और इन पांच सालों में राज्‍य का हर क्षेत्र में विकास करेगी. उन्‍होंने कहा कि इस पुस्‍तक के लिए अनुज कुमार सिन्‍हा बधाई के पात्र हैं. उन्‍होंने कहा कि वे ‘प्रभात खबर’ की विकास यात्रा के एक प्रत्‍यक्ष गवाह हैं. उन्‍होंने ‘प्रभात खबर’ का संघर्ष जमशेदपुर में काफी नजदीक से देखा है.

मुख्‍यमंत्री ने कहा कि हरिवंश जी जिस अखबार का नेतृत्‍व कर रहे हैं और उनके साथ अनुज जी और विजय पाइक जैसे सहयोगी हैं, उसको तो सफल होना ही था. उन्‍होंने स्‍वामी विवेकानंद की एक पंक्ति को आधार बनाकर कहा कि हर चीज शुरुआत में छोटी होती है बाद में वह बड़ी हो जाती है. उन्‍होंने कहा कि व्‍यक्ति अपने कर्मों से सुंदर होता है चेहरे से नहीं. श्री दास ने कहा कि राज्‍य के विकास के लिए जो भी सुझाव देना चाहता हो वह सहज ढंग से अपने सुझाव मुझतक पहुंचा सकता है.
 
कार्यक्रम में हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप के चीफ एडिटोरियल कंटेंट ऑफिसर निकोलस डावेस ने कहा कि ‘प्रभात खबर’ ने स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय मुद्दों को काफी संजीदगी और सुंदरता से पेश किया है. जमीनी स्‍तर की पत्रकारिता करते हुए व्‍यापार का एक सफल मॉडल बनकर सभी के सामने मिशाल पेश किया है. राष्‍ट्रीय अखबारों में जिस प्रकार कोल ब्‍लॉक और लड़कियों की तस्‍करी जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाता है, उसी प्रकार ‘प्रभात खबर’ में भी इन मुद्दों को काफी अच्‍छे ढंग से प्रकाशित और प्रसारित किया जा सकता है. उन्‍होंने कहा कि नेशनल मीडिया की तरह परंपरागत मीडिया में भी तकनीक का असर देखा जा रहा है. आने वाले दिनों में सभी चीजें डिजीटलाइज हो जायेगा.
 
कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर एंड बिजनेस मैनेजमेंट के निदेशक अशोक कुमार दत्‍ता ने कहा कि ‘प्रभात खबर’ अखबार तीन चीजों के कारण सफल हुआ है. ये तीन चीजें लीडरशिप, नैतिक मूल्‍य और टीम का पैशन है. ये बातें किसी भी संस्‍थान को सफलता के सोपान पर पहुंचा सकती है. उन्‍होंने हरिवंश की भावना की सराहना की और कहा कि नैतिक मूल्‍यों ने ‘प्रभात खबर’ को आज जन-जन का चहेता बनाया है. इससे पूर्व मुख्‍यमंत्री और अन्‍य अतिथियों ने ‘प्रभात खबर : प्रयोग की कहानी’ पुस्‍तक और ‘झारखंड गौरव सम्‍मान’ नामक कॉफी टेबल बुक का लोकार्पण किया.
 
पुस्‍तक ‘प्रभात खबर : प्रयोग की कहानी’ के लेखक और ‘प्रभात खबर’ के संपादक अनुज कुमार सिन्‍हा ने कहा कि हमारा संकल्‍प था कि अखबार बंद ना हो. जीवन में कभी निराश नहीं होना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि हरिवंश जी और गोयनका जी से पुस्‍तक लिखने की प्रेरणा मिली.

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न्यूज चैनल के बाद जिया इंडिया मैग्जीन का भी डिब्बा गोल

जिया न्यूज चैनल का भट्ठा बैठाने के बाद वरिष्ठ और बुजुर्ग पत्रकार एसएन विनोद ने पाक्षिक पत्रिका जिया इंडिया का भी डिब्बा गोल करवा दिया है। जिया इंडिया के नोएडा स्थित ऑफिस में तालाबंदी कर दी गयी है। दर्जनों कर्मचारी फिर से बेरोजगार हो गए हैं। एडिटोरियल और नॉन एडिटोरियल सभी कर्मचारी सड़क पर आ गए हैं। जिया इंडिया में पिछले तीन महीने से सेलरी भी नहीं दी गयी है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिनकी चार-चार महीने की सेलरी बकाया है।

