उपजा फैजाबाद की नयी कार्यकारिणी गठित, कृपा शंकर अध्यक्ष बने

फैजाबाद प्रेस क्लब में उ०प्र० जर्नलिस्ट एसोसिएशन की जिला इकाई के वार्षिक अधिवेशन में नयी समिति का गठन हुआ. अध्यक्ष पद पर सर्वसम्मति से वरिष्ठ पत्रकार कृपाशंकर पाण्डेय और महामंत्री पद के लिए लगातार दूसरी बार कमलेश श्रीवास्तव के नाम पर मुहर लगी. संगठन के सदस्य त्रियुग नारायण तिवारी एवं वीएन दास की देखरेख में हुए चुनाव में रवि मौर्या, रवि प्रकाश पाठक, विकास सिंह को मीडिया प्रभारी, विवेकानन्द पाण्डेय सह मीडिया प्रभारी राम अजोर वर्मा, अबुल बसर, केबी शुक्ला को क्षेत्रीय सचिव का पद सौपा गया. अयोध्या का प्रभार प्रदीप पाठक को तथा केके मिश्रा, केडी दूबे को सोहावल तहसील का प्रभारी बनाया गया. कार्यसामिति के सदस्यों में डा० नरेन्द्र बहादुर सिंह, रामतीरथ विकल, सुरेन्द्र अग्रवाल, राजेन्द्र सोनी, जोखू प्रसाद तिवारी, प्रदीप श्रीवास्तव, जयप्रकाश सिंह, नाथ बक्स सिंह, गणेश दत्त तिवारी आदि की संस्तुति की गयी. इस मौके पर डा. नरेन्द्र बहादुर सिंह, पंकज श्रीवास्तव, बलराम मौर्या, कन्हैया कश्यप, प्रशांत शेखर यादव, अवनीश मिश्र, देवी प्रसाद वर्मा, संदीप सिंह और विक्रम सिंह आदि मौजूद रहे. कार्यक्रम के अन्त में सभी लोगों ने खिचडी़ भोज में शामिल होकर एक दूसरे को बधाई दी.

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ट्रेन में चाय बेचने से लेकर 7 रेसकोर्स तक का सफरः नरेंद्र मोदी- एक शोध

कुलदीप सिंह राघव अपनी पीढी के उभरते लेखक हैं. हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन काल पर एक छोटे-मोटे शोध प्रबंध जैसी एक किताब लिखी है. किताब भारतीय जनता पार्टी और संघ के स्वयं सेवकों में कितनी लोक प्रिय होगी इसका जायजा तब ही हो जाता है जब पूर्व सासंद राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ उसकी समीक्षा खुद लिखते हैं. किताब की समीक्षा कुछ इस तरह हैः- कुलदीप सिंह राघव लिखित नरेंद्र मोदी- एक शोध की उपादेयता के बारे में अपना अभिमत प्रगट करूं इसके पूर्व मेरे लिए यह बता देना आवश्यक है कि सर्वप्रथम 1984 में गुजरात विधानसभा चुनाव के समय एक पत्रकार के रूप में नरेंद्र मोदी से मेरी भारतीय जनता पार्टी के अहमदाबाद कार्यालय में भेंट हुई थी और उन्होंने परिणाम का जो आंकलन पेश किया था, वह एकदम सटीक साबित हुआ। पत्रकारिता और कुछ काल के लिए राजनीतिक सक्रियता के दौरान मुझे नरेंद्र मोदी से बार-बार मिलने का अवसर मिला। मेरा अहमदाबाद साल में कई बार जाना इसलिए होता रहा क्योंकि मेरा आधा परिवार वहीं रहता है। मैंने नरेंद्र मोदी से उनके विभिन्न दायित्व निर्वाहन के दौरान संपर्क की जानकारी देना इसलिए आवश्यक समझा क्योंकि कुलदीप सिंह राघव ने जो शोध किया है, उसकी प्रामाणिकता की पुष्टि कर सकूं। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में 2002 में गुजरात वापसी के साथ ही भयावह भूकंप और हिला देने वाले सांप्रदायिक तांडव की अनेक कोणों से गत डेढ़ दशक में जिस रूप में चर्चा हुई है उससे कुलदीप सिंह राघव द्वारा उदहृत मोदी का यह कथन सार्थक साबित होता है कि ‘आप मुझे पसंद करें या नफरत-मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते।’ नरेंद्र मोदी के परिवार, उनके प्रारंभिक काल से प्रधानमंत्री का दायित्व संभालने तक के घटनाक्रम का सटीक संकलन और आलोचना, समीक्षाओं तथा उनके व्यक्तित्व के आंकलन को संक्षेप में समेट लेना बहुत कठिन है। जो व्यक्ति एक स्टेशन पर बाल्यकाल में पिता के साथ चाय बेचने का काम करता रहा हो वह देश का प्रधानमंत्री कैसे और क्यों बना उसके प्रत्येक पहलू पर सैकड़ों पृष्ठ का ग्रन्थ तैयार हो सकता है फिर भी राघव ने उसे संक्षेप में समेटने का प्रयास किया है। पूरी पांडुलिपि पढ़ने के बाद मुझे ऐसा नहीं लगा कि नरेंद्र मोदी के जीवन का कोई संदर्भ अछूता रह गया है। हां उसका विस्तार जितना हो सकता है, उसका अभाव अवश्य खटने वाला है। मैं शोध के संकलन की संपूर्णता की सराहना किए बिना नहीं रह सकता, विशेषकर इसलिए भी कि राघव ने विपरीत अभिव्यक्तियों की उपेक्षा नहीं की है। भूमिका में कुलदीप सिंह राघव ने जनवरी 2014 से जुलाई 2014 के बीच ‘‘मोदी की जनसभाओं और कई महत्वपूर्ण पहलुओं को संकलित’’ किया है। राघव ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि यह पुस्तक ‘संकलन’ भर है। संभवतः यही कारण हो सकता है कि लेखक ने अपनी ओर से कोई टिप्पणी नहीं की है। जो लोग अति संक्षेप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म, परिवार और उनके सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन के घटनाक्रम का अवलोकन करना चाहते हैं उनके लिए ‘नरेंद्र मोदीः एक शोध’ उपयोगी साबित होगी। मैं कुलदीप सिंह राघव को इसके लिए बधाई देता हूं। मेरी शुभकामना और अपेक्षा है कि इस पुस्तक से पत्रकारिता की युवा पीढ़ी को ‘नित्य शिकार कर खाने की’ परिधि से निकलकर कुछ ठोस योगदान की प्रेरणा मिलेगी।

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बिक्रम मजीठिया को सम्मन भेजने की सजा कोलकाता ट्रांस्फर…!

गठबंधन का फायदा किसी राजनीतिक परिवार को सीखना हो तो उसे पंजाब जाना चाहिए. पंजाब सरकार के हालिया ठेकेदार बादल पिता-पुत्र ने गठबंधन की राजनीति के नफे-नुकसान का बड़ा अच्छा उदाहरण पेश किया है. बताया जा रहा है कि ‘बादलों’ के दबाव में प्रवर्तन निदेशालय ने पंजाब के रेवेन्यु मिनिस्टर बिक्रम मजीठिया पर लगे आरोपों की जांच कर रहे अधिकारी को कोलकाता ट्रांस्फर कर दिया है.

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ड्रग रैकेट में शामिल होने के आरोपों से घिरे अपने रसूखदार रिश्तेदार और सूबे के रेवेन्यु मिनिस्टर बिक्रम सिंह मजीठिया को ईडी के शिकंजे से मुक्त कराना चाहते थे. सो उन्होंने तुरंत दिल्ली दरबार को आगाह किया. गठबंधन की राजनीति का हवाला दिया. आगे आने वाले समय में कोई बवाला न हो इसलिए बिक्रम सिंह की जांच कर रहे ईडी के अधिकारी निरंजन सिंह को हटाने की शर्त रख दी. दिल्ली दरबार को भी कुछ नहीं सूझा निरंजन सिंह को पंजाब से उठा कर कोलकाता फेंक दिया गया. हालांकि कांग्रेस सहित विपक्ष के कई नेता प्रधानमंत्री को शिकायत लिखने और दूध का दूध – पानी का पानी करने की बात कह रहे हैं. लेकिन अब होना क्या है. पंजाब में नशे का धंधा खूब फल-फूल रहा है. और इसमें उन रसूखदारों का नाम रोशन हो रहा है जो लाल बत्तियों की गाडी़ में घूमते हैं और कानून के शिकंजे में आने से बचे रहते हैं. मजीठिया के अलावा ऐसे रसूखदारों में पंजाब के पूर्व जेल मंत्री सरवन सिंह फिल्लौर के बेटे धरमवीर सिंह, शिरोमणी अकाली दल के प्रमुख संसदीय सचिव अविनाश चंदर और कांग्रेस सांसद संतोख चौधरी पर ईडी की निगाहें लगी हुई हैं.

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Major Indian Channels Removed From Chitram TV App

In a major break-through, sending a strong message to organised pirates of content in the digital space, certain members of Indian Broadcasting Foundation (IBF) have succeeded in their efforts to remove their channels from recently launched android and ios applications of ‘Chitram TV’ on Google and Apple play stores.

Chitram TV is an IPTV/OTT service provider which has been illegally broadcasting the signals of the Indian origin channels (MSM (Sony), Zee, Star, Viacom18 and certain other regional Indian television networks which are members of IBF) for quite some time. Recently Chitram TV launched its mobile application on android and ios devices in an attempt to widen its distribution and reach. The broadcasters took up the issue of Chitram’s illegal broadcast and Apple and Google have now removed these channels from their ios and Android platforms.  This is a major victory for the members of IBF in their fight against online piracy.

 These Indian broadcasters, who have joined hands to collectively fight digital piracy, are considering initiating legal proceedings against Chitram TV and other pirate platforms in multiple jurisdictions outside. None of the members of IBF (viz. MSM (Sony), Zee, Star and Viacom18) has authorised Chitram TV to carry their channels on any media platform let alone digital. IBF understands that Chitram TV continues to distribute the Indian channels via IPTV/OTT particularly outside India. IBF members have buckled up to fight the pirates like Chitram TV to preserve the integrity of their channels and content.

With the rapid advent of technology enabling the dissemination of content across digital platforms, there are enormous revenue opportunities for broadcasters and other content owners. The Indian channels which are available in more than 100 countries around the world are extremely popular amongst the South Asian diaspora.  All of these channels have launched their own digital platforms and mobile apps but piracy has been a major stumbling block in revenue monetisation. Isolated efforts of the broadcasters could have achieved little. Now that the Indian broadcasters stand united in their fight against digital piracy, their efforts will provide a greater impetus in the global effort to combat digital piracy.

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सिल्वर स्क्रीन पर अब ‘मंडल’ की कहानी

देश में जब जातिगत राजनीति अपने चरम पर है तब निर्देशक सागर सहाय अपनी फीचर फिल्म ‘मंडल’ लेकर आ रहे हैं. जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि, ‘मंडल’ भारत में जाति आधारित आरक्षण की विवादास्पद नीति पर एक सामाजिक-राजनीतिक फिल्म है.

फिल्म के निर्देशक सागर सहाय का कहना है कि फिल्म ‘मंडल’ के जरिए वे आरक्षण को लेकर किसी विवाद को जन्म नहीं देना चाहते, बल्कि ठीक इसके उलट फिल्म की कहानी सकारात्मक और वर्तमान समय में भारत की एक वास्तविक आवश्यकता को दर्शाती है.

दिल्ली के सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में 15 जनवरी को हुए एक समारोह में ‘मंडल’ का ‘पोस्टर’ और फिल्म के एक गीत का ऑडियो भी लॉन्च किया गया. समारोह में विवादास्पद फिल्म ‘पीके’ में ‘धर्मगुरु’ का किरदार निभाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता सौरभ शुक्ला मुख्य अतिथि थे. उनके अलावा मंडल के संगीत निर्देशक-निखिल कामथ, संदीप मारवाह, अस्मिता थिएटर ग्रुप के निदेशक-अरविन्द गौड़, संस्थापक व कैरियर लांचर के अध्यक्ष-सत्यनारायणन और अभिनेता अतुल श्रीवास्तव आदि ने समारोह में शिरकत की.

मंडल की कहानी सागर सहाय ने लिखी है और उन्हीं का निर्देशन भी है  लिखित और निर्देशित, और राम सुमेर व राजीव रोशन के द्वारा निर्मित की जा रही है।

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माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में मनायी गयी विवेकानन्द की जयंती

भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में स्वामी विवेकानन्द की जयंती को युवा दिवस के रूप मनाया गया. इस अवसर पर अमरीका से आए डॉ. सुदेश अग्रवाल ने वैज्ञानिकों को विज्ञान की भाषा में अध्यात्म सिखाने की बीड़ा स्वामी विवेकानंद ने ही उठाया था.

वैज्ञानिकों को उनकी ही भाषा में अध्यात्म सिखाने के लिए विवेकानंद अमरीका गए और प्रसिद्ध वैज्ञानिक निकोल टेसला और थॉमस एल्वा एडिसन सहित अन्य वैज्ञानिकों से संवाद किया. डॉ. अग्रवाल ने कहा कि आज अमरीका में भारतीयता का क्या प्रभाव स्वामी विवेकानन्द के प्रयासों से ही है. दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों पर स्वामी विवेकानंद छाप साफ दिखाई देती है. उन्होंने बताया कि अमरीका का सबसे धनी व्यक्ति रॉकर फेलर सामाजिक कार्यों में रूचि नहीं लेता था लेकिन स्वामी विवेकानन्द के संपर्क में आने के बाद उसने विभिन्न सामाज सेवा और शिक्षा संस्थानों की स्थापना की. मार्थिन लूथर किंग  ने भी स्वामी विवेकानन्द को अपनी प्रेरणा का स्रोत बताया था. कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने और संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया.

