मीडिया को कैलाश जैसों से मतलब नहीं वो तो आमिर-अमिताभ को महिमामंडित करता है जिनके पीछे करोड़ों का बाज़ार खड़ा है

बचपन में फिल्मों के प्रति दीवानगी के दौर में फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं भी बड़े चाव से पढ़ी जाती थी। तब यह पढ़ कर बड़ी  हैरत होती थी कि फिल्मी पर्दे पर दस-बारह गुंडों से अकेले लड़ने वाले होरी वास्तव में वैसे नहीं है। इसी तरह दर्शकों को दांत पीसने पर मजबूर कर देने वाले खलनायक वास्तविक जिंदगी में बड़े ही नेक इंसान हैं। समाज के दूसरे क्षेत्र में भी यह नियम लागू होता है। कोई जरूरी नहीं कि दुनिया के सामने भल मन साहत का ढिंढोरा पीटने वाले सचमुच वैसे ही हों। वहीं काफी लोग चुपचाप बड़े कामों में लगे रहते हैं। बचपन बचाओ आंदोलन के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी का मामला भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। ये कौन हैं… किस क्षेत्र से जुड़े हैं… किसलिए… वगैरह – वगैरह। ऐसे कई सवाल हवा में उछले जब कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। क्योंकि लोगों की इस बारे में जानकारी बहुत कम थी।

बचपन बचाओ आंदोलन की चर्चा यदा-कदा शायद अखबारों में पढ़ी भी गई हो, लेकिन इसे चलाने वाले और अंत में नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी के योगदान से अधिकांश लोग लगभग अनभिज्ञ ही थे। भले ही नोबल पुरस्कार मिलने के बाद से तमाम चैनल और समाचात्र पत्र आज उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हों। कैलाश से ज्यादा प्रचार तो अपने देश में तालिबानियों के हमले का शिकार हुई मलाला युसूफजई को मिला। यह मामला एक सुपात्र की उपेक्षा का ही नहीं, बल्कि इस बहाने मीडिया की कार्यशैली व क्षमता भी सवालों के घेरे में कैद हो जाती है। सवाल उठता है कि अगर देश की राजधानी दिल्ली से अपना आंदोलन चलाने वाले कैलाश सत्यार्थी अब तक मीडिया की रौशनी से वचित रहे, तो उन हजारों  निस्वार्थ स्वयंसेवकों का क्या, जो देश के कोने-कोने में खुद दिए की तरह जल कर समाज को रोशन करने का कार्य कर रहे हैं।

आज कैलाश सत्यार्थी और उनके आंदोलन को लेकर दर्जनों तरह की खबरें चलाई जा रही है। लेकिन इससे पहले तो उनके विषय में रुटीन खबरें तक नहीं चली। उनके बदले कभी अन्ना, तो कभी केजरीवाल व मोदी ही मीडिया के कैलाश बने रहे। देशवासियों को उनके बारे में पता तब ही चला जब विदेशियों ने उन्हें नोबल पुरस्कार देने की घोषणा की। इस बहाने क्या मीडिया को आत्ममंथन नहीं करना चाहिए। दरअसल मीडिया के साथ यह विडंबना पुरानी है। कश्मीर में बाढ़ आती है तो मीडिया में उस के कवरेज के लिए टूट पड़ता है, लेकिन असम समेत देश का पूर्वोत्तर क्षेत्र आज भी बाढ़ की चपेट में है, लेकिन उस पर एक लाइन की भी खबर मीडिया में नजर नहीं आती।

छात्र जीवन में क्रिकेट के प्रति दीवानगी के दौर में समाचार पत्र व पत्रिकाओं में नामी क्रिकेट खिलाड़ियों के खेल स्तंभ पढ़ कर मैं आश्चर्य में पड़ जाता था। बाद में पता चला कि यह खिलाड़ियों की कमाई का जरिया है। खिलाड़ी लिखते नहीं बल्कि मीडिया घराने अपने मतलब के लिए खिलाड़ियों से लिखवाते और छापते हैं। फिर राजनेताओं के अखबारों में स्तंभ लेखन का दौर चला। जिसे पढ़ कर सोच में पड़ जाना पड़ता है कि हमारे राजनेता अपने पेशे से इतर अच्छा कलम भी चला लेते हैं। चैनलों का दौर शुरू होने पर किसी न किसी बहाने राजनेताओं का चेहरा दिखाने की होड़ तो लगभग हमेशा मची ही रहती है।

आज ही एक अग्रणी अखबार खोला तो उसमें अपने सांसद से मिलिए स्तंभ के तहत एक सांसद का जीवन परिचय छपा मिला। दूसरे में राज्यपाल बन कर अचानक चर्चा में आए एक अन्य राजनेता की चार कविताएं नजर आई। जिसके जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई कि महामहिम अच्छे कवि तो हैं ही, देखो हम उनके कितने निकट हैं। जो उनसे कविता लिखवा कर आप तक पहुंचा रहे हैं। यह कहना अनुचित होगा कि मीडिया में राजनेताओं व अन्य सितारों को बिल्कुल स्थान नहीं मिलना चाहिए। लेकिन यदि कैलाश सत्यार्थी जैसों की उपेक्षा कर मीडिया अपने कैलाश लोगों पर थोपने की कोशिश करता रहे, तो विरोध तो होना ही चाहिए।

आश्चर्य कि कभी केजरीवाल तो कभी मोदी की माला जपने वाले मीडिया को देश की राजधानी के कर्मयोगी कैलाश सत्यार्थी की सुध तभी आई जब उन्हें नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। इससे पहले तक तो मीडिया आमिर खान के सत्यमेव जयते, आइपीएल या अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति को महिमामंडित करने में जुटा था। क्या इसलिए कि इसके पीछे करोड़ों का बाजार खड़ा है।

 

लेखक तारकेश कुमार ओझा दैनिक जागरण से जुड़े हैं। संपर्कः 09434453934

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मजीठिया के लिए इधर-उधर भटकने से बेहतर है कि सीधे कोर्ट जाएं या फिर सुप्रीम कोर्ट और केन्द्रीय श्रम मंत्रालय में आरटीआई लगाएं