बीते रोज 21 फरवरी को जब कर्मचारी जिया इंडिया के ऑफिस  पंहुचे तो गार्ड ने भीतर घुसने से रोक दिया और कहा कि मैगजीन बंद हो गयी  है। आज से कोई काम नहीं होगा। गार्ड की बात सुन कर सभी कर्मचारी हतप्रभ  रह गये और एसएन विनोद को फोन करने लगे। मगर एसएन विनोद ने किसी  का फोन ही नहीं उठाया। हैरान-परेशान कर्मचारी जिया इंडिया के दफ्तर के  सामने धरने पर बैठ गये। बार-बार कोशिश के बावजूद जब एसएन विनोद ने  फोन नहीं उठाया तो कर्मचारियों ने जिया इंडिया के मालिक रोहन जगदाले को  फोन मिलाया। रोहन जगदाले ने फोन पर कर्मचारियों की समस्याओं से  अनभिज्ञता जाहिर की। जगदाले ने यह भी कहा कि चार महीने से सेलरी न  दिये जाने की बात भी उन तक किसी ने पहुंचाई।

यह सुन कर कर्मचारियों के  मन में एसएन विनोद के प्रति गुस्सा और बढ़ गया। रोहन जगदाले ने  कर्मचारियों को आश्वासन दिया कि एसएन विनोद सभी से बात करेंगे और उनकी समस्याओं का भी निदान करेगे। कुछ देर बाद रोहन जगदाले ने खुद फोन किया और टेलिकॉनफ्रेंसिंग के जरिए कर्मचारियों की बात एसएन विनोद से करवायी। फोन पर एसएन विनोद का भाषा गुण्डे माफिया जैसी थी। वो बार-बार बोल रहे थे कि नोएडा से लेकर नागपुर तक जिसको जो उखाड़ना हो वो उखाड़ ले। इसी तरह की तमाम बातें बोलते हुए उन्होंन फोन बीच में ही डिस्कनैक्ट कर दिया।

इस वाकये के बाद कर्मचारी ऑफिस के सामने डटे रहे। कुछ देर बाद एसएन विनोद ऑफिस तो ताले खुले। एसएन विनोद सीधे अपने केबिन में घुसे और एक-एक कर सभी कर्मचारियों को बुलाकर जलील करने लगे। जिया मैगजीन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी को उन्होंने अपशब्दों से नवाजते हुए सिफारिश पर नौकरी दिए जाने का उलाहना भी दिया। चर्चा है कि इससे वरिष्ठ पदाधिकारी गुंजन सिन्हा ने एसएन विनोद पर आक्रामक हो उठे। लेकिन बाकी लोगों ने उन्हें रोक लिया। इस घटना के बाद एसएन विनोद ढीले पड़ गये। तब तबीयत खराब होने और पिता की उम्र का होने का वास्ता देकर धीरे से खिसक लिए। शाम लगभग सात बजे तक सभी कर्मचारी जिया इंडिया के ऑफिस के सामने ही बैठे रहे। गौरतलब है कि जब जिया इंडिया मैग्जीन की शुरुआ की जा रही थी उस वक्त जिया न्यूज नामक इसी ग्रुप के चैनल के कर्मचारी अपने वेतन भत्तों को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे थे। उस वक्त भी एसएन विनोद ने चैनल के कर्मचारियों के साथ ऐसा ही व्यबहार किया था। जिया न्यूज चैनल के कर्मचारियों ने लेबर कमिशनर के सामने भी मामला उठाया था।

मूल खबर…

‘जिया इंडिया’ मैग्जीन के बुरे दिन, मीडियाकर्मियों को तीन महीने से वेतन नहीं

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एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में भारत सरकार के सीनियर स्टेंडिंग काउंसिल नियुक्त

भारत सरकार ने जाने-माने एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट में सीनियर स्टेंडिंग काउंसिल नियुक्त किया है. नेशनल हैराल्ड से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक हुए विभिन्न न्यूज हाउसों में हुए मीडिया कर्मियों के  आंदोलनों को लीगल हेल्प करने वाले और अदालतों में मीडिया कर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा के प्रोफाइल में यह एक और बडी उपलब्धि जुड़ गई है.

एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी के मेम्बर और देश के लब्धप्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों के लीगल एडवाइज़र भी हैं। एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा आजकल प्रिंट मीडिया में काम करने वाले पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मियों को मजीठिया वेज़ बोर्ड की सिफारिशों के मुताबिक वेतन दिलाने की लडा़ई शुरु कर चुके हैं. भडा़स4मीडिया के साथ एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा भी मजीठिया दिलवाने के लिए लड़ाई में ‘नो प्रोफिट-नो लॉस’ के आधार पर जुटे हुए हैं. इससे पहले एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा ने प्रिंट मीडिया संस्थानों में पालेकर, बछावत, महीसाणा बोर्ड लागू करवाने के लिए लंबी और दुरूह लडा़ईयां जीत चुके हैं. हालात यह हैं कि नंबर वन और निडरता का थोथा ढोल पीटने वाले संस्थानों के मालिक एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा के नाम से खौफ खाते हैं. कानून से विभिन्न क्षेत्रों में महारत हासिल रखने वाले एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा साइवर और आईटी लॉ के विशेषज्ञों मे शुमार हैं. एनजीटी और डीआरटी जैसे ट्रिब्युनल्स के अलावा एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सन् 1994 से सक्रिय वकालत कर रहे हैं. अगस्त 1962 में जन्मे एडवोकेट उमेश चंद्र शर्मा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से वकालत की उच्च शिक्षा हासिल की है.

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एलआईसी के कैलेण्डर पर कानूनी कार्यवाई करेगी छत्तीसगढ़ की ‘सम्पदा’

जीवन बीमा (एलआईसी) के नये साल के कैलेण्डर को लेकर एक बड़ा बवाल खडा़ हो गया है. कैलेण्डर के जून महीने के पन्ने पर जो कला कृति दिखायी गयी है, उसी पर यह बवाल है. इस पूरे विवाद पर छत्तीसगढं की सम्पदा नाम की सामाजिक संस्था ने आपत्ति की है. सम्पदा के कर्ताधर्ताओं का कहना है कि जून महीने के पन्ने पर ढोकरा धातु कला का प्रदर्शन किया है. इस कला का परिचय मध्यप्रदेश की कला के रूप में किया गया है. जबकि यह छत्तीसगढ की प्रमुख धातु कला है. इस कैलेण्डर को वापस लेने और संशोधन के बाद पुनः प्रकाशित कर ने पर ‘सम्पदा’ वालों ने एलआसी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है.  इस बारे में ‘सम्पदा’ वालों का की क्या आपत्ति है और वो क्या चाहते हैं. इस को जानने के लिए देखिए नीचे दिया गया पत्र-

प्रति,
   श्रीमान अध्यक्ष महोदय,
  भारतीय जीवन बीमा निगम.
विषय: कैलेंडर में गलत, भ्रामक जानकारी प्रकाशित करने के कारण हमें विभिन्न स्तरों पर होनेवाली हानि के बाबत.