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पत्रकारों की खुद लिखी किताबों का पीसीआई में मेला

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पहली बार तीन दिवसीय पुस्तक मेले का शुभारंभ हुआ। रविवार तक चलने वाले इस आयोजन में शिल्पायन, राजकमल, भारतीय ज्ञानपीठ, वाणी प्रकाशन, पेंग्विन, नेशनल बुक ट्रस्ट, साहित्य अकादमी, सुरेंद्र कुमार एंड संस, राजपाल एंड संस आदि प्रमुख प्रकाशनों ने हिस्सा लिया।

रविवार तक चलने वाले इस आयोजन के बारे में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की संयुक्त सचिव विनिता यादव ने बताया कि प्रेस क्लब के इतिहास में पहली बार इस तरह के पुस्तक मेले का आयोजन किया गया है। इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य पत्रकारों की स्वंय की लिखी पुस्तकों की जानकारी पत्रकारों को देना है। क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि पत्रकारों द्वारा लिखी गई पुस्तक का प्रचार-प्रसार कम होता है। ऐसे में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पत्रकारों की लिखी गई पुस्तकों को बढ़ावा देना चाहता है। पुस्तक मेले के पहले दिन बड़ी संख्या में पत्रकारों और पाठकों ने हिस्सा लिया।

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उपजा ने मांगा पीजीआई में फ्री इलाज तो एआईआरए बोली मत करो बिरादरी के टुकड़े, स्टिंगरों को भी देखो

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविंद शुक्ला के एक पत्र से पत्रकार बिरादरी में असंतोष फैल रहा है. ऑल इंडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन (एआईआरए) के महामंत्री एमके त्रिपाठी का कहना है कि अरविंद शुक्ला पत्रकारों के परिजनों को स्वास्थ्य एंव चिकित्सा सुविधा दिलाए जाने के नाम पर पत्रकारों को बड़ा-छोटा या अगड़ा-पिछडा जैसे वर्गों में विभाजित कर रहे हैं.

एआईआरए के महामंत्री एमके त्रिपाठी ने सभी पत्रकार यूनियनों और राज्य सरकार से आग्रह किया है कि पत्रकारों या उनके परिजनों को जो भी सुविधाएं दी जाएं वो सभी पत्रकारों को एक समान और एक साथ दी जाएं. राज्य और जिला स्तर या डेस्क या फील्ड नाम पर पत्रकरों को न बांटा जाए. एमके त्रिपाठी ने मीडिया के सभी संगठनों और सरकार से भी आग्रह किया है कि अखबारों और टीवी चैनलों के लिए बेगार की तरह काम करने वाले संवादसूत्रों, स्टिंगरों व उनके परिजनों के लिए भी रेगुलर पत्रकारों की तरह सभी सुविधाएं मुहैया करायी जायें. उन्होंने संवादसूत्रों और स्टिंगरों के आर्थिक शोषण की तरफ भी सरकार का ध्यान आकर्षित किया है. गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविंद शुक्ला ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को एक पत्र लिख कर पहले चरण में राज्य स्तरीय पत्रकारों के परिजनों को भी संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ तथा लोहिया इंस्टीट्यूट में निःशुल्क स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाओं की मांग की है. अरविंद शुक्ला ने दूसरे चरण में जिला स्तरीय मान्यता प्राप्त पत्रकारों को यही सुविधा देने और सबसे बाद में डेस्क पर कार्यरत पत्रकारों का जिक्र किया है. ऑल इंडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन के महामंत्री का सुझाव है कि राज्य, जिला, फील्ड और डेस्क के नाम से विभाजन से पत्रकारों में परस्पर द्वेष और हीन भावना पैदा न की जाये.

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अब वाड्रा के हंटर पर डांस करेंगे बड़का टीवी संपदक !!

खबर आ रही है कि नवीन जिंदल की तर्ज पर कोई वाड्रा भी चैनल ला रहे हैं. मीडियी की शतरंज में नवीन जिंदल तो सीधे मीडिया में कूदे थे लेकिन वाड्रा एक मोहरे को आगे रख कर आगे बढ. रहे हैं. खबर सही मानने की कई वजह बतायी जा रही हैं. कौन सी वजह सही है यह राबर्ट वाड्रा ही जानें लेकिन एक सबसे प्रमुख वजह पीसीआईएल और वाड्रा की कंपनियों के बीच कोई बड़ा लेन-देन बताया जा रहा है. पीसीआईएल की तरफ से किसी भी वाड्रा के नाम पर चुप्पी साधी हुई है. मीडिया और पॉलिटीशियंस में चल रही कानाफूसी के मुताबिक पीसीआईएल पर वाड्रा की रिएल इस्टेट कंपनी का कई सौ करोड़ वकाया है. जब से सेबी ने पीसीआईएल पर शिकंजा कसा है और लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का हिसाब-किताब मांगा है तब से वाड्रा की कंपनी पीसीआईएल से अपना पैसा वापस मांग रही है. दिल्ली के करीबी सूबों की सरकारों से त्रस्त वाड्रा के हाथ भी खिंचे-खिंचे चल रहे हैं. पीसीआईएल ने वाड्रा की कंपनी के सामने प्रस्ताव रखा कि न्यूज चैनल और उसकी संपत्तियों के अधिग्रहण के जरिए बकाया रकम का निपटारा कर लिया जाए. बताते हैं कि वाड्रा कि कंपनी ने कुछ शर्तों के साथ पीसीआईएल का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. वाड्रा अगर खुद सामने आकर यह सौदा करते तो उन्हें ढेर सारे किस्से-कहानियां शुरु हो जाने का डर था. इसलिए उन्होंने एक कांग्रेसी नेता को मोहरे की तरह आगे कर दिया. यह कांग्रेसी नेता वही बताए जाते हैं जो वाड्रा की पत्नी को बार-बार सक्रिय राजनीति में लाने के लिए टिटेहरी प्रयास करते रहे हैं. ऐसा माना जा रहा है कि नवीन जिंदल की तरह इस पी 7 चैनल के इस नये प्रबंधन के निशाने पर भी कुछ मीडिया के दिग्गज और बड़े मीडिया हाउस ही रहने वाले हैं. अगर ये सारी कानाफूसियां सहीं है तो वाड्रा पर्दे के पीछे बैठ कर खेल करेंगे. मीडिया कर्मियों को अपनी उंगलियों पर नचाएंगे. विरोधियों के खिलाफ खबरें प्लांट करवाएंगे. एक-एक से चुन-चुन कर बदला लेंगे. हालांकि कानाफूसी करने वाले यह भी कहते हैं कि वाड्रा भले ही नवीन जिंदल से एक कदम आगे चलने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन हस्र उनका भी नवीन जिंदल और फोकस जैसा ही रहेगा. फोकस को री-लॉंच करने के बाद नवीन जिंदल को सामाजिक, राजनीतिक-आर्थिक या व्यक्तिगत स्तर पर भी कोई लाभ नहीं हुआ है. फोकस का फोकस डीफोकस होकर रह गया. कोल ब्लाक मामले में किरकिरी हो रही है. नवीन जिंदल हरियाणा के चुनाव में अपनी मां को भी फायदा नहीं दिला सके. मीडिया इंडस्ट्री में भी फोकस को आज तक न तो सम्मान दिला पाये और न  टीआरपी में ही जगह हासिल कर पाये. मीडिया इंडस्ट्री में नवीन जिंदल की नाकामी की कहानी कहने वाले बताते हैं कि वाड्रा ने न्यूज चैनल में प्लानिंग की जिम्मेदारी किसी कनिष्का को सौंपी है. न्यूज कंटेट क्या होना चाहिए और उसका टेलिकास्ट टाइम क्या रहेगा. यह सब कनिष्का ही तय करेंगे लेकिन वाड्रा की तरह वो भी कभी सामने नहीं आएंगे. चैनल के संपादक और पत्रकार कठपुतली की तरह वैसा ही डांस करेंगे जैसा कनिष्का की मर्जी होगी. अब तो समय ही बताएगा कि ये सारी कानाफूसियां कितनी सही हैं और ऊंट किस करवट बैठने वाला है.

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एनडीटीवी इंडिया अब साउथ अफ्रीका में भी

एनडीटीवी भले ही हिन्दुस्तानी दर्शकों के बीच अच्छी पैठ न बना पाया हो इसके बावजूद उसने साउथ अफ्रीका में दो चैनलों को अफ्रीकन केबल टेलीविजन नेटवर्क पर ऑन एयर कर दिया है। यह दोनों चैनल एनडीटीवी इंडिया और एनडीटीवी प्रोफिट प्राइम शामिल है। अफ्रीकन केबल टेलीविजन नेटवर्क का खास तौर पर खासा दबदबा है। माना जा रहा है एनडीटीवी समूह दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीय और भारतीय मूल के दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है। ये भी समझा जा रहा है कि दक्षिण अफ्रीकी बाजार में जाने के बाद एनडीटीवी समूह की शेयर पूंजी में सुधार आ सकता है।

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अरुण अग्रवाल आईटीवी लौटे, प्रदीप परमेश्वरन बने डेन के सीईओ

कुछ समय तक एनडीटीवी के साथ रहने और ओवरसीज प्रोजेक्ट पूरे करने के बाद अरुण अग्रवाल फिर से कार्तिक शर्मा के आईटीवी नेटवर्क के साथ जुड़ गये हैं. अरुण पहले भी आईटीवी नेटवर्क में सीएफओ के पद पर कार्यरत थे। कार्तिक शर्मा उन्हें फिर से उसी जिम्मेदारी पर लेकर आये हैं. अरुण अग्रवाल जी मीडिया समूह में भी लंबे समय तक कार्य कर चुके हैं। आईटीवी नेटवर्क में अरुण अग्रावल के शामिल होने की खबर दिसम्बर में ही थी। नये साल में उन्होंने जिम्मदारियों को फिर से संभाल लिया है। इसके अलावा मैक केनजी के पूर्व पार्टनर प्रदीप परमेश्वरन ने डेन नेटवर्क ज्वाइन कर लिया है।

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ज्वलंत स्वरूप बने साकाल मीडिया समूह के सीईओ

ओशो याना कंसलटेंट्स के सीईओ ज्वलंत स्वरूप ने साकाल मीडिया समूह ज्वाइन कर लिया है. वे यहां भी सीईओ बनाये गये हैं और साकाल के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया को देखेंगे. ज्वलंत स्वरूप को मीडिया का काफी लंबा अनुभव है. वो महाराष्ट्र के मीडिया समूह लोकमत से लगभग 20 साल तक जुड़े  रहने के बाद 2012 में अलग हुए थे. ऐसी खबरें रहीं है कि साकाल मीडिया समूह का शरद पवार परिवार से संबंध है. ज्वलंत स्वरूप के सीईओ बनने के बाद कयास लगाये जा रहे हैं कि साकाल समूह अपने बंद पड़े कुछ प्रोजेक्ट्स को नये सिरे से शुरु कर सकता है.साकाल समूह ने कुछ समय पहले दिल्ली से भी एक राष्ट्रीय हिंदी चैनल शुरु करने का प्रयास किया था. 

 

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मोदी नाखुश, सुषमा कैंप पर आरोप- मीडिया तक पहुंचाया नये विदेश सचिव की नियुक्ति का मामला !!!

भारत की सत्ता के साउथ ब्लाक में कानाफूसी है कि मोदी अपनी विदेश मंत्री सुषमा से नाराज़ है. उनकी नाराजगी नये विदेश सचिव की नियुक्ति पर उठे सवालों को मीडिया तक पहुंचाने पर है. मोदी और उनके सलाहकार चाहते हैं कि विदेश सचिव के पद पर सुब्रहमण्यम जयशंकर को नियुक्त किया जाये.

सुब्रहमण्यम जय शंकर फिल्हाल अमरीका में भारतीय राजदूत हैं. पीएमओ ने जैसे ही मौजूदा विदेश सचिव सुजाता सिंह को हटाय जाने के संकेत दिये तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सुजाता सिंह के पाले में खड़ी दिखायी दीं. उन्होंने अपने विभाग के कुछ अधिकारियों के सामने यह कहा कि सुजाता सिंह बेहतर काम कर रहीं हैं और अभी उनके कार्यकाल में आठ महीने भी बाकी हैं. सुषमा ने डिप्लोमेटिक चैनल से अपनी मंशा पीएमओ तक पहुंचा दी. सुषमा को उसी चैनल से वापस जवाब मिला कि सुब्रहमण्यम जयशंकर अमरीका से पहले सिंगापुर और चीन में भारत के राजदूत रह चुके हैं. उनका अनुभव प्रधानमंत्री की ‘लुक ईस्ट’ पॉलिसी को क्रियान्वित करने में जादा काम आएगा.

यह भी कहा जा रहा है कि  सुब्रहमण्यम जयशंकर अपने अनुभव से ईस्ट-वेस्ट में बेहतर संतुलन बना सकेंगे. सुषमा स्वराज ने इसके बावजूद विदेशों में अब तक भारत की छवि और अपनी प्रतिष्ठा का हवाला दिया. इस पर उनको बताया गया कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार भी सुब्रहमण्यम जयशंकर को विदेश सचिव बनाना चाहती थी लेकिन तत्कालीन दो वरिष्ठ कांग्रेसियों के दबाव के चलते सुजाता सिंह को विदेश सचिव बनाया गया था. अब समय और हालात को देखते हुए सुब्रहमण्यम जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त करना उचित होगा. गौरतलब है कि सुजाता सिंह उसी पूर्व आईबी निदेशक टीवी राजेश्वर की बेटी हैं. जिन पर कांग्रेस हमेशा रहती थी. मोदी की पूर्ववर्ती यूपीए सरकार भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सुब्रहमण्यम जयशंकर को भी दो साल का सेवा विस्तार दे चुकी है. बहरहाल, नये विदेश सचिव की नियुक्ति पर पीएमओ और विदेश मंत्रालय के बीच कहासुनी और कानाफूसी का दौर जारी है.

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सुनंदा हत्याकांड : मीडिया के कुछ वरिष्ठ लोग कर रहे हैं संदिग्ध को बचाने की लायजनिंग!

कानाफूसी चौकाने वाली है. सुनंदा पुष्कर की हत्या के कथित संदिग्धों में से एक की लायजनिंग इंडियन मीडिया के बडे ‘शर्माज़’ ने शुरू कर दी है. इनमें से ‘एक शर्मा’ पहले कांग्रेसी नेता शशि थरूर को मोदी कैंप के नजदीक लाने की कोशिश कर चुके हैं. बताया गया है कि इन ‘शर्माज़’  का प्रयास कथित संदिग्ध को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से बचाने और सत्ता पक्ष की रहमदिली और नरमदिली का फायदा दिलाने की है.

भारत की सत्ता और सरकार की धुरी से काफी नज़दीकी रखने वाले मीडिया के ‘शर्माज़’ ने कथित प्रथम दृष्टया संदिग्ध को नसीहत दी है कि एक्सट्रीम एडवर्स सिचुएशन्स (गंभीर विपरीत परिस्थितियों) में अपना आपा न खोयें. मीडिया से भागे नहीं और सभी सवालों का पूरी शालीनता से जबाब दे. इस बीच सुनंदा पुष्कर के भाई अशोक पुष्कर के ताजा बयान से सुनंदा पुष्कर के पति कांग्रेसी नेता शशि थरूर की भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं. अशोक पुष्कर ने टीवी चैनलों पर लाइव बोला है कि सुनंदा पुष्कर की हिफाजत की जिम्मेदारी शशि थरूर की ही थी. अशोक ने कहा है कि सुनंदा पुष्कर को खतरा उसी समय पैदा हो गया था जब उसने कहा था कि वह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली है.

सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय मौत पर अशोक पुष्कर चाहे जो कहें, उसकी जांच तो पुलिस करेगी लेकिन सवाल तो यह उठता है कि मीडिया के ‘शर्माज़’ को अपने संबंधों का उपयोग एक बहुचर्चित रहस्यमय मौत के कथित संदिग्ध को बचाने लिए करना चाहिए. बहरहाल खबर आगे की यह है कि सत्ता और सरकार ने अपने अनौपचारिक लायजनर ‘शर्माज़’ को दक्षिण को सुधारने में मदद के लिए आग्रह किया था. सत्ता सरकार के आग्रह पर अमल के आसार भी जगजाहिर हुए थे. कहा जा रहा है कि इस वक्त मौका भी है और दस्तूर भी. अगर ‘दक्षिण’ में मुकम्मल मदद का मसौदा परवान चढ़ जाता है तो सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय मौत के कथित प्रथम दृष्टया संदिग्ध को ‘कुछ चक्कर’ चला कर क्लीन चिट दिला दी जाएगी.

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दिल्ली पुलिस को मुहब्बत… वो भी झुग्गियों और कूड़ा बीनने वालों से ?

लगता है कि दिल्ली में फुटपाथिये, कूड़ा बीनने वाले और झु्ग्गियों में रहने वालों के दिन जरूर फिर गये हैं. दिल्ली पुलिस को झुग्गियों और कूड़ा बीनने वालों से मुहब्बत हो गयी है.  हालांकि ये चार दिन की चांदनी जैसी बात हो सकती है फिर भी फुटपाथिये, कूड़ा बीनने वाले और झुग्गियों में रहने वाले आजकल दिल्ली पुलिस के माई-बाप बने हुए हैं. दिल्ली पुलिस के सामान्य सिपाही से लेकर आला अफसर तक झुग्गी वालों के पास पहुंच रहे हैं. उनकी मान-मनुहार कर रहे हैं. दिल्ली पुलिस इन सभी का दिल जीत लेना चाहती है.

दिल्ली पुलिस उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद साथी बनाना चाहती है. यह सारी कवायद भारत सरकार के गृहमंत्रालय के निर्देश पर हो रही है. दिल्ली पुलिस को प्रेमभाव के साथ झुग्गीवालों, कूडा़ बीनने वालों के बीच देख कर सवाल खड़े होना बाजिब है. सामान्य परिस्थितियों में लोगों से सीधे मुंह बात न करने वाले पुलिस वाले क्या भाजपा के एजेंट बन गये हैं क्या ? क्या राजनाथ सिंह ने मोदी का दिल जीतने के लिए झुग्गी वालों के वोट बटोरने का जिम्मा दिल्ली पुलिस को सोंप दिया है…? तफ्तीश करने पर पता चला कि दोयम दर्जे का नागरिक जैसा जीवन जीने वालों की मिजाजपुर्सी की बजह अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत विजिट है. आतंकियों ने ओबाम की विजिट के दौरान धमाकों की धमकी दी है. इन धमकियों से दिल्ली पुलिस की सांस फूल गयी है. इसी बजह से अब वो फुटपाथिये, कूड़ा बीनने वाले और झु्ग्गी वालों की शरण में है.  फुटपाथिये, कूड़ा बीनने वाले और झु्ग्गी वालों का दिल जीत कर दिल्ली पुलिस उन्हें खास ट्रेनिंग देने जा रही है. अब कम से कम जब तक अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आकर वापस अमरीका  नहीं चले जाते तब तक तो इन फुटपाथिये, कूड़ा बीनने वाले और झु्ग्गी वालों की मौज ही मौज है. कूडा़ बेचकर होने वाली कमाई के अलावा दिल्ली पुलिस से दिहा़ड़ी भी जो मिलने वाली है.

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जी़ मीडिया को मिलेगा मोदी का भोंपू बजाने का ‘मीठा’ फल

लोक सभा और हाल ही में हुए विधान सभा चुनावों में मोदी का भोंपू बजाने का मीठा फल  जी मीडिया कार्पोरेशन को मिलने जा रहा है. हरियाणा के विधानसभा चुनाव में तो जी मीडिया कार्पोरेशन के चेयरमेन सुभाष चन्द्रा ने तो भजपा की चुनावी रैलियों में भी हिस्सा लिया था.

भाजपा के लिए बाकायादा कैंपेन किया था. सुना जा रहा है कि चुनावी सेवाओं के बदले जी मीडिया कार्पोरेशन को सेबी शेयर मार्केट से 200 करोड़ रुपये उगाहने की मंजूरी देने जा रहा है. ‘गंभीर मंदी’ के दौर से जूझ रहे जी मीडिया कार्पोरेशन को सेबी की मंजूरी संजीवनी का काम करेगी. ऐसा भी बताया जाता है कि जी मीडिया कार्पोरेशन इस पूंजी को विदेशों में लंबित मीडिया प्रोजेक्ट्स में लगायेगा. जो भी हो, देश में न सही विदेश में सही कुछ देसी मीडिया कर्मियों के दिन अच्छे आ सकते हैं. बहरहाल, वित्त मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी से फोन कॉल आ जाने के बाद जी मीडिया के चेयरमेन सुभाष चंद्रा खुश नजर आ रहे हैं. उन्होंने अपने सिपहसालारों को नये प्रोजेक्ट्स शुरु करने के लिए कमर कस लेने का हुक्म दे दिया है. सुभाष चंद्रा के नेतृत्व में जी मीडिया खुद को देश सबसे बडा़ मीडिया ग्रुप होने के खुद ही डंके बजाता आ रहा है, लेकिन दर्शकों के दिलो दीमाग में अभी तक नम्बर चार से आगे नहीं बढ. पाया है.

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संकिसा स्तूप के संबंध में झूठी और भ्रामक खबरें प्रकाशित करता है दैनिक जागरण, बुद्ध के अनुयायियों में रोष

फर्रूखाबाद। विश्व विख्यात कहे जाने वाले दैनिक जागरण, कानपुर के समाचार पत्र ने झूठी खबर प्रकाशित कर विश्व गुरू भगवान बुद्ध व उनके समर्थकों का घोर अपमान किया है। इससे बौद्धों में जबरदस्त रोष व्याप्त हो गया है। झूठी खबर का खंडन प्रकाशित न करने पर बौद्धों ने दैनिक जागरण के विरूद्ध मानहानि का मुकदमा दायर करने की रणनीति बनाई है। संकिसा मुक्ति संघर्ष समिति के संयोजक कामरेड कर्मवीर शाक्य ने दैनिक जागरण में प्रकाशित झूठी खबरों पर नाराजगी जाहिर करते हुये बताया कि आगाह करने के बाबजूद भी दैनिक जागरण ने बीते दिनों संकिसा महोत्सव सम्बंधी समाचार में भगवान बुद्ध के स्तूप को टीला एवं स्तूप परिसर में सम्राट अशोक महान के द्वारा निर्मित कराये गये राष्ट्रीय चिन्ह स्तम्भ को हाथी मंदिर बताया है।

शाक्य ने आरोप लगाया कि सनातन धर्म की कट्टर मानसिकता वाले स्थानीय पत्रकार अपने धर्म के लोगों को खुश करने एवं बौद्धों को अपमानित करने के लिये जानबूझ कर फर्जी खबर छापते हैं। दैनिक जागरण ने संकिसा प्रकरण के मामले में कभी भी निष्पक्ष समाचार का प्रकाशन नहीं किया। संकिसा स्तूप परिसर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के अधीन है। संकिसा परिसर में पुरातत्व विभाग के कई बोर्ड भी लगे हैं। पुरातत्व विभाग ने स्तूप का जीर्णोद्वार परिसर की सुरक्षा के लिये बाउंड्री का निर्माण करवाकर आगरा निवासी जैनुद्धीन चैकीदार को तैनात किया है। तहसीलदार की रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि भगवान बुद्ध स्तूप पर संकिसा गांव के कुछ गुंडो ने 2003 से पूर्व कथित विसारी देवी मंदिर का निर्माण कराया है।

हिन्दू धर्म में कही भी विसारी देवी का उल्लेख नहीं है और न ही किवदंतियां प्रकाश में आई है। रूपयों की कमाई करने के लिये विसारी देवी के मेले का भी आयोजन किया जाता है। कथित विसारी देवी मंदिर की ओर से शिव मंदिर रानीघाट फतेहगढ़ के दंडा स्वामी परमानंद सरस्वती ने वर्ष 1994 में सिविल जज की अदालत में पुरातत्व विभाग दिल्ली के महानिदेशक, जिलाधिकारी फर्रूखाबाद, कामरेड कर्मवीर शाक्य, डॉ. मुंशीलाल शाक्य आदि के विरूद्ध मुकदमा नम्बर 572 दायर किया था। अदालत ने इस मुकदमें में स्थगन आदेश जारी कर दिया था। जिसको खारिज किये जाने पर अपर जिला जज की अदालत में रिवीजन संख्या 55/12 दायर की गई।

न्यायाधीश महेन्द्र प्रताप चैधरी ने 4 जनवरी 2013 को पुनरीक्षण वाद को व्यय सहित निरस्त कर दिया है। दैनिक जागरण ने स्टे के साथ ही उसकी अपील खारिज हो जाने का भी समाचार प्रकाशित नहीं किया। जिससे आम जनता को पता चल सके कि संकिसा की सच्चाई क्या है। दैनिक जागरण ने महोत्सव के दौरान अशोक स्तम्भ की गैरजानकार बौद्ध समर्थकों से पूजा के नाम पर रूपये चढ़वा कर लूटने बाले वेदप्रकाश गिरी को पुजारी दर्शा कर भी झूठा समाचार प्रकाशित किया है। स्तूप परिसर में किसी भी सनातन धर्मी को पूजा कराने का अधिकार नहीं है। दैनिक जागरण ने महोत्सव के दिन ही संकिसा गांव से गुजरने के दौरान एटा गंजडुडवारा के बौद्ध समर्थक पूर्व सैनिक युद्धिस्टर शाक्य व उनके शिक्षक पुत्र पंकज कुमार की  पिटाई के दौरान लूटे गये मोबाइल व नगदी का भी समाचार में उल्लेख नहीं किया।

बौद्ध समर्थको ने दैनिक जागरण के सम्पादकीय निदेशक महेन्द्र मोहन एवं प्रधान सम्पादक संजय गुप्त तथा उत्तर प्रदेश के सम्पादक दिलीप अवस्थी को राय दी है कि वह झूठे प्रकाशित किये गये समाचारों का निष्पक्षता के साथ जांच कराकर उसका खण्डन प्रकाशित करवायें। ताकि दैनिक जागरण की साख के साथ ही भगवान बुद्ध व उनके समर्थको का मनोबल बरकरार रहे।

 

आनंदभान शाक्य। 

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विचारों को स्थाई रूप देते-देते एक आईपीएस अफसर बन गया साहित्यकार

वरिष्ठ आपीएस अधिकारी सतीश शुक्ल की एक और कृति बाजार में आई है। दो दर्जन छोटी छोटी कहानियों के संग्रह के साथ ‘लड़की जीत गई’ नाम से उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में पहली बार कदम रखा। इसके ठीक एक साल बाद ‘इत्ती सी बात’ नाम का एक लघु उपन्यास हाल ही में प्रकाशित हुआ है। पिछली बार से सबक लेते हुए इस बार उनकी कृति को पढ़कर यह नहीं लगता कि पुलिस की व्यस्त नौकरी करने वाला एक अधिकारी इस तरह का साहित्य सृजन कर सकता है। ‘इत्ती सी बात’ से सतीश शुक्ल ने खुद को मंझे हुए कलमची की फेहरिस्त में शामिल कर लिया है। उपन्यास में उन्होंने गहराई में उतरकर दो दोस्तों के बीच की मुक़दमेबाजी का खूबसूरत अंदाज में वर्णन किया है।

हिन्दी व उर्दू के शब्दों का सामन्जस्य अच्छा है। कहीं कहीं पर मुहाबरों का प्रयोग भी बेहतर ढंग से किया गया है। दरअसल ‘इत्ती सी बात’ दो पड़ोसियों की घटनाओं की किस्सागोई है। मामूली सी बात पर लम्बी मुक़दमेबाजी पर ही पूरा उपन्यास आधारित है। इस बीच एक कन्या का प्रवेश एक नया मोड़ लेता है। इसमें कन्या को बोझ समझने जैसी बीमार मानसिकता पर भी प्रहार किया गया है। अंत तक पाठकों की जिज्ञासा बनी रहती है। ग्रामीण जीवन शैली के विविध रंगों को ‘इत्ती सी बात’ के माध्यम से सामने लाने का बेहतर प्रयास कहा जा सकता है। पूरा उपन्यास सत्ताइस अध्यायों में बंटा है। काफी अर्से बाद ग्रामीण परिवेश को शब्दों से गूंथा गया है।

रिक्शा चालक से पुलिस अधिकारी और अब साहित्यकार के रूप में सतीश शुक्ल का अब तक सफर बेहद उतार चढ़ाव वाला रहा है। हालांकि बचपन से ही वो पढ़ाई के प्रति संजीदा रहे हैं। हाईस्कूल से ही मेधावी छात्रों में रहे शुक्ल ने उच्च कक्षाओं में भी अपना सिक्का बनाये रखा। बी.एच.यू. जैसे संस्थान से स्नात्कोत्तर उपाधि करने के बाद उन्होंने एफ.आर.आई. से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया और वन सेवा में अधिकारी वन गये। यहां कुछ समय नौकरी करने के बाद वो उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में चयनित होकर प्रांतीय पुलिस सेवा का अंग बने। राज्य बनने के बाद उन्होंने उत्तराखंड में सेवा करने का मन बनाया। वर्तमान में पुलिस मुख्यालय में पुलिस उपमहानिरीक्षक पद पर कार्यरत हैं।