मजीठिया वेतनमान को लेकर पत्रकारों के लिए 10 नबंवर का दिन खास हो सकता है। इस दिन गुजरात हाईकोर्ट पत्रकारों के केस की अंतिम सुनवाई करने वाला है यदि इसी दिन फैसला आ जाता है तो मजीठिया वेतनमान को लेकर प्रेस मलिकों की आफत तो तय है। जाहिर है इस केस का आधार लेकर हर राज्य में पत्रकार हाईकोर्ट जा सकते। दरअसल लेबर कोर्ट पत्रकारों का केस यह कहकर लेने से मना करता है कि वेतन भुगतान अधिनियम के तहत हम 14 हजार वेतन तक के मामलों की सुनवाई कर सकते है उससे अधिक वेतन पाने वाले अधिकारिक वेतनमान की श्रेणी में आते है और हाईकोर्ट ही मामले की सुनवाई कर सकता है।

खैर पत्रकारों के पक्ष में फैसला होना तय है क्योंकि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत 95 प्रतिशत फैसले लेबर के पक्ष में जाते हैं मालिकों को सिर्फ हड़ताल में राहत मिल सकती है। उक्त मामले में प्रेस प्रबंधन ने अब तक सिर्फ एक ही दलील दी है कि कर्मचारी मजीठिया वेतनमान नहीं लेना चाहते।

हो क्या रहा है

वर्तमान समय में टॉप प्रेस व मीडिया मालिकों को मोदी सरकार की तरफ से खूब पैसे दिए जा रहे है। ऐसे में कोई भी मीडिया या प्रेस संस्थान मोदी के खिलाफ कुछ बोलने या लिखने से कतरा रहा है। उद्योगिक संस्थान लाने के लिए केन्द्र सरकार श्रम कानूनों को शिथिल करने में लगी हुई है। लेकिन नरेन्द्र मोदी को एक बात अच्छे से समझ लेनी चाहिए कि 2003 के लोक सभा चुनाव में भी बीजेपी ने फील गुड का नारा दिया था जनता ने फीड गुड करा दिया था। सिर्फ बडबोल बोलने से, घोषणाएं करने से प्यासे की प्यास बुझ जाए, भूखे की भूख खत्म हो जाए तो आश्वासन व घोषणाएं ही होनी लगे।

श्रम विभाग की कमाई का जरिया

मजीठिया वेतनमान श्रम विभाग की कमाई का अच्छा जरिया बन गया है। यदि इससे संबंधित कोई शिकायत आती है तो श्रम विभाग पहली नोटिस तो आनन-फानन में जारी करता है। फिर संस्थान के मैनेजर से संपर्क साधकर पैसे की मांग करता है जिससे उक्त केस कोर्ट ना फारवर्ड किया जाए। अब जब श्रमिक विभाग जाता है तो समझौता कराने के लिए एक-एक माह की डेट दी जाती है। उस दिन संस्था की तरफ से कोई नहीं आता तो दूसरी नोटिस, फिर घूस और दूसरी नोटिस में भी नहीं आया तो एक बार और समय, तीसरी बार भी नहीं आया तो राज्य शासन के श्रम मंत्रालय भेज देते है या भी नोटिस पर नोटिस का खेल चलता है अंत में मामला श्रम न्यायालय भेजा जाता है तब तक 1 साल बीत जाते है।
 अब पत्रकार घूमता रहे इससे बेहतर है सीधे हाईकोर्ट चला जाए तो श्रम विभाग के चक्कर नहीं लगाने पड़ेगे। नतीजन सभी प्रेस मालिक यह आदेश निकाल चुके है कि श्रम विभाग के बारे में कुछ नहीं लिखना है क्योंकि यदि लिखे तो दूसरे दिन मजीठिया वेतनमान को लेकर नोटिस आ जाएगी या छापा पड़ जाएगा।

आरटीआई लगाएं

वैसे इधर-उधर भटकने से बेहतर है कि सीधे कोर्ट जाएं। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर पत्रकार सूचना का अधिकार लगाकर जिले के श्रम विभाग और श्रमायुक्त से यह पूछे की मजीठिया वेज बोर्ड के संबंध में 7 फरवरी 2014 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य/जिले के कितने कितने प्रेस अनुपालन कर रहे है। या राज्य/जिले के कितने प्रिंट मीडिया/न्यूज एजेंसियां मजीठिया वेतनमान दे रही है। दूसरा प्रश्न यह पूछें कि यदि मजीठिया वेतनमान नहीं दे रही है तो विभाग द्वारा क्या कार्यवाही की गई।

ऐसी ही आरटीआई सुप्रीम कोर्ट और केन्द्रीय श्रम मंत्रालय में लगाए फिर पत्रकारों की सक्रियता और एकता के आगे कौन टिकता है। वर्तमान समय में पत्रकारों को एकजुट होने की जरूरत है, यदि मजीठिया वेतनमान पत्रकारों को मिलने लगेगा तो मीडिया संस्थानों के अंदर की राजनीति, पेड न्यूज की बीमारी, प्रतिस्पर्धा आदि अपने आप खत्म हो जाएंगी। चूंकि पत्रकार की कलम किसी की गुलाम नहीं, प्रेस मालिक यदि लिखने नहीं देगे तो अभिव्यक्ति के हजार माध्यम है सो अपनी अभिव्यक्ति का गला ना घोटें और उक्त मामले में खुलकर कलम चलाए।

वेतन गणना

वेतन गणना का अच्छा कार्य सीए ही कर सकता है फिर भी सामान्य जानकारी के अनुसार गणना पेश की जा रही है।

जैसे मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसा के अनुसार उच्च वेतन पर विचार करें तो वर्ग 1 श्रेणी के अखबार जितना टर्न ओवर 1000 करोड़ से ऊपर है। वर्ग एक के पत्रकारों अर्थात् सलाहकार संपादक, रेसिडेंट एडिटर्स, मैनेजर एडिटर्स आदि का वेतनमान 25000 एआरआई (4 प्रतिशत) 54800 मतलब 54800 मूल वेतनमान है जबकि 25000 को आधार मानकर साल में 4 प्रतिशत वेतन वृद्धि करनी है। अर्थात् इस वेतनमान पर साल में वेतन वृद्धि महज 1000 रूपए होगी और यह बेसिक में जुड़ जाएगी और अगले साल का वेतन 55800 हो जाएगा।

मूल वेतन 54800
वेरिएबल पे 19180                                    बेसिक का 35 प्रतिशत (चार्ट अनुसार)
डीयरनेस एलांउस (डीए) 35620                      बेसिक का 65 प्रतिशत
(1 जनवरी 2014 से जून 2014 की गणना)

जुलाई 2014 से दिसंबर 2014 तक का डीए
डीयरनेस एलांउस (डीए) 40004                      जुलाई 2014 से दिसंबर 2014 तक 73 प्रतिशत