माननीय महोदय,
      आज आप  अर्ध शासकीय राष्ट्रीय संस्था द्वारा प्रकाशित वर्ष २०१५ का  वार्षिक कैलेंडर कलात्मक तस्वीरों से युक्त सुन्दर है, बधाई. किन्तु बड़े खेद का विषय है कि माह जून २०१५ के माह के पेज पर पीतल की कलाकृतियों के साथ ही इसका त्रुटिपूर्ण, भ्रामक परिचय, धातु कला-ढोकरा, मध्यप्रदेश के रूप में कराया गया है, जो कि गलत है.
हम और हमारे पूर्वजों द्वारा बीसियों पीढ़ियों से, कई सदियों से बस्तर जिले में इस प्राचीन कला पद्धति के द्वारा कलाकृतियाँ तथा ग्राम्य देवी देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती रहीं हैं, देश विदेश में हमारी यह कला ढोकरा कला के नाम से विख्यात है. बस्तर कोन्डागांव की ढोकरा कला के हमारे संस्थान के पूर्व मार्गदर्शक कला गुरु स्वर्गीय जयदेव बघेल निवासी कोन्डागांव वर्तमान में ढोकरा कला के पितामह माने जाते हैं.
  किन्तु आप के द्वारा इस “ढोकरा कला” को  मध्यप्रदेश की कला बताने से हमारी कला की साख को गम्भीर क्षति पहुंची है, साथ ही हमारी तथा हमारी कला की विश्वसनीयता भी. पूरे देश में, जहां-जहां भी आप का कैलेंडर वितरित किया गया है वहां भी कम होगी. वस्तुतः अब हम छत्तीसगढ के ढोकरा कला के मूल कलाकारों की कलाकृतियों को मध्यप्रदेश की ढोकरा कला की नकल समझा जावेगा.
२-  आप के कैलेंडर में ढोकरा कला को मध्यप्रदेश का प्रदर्शित करते हुए इस कैलेंडर के वितरण से हम कोन्डागांव, बस्तर ही नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ के सभी ढोकरा कला के कलाकारों की कलाकृतियों की विश्वसनीयता, साख पूरे देश भर में प्रभावित होगी तथा हमारी कलाकृतियों के मूल्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. जिसके कारण ढोकरा कला से जुड़े छत्तीसगढ़ राज्य के सभी कलाकारों का जीवन यापन करना कठिन हो जाएगा. अतएव हम आप से विनम्र निवेदन करते हैं कि, तत्काल इस असत्य, भ्रामक जानकारी वाले समस्त वितरित कैलेंडर वापस लेकर आवश्यक त्रुटियां सुधार कर ही वितरित करने की कृपा करें.
३- हमारी मध्यप्रदेश अथवा किसी भी प्रदेश के प्रति कोई दुर्भावना बिल्कुल ही नहीं है, अतएव इस सन्दर्भ में हमारा सकारात्मक सुझाव है कि मध्यप्रदेश के पूर्व छत्तीसगढ के नाम को ढोकरा कला के लिए लिखा जाए.
आप का कैलेंडर जितना ही अधिक प्रचलित, वितरित , प्रदर्शित होगा, उतना ही अधिक हमें एवं हमारे छत्तीसगढ के ढोकरा कला के कलाकारों को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष हानि होगी, अत: आप से विनम्र निवेदन है कि, आप अपनी महान कल्याणकारी राष्ट्रीय संस्थान भारतीय जीवन बीमा निगम, की यशस्वी परंपरा के अनुरूप यथाशीघ्र इस पर उचित एवं प्रभावी कार्यवाही कर, की गई कार्रवाईयों  से हमें भी  अवगत कराने की कृपा करें.
आप के द्वारा सन्तोषप्रद कार्रवाई नहीं करने की दशा में हमें मजबूरन अपने समूह, प्रदेश के सम्मान, कला की साख एवं विश्वसनीयता तथा अपनी आजीविका को बचाने हेतु उचित वैधानिक उठाना पड़ेगा, जिसकी जिम्मेदारी आप की एवं आपकी संस्था की होगी.

    आवेदक
  डॉ. राजाराम ,
वास्ते:
सम्पदाःसमाज सेवी संस्थान,
Website:- www.sampda.org
कोन्डागांव बस्तर, छत्तीसगढ़.
07786-242506

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दिल्ली के चौराहों पर नहीं सजेंगे अब चुनावी चर्चाओं के मंच

कम से कम अब दिल्ली के गली-चौबारों और चौराहों पर कैमरा-लाइट और रोल न दिखाई देगा और न सुनाई देगा. दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी किए हैं कि गली-मुहल्लों और चौक-चौबारों पर भीड़ इकट्ठी कर और मंच सजाकर चुनावी बहस के सीधे प्रसारण की अनुमति नहीं दी जाएगी.

अभी तक की परंपरा के मुताबिक दिल्ली चुनाव की कवरेज में सबसे आगे रहने और सबसे विश्वसनीय खबरें देने के लिए प्रायः टीवी चैनल्स जनता के बीच जाकर बहस आयोजित करते रहे हैं. जिनका सीधा प्रसारण भी होता है. दिल्ली पुलिस का तर्क है कि सीधे प्रसारण के दौरान हल्ला-गुल्ला हाथापायी और कभी-कभी तो दंगे जैसी नौबत भी देखी गयी. दिल्ली की गलियों और चौराहो पर चुनावी कार्यक्रमों के प्रसारण से लॉ एण्ड ऑर्डर की समस्या पैदा न हो इसलिए ऐसे आदेश जारी किए गए हैं. दिल्ली पुलिस के इन नये आदेशों पर अभी तक न्यूज चैनलों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली है. यह देखना रोचक होगा कि सबसे आगे और सबसे विश्वसनीय बनने की होड़ का क्या होगा. क्या चैनल्स सूचना प्रसारण मंत्रालय के सामने अपनी समस्या लेकर जाएंगे या कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे या फिर चुप्पी साध कर बैठ जाएंगे.