डीआईजी से सतीश शुक्ल से जब पूछा गया कि पुलिस की व्यस्ततम नौकरी के बीच आप साहित्य सृजन के लिए कैसे समय निकालते हैं तो उनका कहना है कि दोनों ही काम बिल्कुल अलग-अलग हैं। यह बात कांच की तरह साफ है कि पुलिस की भागामभाग की नौकरी के बीच में समय निकालना आसान काम नहीं था, फिर भी मुझे सेवाकाल में जब कभी भी मौका मिला तो मैने छोटी छोटी कहानियां लिखना शुरू कर दिया। देखते ही देखते 20-25 कहानियां तैयार हो गई और ‘लड़की जीत गई’ इसकी बानगी आपके सामने है। सतीश बताते हैं कि अध्ययन के दौरान ही मैं साहित्यक व अन्य पाठयेत्तर गतिविधियों में भाग लेता रहा। ऑल इंडिया रेडियो में सक्रिय भाग लिया। गोरखपुर में बाल सखा कार्यक्रम में वार्ताओं का प्रस्तुतीकरण किया। उम्र के इस पड़ाव में अनुभव किया कि विचारों को स्थाई रूप देने के लिए लेखन से सुदंर अन्य कोई कार्य नहीं है।

कुल मिलाकर साहित्य की यात्रा के प्रथम चरण में पुलिस अधिकारी सतीश शुक्ल का अब तक का सफर उपलब्धियों से भरा रहा है। हालांकि अब तक उनका एक कहानी संग्रह ‘लड़की जीत गई’ और एक उपन्यास ‘इत्ती सी बात’ प्रकाशित हुये हैं लेकिन दोनों ही कृतियों को खासा रिस्पोन्स मिला है। सृजन के अगले पड़ाव में बहुत जल्द ही एक कथा संग्रह प्रकाशन की प्रतीक्षा में है। इसके अलावा एक वृहद उपन्यास दो खण्डों को लिखा जा चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पुलिस सेवा की सफलता के बाद सतीश शुक्ल साहित्य की सेवा भी उसी कर्मठता व ईमानदारी के साथ करेंगे।

 

बृजेश सती/देहरादून
9412032437

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अमर उजाला के ब्यूरो चीफ को अंग्रजी से बहुत प्यार हैं इसलिए हिन्दी लेखों में अंग्रेजी हेडिंग घुसेड़ देते हैं

आठ अक्टूबर को हिन्दी के प्रमुख स्तंभकार और साहित्य मनीषी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की जयंती थी। आचार्य शुक्ल हिन्दी के कवि थे। उनका ज्यादातर जीवन मीरजापुर जिले में बीता। यहां पर उनका पैतृक आवास भी है जहां पर उनके पौत्र रहते है। पर यहां चिंता की बात बड़े अखबार के बड़े पत्रकारों के लेखनी की है। जो हिन्दी अखबार में अंग्रेजी को ऐसे घुसेड़ते हैं जैसे कि वह अंग्रेजी का अखबार हो और उनका पाठक अंग्रेजी मर्मज्ञ हैं।

mirzapur

आठ अक्टूबर के अंक में मीरजापुर अमर उजाला ब्यूरो प्रभारी पवन तिवारी ने एक लेख लिखा। जिसकी हेंडिग है ‘बोथ आर करेक्ट बट शुक्ल इज मोस्ट करेक्ट।’ वैसे तो इन पर बाइलाइन बहुत छपा है। पर ब्यूरो प्रभारी यहां पर नये आये है तो चलता है एक और नया बाइलाइन। पर इतने बड़े पत्रकार और ब्यूरो प्रभारी को इतना तो पता होना चाहिए कि अखबार हिन्दी का है और लेख भी हिन्दी के मुर्धन्य साहित्यकार के बारे में लिखा जा रहा है तो खबर की हेडिंग हिन्दी में लिखे। यही नहीं खबर के अन्दर भी कई शब्द है जो अंग्रेजी में लिखे है जैसे- पीरियड, एक्सप्लेशन, लांगमैन, फ्लैश बैक।

एक बात बता दूं कि बोथ आर करेक्ट बट शुक्ल इज मोस्ट करेक्ट वाली लाइन इन्होंने एक कहानी से ली है जिसमें एक अंग्रेजी के अध्यापक द्वारा यह बात कही गयी है।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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आर्थिक संकट से जूझ रहे पर्ल्स ग्रुप के सभी चैनल ठप, गबन के आरोपी निदेशक की वापसी से कर्मचारियों में नाराज़गी

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कहते है डूबती नाव को बचाना बहुत ही मुश्किल होता है और कुछ ऐसा ही इनदिनों हो रहा है पर्ल्स ग्रुप के साथ। पर्ल्स ग्रुप की शुक्रवार और बिंदिया जैसी नामी मैगज़ीन बंद होने के बाद अब पी7 की बारी है। चैनल इन दिनों आर्थिक संकट से जूझ रहा है क्योंकि सेबी के चाबुक के बाद पर्ल्स ग्रुप को निवेशकों का 50000 करोड़ रुपये की रकम चुकानी है। चैनल के कर्मचारियों ने बगावती सुर अपनाते हुए जुलाई से सैलरी न मिलने पर मामले को लेकर लेबर कमिश्नर का दरवाज़ा खटखटाया है और अब सैलरी टाइम से न मिलने पर चैनल के कर्मचारियों ने चैनल के काम-काज को ठप करते हुए चैनल को फ्रिज कर दिया।

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पर्ल्स ग्रुप के तीन चैनल है पी7, पर्ल्स हरयाणा और पर्ल्स एमपी सीजी यह सब बंद पड़े है। इस तरह से चैनल के मैनेजमेंट ने हालांकि कर्मचारियों को सैलरी का आश्वासन दिया लेकिन कोई भी नहीं माना। हालत ये है की तीनों चैनल बंद है और ऑफ एयर है। गौरतलब है पर्ल्स ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू ने चैनल का कामकाज़ देख रहे निदेशक केसर सिंह को चैनल के कामकाज से अलग कर दिया था लेकिन चार दिन बाद ही केसर सिंह और शरद दत्त फिर से वापिस आ गए इसी बात को लेकर कर्मचारियों के बीच नाराज़गी है। बताया ये भी जाता है की केसर सिंह के ऊपर करोड़ों रुपये के गबन का भी आरोप लगा है जिसके बाद केसर सिंह को चलता कर दिया गया था लेकिन वफादारी की दुहाई और मालिकों के पैर पड़ने के बाद केसर वापिस आ गए और अब हालात ये है की चैनल के अन्दर बगावती तेवर दिखाई देने लगे है।

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एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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पी7 न्यूज में हड़ताल, प्रसारण ठप, कई माह से सेलरी न मिलने के कारण लेबर कोर्ट गए कर्मी

 

 

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महाराष्ट्र चुनाव में वोटरों के सामने से मुद्दे गायब हैं, बीजेपी-शिवसेना का मनमुटाव हावी है

3 जनवरी 1969 को पहली बार नागपुर में बालासाहेब ठाकरे की मुलाकात तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवरकर और सरकार्यवाहक देवरस से हुई थी। उस वक्त बालासाहेब ठाकरे बंबई से गये तो थे नागपुर विघापीठ में विघार्थी संघ के सम्मेलन में भाषण देने। लेकिन सीपीएम की धमकी की ठाकरे नागपुर से जिन्दा वापस लौट नहीं पायेगें के बाद ही संघ हरकत में आया और नागपुर के महाल के टाउन हाउन में एक हजार स्वयंसेवक ठाकरे की सुरक्षा के लिये दर्शक बनकर बैठ गये। उस वक्त ठाकरे के साथ प्रमोद नवलकर, सुधीर जोशी और मनमोहर जोशी समेत 12 शिवसैनिक ठाकरे के बाडीगार्ड बन कर गये थे। और 45 बरस पहले टाउन हाल में दिये भाषण में ठाकरे ने जिस अंदाज में मराठी मानुष से लेकर हिन्दुराष्ट्रवाद का जिक्र किया उसके बाद से आरएसएस को कभी लगा ही नहीं बालासाहेब ठाकरे संघ के स्वयंसेवक नहीं हैं।

वजह भी यही है कि महाराष्ट्र की सियासत का यह रंग बीते 45 बरस में इतना गाढ़ा हो चला कभी किसी ने सोचा ही नहीं कि दोस्ती के लिये लहराता भगवा परचम कभी दुश्मनी के दौर में भी लहरायेग। दरअसल महाराष्ट्र की राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी के बीच लहराता भगवा परचम ही सत्ता के सारे समीकरण तय भी कर रहा है और बिगाड़ भी रहा है। बीजेपी अपने बूते महाराष्ट्र की सत्ता साध लें या फिर चुनाव के बाद शिवसेना और बीजेपी मिलकर सरकार बनाये यह सवाल आज भी संघ परिवार के भीतर लाख टके का सवाल है कि जबाब होगा क्या। क्योंकि महाराष्ट्र में स्वयंसेवक अगर बीजेपी के लिये सक्रिय होता है तो फिर संघ की शाखायें भी शिवसेना के निशाने पर आ सकती हैं, इसलिये स्वंयेसवक महाराष्ट्र में हिन्दू वोटरों को वोट देने के लिये निकालने को लेकर सक्रिय है। सीधे बीजेपी को वोट देने का जिक्र करने से बच रहे हैं। यानी महाराष्ट्र चुनाव मोदी-अमित शाह की जोड़ी के लिये ऐसा एसिड टेस्ट है जिसमें शिवसेना को लेकर संघ के हिन्दुत्व की साख दांव पर आ लगी है। और इस महीन राजनीति को उद्धव ठाकरे भी समझ रहे है और नरेन्द्र मोदी भी। इसीलिये उद्धव ठाकरे हिन्दुत्व का राग अलाप रहे हैं तो मोदी विकास का नारा लगा रहे हैं।

शिवसेना-बीजेपी किसी एक मुद्दे पर तलवार निकालने को तैयार हैं तो वह शिवाजी की विरासत है। और यह संघर्ष महाराष्ट्र की सियासत में कोई नया गुल खिला सकता है इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि नरेन्द्र मोदी का मिजाज़ उन्हे अफजल खान ठहराने वाले को चुनाव के बाद की मजबूरी में भी साथ लेने पर राजी होगा, इसका जबाब बेहद मुश्किल है। यह हालात संघ परिवार के भीतर एक लकीर खींच रहे हैं। आरएसएस के भीतर यह कश्मकश कहीं तेज है कि पार्टी, संगठन और विचार सबकुछ राजनीतिक जीत-हार के सही गलत नहीं देखे जाने चाहिये। लेकिन बीजेपी मोदी की अगुवाई में जिस रास्ते निकल पड़ी है उसमें संघ के सामने कोई विकल्प भी नहीं है और मोदी के सामने कोई चुनौती भी नहीं है। इसीलिय इस लकीर का सबसे ज्यादा मुनाफा किसी को है तो वह एनसीपी का है।

एनसीपी के जो सरदार बीते पन्द्रह बरस की सत्ता में खलनायक हो चले थे वह झटके में अपनी पूंजी के आसरे नायक हो चले हैं। असल में शरद पवार की पार्टी हर जिले के सबसे ताकतवर नेताओ के आसरे ही चलती रही है। यानी संगठन या कार्यकर्ता की थ्योरी पवार की बिसात पर चलती नहीं है। रईस नेताओं के आसरे कार्यकर्ता खड़ा हो सकता है लेकिन कार्यकर्ताओ के आसरे नेता खड़ा नहीं होता। तो घोटालों की वह लंबी फेरहिस्त जिसका जिक्र बीजेपी हर दिन मोदी की तस्वीर के साथ दैनिक अखबारो में पन्ने भर के विज्ञापन के जरीये छाप रही है वह बेअसर हो चली है क्योकि कांग्रेस एनसीपी की जाती हुई सत्ता पर किसी की नजर नहीं है, कोई बहस करने को तैयार नहीं है। वोटरों की नजर बीजेपी-शिवसेना के उस संघर्ष समीकरण पर आ टिकी है, जहां सत्ता दोनों में से किसके पास कैसे आयेगी यही मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण हो चला है।

यानी 70 हजार करोड़ का सिचाई घोटाला हो या आदर्श घोटाले की हवा में उड़ी कांग्रेसी सीएम अशोक चव्हाण की कुर्सी। कोई मायने नहीं रख रहे। महत्वपूर्ण बीजेपी शिवसेना के मुद्दे हो चले हैं। और चुनावी समीकरण का असल खेल यही से बन बिगड़ रहा है। मुंबई जैसी जगह पर भी गुजराती और मराठी मानुष टकरा जाये यह शिवसेना की जरुरत है और मराठी मानुष रोजगार और विकास को लेकर गुजरातियों के साथ चलने को तैयार हो जाये यह बीजेपी की जरुरत है। उद्धव ठाकरे इस सच को समझ रहे है कि बीजेपी दिल्ली की होकर नहीं रह सकती क्योंकि नरेन्द्र मोदी का पहला प्रेम गुजरात हो या ना हो लेकिन मुंबई और पश्चिमी महाराष्ट्र में बसे गुजराती अब शिवसेना की ठाकरेगिरी पर नहीं चलेंगे। क्योंकि उन्हे दिल्ली की सत्ता पर बैठे गुजराती मोदी दिखायी दे रहे हैं।

लेकिन मोदी का संकट दोहरा है एक तरफ वह महाराष्ट्र को बंटने ना देने की राजनीतिक कसम खा रहे हैं। लेकिन अलग विदर्भ के बीजेपी के नारे को छुपाना भी नहीं चाह रहे हैं। यानी वोटो का जो समीकरण बीजेपी के लिये विदर्भ को अलग राज्य बनाने के नारे लगाने से मिल सकता है वह खामोश रहने पर झटका भी दे सकता है। और नारा लगाने पर मुबंई से लेकर पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाडा तक में मोदी हवा को पंचर भी कर सकता है। दरअसल लोकसभा चुनाव में मोदी हवा में विदर्भ के 62 सीटों में से बीजेपी-शिवसेना 59 सीटों पर आगे रही तो विदानसभा चुनाव में बीजेपी अपने बूते 45 सीट जीतने का ख्वाब संजोये हुये है और उसकी सबसे बड़ी बजह विदर्भ राज्य को बनवाने के वादा पूरा करने का है। लेकिन यह आवाज तेज होती है तो कोकंण और मराठवाडा की क्षेत्रीय ताकते यानी मराठा से लेकर कुनबी और ओबीसी की धारा बीजेपी से खिसक सकती है जो उसने बाला साहेब ठाकरे के साथ मिलकर प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे के भरोसे बनाया।