हाउस रेंट- 7398                                      (बेसिक $ वेरियवल पे का 10 प्रतिशत)
मकान किराया एक्स शहर के लिए बेसिक का 30 प्रतिशत, वाई शहर के लिए 20 प्रतिशत और जेड श्रेणी के शहर के लिए 10 प्रतिशत निर्धारित है।
कौन सा शहर किस श्रेणी का है इसका निर्धारण मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा में दिया हुआ है।

ट्रास्टपोर्ट एलाउंस 3699                              (बेसिक $ वेरियवल पे का 5 प्रतिशत)
ट्रास्टपोर्ट एलाउंस एक्स शहर के लिए बेसिक का 20 प्रतिषत, वाई शहर के लिए 10 प्रतिशत और जेड श्रेणी के शहर के लिए 5 प्रतिशत निर्धारित है।

मेडिकल एलांउस 1000
मेडिकल एलाउंस वर्ग 1 व 2 के अखबारों के लिए लिए 1000 और 3 व 4 श्रेणी के अखबारों के लिए 500 रूपए निर्धारित है।

नाइट एलाउंस 3000, 100 रूपए प्रतिदिन
वर्ग 1 व 2 के अखबारों के लिए लिए 100 रूपए प्रतिदिन और 3 व 4 श्रेणी के लिए 75 रूपए व अन्य श्रेणी के अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को 50 रूपए प्रतिदिन निर्धारित है।

कनवेन्स 9130 बेसिक का 16.66 प्रतिशत
समुद्र तल से 1500 मीटर ऊंची जगहों में रहने वालों पत्रकारों को हार्डशिप एलांउस 1000 रूपए प्रतिमाह दी जाती है।

इसमें पीएफ 12.36 प्रतिषत व इनकम टैक्स की कटौती होती है।

इसके अलावा तीन उच्च माह के वेतन के बराबर एरियर्स अर्थात् तीन माह का वेतन और एक माह के वेतन के बराबर न्यूनतम बोनस देने का मजीठिया वेतनबोर्ड में प्रावधान है।

दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, जागरण, नईदुनिया, इंडियन एक्सप्रेस आदि प्रेस का आय-व्यय 1000 करोड़ से ऊपर है। यदि इतना वेतन मिलने लगे तो पत्रकारों को कोई छोटी दृष्टि से नहीं देखेगा।

नोट- मजीठिया वेतन बोर्ड की गणना कृप्या अच्छे सीए से कराए। उक्त गणना सिर्फ जानकारी के लिए है विषेषज्ञ या अंतिम गणना नहीं है।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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भारत में ग़ैर सरकारी संगठनों का उभार और कैलाश सत्यार्थी को नोबेल मिलना महज़ इत्तेफाक नहीं

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यह संभवतः सन 2005 की बात है, एक शाम मैं सहारा समय समाचार चैनल देख रहा था तो एक समाचार प्रसारित हुआ कि कैलाश सत्यार्थी का नाम नोबल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित हुआ है। मुझे इस  बात पर आश्चर्य हुआ। मैं तब मध्य प्रदेश के धार जिले में था वहां से मैंने इस बात की पुष्टि करनी चाही। उन दिनों सहारा समय के विदिशा के पत्रकार बृजेन्द्र पांडे हुआ करते थे वहीँ से यह समाचार लगा था।  बृजेंद्र पांडे, मेरे और कैलाश के सहपाठी थे सन 1967-69 में विदिशा के हायर सेकेण्ड्री स्कूल में। बाद को कैलाश ने इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन ले लिया, मैंने और बृजेंद्र ने बीएससी में।

मैंने उन्हें फ़ोन लगाया और इस बाबत उनसे पूछा। उन्होंने बताया कि कई लोगों ने कैलाश का नाम प्रस्तावित किया था। नोबल पुरस्कार लिए तब उन्हें नामांकित नहीं किया गया था। आज जब मैं बेटी से मिलने वैंकूवर पहुंचा तो उसने बताया कि आपके मित्र कैलाश सत्यार्थी अंकल को ‘पीस’  नोबल पुरस्कार मिला है। कुछ महीने पहले मैं मेरी पत्नी तथा बेटी कैलाश के अलवर जिले के आश्रम गए थे। वहां उनकी पत्नी तथा बेटी भी थी। आज यह समाचार सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। मलाला युसुफ़ज़ई के साथ सम्मिलित रूप से उन्हें 2014 का शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बच्चों और युवाओं के दमन के ख़िलाफ़ कार्य करने तथा सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए दिया गया है।

कैलाश बंधुआ मजदूरी एवं बाल श्रम के विरुद्ध भारतीय अभियान में 1990 के दशक से ही सक्रिय रहे हैं, आंदोलन करते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके द्वारा संचालित संगठन ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ ने लगभग 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और उनके पुनर्वास एवं शिक्षा की व्यवस्था में सहायता की है। कैलाश सत्यार्थी पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं। हायर सेकंड्री तक कैलाश एक मेधावी छात्र थे। इंजीनियरिंग में प्रवेश के बाद उनका ढर्रा बदलने लगा। वह आर्य समाजी तो थे ही फिर लोहियावादी भी हो गए। जाति-पांति में कैलाश का विश्वास नहीं था।

एक दिन विदिशा के नीमताल चौराहे पर कैलाश ने दलित अछूतों से भोजन बनवाया और बिना किसी की परवाह किये बीच चौराहे पर बैठ दलित बंधुओं के साथ हम लोगों ने भोजन किया। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो उन्होंने समाजवादी दल के प्रत्याशी का दल बल के साथ प्रचार किया था। चुनाव के परिणाम आने के बाद कैलाश मुझे भोपाल के विधायक निवास ले गए और वहां तब निर्वाचित विधायक रघु ठाकुर से भेंट कराई थी। आर्य समाज तो उनका प्रथम प्रेम था जिसके चलते वह स्वामी अग्निवेश  संपर्क में आए और बंधुआ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए। यही उनकी इस क्षेत्र में पहली पाठशाला थी। बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्त कराना उनकी प्राथमिकता बन गई और पैशन भी।

एक बार इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य ने उनसे पूछा था कैलाश तुम्हारी योग्यता क्या है तब कैलाश ने कहा था आप देख रहे हैं जो कुछ में कर रहा हूं यही मेरी योग्यता है। तब कैलाश की इस योग्यता पर शायद किसी को विश्वास न रहा हो लेकिन आज यह प्रमाणित हो गया है कि कैलाश की यह योग्यता किसी अकादमिक योग्यता से कहीं बड़ी थी। ह्यूमन राइट्स वॉच के द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार “भारत में बाल यौन उत्पीड़न घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रों में आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियाँ “स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।”