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क्या नयी शक्ल मे मीडिया सेंसरशिप लाने वाली है मोदी सरकार…?

भारत के न्यूज चैनलों में मची नम्बर वन की होड़ और सबसे पहले खबर दिखाने की कोशिशों पर अब पानी फिरने वाला है. मोदी सरकार बहुत जल्दी कुछ ऐसे दिशा टनिर्देश जारी करने वाली है जिससे आतंकी और देश विरोधी घटनओं के सीधे प्रसारण और कवरेज पर रोक लग सकती है.

हालांकि मोदी सरकार और उनके भारी-भरकम मंत्री मीडिया पर सेंसरशिप लागू किये जाने की आशंकाओं को नकारते हैं.लेकिन वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के भार दबावों की वज़ह से सरकार कुछ विशेष घटनाओं के प्रकाशन और प्रसारण के लिए नियम-कानून बना सकता है. सूचना प्रसारण मंत्री के इस सार्वजनिक बयान पर मीडिया के बड़े-बड़े अलम्बादारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी है.

मीडिया, खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कंटेट पर पूर्ववर्ती सरकारों ने भी नियंत्रण लगाने की कोशिशें की गयी थीं. उस वक्त काफी बवाल मचा था. फिर यह कहा गया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्वतः नियमन करे. इसके बाद इंडियन ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन जैसी संस्थाएं भी बनी. इसके बावजूद न्यूज चैनलों की भेड़ चाल अभी तक चालू है. देश की सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि ब्रेकिंग न्यूज और एक्सक्लूसिव न्यूज के नाम पर भारत के चैनल टीवी स्क्रीन्स पर आतंकवादी घटनाओं और मुठभेड़ों की लाइव कवरेज और देश विरोधी तत्तवों का इंटरव्यू दिखाना-चलाना और छापना एक फैशन बन गया है. जिसका फायदा देश विरोधी तत्वों को लाभ मिलता है और सुरक्षा एजेंसियों की योजना में बाधा आ रही है.

यहां गौरतलब यह है कि मीडिया फ्रेंडली वाली छवि बनाने में जुटे राजनाथ सिंह का मंत्रालय खबरों के प्रसारण-प्रकाशन पर सरकारी नियमन के लिए रक्षा मंत्रालय से भी जादा दवाब बना रहा है. भारतीय मीडिया के विश्लेषकों का कहना है कि अगर खबरों के प्रसारण-प्रकाशन पर किसी भी तरह का सरकारी नियमन लागू हुआ तो वो सेंसरशिप का बदला हुआ स्वरूप होगा. हो सकता है कि सरकार उसे पहले सीमित दायरे में लागू करे लेकिन इस बात की क्या गारंटी कि सरकार अपने निहित स्वार्थो के लिए इस नियमन का दुरुपयोग नहीं करेगी.

सबसे अहम बात है कि अरुण जेटली के सार्वजनिक बयान के कुछ अंशों को ही प्रमुखता से प्रकाशित और प्रसारित किया गया है. खबरों पर सरकारी नियमन के बयान को छुपा दिया गया है. टीवी चैनलों पर अभी तक इस भावी सरकारी नियमन पर बहस-मुहाबिसे भी नहीं हो रहे हैं. इंडियन ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन और एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं को तो जैसे सांप सूंघ गया है.

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आरके लक्ष्मण वेंटिलेटर पर, हालत गंभीर

पिछले कई दशकों से अपने कार्टून्स के जरिए दुनिया भर को गुदगुदाने वाले जाने-माने कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण की हालत गंभीर है. वो काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. उनका इलाज मुंबई के दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में चल रहा है. उनके शरीर के महत्वपूर्ण अंग निष्क्रिय हो गये हैं. उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है. अस्पताल के भीतर डॉक्टर्स उनका इलाज कर रहे हैं और बाहर उनके शुभ चिंतक और प्रसशंक उनके स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थनाएं कर रहे हैं.

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नौकरी नहीं दी, तो आत्महत्या कर लूंगा…!!!

‘माननीय सर, मुझे उम्मीद है कि मेरे शब्द आपको आहत नहीं करेंगे. आप मेरी स्थिति से भली भांति परिचित हैं. मैं आपको पिछले एक साल से लगातार इसके बारे में बता रहा हूं. आपका मानव संसाधन विभाग आपके कहने पर मेरे बारे में अवश्य विचार करेगा. महोदय मैं और मेरा परिवार भूखे मरने की स्थिति में आ गया है. यदि आपने मुझे नौकरी नहीं दी तो मैं अपने परिवार समेत आत्महत्या कर लूंगा.