मोदी और अमित शाह इसीलिये चैक एंड बैलेंस का खेल खेल रहे हैं। मोदी नागपुर से चुनाव लड़ रहे देवेन्द्र फडनवीस की खुली तारीफ कर रहे हैं और अमित शाह पंकजा मुंडे का नाम ले रहे हैं। फडनवींस विदर्भ का राग अलाप रहे है और पंकजा महाजन-मुंडे की जोड़ी को याद कर मराठवाडा में बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग बरकरार रखने की जद्दोजहद कर रही हैं। वहीं शिवसेना भी सोशल इंजिनियरिंग के सच को समझ रही है तो भाषणों में महाजन-मुंडे के साथ रिस्तो की अनकही कहानी का प्रलाप उद्दव ठाकरे तक कर रहे हैं। क्योंकि निगाहों में मराठा, कुनबी और ओबीसी वोट बैंक हैं। इसके लिये मुंडे की तस्वीर तक को शिवसेना के नेता मंच पर लगाने से नहीं चूक रहे। और यह बताने से भी नहीं चुक रहे कि शिवसेना उस बीजेपी से नहीं लड़ रही जो बालासाहेब के दौर में साथ खड़ी थी बल्कि शिवसेना बीजेपी के उस ब्रांड एंबेसडर से लड़ रही है जिसने बीजेपी में रिश्ते निभाने वालों को भी सरेराह छोड़ दिया। यानी सत्ता की लड़ाई में साख पर सियासत कैसे हावी है यह भी कम दिलचस्प नहीं।

नरेन्द्र मोदी जिस एनसीपी कांग्रेस सरकार के 15 बरस के शासन को घोटालों और लूट के तराजू में रखकर पलटने का नारा लगातार रहे है, उस बीजेपी में 37 उम्मीदवार कांग्रेस-एनसीपी से ही निकल कर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावे 14 उम्मीदवार दूसरे राजनीतिक दलो से बीजेपी में घुसे हैं। वहीं शिवसेना को जिस बीजेपी से दो दो हाथ करने है, उसके टिकट पर बीजेपी के साथ रहे 27 नेता चुनाव लड़ रहे हैं। यहां तक की देवेन्द्र फडनवीस के करीबी मित्र और बीजेपी के कार्यकर्ता तोतवानी शिवसेना की टिकट पर देवेन्द्र फडनवीस के खिलाफ ही चुनाव लड़ रहे हैं। मुकाबला चौकोणीय है तो फिर तोतवामी का सिंधी होना विधानसत्रा क्षेत्र में 12 हजार सिंधी वोट के जरीये क्या गुल खिला सकता है और संघर्ष का पैमाना इस दौर में कहां आ पहुंचा है उसकी एक तासीर भर है यह समीकरण।

सच तो यह है कि बीजेपी पर निर्भर शिवसेना ने 89 विधानसभा क्षेत्र में कभी अपने संगठन की तरफ ध्यान दिया ही नहीं और शिवसेना पर निर्भर बीजेपी ने 63 सीट पर कभी अपने कैडर को दाना-पानी तक नहीं पूछा। यानी इन सीटों पर कौन कैसे चुनावी संघर्ष करे यह पहली मुश्किल है तो दूसरी मुश्किल उम्मीदवारों के नाम के आगे से पार्टियों के नाम का मिटना है। महाराष्ट्र की 47 सीट ऐसी हैं, जहां बीजेपी और कांग्रेस का भेद मुश्किल है। इसके अलावा 41 सीट ऐसी हैं जहां शिवसेना और एनसीपी के बीच भेद करना मुश्किल है। यानी राज्य की 288 में से 88 सीट नो मेन्स लैंड की तर्ज पर हर दल के लिये खुली हैं। इतना ही नहीं बीजेपी जिन 59 सीटों का जिक्र बार बार शिवसेना से यह कहकर मांग रही थी कि वह कभी जीती नहीं तो उस पर तो उन पर शिवसेना ने किसी बाहरी को टिकट दिया नहीं और बीजेपी ने इन्ही 59 सीट पर 11 एनसीपी के तो 9 कांग्रेस छोड़कर आये नेताओं को टिकट दे दिया।

वहीं दूसरी तरफ गठबंधन के दौर में जिन 27 सीटो पर बीजेपी कभी जीती नहीं उसपर शिवसेना ने बीजेपी छोड़ शिवसेना के साथ आये 9 नेता को टिकट दे दिया। ध्यान दें तो बीते 15 बरस में कौन सा दल किससे अलग है यह सवाल ही गायब हो गया। उस्मानाबाद नगरपालिका में काग्रेस धुर विरोधी शिवसेना -बीजेपी के साथ मिल गयी। नासिक में राजठाकरे से शरद पवार ने हाथ मिला लिया। बेलगाम में कांग्रेस बीजेपी एकसाथ हो गये। पुणे महाराष्ट्र यवतमाल में शिवसेना-बीजेपी के साथ एनसीपी खड़ी हो गयी। नागपुर महानगरपालिका में बीजेपी के साथ मुस्लिम लीग के दो पार्षद आ गये। जाहिर है ऐसे में लूट की हर कहानी में राजनीतिक बंदरबाट भी हर किसी ने देखा। को-ओपरेटिव हो या भूमि अधिग्रहण। मिहान प्रोजेक्ट हो या सिंचाई परियोजना। लूट की हिस्सेदारी कहीं ना कहीं हर राजनीतिक दल के दामन पर दाग लगा ही गयी।

असर इसी का हो चला है कि पहली बार वोटरों के सामने से हर मुद्दा गायब है। शरद पवार के सांप्रदायिकता के कटघरे में बीजेपी है शिवसेना नहीं है। शिवसेना के घोटालो के कटघरे में कांग्रेस है एनसीपी पर खामोशी है। लेकिन खलनायक मोदी हैं। बीजेपी के कटघरे में शरद पवार यानी एनसीपी है, शिवसेना पर खामोशी है। गांधी नेहरु के प्रति प्रेम जताकर कांग्रेस के वोट बैंक को आकर्षित करने में मोदी लगातार लगे हैं। कांग्रेस के कटघरे में सिर्फ मोदी हैं, शिवसेना और बीजेपी भी पाक साफ हो चली है। तो बहुमत के जादुई आंकड़े को पाने के सस्पेंस पर टिके चुनाव का असल सच यह है कि कांग्रेस न जीत पाने की उम्मीद में लड़ रही है। एनसीपी सियासी सौदेबाजी में प्यादा से वजीर बनने के लिये लड़ रही है। शिवसेना किंग बनने के लिये लड़ रही है। और बीजेपी जीतती हुई लग रही है क्योंकि उसे विश्वास है कि उसके सिकंदर यानी मोदी का जादू सर चढ़ कर अब भी बोल रहा है तो वह जीत का नया इतिहास बनाने के लिये लड़ रही है।

PUNYA

जाने माने पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से साभार।

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बिना पूर्व सूचना दाम बढ़ाने पर हॉकर संघ ने जागरण के खिलाफ खोला मोर्चा

gonda

गोंडा। श्रमजीवी समाचार पत्र सेवा संस्थान के अध्यक्ष सुधीर यादव ने स्थानीय गांधी पार्क में हुई बैठक के दौरान बताया कि दैनिक जागरण द्वारा शनिवार एवं रविवार को पेपर का रेट 5 रूपये किये जाने के कारण सभी वितरकों ने निर्णय लिया है कि पेपर का रेट प्रतिदिन 5 रूपये किया जाय यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो आने वाले शनिवार एवं रविवार को दैनिक जागरण का वितरण नहीं किया जायेगा। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया है कि यदि सभी वितरकों को एक-एक चांदी का सिक्का एवं एक-एक साइकिल नहीं दी जायेगी तो दिपावली के दिन से सभी समाचार पत्रों का वितरण बन्द कर दिया जायेगा।

दैनिक जागरण समाचार पत्र द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के रेट बढ़ाने से सभी समाचार पत्र वितरकों के भीतर आक्रोष व्याप्त कर रहा है और क्योंकि दैनिक जागरण समाचार पत्र को जब भी रेट बढ़ाना होता था तो एक सप्ताह पहले सरकुलर आ जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता है जो नियम के खिलाफ है। इस दौरान रविन्द्र कुमार तिवारी, जसलाल मिश्रा, पिन्टू पाण्डेय, नरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव उर्फ झब्बू सहित कई वितरक उपस्थित रहे।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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सरकारी एजेंट के रूप में काम कर रहा प्रभात ख़बर, सच कहने वाले ब्रजवाशी को कर रहा टार्चर

‘जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो क्या होगा.’ कल इंटरनेट पोर्टल पर सूबे के 4 लाख नियोजित शिक्षकों को भ्रामक जानकारी देने वाली खबर क्या छपी. प्रभात खबर ने अपनी गलती नहीं सुधारी. उल्टे मुजफ्फरपुर संस्करण के रिपोर्टर के द्वारा प्रबंधन के ईशारे पर परिवर्तन प्रारंभिक शिक्षक संघ, बिहार के अध्यक्ष वंशीधर ब्रजवाशी को भी परेशान किया जा रहा है.

मूलत: मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन के निवासी वंशीधर ने बताया कि आज उनके विद्यालय में स्थानीय संवाददाता को भेजकर उनके बारे में हेड मास्टर से पूछताछ की गई. चूंकि सोमवार को पूरे सूबे में भारी बारिश के कारण सुबह से ही प्राकृतिक आपदा की स्थिति रही. ऐसे में रिपोर्टर के विद्यालय आने का मकसद डराने धमकाने का ही था. लेकिन हमारा आंदोलन इससे कमजोर नहीं पड़ने वाल.

इस घटना से कभी सरोकारी माने जाने वाले इस अखबार की कलई खुलने लगी है कि किस तरह यह सरकार के एजेंट के रुप में काम कर रहा है. वंशीधर ने बताया कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से इस तरह के दोयम रवैये की उम्मीद नहीं की जा सकती. प्रभात खबर को नियोजित शिक्षकों के हक में खबर नहीं छापनी है तो न छापे लेकिन ऐसी ओछी हरकत ना करे.

हालांकि उन्होंने प्रदेश के अन्य अखबारों हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय सहारा, सन्मार्ग, आज व ईटीवी, सहारा समय आदि क्षेत्रीय न्यूज चैनलों के प्रति पूरी आस्था जताई. क्योंकि ये मीडिया बैनर शिक्षकों वाली खबर छापने या दिखाने में निष्पक्षता दिखाते हैं व सावधानी बरतते हैं, अफवाह नहीं फैलाते.

 

श्रीकांत सौरव <saurav.srikant@gmail.com>

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घपलों-घोटालों और कैलाश सत्यार्थी का चोली-दामन का साथ रहा है, नोबेल मिलना कुशल मीडिया मैनेजमेंट का नतीजा है

वर्ष 2006 में कैलाश सत्यार्थी पहली बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित हुए थे। उस वक्त हिंदी साप्ताहिक अख़बार द संडे पोस्ट ने उनके काम, व्यक्तित्व, विवाद और जीवन के आयामों का जायजा लेते हुए एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी। यह रिपोर्ट इस वर्ष के नोबल शांति पुरस्कार के विजेता कैलाश सत्यार्थी के काम की जांच करते हुए उनके जिस रूप को सामने लाती है वह इस पुरस्कार के विजेता को कठघरे में खड़ा करने के साथ पुरस्कार की चयन प्रक्रिया को ही विवादित बना देता है। और ऐसा शायद पहली ही बार हुआ है कि इतने बड़े सम्मान से एक भारतीय के सम्मानित होने पर भी प्रशंसा से अधिक सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है इसे जानने के लिए पढ़िए स्पेशल  रिपोर्ट-

कैलाश सत्यार्थी का नाम आते ही जेहन में उन बेहाल बच्चों की तस्वीर उभरती है जिन्हें असमय श्रम की भट्टी से मुक्ति दिलायी गयी थी। यह मुक्ति कैलाश सत्यार्थी और उनकी संस्था ‘बचपन बचाओ’ के कार्यकर्ताओं ने दिलायी। ‘बचपन बचाओ’ के कार्यकर्ता इन बच्चों को उद्योग मालिकों के यहां से आजाद कराते हैं जहां वे मामूली पैसों पर मजदूरी करने को विवश होते हैं। इसी नेक मुहिम के चलते इस वर्ष  कैलाश सत्यार्थी नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किये गये हैं। लेकिन कैलाश सत्यार्थी के पुराने सहयोगी उन्हें सवालों—संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं जो उनके दूसरे रूप को सामने लाता है। उनका यह दूसरा पहलू लोगों के बीच निर्मित उनकी धवल छवि को धूमिल करता है।

फैक्ट्रियों में दम तोड़ रहे बचपन को आजाद करने के नाम पर दुनियाभर की दानदाता एजेंसियों से ‘दक्षिणा’ लेने वाले कैलाश सत्यार्थी पर करोड़ों रुपये का घपला करने तथा ट्रस्ट कागजातों के साथ हेराफेरी करने का आरोप है। इन्होंने न सिर्फ मुक्ति प्रतिष्ठान से संचालित ‘मुक्ति आश्रम’ पर कब्जा कर लिया है, बल्कि स्वामी अग्निवेश के पावर ऑफ अटॉर्नी वाले शेख सराय की बिल्डिंग को भी हथिया लिया है। फंडिंग का रास्ता खुलते देख सत्यार्थी ने दिल्ली के इब्राहिम पुर स्थित ‘मुक्ति आश्रम’ को संपत्ति उगाहने के केंद्र के रूप में विकसित किया और एक के बाद एक कई ट्रस्ट खोले। महत्वपूर्ण बात तो ये रही कि ‘मुक्ति आश्रम’ में ही सत्यार्थी ने तमाम दूसरे ट्रस्टों के पंजीकृत कार्यालय खोले, मगर अन्य ट्रस्टियों को इसकी मौखिक जानकारी तक नहीं दी। हद तो तब हो गयी जब ट्रस्टी शेओताज सिंह, राजेश त्यागी, प्रभात पंत और खूबीराम की सहमति के बगैर ‘आवा’ नाम का एक नया ट्रस्ट अस्तित्व में आया और उसके भी ट्रस्टी कैलाश सत्यार्थी और उनकी पत्नी सुमेधा सत्यार्थी ही थे। तकनीकी तौर पर बचने के लिए सत्यार्थी ने एक नई स्कीम पेश की और सालभर में 25 रुपये दान में देने वालों को भी ट्रस्टी बनाया। इसका सिर्फ एक मकसद रहा कि आगे चलकर कोई यह न कहे कि उनके ज्यादातर ट्रस्ट सत्यार्थी दंपत्ति के प्रबंधकीय और मालिकाना हक में चलते हैं।