भारत में बाल यौन उत्पीड़न से निपटने की प्रणाली और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में अपर्याप्त हैं। अनेक बच्चों को दोबारा दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जाँच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते। सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पीड़ितों के साथ व्यवहार के मामलों को रोक पाने में विफल रहा है। यूं तो स्कूलों को बच्चों का वर्तमान व भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है। लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं। सस्ते श्रमिक, बंधुआ मजदूर, बच्चों एवं महिलाओं की तस्करी और उनपर किये जाने वाले जुल्म बढ़ रहे हैं। दिल्ली में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से घरों में काम करने वाले बच्चों को लाया जाता है और उनके साथ लगातार अन्याय किया जाता है। दिल्ली की हाल ही की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

विकलांग बच्चों के जीवन के जन्म पहले दिन से बहिष्कार शुरू हो जाता है। सरकारी मान्यता के अभाव में, उन्हे अपने अस्तित्व और संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं और कानूनी सुरक्षा से काट दिए जाता हैं। उनकी उपेक्षा ही भेदभाव बढ़ाती है। द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन’स 2013: चिल्ड्रन विथ डिसेबिलिटी कहती है कि विकलांग बच्चों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने या स्कूल जाने की कम से कम संभावना होती है। वे हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा के सबसे बडी कमजोरी के बीच होते है खास कर जब अगर उन्हे छिपाया जाता है या संस्थानों में डाला जाता हैं- कई सामाजिक कलंक के कारण या उन्हें उठाने की खर्च के कारण। वे दुनिया में सबसे उपेक्षित लोगों के बीच में है।

गरीबी में रहने वाले बच्चों को अपने स्थानीय स्कूल या क्लिनिक में कम से कम में भाग लेने की संभावना होती है, लेकिन जो गरीबी में रहते हैं और विकलांग भी हैं  उन लोगों में ऐसा कर पाने की संभावना कम होती है। भारत में बच्चों के लिए हज़ारों एनजीओ काम कर रहे हैं, फिर भी हर लाल-बत्ती पर बच्चे भीख मांगते हैं, हर खान-खदान-ढाबे-फैक्टरी में बच्चे काम करते हैं, हज़ारों बच्चे ग़ायब कर दिये जाते हैं, अनगिनत की करके हत्याएं कर दी जाती हैं। कैलाश को ये सम्मान मिलने के साथ ही कई सवाल भी उठने लगे है। नोबेल की राजनीति विचित्र है। गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार देने से इंकार करते हुए उन पर रंगभेदी होने का आरोप भी लगा दिया गया और विडंबना देखिये कि गांधी नाम का उपयोग करने के लिए कैलाश सत्यार्थी को यह पुरस्कार दे दिया गया।

पिछले कुछ समय में जिन लोगों को शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, उसने तो नोबेल की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। बराक ओबामा, अल-गोर, हेनरी किसिंगर जैसे को क्या सोचकर नोबेल का शान्ति पुरस्कार दिया गया, इस पर अनुसन्धान की आवश्यकता पड़ेगी! इससे जुड़ी इनामी रकम और दूसरी सुविधाओं की वजह से इन पुरस्कार के लिए लॉबिंग पहले से कहीं ज्यादा होने लगी है। कुल मिलाकर, इस बार कैलाश सत्यार्थी को जो नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला है और अतीत में जिन शान्तिदूतों को यह पुरस्कार दिया जाता रहा है, वह नोबेल पुरस्कार के पीछे काम करने वाली पूरी राजनीति का चेहरा साफ कर देता है। शेख हसीना के हवाले से कहा गया था कि नार्वे की टेलीनॉर कंपनी ने यूनुस के लिए लॉबिंग की और भारी भरकम धनराशि क्लिंटन फाउंडेशन को दान में दी, जिसके कारण उन्हें वर्ष 2006 में नोबल पुरस्कार मिल सका।

अमेरिका की मशहूर मैग्जीन फोर्ब्स में काम करनेवाली महिला पत्रकार मेघा बाहरी ने कैलाश सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। मेघा ने अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए उन पर आरोप लगाया है। मेघा ने कैलाश के एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन पर गलत तरीके से फंड जुटाने का आरोप लगाया है। मेघा ने उन्हें नोबल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़ा किया है। मेघा बहरी ने लिखा है कि कैलाश सत्यार्थी नोबेल योग्य नहीं हैं। मेघा ने उनकी संस्था ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में कैलाश सत्यार्थी के एक सहयोगी ने यूपी के एक गांव में बाल मजदूरी को लेकर जो दावे किए थे वो झूठे निकले। उन्होंने लिखा है कि ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ज्यादा से ज्यादा विदेशी फंड हासिल करने लिए बाल मजदूरी के झूठे आंकड़े देती है।

अपने लेख में उन्होंने सत्यार्थी पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में फोर्ब्स  के लिए भारत में बाल श्रम के उपयोग पर एक आर्टिकल लिखते वक्त मैं बचपन बचाओ आंदोलन से मिली। संस्था से जु़ड़े व्यक्ति ने उन्हें बताया कि उत्तर प्रदेश का कार्पेट बेल्ट जहां गांव के हर घर के बच्चे दूसरे देशों को भेजे जाने वाले कालीन को बनाने में लगे हैं। जब मेघा से उस जगह को दिखाने की बात कही तो वो शख्स उन्हें घुमाता रहा। वो मेघा को यूपी के एक गांव में लेकर गया। मेघा ने अपने लेख में लिखा है कि मुझे उस गांव में कोई बच्चा काम करता नहीं दिखा। जब मैंने उससे सवाल किए तो वो मुझे एक घर के पास लेकर गया जहां कालीन का काम कर रहे लोगों के पास दो बच्चे बैठे थे। दोनों बच्चों में खास बात यह थी कि वे स्कूल ड्रेस में थे।

मेघा आगे बताती है कि मैं वहां से खुद ही निकल पड़ी और कई जगह देखा। मेघा ने 2008 की इस पूरी घटना का जिक्र किया है और इसके पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा है कि जितने बच्चों को आप बचाते हुए दिखाते हैं विदेशों से उतना ही बड़ा चंदा आपको मिलता है। भारत में ज़्यादातर एनजीओ को लेकर तमाम सवालात उठ रहे हैं, उन्हें हो रही विदेशी फंडिंग और उसके पीछे की मंशा पर चिंता जताई जा रही है, भारत के एक एनजीओ संचालक को नोबेल मिला है और इसे बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान की एक बच्ची के साथ उसे बांट दिया गया है।