अल सुबह मेरे मोबाइल फोन पर आये एक एसएमएस का यह हिंदी तर्जुमा है.

सुबह सुबह इस मैसेज को पढ़कर बहुत गुस्सा आया. ये नौकरी मांगने का कौनसा तरीका है? कल ऐसा न हो कि कोई कनपटी पर पिस्तौल रखकर नौकरी मांगने लगे. भूखे मर जाएंगे, आत्महत्या कर लेंगे लेकिन नौकरी मीडिया में ही करेंगे. क्या हम संकीर्णता के मनोरोग से ग्रसित तो नहीं हो गए हैं जहां हमें एक अदद नौकरी के अलावा जिंदगी जीने का कोई और तरीका नहीं दिखता? ऐसा नहीं कि मैं आजीविका की आवश्यकता और बेरोजगारी की प्रताड़ना से वाकिफ नहीं हूं. एक बार तो अपने एक लेख में किसी चैनल के बंद होने पर मीडिया साथियों के लिए अपनी संवेदनाएं प्रकट करना भी भारी पड़ गया था. एक परम ज्ञानी मित्र ने सार्वजनिक तौर पर लिखा था कि जाके पैर न फटी बिवांई…आगे आप जानते ही हैं. मैंने प्रत्युत्तर दिया कि मेरे पैरों कि बिवाईं की गांरटी आप क्यूं लेते हैं? आप मेरे जीवन से परिचित भी नहीं और मेरे वर्तमान संघर्षों से भी नहीं, फिर क्यूं मेरे दुख को और बढ़ाते हैं. हो सकता है मैं आपके दर्द में अपने दर्द को भी महसूस कर रहा हूं. ये बात और है कि उन्होंने उस वक्त इन बातों को समझा था और उसी सार्वजनिक मंच पर माफी भी मांगी थी.

आज इन बातों को यहां लिखने की आवश्यक्ता इसीलिए महसूस हुई क्यूंकि मीडिया में नौकरी मांगने वाली दो जमातों का एक बड़ा फर्क महसूस हो रहा है. एक जमात वो है जो उम्मीदों से भरी है मीडिया कि चकाचौंध से प्रभावित है और कुछ कर गुजरने के सपने संजोए हुए है. तो एक जमात वो है जो कुछ समय तक मीडिया में काम कर चुकी है, इसकी चुनौतियों और सीमाओं से वाकिफ है और अपने लिए एक सुरक्षित जगह कि तलाश कर रही है.ज्यादातर जगहों पर एक पूरा का पूरा कबीला टेक ओवर करता है और एक पूरा का पूरा कबीला निकाल दिया जाता है. मजदूर वर्ग अप्रभावित सा टुकुर टुकुर ये सब देखता है और अपनी गनीमत भगवान से चाहता रहता है. मीडिया कर्मियों को अपने करियर के विषय में अधिक गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. हमें बदलते वक्त में मीडिया कि सीमाओं के प्रति भी सजग रहना होगा नहीं तो अचानक वो स्थिति हमारे सामने होगी जब मीडिया में नौकरी नहीं होगी और दूसरा काम हमें आता नहीं होगा. फेस बुक पर सैंकड़ों ऐसी धमकी भरी गुजारिशें मेरे मैसेज बॉक्स में पड़ी रहती हैं. एक सज्जन ने तो मुझे एक के बाद एक कई मैसेज किए और जवाब नहीं देने पर प्रश्न पूछा. आप जवाब देना पसंद नहीं करते हैं क्या?

ये प्रश्न भी अनुत्तरित ही रखा तो कुछ दिन बाद उनका मैसेज आया, हद कर दी आपनें? मन में तो मैंने सोचा कि हद मैंने कर दी या आपने, लेकिन फिर उनकी व्यग्रता से अपने चित्त को अछूता ही रखते हुए इस बात का भी जवाब नहीं दिया. दो तीन दिन बाद फिर उनका मैसेज मिला. आप क्या समझेंगे कि संघर्ष क्या होता है. आप तो चांदी कि चम्मच मुंह में लिए पैदा हुए होंगे. ये बात थोड़ी दिल को लगी. हंसी भी आ रही थी. अपने गुजरे दिनों को भी याद कर रहा था. अपने स्कूल जीवन में ही मैंने काम करना शुरू कर दिया था. अपनी आर्थिक परिस्थितियों पर रौशनी डालने का मंच मैं इस लेख को नहीं मानता लेकिन जो थोड़ी जानकारी उस मित्र को दी वो जरूर यहां लिख रहा हूं. मैंने उसे बताया कि मैं 14 वर्ष की उम्र में एक कपड़े की दुकान पर झाड़ू पोछे का काम कर चुका हूं, नमकीन बनाने के कारखाने में काम किया, किराने की दुकानों पर भी बैठा हूं. एक मजदूर का बेटा होने के नाते dignity of labour का पाठ मुझे बहुत छोटी उम्र से पढ़ाया गया.