देश ही नहीं दुनियाभर के ‘कॉर्पोरेट बुद्धिजीवियों’ के बीच सुर्खियों में रहने वाले सत्या​र्थी आज अपने जुगाड़ की बदौलत ‘नोबल शांति पुरस्कार’ के लिए नामित हो गये हैं। एक के बाद एक आधा दर्जन से अधिक ट्रस्ट खोलने वाले सत्यार्थी वही हैं, जिन्होंने झूठी प्रतिष्ठा पाने के लिए पानीपन की एक फैक्टरी पर फर्जी इल्जाम लगाये थे और आपराधिक मुकदमे पर जेल गये। बचपन बचाने से लेकर सूचना के अधिकार की पैरोकारी करने वाले सत्यार्थी किसी तरह की सूचना मांगने पर मामले को दबा जाने में माहिर हैं और हेराफेरी करने में उनका कोई जवाब ही नहीं है। महीने का पखवाड़ा विदेश में बिताने वाले सत्यार्थी के खिलाफ उनके कर्मचारी भी खड़े हो गये हैं। कुछ कर्मचारियों ने उनके खिलाफ अदालत मे मामला दायर किया है।

सत्यार्थी ने पैक्स नाम की विदेशी दानदाता एजेंसी की शर्तों के मातहत मुक्ति आश्रम को कर दिया। फंडिंग का रास्ता खुलता देख मध्य प्रदेश के विदिशा वासी सत्यार्थी ने साक्स (SACCS) नाम की भी एक संस्था खोल दी। इस प्रकार सत्यार्थी साउथ एशियन कॉलिशन ऑन चाइल्डहुड सर्विस के स्वनामधन्य चेयरमैन और ‘मुक्ति आश्रम’ के सेक्रेटरी हो गये। जिसके बाद 1994 में बनाये गये एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन (आव) को इब्राहिमपुर स्थित ‘मुक्ति आश्रम’ की 14 बीघा 8 बिस्वा जमीन लीज पर दे दी गयी। आगे चलकर बचपन बचाओ फाउंडेशन का निर्माण किया और इस फाउंडेशन का रजिस्टर्ड ऑफिस भी मुक्ति आश्रम को ही रखा। इतना ही नहीं शेख सराय में जनता पार्टी के पूर्व सांसद बापू कालदांते द्वारा सांसद कोटे से दिये गये 24—सी एमआईजी फ्लैट को भी सत्यार्थी ने हथिया लिया। आजकल सुनने में आ रहा है कि शेख सराय का वह फ्लैट सत्यार्थी ने किसी तीसरे को बेच दिया है, ज​बकि उसकी पावर ऑफ अटॉर्नी स्वामी अग्निवेश के पास है। उल्लेखनीय है कि 1982 से 1992 तक बाल शोषण के खिलाफ संगठित तौर पर सत्यार्थी और अग्निवेश ने साथ काम किया।

जनकल्याण का लबादा ओढ़े, जनता और ट्रस्ट की संपत्ति को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने वाले सत्यार्थी का यह विद्रूप चेहरा स्वामी अग्निवेश से हुयी एक बातचीत में सामने आया। विदेशी दान के करोड़ों रुपये डकारने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी पर उंगली मुक्ति आश्रम के कर्मचारियों की शिकायत के बाद उठी थी। चारों ट्रस्टियों शेओताज सिंह, खूबीराम, प्रभात पंत, राजेश त्यागी से ‘मुक्ति आश्रम’ के कर्मचारियों ने सत्यार्थी की मनमानी किये जाने, ट्रस्ट के धन को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने तथा हेरा—फेरी करने के गंभीर आरोप लगाये। इन तमाम आरोपों के मद्देनजर कैलाश सत्यार्थी, सुमेधा सत्यार्थी और एकाउंटेंट विट्ठल राव से जब ट्रस्टी शेओताज सिंह ने सफाई चाही तो सत्यार्थी दंपत्ति ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर बिट्ठल राव ने शुरुआत में सहयोग किया। ऐसी स्थिति में उक्त चारों ट्रस्टियों की तरह से एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया। जांच के दौरान सत्यार्थी पर लगाये गये कर्मचारियों के आरोपों की सिलसिलेवार और तथ्यगत पुष्टि हुयी। जांच अधिकारी ने अक्टूबर 1995 में अलीपुर थाने में सत्यार्थी के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया।

ट्रस्ट का मामला ट्रस्ट में ही निपटा लेने के मकसद से 1994 में स्वामी अग्निवेश के नेतृत्व में आर्य समाज और ट्रस्ट से जुड़े लोगों की आसफ अली रोड पर मीटिंग बुलायी गयी। लेकिन आर्य समाज के कार्यालय में घंटों तक चली इस बैठक का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। अंतत: सदस्यों ने सर्वसम्मति से सत्यार्थी दंपति को ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’ से निष्कासित कर दिया। चूंकि इब्राहिमपुर का ‘मुक्ति आश्रम’ जंतर मंतर स्थित ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’ कार्यालय से संबद्ध था लिहाजा सत्यार्थी को ‘मुक्ति आश्रम’ से सारे रिश्ते स्वत: खत्म हो जाने चाहिए थे। बावजूद इसके स्वामी अग्निवेश के शब्दों में ‘सत्यार्थी की बदमाशियां जारी रहीं।’

‘मुक्ति आश्रम’ की नियमावलियों के मुताबिक यह स्थान गरीब, बीमार एवं विकलांग बच्चों के आर्थिक, सामा​जिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए बनाया गया था। परंतु ऐसा न होते देख जांच अधिकारी शेओताज सिंह एवं अन्य तीन ने मिलकर जनवरी 1997 में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में उक्त भ्रष्टाचार के आरोपी ट्रस्टियों के खिलाफ याचिका दायर की।

सत्यार्थी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा देख अप्रैल 1997 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश बीएस चौधरी ने कोर्ट की तरफ से राना प्रवीन सिद्दीकी को जांच अधिकारी नियुक्त किया। सिद्दीकी ने भी जांच के बाद पेश की गयी रिपोर्ट में ‘मुक्ति आश्रम’ में हो रही अनियमितताओं को रेखांकित किया और पाया कि बेहद सुनियोजित तरीके से आर्थिक मामलों में हेरफेर की गयी है। रिपोर्ट में उल्लेख किया कि कैश बुक को देखने से ऐसा लगता है कि मानो एक ही आदमी ने कई जगह अगूंठे लगा रखे हैं। उन्होंने रिपोर्ट में आगे उल्लेख किया है कि 81 से 84 तक की जो कैशबुक है उनका कोई वाउचर नहीं है तथा संस्था को अनुदान किन स्रोतों से कितना प्राप्त हो रहा है इसका भी कोई उल्लेख नहीं है। 1980 से 89 तक का मुक्ति आश्रम में कोई रजिस्टर नहीं है। यहां तक कि मीटिंगों के दौरान लिए जाने वाले नोट्स भी उपलब्ध नहीं हैं। राना प्रवीन सिद्दीकी ने अपनी रिपोर्ट में स्वामी अग्निवेश तथा शेओताज सिंह पर जांच में सहयोग न करने तथा असंवैधानिक व्यवहार करने का भी जिक्र किया है।

एक के बाद एक तीन स्तरों से एक ही ढंग से लगाये गये आरोप उजागर भी हुए, परंतु सत्यार्थी ‘नोबल शांति पुरस्कार’ तक पहुंच गये। सत्यार्थी के विरोधियों और सहयोगियों दोनों का कहना है कि उनका यहां तक पहुंचना मीडिया मैनेजमेंट की कुशल कारीगरी का ही नतीजा है।

सत्यार्थी पर लगाये गये आरोपों के मद्देनजर जब उनका पक्ष जानने के लिए ‘दि संडे पोस्ट’ ने संपर्क किया तो कालकाजी स्थित उनके कार्यालय से जवाब आया कि ‘सत्यार्थी जी इस पर बातचीत नहीं करना चाहते हैं।’ फोन पर हुयी बातचीत में उनके मीडिया प्रभारी राकेश सेंगर ने न्यायिक सलाहकार का हवाला देते हुए कहा कि ‘न्यायालय में चल रहे इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।’ ट्रस्ट बनाम सत्यार्थी का मामला कोर्ट में गये नौ साल हो गये हैं, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है। न्यायालय पर टिप्पणी किये बिना इतना जरूर कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता बेहद सुस्त हो चुके हैं। इसी सुस्ती का परिणाम हुआ कि याचिकाकर्ता सुनवाई की तारीख में नहीं पहुंचे और कोर्ट ने केस ही खत्म करने का आदेश दे दिया, लेकिन केस देख रहे वकील आरके गौड़ की सक्रियता का परिणाम रहा कि केस की पुनर्वहाली के लिए अर्जी दे दी गयी।

आंखिन देखी सच

दिल्ली के सुदूर गांव इब्राहिमपुर में ‘मुक्ति आश्रम’ परिसर में ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के नारे लिखे हैं। लगभग 3.5 एकड़ में स्थित यह आश्रम फार्म हाउस मार्का है। अंदर बचपन की किलकारियां नहीं कुत्तों की आवाज है। यहां अनाथ बच्चे नहीं बल्कि विदेशी ब्रांड के कुत्ते रहते हैं। इन कुत्तों की देखरेख के लिए दरबान लगे हैं। आगंतुक कक्ष में लालटेन में भी बल्ब लगा हुआ है। एक-दो कट्ठे में बनी सामने एक ईमारत खड़ी है। कर्मचारी बताते हैं कि यहीं साठ बच्चे छह महीने के लिए आते हैं। यानी प्रत्येक साल यहां 120 बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दी जाती है। परंतु बाल मजदूरी से पचासों हजार बच्चों को सत्यार्थी का संगठन मुक्त कराता है। बहरहाल, इस समय वाले साठ बच्चे कहां हैं? पूछने पर जवाब मिलता है अभी नहीं हैं। यहां हर आदमी का अपना एक ग्रेड है। दरबान और पानी लाने वाली दाई को छोड़ सब सभ्रांत दिखते हैं। सवाल जवाब कर रहा कर्मचारी भी नौकरी छोड़ जाने वाला है। वह सुमन जी (मुक्ति आश्रम की निवर्तमान निदेशक) का हर एक वाक्य के बाद जिक्र करता है। यहां जो कुछ भी हो रहा है वह इससे संतुष्ट नही है। अपनी भावनायें व्यक्त करते हुए कहता है- ‘आपके पास तो कहने का औजार है हमारे पास क्या है।’ चाय खत्म कर बाहर निकलने पर सूख रही फूल-पत्तियों से घिरा ‘बालिका मुक्ति आश्रम’ दिख जाता है। यहां एक भी लड़की नहीं है जबकि दावा चालीस का किया जाता है। वहां की महिला कर्मचारी बताती है कि दस-बारह थीं, दो-चार दिन पहले चली गयीं।

इसलिए सहयोगियों ने छोड़ा साथ

‘कैलाश सत्यार्थी के काम का चरित्र वैसा ही है जैसा कि स्वयंसेवी संगठनों का है। ये संगठन मूलत: इस तरह के सामाजिक काम पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के मुखिया बाल बंधुआ मजदूरों को मुक्त तो कराते है, परंतु वे बच्चे पुन: उस नर्क में वापस न जायें, इसका कोई विकल्प खड़ा नहीं करते। उनकी आर्थिक समृद्धि का विकल्प खड़ा किये बिना इस तरह के सारे प्रयास बेमानी हैं। कैलाश सत्यार्थी को दूसरे देश के संगठनों से तो समर्थन मिलता है, परंतु संकट की घड़ी में उन्हें अपने ही देश भारत में कोई समर्थक नजर नहीं आता। –आनंदस्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता

बात दशकों पहले की है इसलिए मुझे ठीक-ठाक याद नहीं कि मैंने पावर ऑफ अटार्नी बदली थी या नहीं। हां, इतना मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मैंने पावर ऑफ अटार्नी स्वामी अग्निवेश को दी थी। बाद में कैलाश सत्यार्थी और स्वामी अग्निवेश का आपस में झगड़ा हो गया और उस बीच मेरे पास सत्यार्थी और अग्निवेश दोनों आये थे। मैंने झगड़े में न पड़ते हुए अग्निवेश से कहा था कि 24—सी, शेख सराय वाला मकान दे दें, क्योंकि उस समय मेरे पास रहने के लिए घर नहीं था। लेकिन अग्निवेश ने कहा था कि यह फ्लैट अब विवादों में है जिसका मामला कोर्ट में चल रहा है। –बापू कालदांते, पूर्व सांसद जनता पार्टी

सत्यार्थी कहते हैं कि उन्होंने शिकायतकर्ता चारों ट्रस्टियों को ट्रस्ट से निष्कासित कर दिया है। यह जवाब वे तब देते हैं जब उनकी मनमानी और अनियमितताओं पर सवाल खड़ा होता है। सफाई के लिए ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’ से जुड़े लोगों की बैठक करायी जाती है। उस फैसलाकून बैठक में साजिशन तरीके से फर्जी फोटोस्टेट के दस्तखत वाले नये ट्रस्टियों की बहाली की प्रतियां सत्यार्थी द्वारा दिखायी जाती हैं, जिसमें फर्जी हस्ताक्षर रामशरण जोशी और मधु जोशी के हैं, जबकि उन्होंने बहुत पहले ही ट्रस्ट छोड़ दिया था। हमने इस कागजात की कॉपी कोर्ट में भी लगायी है। अदालत द्वारा सुझाये गये ट्रस्ट कानूनों को ताक पर रखकर सत्यार्थी ने जो मनमानी की है, वह पूर्णतया आपराधिक मामला है। सत्यार्थी दंपत्ति जिन ट्रस्टों में भागीदार रहे हैं उनकी तहकीकात की जाये तो ज्यादातर ट्रस्टों की मैनेजिंग कमेटी में सत्यार्थी पाये जायेंगे। –राजेश त्यागी, वकील सुप्रीम कोर्ट एवं ट्रस्टी ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’

बहुत पुरानी बात हो गयी है अब तो मैं ट्रस्टी भी नहीं हूं। हां, मुझे इतना याद है कि सत्यार्थी द्वारा किये गये हेर-फेर के खिलाफ शेओताज सिंह ने अदालत में याचिका दायर की थी। यह पूरा मामला सत्यार्थी बनाम अग्निवेश का है। उन्हीं से इस बारे में पूछिये। –प्रभात पंत, मुक्ति प्रतिष्ठान ट्रस्टी

 

अजय प्रकाश

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फॉरवर्ड प्रेस एक व्यावसायिक पत्रिका है और अभी तक इसी दक्षिणपंथी सरकार में राजनीतिक स्पेस खोज रही थी