इस नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग से इतना कन्फर्म है कि इसे दुनिया के प्रभावशाली मुल्कों, ख़ासकर अमेरिका का संरक्षण-समर्थन हासिल है। यह अकारण नहीं है। क्या अजीब इत्तेफ़ाक है कि भारत में पिछले तीन-चार साल में एनजीओ का ज़बर्दस्त उभार देखा जा रहा है। एक-एक प्रोजेक्ट पर दुनिया के बड़े-बड़े दिमागों और इवेंट मैनेजरों द्वारा मंथन किया जाता है। मिलते-जुलते नज़ारे दुनिया के कुछ अन्य देशों में दिखाई देते हैं, जिससे लगता है कि हो न हो, इन सारे इवेंट्स की प्लानिंग और फंडिंग करने वाले लोग कॉमन हैं।

 

शैलेंद्र चौहान। संपर्क: ३४/२४२, प्रतापनगर, जयपुर – ३०२०३३ (राजस्थान),
मो. 917838897877

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केपी गंगवार बने जर्नलिस्ट यूनियन ऑफ उत्तराखण्ड की रुद्रपुर इकाई के अध्यक्ष, गोपाल भारती महामंत्री

रुद्रपुर। जर्नलिस्ट यूनियन ऑफ उत्तराखण्ड की नगर ईकाई का गठन करते हुये यूनियन के जिलाध्यक्ष नारायण दत्त भट्ट ने के.पी. गंगवार को पुनः यूनियन का नगरध्यक्ष घोषित किया है। इसके अलावा गोपाल भारती को महामंत्री, अमन सिंह को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार यूनियन की एक बैठक जिलाध्यक्ष नारायण दत्त भट्ट की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में नगरध्यक्ष के.पी. गंगवार द्वारा विगत के कार्यो का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया इसके बाद सर्व सम्मति से नई कार्यकारिणी का गठन किया गया। जिसमें के.पी. गंगवार को पुनः नगरध्यक्ष, गोपाल भारती को महामंत्री, अमन सिंह को कोषाध्यक्ष, संजय भटनागर को सचिव/मीडिया प्रभारी, सुदेश जौहरी को वरिष्ठउपाध्यक्ष, शुभोदुति मण्डल को उपाध्यक्ष, एवं प्रवीण अरोरा को प्रवक्ता नियुक्त किया गया।

सभी निर्वाचित पदाध्किारियों को नारायण दत्त भट्ट द्वारा नियुक्ति पत्रा सौंपे गये। इस अवसर पर भट्ट ने कहा कि पत्राकारों की हितों की लड़ाई संगठन ने हमेशा लड़ी है और आगे भी लड़ी जायेगी। संगठन के प्रत्येक सदस्य का दुर्घटना बीमा एक लाख से बढ़ाकर दो लाख की दिया है। इसके अलावा संगठन का राष्ट्रीय का सम्मेलन इस वर्ष जुलाई में असम में होगा जिसमें पूरे देश के पत्राकार हिस्सा लेगें।

शीघ्र ही नगर कार्यकारिणी का विस्तार कर संगठन को मजबूत बनाने के लिये एक बड़ी बैठक का आयोजन रुद्रपुर में किया जायेगा। इस मौके पर संगठन के सभी सदस्य मौजूद थे।

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बंगलूरू के टीवी पत्रकार ने फांसी लगा कर जान दी

बंगलूरू। एक चैनल के पत्रकार संजय, 29 वर्ष, ने शुक्रवार की रात घर में पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली। वे चैनल में कापी एडिटर थे।

पुलिस के अनुसार, संजय की हाल ही में शादी हुई थी और वह एक किराए के मकान में अपनी पत्नी के साथ रह रहे थे। संजय की पत्नी इस समय बाहर थी और शुक्रवार को वह पत्नी से मिलकर लौटा था। पुलिस ने बताया कि जब उसकी पत्नी ने शनिवार को हालचाल जानने के लिए फोन किया तो संजय ने फोन नहीं उठाया। उसके बाद उसने पड़ोसी को फोन करके संजय से बात कराने के लिए कहा। पड़ोसी ने भी कोशिश की पर संजय ने अंदर से दरवाजा नहीं खोला।

इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस पहुंची तो उसे संजय छत के पंखे से लटका मिला। पुलिस को किसी भी प्रकार का कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। पुलिस ने आत्महत्या का मामला दर्ज कर लिया गया है। संजय के सहयोगियों और रिश्तेदारों से पूछताछ हो रही है। आत्महत्या के कारणों का पता नहीं चल सका।

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सुब्रत रॉय की रिहाई के लिए हेज फंड से कर्ज़ लेगा सहारा समूह

सहारा ग्रुप अपने चीफ सुब्रत रॉय की रिहाई वास्ते धन जुटाने के लिए दो अमरीकी हेज फंज फंडों से बात कर रहा हैं। इस सौदे से सहारा ग्रुप करीब एक अरब डॉलर (6000 करोड़ रुपए) का कर्ज़ जुटाना चाहता है। मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक ये दोनों हेज फंड, विदेशों में सहारा समूह के तीन होटलों पर कुल एक अरब डॉलर से अधिक (6,000 करोड़ रुपये) के ऋण के वित्त पोषण के लिए धन दे सकते हैं।

इन होटल संपत्तियों में समूह का लंदन में ग्रासवेनोर हाउस होटल और न्यूयार्क के दो होटल प्लाजा और ड्रीम डाउनटाउन होटल शामिल हैं।

सहारा ग्रुप के प्रवक्ता ने कहा, ‘इस मामले में हम बस यही कह सकते हैं कि यह समाचार पूरी तरह से गलत है।’ प्रवक्ता ने इ-मेल से भेजे जवाब में कहा, ‘ बात जाहिर न करने की सहमति की वजह से संपत्तियों के सौदे से जुड़े किसी भी मुद्दे पर टिप्पणी न करने की हमारी असमर्थता को आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं। आप इस तथ्य से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि बात न करने की सहमति का विदेश में कितनी सख्ती से पालन किया जाता है।’