इन सारे अनुभवों ने मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाया. विदेशों में सेना में सेवाएं देने की अनिवार्य व्यवस्था की जाती है. इसकी वजह है संघर्ष और देश प्रेम को समझना. देशप्रेम का तो नहीं पता लेकिन जीवन जीने का ये संघर्ष हमारे देश में जीवन की शुरूआत से ही ज्यादातर बच्चों को मिल जाता है. संघर्ष की कमी हमारी कमियों को दूर करने के बजाय हमारी निर्भरता को बढ़ाती है और हम अपनी असफलता का जिम्मेदार दूसरों को मानने लगते हैं. अधिकतर मौकों पर बेचारा भाग्य हमारा पंचिंग बैग बन जाता है. अपने इस भाई को मैंने अंत में ये भी समझाया कि मैंने सारे संघर्ष किए लेकिन जिस अंदाज में तुमने नौकरी मांगी, उसकी हिम्मत कभी न हो पाई. उसका कोई जवाब तो मेरे पास नहीं आया लेकिन मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वो इस सुंदर जीवन की शक्ति और संघर्ष के सही मायने समझ पाए.

मीडिया में काम करने वालों की स्थिति बहुत दुखद बनती जा रही है. अखबारों में काम करने वाले तो कई पुराने, अनुभवी और अपने जमाने में पहचान रखने वाले पत्रकार भी बुरी स्थिति में हैं. मैं ये बात इसीलिए कह रहा हूं क्यूंकि ऐसे कई पत्रकारों को भी नौकरी की जरूरत महसूस होती है. नई जमात आती जा रही है पुरानी की कोई व्यवस्था नहीं है. उस पर चैनल के चैनल, अखबार के अखबार बंद हो जाते हैं तो सालों से काम कर रहे पत्रकारों की एक बड़ी जमात सड़क पर आ जाती है. पत्रकार के हुनर भी बहुत सीमित हैं. हल बक्खर तो हांक नहीं सकता. लिख सकता है पढ़ सकता है. इन कामों के लिए भी उसे किसी इस्तेमाल करने वाले की जरूरत होती है. इन पत्रकारीय गुणों को स्वयं धनोपार्जन का तरीका नहीं बना पाते हैं किसी के कार्य में इसकी आवश्यक्ता होती है तो कुछ बात बन जाती है. फिर कॉलेजों में पढ़ाने का विकल्प सूझता है तो पढ़ाना भी मीडिया की पढ़ाई तक सीमित है.