आज से कोई साढ़े आठ साल पहले यानी 2006 के फरवरी में ”सीनियर इंडिया” नाम की व्‍यावसायिक पाक्षिक पत्रिका पर छापा पड़ा था। विवादास्‍पद अंक ज़ब्‍त कर लिया गया था। संपादक आलोक तोमर समेत प्रकाशक को जेल हुई थी। आरोप था कि पत्रिका ने डेनमार्क के कार्टूनिस्‍ट का बनाया मोहम्‍मद साहब का कथित विवादित कार्टून छापा है जिससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। सच्‍चाई यह थी कि उस वक्‍त दुनिया भर में चर्चित इस कार्टून पर पत्रिका ने एक कोने में करीब दो सौ शब्‍द की अनिवार्य टिप्‍पणी की थी जिसके साथ कार्टून का एक थम्‍बनेल प्रकाशित था, जिसे आधार बनाकर दिल्‍ली पुलिस कमिश्‍नर ने अपने ही सिपाही से पत्रिका के खिलाफ एक एफआइआर इसलिए करवा दी क्‍योंकि दो अंकों से पत्रिका की आवरण कथा कमिश्‍नर के खिलाफ़ छप रही थी जिसे मैंने और अवतंस चित्रांश ने संयुक्‍त रूप से अपने नाम से लिखा था। स्‍पष्‍टत: यह दिल्‍ली पुलिस द्वारा बदले की कार्रवाई थी, लिहाज़ा प्रभाष जोशी से लेकर राहुल देव तक पूरी पत्रकार बिरादरी का आलोकजी के समर्थन में उतर आना बिल्‍कुल न्‍यायसंगत था।

अब इसके साथ व्‍यावसायिक पत्रिका ”फॉरवर्ड प्रेस” का मामला रखकर देखिए। बताया जा रहा है कि एक शिकायत के आधार पर आरोप यहां भी वही है कि कुछ लोगों की भावनाएं दुर्गा-महिषासुर पौराणिक कथा के पुनर्पाठ के कारण आहत हुई हैं। लिहाज़ा अंक ज़ब्‍त हुआ और चतुर्थ श्रेणी के कुछ कर्मचारी जेल चले गए। सच्‍चाई क्‍या है? सच्‍चाई उतनी ही है जितनी दिखती है- मतलब एक शिकायत हुई है कंटेंट के खिलाफ़ और कार्रवाई हुई है। इसके पीछे की कहानी यह है कि महिषासुर विरोध के लिए जिस ‘दक्षिणपंथी’ सरकार को आज दोषी ठहराया जा रहा है, पिछले कई अंकों से यह पत्रिका उसी के गुणगान कर रही थी। जिस सरकार ने ”फारवर्ड प्रेस” की अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर हमला किया है, अब तक पत्रिका उसी सरकार और उसके ओबीसी प्रधान सेवक के एजेंडे में अपनी राजनीतिक स्‍पेस खोज रही थी, हालांकि ‘संतुलन’ बैठाने के लिए कुछ और लेख बेशक छाप दिए जाते थे। तो हुआ यह, कि अचानक एक शिकायत के कारण मामला बस बैकफायर कर गया। पहले महिषासुर हिंदुत्‍व में डायवर्सिटी खोजने का औज़ार था, दमन की कार्रवाई के बाद वह अचानक वामपंथ से समर्थन जुटाने का औज़ार बन गया है।

इसके बावजूद पत्रिका पर छापे की ‘कार्रवाई’ का विरोध होना चाहिए, तो इस बात को समझते हुए कि अभिव्‍यक्ति की आज़ादी का मामला यहां पत्रिका के राजनीतिक एजेंडे से स्‍वायत्‍त नहीं है। पहले तो आप यह मानें कि ”फॉरवर्ड प्रेस” एक व्‍यावसायिक पत्रिका है, कोई आंदोलन नहीं। दूसरे यह समझें कि सामान्‍यत: प्रकाशनों पर दमन सत्‍ता-विरोध के चलते किया जाता है (जैसा ”सीनियर इंडिया” के साथ हुआ), लेकिन ताज़ा मामले में पिछले एक साल से मोदी सत्‍ता के पक्ष में तर्क जुटा रही पत्रिका का दमन हुआ है। इसलिए इसे आप पत्रिका के राजनीतिक एजेंडे से काटकर नहीं देख सकते। इस लिहाज से मैं सीनियर इंडिया के मामले को फॉरवर्ड प्रेस के मुकाबले ज्‍यादा जेनुइन मानता हूं।

अगर वाकई ”फॉरवर्ड प्रेस” दक्षिणपंथ विरोध या वामपंथी रुझान की पत्रिका है (जैसा कि अब कहा जा रहा है) तो एचएल दुसाध से लेकर प्रेमकुमार मणि तक हर कोई नरेंद्र मोदी के प्रोजेक्‍ट में हिस्‍सेदारी क्‍यों तलाश रहा था? यदि पिछले अंकों में ज़ाहिर राजनीतिक लाइन ही पत्रिका की आधिकारिक लाइन है, तो अब दक्षिणपंथी सरकार के दमन का स्‍यापा क्‍यों? कहने का मतलब ये कि अभिव्‍यक्ति की आज़ादी के साथ हम खड़े तो हैं ही, हमेशा रहेंगे, लेकिन उस भ्रामक राजनीति का क्‍या करें जो अपनी सुविधा के मुताबिक कभी दक्षिणपंथी हो जाती है तो कभी वामपंथियों को साथ आने को कहती है।

 

अभिषेक श्रीवास्‍तव

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश, दो माह के भीतर देना होगा मजीठिया वेतनमान

मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू ने करने संबंधी अवमानना के तीन मामलों की सुनवाई करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्‍यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरिमन की खंडपीठ ने सोमवार को ऐतिहासिक आदेश दिया। जैसे ही तीनों मामले उनके समक्ष सुनवाई के लिए पेश किए गए। उन्‍होंने वरिष्‍ठ वकील श्री कोलिन गोंजाल्विस से इस संबंध में पूछा।

तीनों मामले एक ही जैसे थे और इससे पहले एक मामला इंडियन एक्‍सप्रेस का न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई के समक्ष आ चुका था। मामले की गंभीरता को देखते हुए कुछ देर तक दोनों न्‍यायमूर्तियों ने आपस में विचार किया और आदेश दिया कि दूसरी पार्टियां दो महीने के भीतर सुप्रीम कार्ट के फैसले का अनुपालन करें।

अगली सुनवाई की तारीख 2 जनवरी तय की गई है। सबसे पहले भास्‍कर इसके बाद दैनिक जागरण और तीसरे नंबर पर इंडियन एक्‍सप्रेस, चंडीगढ़ का केस था। कोर्ट नंबर दस में सुनवाई के दौरान भास्‍कर के कर्मचारियों की ओर से उनके वकील एचके चतुर्वेदी और दैनिक जागरण के कर्मचारियों की ओर से परमानंद पांडेय पेश हुए।

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सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया मालिकों से मजीठिया लागू करने को कहा, अन्यथा होगी कार्यवाही

मजीठिया के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा आदेश दिया है। 13 अक्टूबर को अवमानना याचिकाओं की सुनवायी करते हुए कोर्ट ने सभी मामलों को दो महीने के बाद लिस्ट करने का आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि यदि प्रतिवादियों भास्कर, जागरण और इंडियन एक्सप्रेस ने मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया है तो इस दो महीने की अवधि के दौरान अनुपालन सुनिशचित करें अन्यथा विधि अनुसार कार्यवाही की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का आदेशः

ITEM NO.5 & 6 & 7                            COURT NO.10                  SECTION X

                                 S U P R E M E C O U R T O F       I N D I A
                                         RECORD OF PROCEEDINGS

     CONMT.PET.(C) No. 401/2014 In W.P.(C) No. 246/2011

     ABP PVT. LTD. & ANR.                                              Petitioner(s)

                                                   VERSUS

     UNION OF INDIA & ORS.                                             Respondent(s)
     (With office report)

     AND

     Cont.P.(C)No. 411 of 2014 in W.P.(C)NO.246 of 2011
     (With office report)

     AND

     Cont.P.(C)No. 450 of 2014 in W.P.(C)No. 264 of 2012
     (With office report)

     Date : 13/10/2014 These petitions were called on for hearing today.

     CORAM :
                           HON’BLE MR. JUSTICE RANJAN GOGOI
                           HON’BLE MR. JUSTICE ROHINTON FALI NARIMAN

     For Petitioner(s)                Mr. H. K. Chaturvedi,Adv.
                                      Ms. Anjali Chaturvedi,Adv.
                                      Ms. Ashish Saxena,Adv.

                                      Mr. Paramanand Pandey,Adv.
                                      Mr. Raj Kishor Choudhary,Adv.
                                      Mr. Utkarsh Pandey,Adv.

                                      Mr. P. George Giri,Adv.
     For Respondent(s)

                            UPON hearing the counsel the Court made the following
                                               O R D E R

                                 List all these matters after two months.
                                 During the aforesaid period the order of the
                         Court be complied by the respondents, if the same has not already been done.

 

Signature Not Verified

Digitally signed by     
Madhu Bala
Date: 2014.10.13
16:41:22 IST
Reason:

(MADHU BALA)                                 (ASHA SONI)
COURT MASTER                                 COURT MASTER

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एआईआर ने 37 ज्ञानवाणी एफएम स्टेशनों को बंद किया

ऑल इंडिया रेडिया ने अपने 37 ज्ञानवाणी शैक्षणिक एफएम स्टेशनों को बंद कर दिया है। इन स्टेशनों का उपयोग इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विवि (इग्नू) के शैक्षणिक कार्यक्रमों के प्रसारण के लिए किया जाता था। स्टेशनों को बंद करने का कराण इग्नू द्वारा बकाया रकम का न चुकाया जाना बताया जा रहा है।

इग्नू ने अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों को प्रसारित करने के एवज में दिए जाने वाले शुल्क का कई महीनों से भुगतान नहीं किया है। इस संबंध में मानव संसाधन विकास मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, प्रसार भारती और इग्नू के मध्य उचित सामंजस्य न होने की बात सामने सामने आ रही है।

इग्नू को केन्द्र सरकार की तरफ से ज्ञानवाणी के माध्यम से शैक्षणिक प्रसार के लिए अनुदान मिलता है। ज्ञानवाणी एक शैक्षणिक एफएम रेडियो नेटवर्क है जिस पर प्राइमरी, सेकेन्ड्री, वयस्क, तकनीकी और रोज़गारपरक शिक्षा से संबंधित कार्यक्रमों तो प्रसारित किया जाता है। इसकी शुरुआत 2001 में की गई थी। इस पर हिन्दी, अंग्रेज़ी तथा अन्य स्थानीय भाषाओं में प्रतिदिन सुबह 6 से 11 बजे तथा शाम 5 से 10 तक कार्यक्रमों का पुनः प्रसारण किया जाता है।

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500 एआईआर कर्मियों को चार महीनों से नहीं मिला वेतन, यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने की मिल रही सज़ा

नई दिल्ली। ऑल इंडिया रेडियो के करीब 500 कर्मचारियों के लिए आने वाली दीपावली काली हो सकती है। एफएम गोल्ड, एफएम रेनबो और अन्य रेडियो स्टेशनों के रेडियो जॉकियों, प्रस्तोताओं और अन्य कर्मचारियों को पिछले चार महीनो से वेतन नहीं मिला है। इन सबके वेतन की करीब एक करोड़ रुपए की रकम जून से बकाया है लेकिन इस देरी का कोई भी संतोषजनक कारण नहीं बताया जा रहा है।

कर्मचारी परेशान है क्योंकि त्योहारों का मौसम शुरु हो चुका है, उन्हे उम्मीद थी कि ईद तक उनका बकाया वेतन मिल जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। प्रबंधन द्वारा संभावित उत्पीड़न के डर से कोई भी कर्मचारी मुंह खोलने को तैयार नहीं है। प्रसार भारती के मुख्य सलाहकार का कहना है कि उन्हे इस विषय में विस्तार से जानकारी नहीं है लेकिन वे इसमें हस्तक्षेप करेंगे। वहीं एआईआर के महानिदेशक एफ शहरयार का कहना है कि उन्हे कर्मचारियों को वेतन न मिलने के मामले की जानकारी नहीं है।

कुछ कर्मचारियों का कहना है कि पहले वेतन समय से मिल जाया करता था लेकिन मार्च 2013 में जब यौन उत्पीड़न के मामलों की शिकायत की गई और मामला सार्वजनिक हुआ तब से वेतन देने में अनियमितता बरती जाने लगी।

गौरतलब है कि मार्च 2013 में करीब 25 कर्मचारियों ने एआईआर प्रबंधन के कुछ वरिष्ठों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। कर्मचारियों की शिकायतों की जांच के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया था। लेकिन इस मामले में जिन लोगों को निलंबित किया गया था उन्हे कुछ समय बाद पदों पर वापस ले लिया गया। 

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शिक्षक से उठक-बैठक करवाना आपराधिक कृत्य, दुर्गा शक्ति के पति की मानवाधिकार आयोग को शिकायत

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल के पति अभिषेक सिंह द्वारा शिक्षक फौरन सिंह से उठक-बैठक करवाने को आपराधिक कृत्य बताते हुए इस सम्बन्ध में कार्यवाही किये जाने की मांग की है.

राष्ट्रीय मानावाधिकार आयोग को भेजी अपनी शिकायत में डॉ ठाकुर ने कहा है कि उन्होंने घटना की जानकारी प्राप्त होने पर फौरन सिंह और उनके पुत्र सचिन से फोन पर बात की. फौरन सिंह ने पूरी घटना को तस्दीक किया जबकि उनके पुत्र सचिन ने एक बुजुर्ग व्यक्ति के साथ हुए इस आचरण को अत्यंत निंदनीय बताया.

प्रार्थनापत्र में कहा गया है कि अभिषेक सिंह का यह कृत्य अनुचित और अमानवीय होने के साथ आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छया उपहति कारित करना- 1 वर्ष कारावास), 341 (किसी व्यक्ति का सदोष अवरोध करना- 1 माह का सादा कारावास), 342 (किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध- 1 वर्ष का कारावास), 506 (आपराधिक अभित्रास- 2 वर्ष का कारावास) के तहत अपराध भी है.

अतः मामले की जांच कराते हुए आवश्यक विधिक कार्यवाही किये जाने और फ़ौरन सिंह के मानवाधिकार उल्लंघन के सम्बन्ध में उन्हें अभिषेक सिंह से निजी व्यय तथा शासकीय स्तर पर समुचित मुआवजा दिलवाए जाने का निवेदन किया है.

उन्होंने अभिषेक सिंह द्वारा पूर्व में कई सरकारी कर्मियों के साथ किये गए कदाचरण का उल्लेख करते हुए यूपी के मुख्यमंत्री से विभागीय कार्यवाही में इन सभी प्रकरणों को भी सम्मिलित करने हेतु पत्र प्रेषित किया है.