इससे पहले रॉय दिल्ली में तिहाड़ जेल में अपने कामचलाऊ ऑफिस से होटलों की बिक्री का सौदा करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन तिहाड़ जेल के कान्फ्रेंस रूम को दफ्तर की तरह इस्तेमाल की छूट का समय खत्म होने के कारण वह सौदा नहीं कर सके। गौरतलब है कि निवेशकों का अरबों डॉलर का धन लौटाने के मामले में भारतीय शेयर बाजार नियामक (सेबी) के साथ लंबे समय से चल रहे विवाद में रॉय मार्च से जेल में बंद हैं।

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मुख्यमंत्री ने पत्रकार किरन खरे के निधन पर शोक व्यक्त किया

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पत्रकार किरन खरे के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी संवेदना भी व्यक्त की है। किरन खरे सूचना विभाग में कार्यरत दिनेश खरे की पत्नी थीं।

 

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आईएसआईएस ने इराकी टीवी पत्रकार समेत 13 की हत्या की

समारा (इराक) : इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने उत्तरी बगदाद के विभिन्न शहरों एवं गांवों में एक इराकी समाचार कैमरामैन और 12 अन्य की हत्या कर दी। इस बात की जानकारी अधिकारियों, मारे गए लोगों के संबंधियों और प्रत्यक्षदर्शियों ने दी।

पत्रकार के संबंधियों ने कहा कि जिहादियों ने कल स्थानीय ख़बरिया चैनल समा सलाहेद्दीन के लिए काम करने वाले 37 वर्षीय कैमरामैन राद अल-अजवी, उसके भाई और दो अन्य नागरिकों की तिकरित शहर के पूर्व में स्थित समारा गांव में गोली मारकर हत्या कर दी।

गर्वनर राइद इब्राहिम ने भी बताया कि शुक्रवार को तिकरित शहर में आतंकवादियों ने राद अल अज्जावी की हत्या कर दी। उन्होंने कहा कि वह और जानकारी देने में अक्षम हैं।

संबंधी ने कहा, ‘वे उसके घर आए और उसे एवं उसके भाई को ले गए। उसने कुछ गलत नहीं किया था। उसका अपराध सिर्फ यह था कि वह एक कैमरामैन था। वह बस अपना काम कर रहा था।’ उसने कहा, ‘गांव के कुछ लोगों ने उस पर सरकार के लिए काम करने का आरोप लगाया और इसकी जानकारी जिहादियों को दे दी होगी। वह हमेशा अपना कैमरा अपने साथ रखता था।’

सीरिया-इराक की सीमा के आर पार बड़े हिस्सों पर कब्जा कर चुका इस्लामिक स्टेट समूह सीरिया में कई पत्रकारों की सिर काटकर हत्या कर चुका है। उसका कहना है कि ये हत्याएं अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन के इराक और सीरिया में हवाई हमले का जवाब हैं।

प्रेस की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) रिपोर्टर्स विदाउट बॉडर्स ने पिछले महीने कहा था कि आतंकवादियों ने सुन्नी आतंकी समूह में शामिल होने से इनकार करने के लिए तीन बच्चों के पिता अल अज्जावी को मारने की धमकी दी थी।

एनजीओ ने कहा कि अल अज्जावी का सात सितंबर को अपहरण किया गया था।

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आईजी से शिकायत का हुआ असर, चौकी इंचार्ज ने लौटाए घूस के रुपए लेकिन दो हज़ार काट के

अमेठी जिले के गाँव ओटिया, पुलिस चौकी इन्होना, थाना शिवरतनगंज में एक हरा पेड़ काटने के मामले में चौकी इंचार्ज महेश चंद्रा द्वारा ठेकेदार ताज मोहम्मद उर्फ़ तजऊ को पकड़ कर 15,000 रुपये वसूलने के मामले में आइपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा आईजी ज़ोन लखनऊ सुभाष चंद्रा को शिकायत करने के बाद 13,000 रुपये वापस हो गए हैं. चौकी इंचार्ज ने 2,000 रुपये इसलिए वापस नहीं किये क्योंकि यह हरा पेड़ काटने का पुलिस चौकी का अपना रेट है.

दरअसल ओटिया गाँव के नफीस खान द्वारा एएसपी मुन्ना लाल और एसपी अमेठी हीरा लाल को इस मामले की जानकारी देने पर कार्यवाही करने की जगह ठेकेदार से बढ़ी धनराशि वसूल कर मामले को रफादफा करने का प्रयास किया गया था जिस पर नफीस ने अमिताभ ठाकुर से शिकायत की थी.

ठाकुर ने आईजी ज़ोन से शिकायत करने के साथ मौके पर जा कर जांच की थी जिसके बाद चौकी इंचार्ज ने 13,000 रुपये वापस कर दिए पर साथ ही नफीस और ठेकेदार पर अपना बयान बदलने का भी दवाब बनाया. ये बातें जानकारी में आने पर ठाकुर ने अब डीजीपी ए एल बनर्जी को इन तथ्यों से अवगत कराते हुए अपने स्तर से जांच कराने की मांग की है.

सेवा में,
      श्री ए एल बैनर्जी,
      पुलिस महानिदेशक,
      उत्तर प्रदेश,
      लखनऊ

विषय- एसपी और एएसपी, अमेठी को हरा पेड़ कटने की सूचना देने के बाद भी कार्यवाही नहीं होने विषयक

महोदय,
      कृपया निवेदन है कि दिनांक 03/10/2014 रात्रि करीब 8.52 बजे मेरे मोबाइल नंबर 094155-34526 पर मोबाइल नंबर 096281-10502 से श्री नफीस खान पुत्र श्री अज़ीम निवासी ग्राम ओटिया पुलिस चौकी इन्होना, थाना शिवरतनगंज, जनपद अमेठी का फोन आया जिन्होंने मुझे दिनांक 02/10/2014 को उनके गाँव और बगल के गाँव शेखनगाँव के बीच में ईदगाह पर एक पुराने बड़े हरा पेड़ कटने के बारे में दिनांक 02/10/2014 को समय लगभग 12-12.30 बजे तथा 03/10/2014 को सुबह लगभग 10 बजे पर एएसपी अमेठी के सीयूजी नंबर 1977 पर फोन कर सूचना देने के बाद पुलिस चौकी इन्होना द्वारा ठेकेदार श्री ताज मोहम्मद उर्फ़ तजऊ पुत्र श्री इन्साद निवासी ग्राम पुरे नवाज़पूर को पकड़ कर ले जाने और 15,000 रुपये ले कर छोड़ देने के बारे में बताया. श्री नफीस ने एसपी अमेठी को उनके सीयूजी मोबाइल नंबर 0427 पर लगभग 3.00 बजे फोन करने पर एसपी द्वारा उनकी बात बड़े ही अनमने ढंग से सुनने और सुनने के बाद झिड़कने के बारे में भी बताया.