फ्री लांस काम करने वालों कि अपनी इंडस्ट्री होती है उसमें कोई ताजा ताजा बेरोजगार यूं ही जगह नहीं बना पाता है. ये व्यवहारिक समस्याएं इसीलिए बता रहा हूं क्यूंकि पत्रकारों को अपने दायरे का विस्तार करना होगा. या तो राजनैतिक गलियारों में दखल रखने वाले दलालों की जमात है या फिर एक दम मजदूर क्लास का पत्रकार है. इस करियर का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं दिखाई पड़ता. कई बुजुर्ग पत्रकारों को तो अब टेलीविजन पर एक्सपर्ट के तौर पर बैठने का मौका मिल गया. महीने का चैक आ जाता है, अखबारों में आर्टिकल छप जाते हैं, कुछ कार्यक्रमों में सम्मान आदि से भी नाम चर्चा में बना रहता है. लेकिन इस वर्ग में भी बहुत सीमित पत्रकार ही आते हैं.ये कोई ऐसा उद्योग नहीं जिसके उत्पाद के बिना जीवन नहीं चल सकता. खदानें, कृषि क्षेत्र, आइटी इंडस्ट्री, अन्य कई उद्योगों की तरह मीडिया इंडस्ट्री का उत्पाद समाज की अनिवार्य जरूरत नहीं है. न ही मनोरंजन इंडस्ट्री की तरह ही हमारी इंडस्ट्री को लिया जा सकता है, हांलाकि ये बात और है कि ज्यादातर चैनल अब उसी दिशा में दौड़ रहे हैं. इसकी चकाचौंध के साथ इसकी संभावनाओं को भी ठीक से समझना होगा. मैंने इंदौर में बड़ी तादाद में मिलों के बंद होने के बाद कई परिवारों के बेरोजगार होने की विभीषिका को देखा है और महसूस किया है. ये बात में मीडिया छात्रों को हतोत्साहित करने के लिए नहीं लिख रहा बल्कि उन्हें मीडिया में कदम रखने से पहले अच्छी तैयारी करने के मकसद से कह रहा हूं. एक सज्जन मुझे मैसेज भेजते हैं कि मैं नौकरी के लिए आपसे संपर्क नहीं कर रहा हूं, बस एक बेहतर मौका चाहता हूं. इसका मतलब मुझे समझ नहीं आया इसीलिए जस का तस इसे यहां रख दिया है. एक भाई कहते हैं कि उन्होंने वर्तमान काम को पारिवारिक दिक्कतों के चलते छोड़ दिया है और अब वे हमसे जुड़ना चाहते हैं. पता नहीं उनकी पारिवारिक दिक्कतें अब कहां काफूर हो गईं. कई मित्र अपने साधारण और गरीब परिवार का होने का भी हवाला देते हैं.

पहले पहल मीडिया को अपने जीवन का मकसद मानकर कुछ कर गुजरने का जुनून रखने वाले पत्रकारों की हालत कितनी दयनीय हो रही है कि वे बहाने बाजी पर उतर आए हैं. हो सकता है ये बहाने न हों, तो भी क्या मजबूरी का दूसरा नाम पत्रकारिता बना देना जरूरी है? ज्यादातर लोग किसी कंपनी में सैलरी नहीं मिलने को नई नौकरी की जरूरत बताते हैं. वे एक दो नहीं बल्कि छह छह महीने से सैलरी आने या नई नौकरी मिलने का इंतजार कर रहे हैं. मुझ नहीं पता उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन ये जरूर है कि वे जो कर रहे हैं सिर्फ वही रास्ता शेष रह गया हो ऐसा भी नहीं है. कई पत्रकार तो कुंठाग्रस्त होकर दूसरों पर कीचड़ उछालने के अलावा और कोई काम ही नहीं कर रहे हैं. वे नकारात्मकता को बढ़ाने का काम कर रहे हैं. मैं खुद गाहे बगाहे इसका शिकार होता रहता हूं. फिर बहुत सारे ऐसे ही कुंठित लोग मिलकर परनिंदा, परचर्चा में जीवन का आनंद लेने लगते हैं. कुछ देर के लिए तो ये उनकी तकलीफों को भुला देगा लेकिन असली दर्द अंदर पनपता रहेगा. अपनी संभावनाओँ को विकसित करते रहना और अन्य विधाओं का ज्ञान होना बहुत जरूरी है. मैंने अपने करियर के दौरान कई ऐसे मित्रों को भी देखा है जिन्होंने मीडिया छोड़ने के बाद अन्य कई कार्य क्षेत्रों में ज्यादा बेहतर काम किया और वे अपेक्षाकृत सुखद और वैभवपूर्ण जीवन जी रहे हैं. नौकरी मिलना, आगे बढ़ना, पदोन्नति आदि आपके काम का हिस्सा हैं. इनके बिना आपका जीवन नष्ट हो जाएगा या आप कुछ नहीं कर पाएंगे कि धारणा आपके लिए घातक सिद्ध हो सकती है. ये मेरे निजी अनुभव है और जीवन का अनुसंधान सतत जारी है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मैं किसी विषय पर कोई विशेषज्ञ टिप्पणी कर सकता हूं. मैंने अपने मन की बात स्वतंत्रता से लिखी है और स्वतंत्रता से साझा कर रहा हूं. इसे बहस का विषय न बनाएं. कुछ अच्छा लगे तो स्वीकार करें नहीं तो ध्यान नहीं देने की स्वतंत्रता तो पाठक को है ही.

लेखक- डा. प्रवीण तिवारी, लाइव इंडिया मैगजीन एवं प्रजातंत्र लाइव समाचार पत्र के प्रधान संपादक हैं.

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