सेवा में,
      जस्टिस के जी बालाकृष्णन,
      अध्यक्ष,
      राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
      नयी दिल्ली 

विषय- श्री अभिषेक सिंह, आईएएस, एसडीएम, महावन, मथुरा द्वारा मानवाधिकार हनन विषयक

महोदय,
      आज दिनांक 12/10/2014 को विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरों के अनुसार तहसील महावन, जनपद मथुरा के एसडीएम श्री अभिषेक सिंह ने मामूली सी गलती पर एक 55 वर्ष के शिक्षक को अपने कमरे में बुलाकर मुर्गा बना दिया. समाचारों के अनुसार श्री अभिषेक ने पुलिस भेजकर दिनांक 08/10/2014 (बुधवार) को रात लगभग 09 बजे बल्देमव विकास खंड के पूर्व माध्यमिक विद्यालय जुगसना के सहायक अध्यापक श्री फौरन सिंह को घर से बुलाया. पहले तो एसडीएम ने उन्हें फटकार लगाई फिर कान पकड़ कर उठक-बैठक लगवाने के लिए बाध्य किया. ऐसा न करने पर उन्होंने उन्हें जेल भिजवाने की धमकी भी दी. समाचार के मुताबिक श्री फ़ौरन सिंह को मजबूरीवश साथ आए बेटे के सामने ही रोते-रोते उठक-बैठक लगानी पड़ी.

समाचारों के अनुसार इसकी जानकारी मिलने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने श्री अभिषेक सिंह को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. मैं श्री अखिलेश यादव के इस कदम की प्रशंसा करती हूँ और इसके साथ ही आपसे इस प्रकरण में कतिपय बिन्दुओं पर संज्ञान लेते हुए आवश्यक कार्यवाही कराये जाने का निवेदन भी करती हूँ. 

निवेदन करुँगी कि इस घटना की जानकारी प्राप्त होने पर मैंने जनपद मथुरा के विभिन्न महत्वपूर्ण समाचारपत्रों के जिम्मेदार लोगों से वार्ता की ताकि मुझे मामले की सही वस्तुस्थिति ज्ञात हो सके. मैंने जितने भी लोगों से वार्ता की सभी ने मुझे यही बताया कि मामला बिलकुल सही है और इस प्रकरण में श्री अभिषेक सिंह ने यह अमानवीय और घृणित कार्य किया है. इसके बाद मैंने स्वयं श्री फ़ौरन सिंह और उनके पुत्र श्री सचिन ने उनके मोबाइल नंबर 097190-46623 तथा 097190-46623 पर वार्ता की. श्री फ़ौरन सिंह ने बताया कि वे तहसील मुख्यालय से करीब 20-25 किलोमीटर दूर रहते हैं. जब उन्हें रात में एसडीएम के पास आने के आदेश मिले थे तो उन्होंने इस बात की असमर्थता बतायी थी क्योंकि उनके पास तहसील पहुँचने का कोई साधन नहीं था. इस पर तहसील की ओर से एक जीप भेजी गयी जिसपर वे और उनके पुत्र तहसील आये. उनके साथ दो शिक्षा मित्र भी थे. तहसील आ कर वे श्री अभिषेक सिंह से मिले. श्री सिंह ने पहले तो उन्हें इस बात के लिए भला-बुरा कहा कि वे स्वयं तहसील क्यों नहीं आये, आखिर वे कोई लाट साहब हैं जिसके लिए गाडी भेजी जायेगी. इस पर श्री फ़ौरन सिंह ने कहा कि वे इस समय रात में गाड़ी से आ पाने में असमर्थ थे क्योंकि अन्य बातों के अलावा उन्हें अब आँख से भी कम दिखता है. इसके बाद श्री सिंह ने उन्हें काफी डांटा-फटकारा और कान पकड़ कर उठ्ठक-बैठक करने को कहा. श्री फ़ौरन सिंह को अपने पुत्र और अन्य लोगों की मौजूदगी में ऐसा करते हुए बहुत ख़राब लगा और उन्होंने ऐसा नहीं करने कला अनुरोध किया पर श्री अभिषेक सिंह ने उन्हें पुलिस बुला कर जेल में डालने की धमकी दी जिसके बाद श्री फ़ौरन सिंह को डर के मारे कई लोगों के सामने उठ्ठक-बैठक करन पड़ा.

इसके बाद रूम में मौजूद एक व्यक्ति, जिन्हें वे उस समय नहीं पहचानते थे और जिन्हें बाद में तहसीलदार बताया गया, ने उन्हें कमरे से बाहर चले जाने को कहा और वे बाहर आये. जब यह घटना शिक्षक संघ की जानकारी में आई तो लोगों ने विरोध किया. श्री फ़ौरन सिंह ने साफ़ कहा कि वे इस घटना से बहुत आहत हैं और इस प्रकार सार्वजनिक रूप से अपनी मर्यादा और प्रतिष्ठता के हनन से बहुत ही दुखी हैं.

श्री फ़ौरन सिंह के लड़के सचिन ने कहा कि यह सब उनकी मौजूदगी में हुआ. उन्होंने कहा कि इस प्रकार एक बुजुर्ग व्यक्ति के साथ आचरण अत्यंत ही निंदनीय है और किसी भी प्रकार से क्षमायोग्य नहीं कहा जा सकता. इसके अतिरिक्त मैं आपके सम्मुख एक समाचार “अफसर की हुकूमत में गुहार भी गुस्ताखी” की प्रति प्रेषित कर रही हूँ जिसमे श्री अभिषेक सिंह के इस कदाचरण के अतिरिक्त उनके छह माह पूर्व छाता तहसील में आरईएस के अधिशाषी अभियंता के साथ किये दुर्व्यवहार (कॉलर पकड़ कर तमाचा जड़ देना) तथा बरसाना में डीएम के साथ जाने पर रंग के छींटे पड़ने पर गेस्ट हाउस में बुला कर सफाई कर्मी को पीटने की घटना का भी उल्लेख है. उपरोक्त घटनाएँ इस बात का साक्षी हैं कि श्री अभिषेक संभवतः पूर्व में भी इस तरह के कदाचरण के आदी रहे हैं.

निवेदन करुँगी कि अनुचित और अमानवीय कृत्य तथा एक व्यक्ति के मानव अधिकार के हनन होने के साथ श्री अभिषेक सिंह का यह कार्य एक आपराधिक कृत्य भी है. जैसा कि आप अवगत हैं यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 (स्वेच्छया उपहति कारित करना- 1 वर्ष कारावास), 341 (किसी व्यक्ति का सदोष अवरोध करना- 1 माह का सादा कारावास), 342 (किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध- 1 वर्ष का कारावास), 506 (आपराधिक अभित्रास- 2 वर्ष का कारावास) के तहत अपराध है.
अतः निवेदन करुँगी कि इस मामले की उच्च-स्तरीय जांच कराते हुए इस प्रकरण में दोषी पाए जाने पर श्री अभिषेक सिंह के विरुद्ध समस्त आवश्यक विधिक तथा प्रशासनिक कार्यवाही कराये जाने की कृपा करें. साथ ही यह भी निवेदन करती हूँ कि श्री फ़ौरन सिंह के मानवाधिकार उल्लंघन तथा अमानवीय त्रासदी से गुजरने के सम्बन्ध में उन्हें श्री अभिषेक सिंह से निजी व्यय तथा शासकीय स्तर पर समुचित मुआवजा दिलवाए जाने की कृपा करें.

पत्रांक संख्या- NT/Comp/05/14 
दिनांक – 12/10/2014

भवदीय,

(डॉ नूतन ठाकुर)
 5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ

सेवा में,
      श्री अखिलेश यादव,
      मुख्यमंत्री,
      उत्तर प्रदेश शासन,
      लखनऊ  

विषय- श्री अभिषेक सिंह, आईएएस, एसडीएम, महावन, मथुरा द्वारा किये गए कदाचरण विषयक

महोदय,
      आज दिनांक 12/10/2014 को विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरों के अनुसार तहसील महावन, जनपद मथुरा के एसडीएम श्री अभिषेक सिंह ने मामूली सी गलती पर एक 55 वर्ष के शिक्षक को अपने कमरे में बुलाकर मुर्गा बना दिया. समाचारों के अनुसार श्री अभिषेक ने पुलिस भेजकर दिनांक 08/10/2014 (बुधवार) को रात लगभग 09 बजे बल्देमव विकास खंड के पूर्व माध्यमिक विद्यालय जुगसना के सहायक अध्यापक श्री फौरन सिंह को घर से बुलाया. पहले तो एसडीएम ने उन्हें फटकार लगाई फिर कान पकड़ कर उठक-बैठक लगवाने के लिए बाध्य किया. ऐसा न करने पर उन्होंने उन्हें जेल भिजवाने की धमकी भी दी. समाचार के मुताबिक श्री फ़ौरन सिंह को मजबूरीवश साथ आए बेटे के सामने ही रोते-रोते उठक-बैठक लगानी पड़ी.

समाचारों के अनुसार इसकी जानकारी मिलने पर आपने श्री अभिषेक सिंह को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. मैं आपके इस कदम की भूरी-भूरी प्रशंसा करती हूँ और इसके साथ ही आपसे इस प्रकरण में कतिपय बिन्दुओं पर संज्ञान लेते हुए आवश्यक कार्यवाही कराये जाने का निवेदन भी करती हूँ. 

निवेदन करुँगी कि इस घटना की जानकारी प्राप्त होने पर मैंने जनपद मथुरा के विभिन्न महत्वपूर्ण समाचारपत्रों के जिम्मेदार लोगों से वार्ता की ताकि मुझे मामले की सही वस्तुस्थिति ज्ञात हो सके. मैंने जितने भी लोगों से वार्ता की सभी ने मुझे यही बताया कि मामला बिलकुल सही है और इस प्रकरण में श्री अभिषेक सिंह ने यह अमानवीय और घृणित कार्य किया है. इसके बाद मैंने स्वयं श्री फ़ौरन सिंह और उनके पुत्र श्री सचिन ने उनके मोबाइल नंबर 097190-46623 तथा 097190-46623 पर वार्ता की. श्री फ़ौरन सिंह ने बताया कि वे तहसील मुख्यालय से करीब 20-25 किलोमीटर दूर रहते हैं. जब उन्हें रात में एसडीएम के पास आने के आदेश मिले थे तो उन्होंने इस बात की असमर्थता बतायी थी क्योंकि उनके पास तहसील पहुँचने का कोई साधन नहीं था. इस पर तहसील की ओर से एक जीप भेजी गयी जिसपर वे और उनके पुत्र तहसील आये. उनके साथ दो शिक्षा मित्र भी थे. तहसील आ कर वे श्री अभिषेक सिंह से मिले. श्री सिंह ने पहले तो उन्हें इस बात के लिए भला-बुरा कहा कि वे स्वयं तहसील क्यों नहीं आये, आखिर वे कोई लाट साहब हैं जिसके लिए गाडी भेजी जायेगी. इस पर श्री फ़ौरन सिंह ने कहा कि वे इस समय रात में गाड़ी से आ पाने में असमर्थ थे क्योंकि अन्य बातों के अलावा उन्हें अब आँख से भी कम दिखता है. इसके बाद श्री सिंह ने उन्हें काफी डांटा-फटकारा और कान पकड़ कर उठ्ठक-बैठक करने को कहा. श्री फ़ौरन सिंह को अपने पुत्र और अन्य लोगों की मौजूदगी में ऐसा करते हुए बहुत ख़राब लगा और उन्होंने ऐसा नहीं करने कला अनुरोध किया पर श्री अभिषेक सिंह ने उन्हें पुलिस बुला कर जेल में डालने की धमकी दी जिसके बाद श्री फ़ौरन सिंह को डर के मारे कई लोगों के सामने उठ्ठक-बैठक करन पड़ा.

इसके बाद रूम में मौजूद एक व्यक्ति, जिन्हें वे उस समय नहीं पहचानते थे और जिन्हें बाद में तहसीलदार बताया गया, ने उन्हें कमरे से बाहर चले जाने को कहा और वे बाहर आये. जब यह घटना शिक्षक संघ की जानकारी में आई तो लोगों ने विरोध किया. श्री फ़ौरन सिंह ने साफ़ कहा कि वे इस घटना से बहुत आहत हैं और इस प्रकार सार्वजनिक रूप से अपनी मर्यादा और प्रतिष्ठता के हनन से बहुत ही दुखी हैं. श्री फ़ौरन सिंह के लड़के सचिन ने कहा कि यह सब उनकी मौजूदगी में हुआ. उन्होंने कहा कि इस प्रकार एक बुजुर्ग व्यक्ति के साथ आचरण अत्यंत ही निंदनीय है और किसी भी प्रकार से क्षमायोग्य नहीं कहा जा सकता.

निवेदन करुँगी कि अनुचित और अमानवीय कृत्य तथा एक व्यक्ति के मानव अधिकार के हनन होने के साथ श्री अभिषेक सिंह का यह कार्य एक आपराधिक कृत्य भी है. जैसा कि आप अवगत हैं यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 (स्वेच्छया उपहति कारित करना- 1 वर्ष कारावास), 341 (किसी व्यक्ति का सदोष अवरोध करना- 1 माह का सादा कारावास), 342 (किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध- 1 वर्ष का कारावास), 506 (आपराधिक अभित्रास- 2 वर्ष का कारावास) के तहत अपराध है.
इसके अतिरिक्त मैं आपके सम्मुख एक समाचार “अफसर की हुकूमत में गुहार भी गुस्ताखी” की प्रति प्रेषित कर रही हूँ जिसमे श्री अभिषेक सिंह के इस कदाचरण के अतिरिक्त उनके छह माह पूर्व छाता तहसील में आरईएस के अधिशाषी अभियंता के साथ किये दुर्व्यवहार (कॉलर पकड़ कर तमाचा जड़ देना) तथा बरसाना में डीएम के साथ जाने पर रंग के छींटे पड़ने पर गेस्ट हाउस में बुला कर सफाई कर्मी को पीटने की घटना का भी उल्लेख है. उपरोक्त घटनाएँ इस बात का साक्षी हैं कि श्री अभिषेक संभवतः पूर्व में भी इस तरह के कदाचरण के आदी रहे हैं.

अतः निवेदन करुँगी कि इस मामले की निलंबन के उपरांत प्रारंभ की गयी विभागीय कार्यवाही में उपोक्त सभी तथ्यों को भी सम्मिलित किये जाने हेतु आदेशित करने की कृपा करें ताकि श्री अभिषेक सिंह के विरुद्ध नियमानुसार समस्त आवश्यक विधिक तथा प्रशासनिक कार्यवाही किये जा सकें.

पत्रांक संख्या- NT/Comp/06/14 
दिनांक – 12/10/2014

 भवदीय,

(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525

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