श्री नफीस ने अगले दिन मुझे व्हाट्सएप पर मौके की कुछ तस्वीरें सबूत के तौर पर भेजीं. उन्होंने मुझे ठेकेदार श्री तजऊ (मोबाइल नंबर 096708-88713) से भी बात कराई जिन्होंने मुझे बताया कि एएसपी को सूचना देने के बाद चौकी इंचार्ज इन्होना ने तजऊ से 50,000 रुपये मांगे, जो बातचीत में 20,000, फिर 18 हज़ार, 16  हज़ार से होते हुए अंत में सौदा 15 हज़ार रुपये में पक्का हुआ. इस तरह एएसपी से शिकायत करने पर दो हज़ार का घूस 15,000 रुपये पर पहुँच गया.

मैंने इन सभी तथ्यों से श्री सुभाष चंद्रा, आईजी ज़ोन, लखनऊ को उनके सीयूजी नंबर पर बताया और फिर अपने पत्रांक संख्या- AT/Comp/01/14 दिनांक 04/10/2014 द्वारा विस्तार से अवगत कराया. श्री चंद्रा ने तत्काल कार्यवाही का आश्वासन भी दिया.
मैं दिनांक 05/10/2014 को स्वयं मौके पर गया था और मैंने मौके पर कटे पेड़ के फोटो लिए और तमाम लोगों से बात की. मैंने श्री नफीस और श्री तजऊ के अलावा श्री सग्गू (जिन्होंने श्री तजऊ की तरफ से चौकी इंचार्ज को पैसे दिए थे) से भी बात की. गांववालों ने यह भी बताया कि अमेठी में हरा पेड़ काटने का तय रेट दो हज़ार रुपये प्रति पिकअप और चार हज़ार रुपये ट्राली है, जो पेड़ कटने के पहले पहुँच जाना चाहिए. मेरे पास इन सभी बातों की वीडियो रिकॉर्डिंग है.

इसके बाद मैंने श्री चंद्रा से पुनः फोन पर बात की लेकिन मेरी जानकारी में अब तक इस मामले में उनके स्तर से कोई भी जांच आदेशित नहीं की गयी है. संभवतः इस प्रकरण की जांच एसपी अमेठी ने एएसपी अमेठी को सौंपी है. जाहिर है कि यह जांच प्रथमद्रष्टया ही दूषित कही जायेगी क्योंकि मैंने जो तथ्य आईजी ज़ोन, लखनऊ के सम्मुख रखे थे उसमे अन्य लोगों के अतिरिक्त एसपी, अमेठी की भूमिका की भी चर्चा है. ऐसे में यह जांच एएसपी द्वारा किया जाना किसी प्रकार से औचित्यपूर्ण नहीं जान पड़ता.
साथ ही यह भी बताना चाहूँगा कि मेरे मौके पर जाने के बाद चौकी इंचार्ज श्री महेश चंद्रा ने ठेकेदार श्री तजऊ के तेरह हज़ार रुपये श्री सग्गू के माध्यम से वापस कर दिए हैं. चौकी इंचार्ज ने ठेकेदार पर अपने बयान बदलने का भी दवाब दिया है और वे लगातार ठेकेदार को अपना बयान बदलने के दिए अलग-अलग प्रकार से दवाब बना रहे हैं. मेरे पास ठेकेदार और उनके प्रत्यक्षदर्शी साथी का वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है जिसमे ठेकेदार श्री तजऊ कह रहे हैं कि चौकी इंचार्ज ने तेरह हज़ार रुपये लौटा दिए और दो हज़ार इसीलिए नहीं लौटाए कि वह लकड़ी काटने का चौकी का अनधिकृत आधिकारिक रेट है. 

श्री नफीस ने मुझसे लखनऊ में मिल कर बताया है कि मेरे वापस आने के बाद उन्हें एसपी अमेठी द्वारा कई प्रकार से धमकी दी गयी है, थानाध्यक्ष शिवरतनगंज को उनके क्राइम हिस्ट्री खंगालने के आदेश दिए गए हैं और श्री नफीस को बर्बाद कर देने की बातें कही गयी हैं.
निवेदन करूँगा कि उपरोक्त सभी बातें अत्यंत गंभीर हैं क्योंकि-

1. इसमें कोई शंका नहीं है कि एक हरा पेड़ कटा

2. इसमें कोई शंका नहीं कि मेरे आईजी ज़ोन को शिकायत किये जाने तक इस मामले की एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी

3. श्री नफीस कह रहे हैं और यह बात फोन रिकॉर्ड से आसानी से तस्दीक की जा सकती है कि उन्होंने एएसपी और एसपी को शिकायत की या नहीं

4. प्रथमद्रष्टया यह सही जान पड़ता है कि श्री नफीस ने पेड़ काटने की शिकायत की क्योंकि एएसपी को शिकायत होने के बाद ही चौकी की पुलिस ठेकेदार को चौकी ले गयी

5. ठेकेदार श्री तजऊ खुलेआम कह रहे हैं कि पेड़ काटने के पहले ही उन्होंने चौकी पर दो हज़ार रुपये जमा कर दिए थे

6. ठेकेदार श्री तजऊ खुलेआम कह रहे हैं कि एएसपी को शिकायत करने पर उन्हें चौकी पर ले जाने के बाद अर्थदंड (घूस) दो हज़ार रुपये से तुरंत पचास हज़ार हो गया जो अंत में पंद्रह हज़ार पर पक्का हुआ

7. ठेकेदार श्री तजऊ खुलेआम कह रहे हैं कि मेरे मौके पर जा कर जांच करने के बाद चौकी इंचार्ज ने तेरह हज़ार रुपये वापस कर दिए, दो हज़ार इसलिए नहीं वापस किये गए क्योंकि यह अवैधानिक सरकारी रेट है

8. मैंने इस मामले की दो बार फोन से और एक बार लिख कर आईजी ज़ोन, लखनऊ को शिकायत की है

9. यद्यपि शिकायत में एसपी अमेठी की भूमिका का भी उल्लेख है पर जांच संभवतः एएसपी अमेठी द्वारा की जा रही है

10. इस गंभीर शिकायत के अब एक सप्ताह बीत चुके हैं

इन स्थितियों में मेरे पास इस बात के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं दिखता कि अब मैं यह प्रकरण स्वयं आपके संज्ञान में लाऊं और आपसे यह निवेदन करूँ कि इस मामले की डीजीपी कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से उच्च-स्तरीय जांच करा कर इस प्रकरण में आवश्यक विधिक तथा प्रशासनिक कार्यवाही कराये जाने की कृपा करें. साथ ही यह भी निवेदन करूँगा कि श्री नफीस तथा ठेकेदार श्री ताज मोहम्मद उर्फ़ तजऊ की आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था भी सुनिश्चित कराये जाने की कृपा करें ताकि पुलिस अथवा किसी अन्य की ओर से उन्हें किसी भी प्रकार की कोई भी क्षति नहीं पहुंचे. पुनः निवेदन करूँगा कि इस मामले में मेरे पास अपनी कही गयी बातों के लिए फोटो तथा वीडियो के रूप में पर्याप्त साक्ष्य हैं जिन्हें मैं किसी भी जांच अधिकारी के सम्मुख प्रस्तुत करने को निरंतर तत्पर रहूँगा.
 

पत्रांक संख्या- AT/Comp/01/14 
दिनांक – 11/10/2014

(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
#  94155-34526

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केजरीवाल को अकल नहीं थी…भाग गया कुर्सी छोड़ कर…मुझे नहीं लगता उसका भविष्य उज्ज्वल है: ओमपुरी

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व्यवस्था के खिलाफ अपनी फिल्मों में उन्होंने शुरूआती दौर में जो आक्रोश दिखाया था, आज भी वैसा ही तेवर उनमें मौजूद है। फिल्म अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता ओम पुरी आज भी मानते हैं कि व्यवस्था बदलने के लिए जन आंदोलन बेहद जरुरी है। पर्यावरण जैसे मुद्दों से लेकर वह ‘निर्भया’ जैसे बड़े आंदोलन के हिमायती हैं। 4-5 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर हुए वाइल्ड लाइफ फिल्म फेस्टिवल शिरकत करने ओम पुरी खास तौर पर आए थे। दो दिन के व्यस्त कार्यक्रम के बाद फुरसत पाते ही ओमपुरी ने बातचीत  के लिए वक्त निकाला। इस दौरान उन्होंने साफगोई के साथ बहुत कुछ अपनी कही और कुछ आज के मुद्दों पर बात की।

अभिनेता ओमपुरी से मो. जाकिर हुसैन की हुई बातचीत इस प्रकार है:
 
तीन अलग-अलग दशकों में यहां के तीन दौरे…अब तक छत्तीसगढ़ को किस तरह बदलता हुआ पाते हैं आप?

मैं तीन दशक में तीन बार यहां आया। 1981 में तो ‘सद्गति’ शूटिंग के लिए हम लोग ट्रेन से आए थे। तब छत्तीसगढ़ के गांव में जाने का मौका मिला था। उसके बाद 2007 में आया तो एयरपोर्ट पर उतरा। इस बार भी एयरपोर्ट से होटल और शहर तक चौड़ी-चौड़ी सड़कें बन चुकी हैं और चारों तरफ  शहर फैल चुका है। कई बड़े होटल बन गए हैं। शहर ने काफी ग्रो किया है। बिल्डिंगें बन गईं और मॉल भी तन गए।
 

मतलब बिल्डिंग और शॉपिंग मॉल अब तरक्की का पैमाना है..?

नहीं ऐसा नहीं है….मुझे बहुत गर्व नहीं होता इस मॉल कल्चर पर। मॉल तो गरीब आदमी को  चिढ़ाते हैं कि देख..बे…
 

छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता स्व.शंकर गुहा नियोगी से आप प्रभावित रहे हैं। उन्हें कैसे याद करते हैं?

हां, उनसे वाकिफ था मैं। सोते वक्त उन्हें खिड़की से फायर कर मारा गया। मुझे खबर लगी तो बहुत तकलीफ हुई थी। मजदूरों के लिए बहुत काम किया था उन्होंने। आज उनके संगठन का क्या हाल है, मुझे नहीं पता।
 

छत्तीसगढ़ में ‘सद्गति’ की शूटिंग का दौर कैसे याद करते हैं आप?

बहुत सी यादें हैं। हमारे डायरेक्टर सत्यजीत रे साहब के साथ मैं, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे , गीता सिद्धार्थ सहित पूरी यूनिट रायपुर में जयस्तंभ चौक के एक होटल में रुके थे। होटल से लगा एक सिनेमा हॉल था, जहां उस वक्त ‘एक दूजे के लिए’ फिल्म लगी हुई थी। रोज सुबह 7 बजे हम लोग महासमुंद के लिए रवाना हो जाते थे। महासमुंद बड़ी शांत जगह है। मुझे याद है एक गांव था जहां हमनें लगातार 20 दिन तक शूटिंग की, बड़े अच्छे से काम हुआ। रोज शूटिंग पूरी कर शाम 7 बजे तक हम लोग होटल लौटते थे। थकान इतनी होती थी कि खाना खाते ही नींद आ जाती थी लेकिन सिनेमा हॉल में चल रही पिक्चर की आवाज मेरे कमरे की दीवारों और खिड़कियों से टकराती रहती थी। एक दिन रे साहब ने छुट्टी दी तो मैनें राज टॉकीज में जाकर वह फिल्म देखी। (इस बातचीत के दौरान मौजूद रहे वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर ने जब इस दौरान बताया कि बात राज टॉकीज और होटल मयूरा की हो रही है तो ओमपुरी को भी तुरंत याद आ गया और बोल पड़े-हां मयूरा होटल था वो)
 

छत्तीसगढ़ की लोकेशन पर ‘सद्गति’ फिल्म का आधार क्या था?

देखिए, मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘सद्गति’ गांव को केंद्र में रख कर लिखी थी। उसमें छत्तीसगढ़ की जगह यूपी-बिहार का भी गांव होता तो भी दिक्कत नहीं होती। वो फिल्म तो किसी भी गांव की लोकेशन पर बनाई जा सकती थी। मुझे जहां तक याद आ रहा है, सत्यजीत रे साहब कलकत्ते से अपने किसी परिचित के बुलावे पर यहां लोकेशन देखने आए थे और मुंबई-हावड़ा ट्रेन रूट पर सीधा रास्ता होने की वजह से लोकेशन उन्हे जंच गई थी। बस इतनी सी बात है। मुझे सत्यजीत रे साहब ने ‘आक्रोश’ में देखने के बाद  ‘सद्गति’ के लिए साइन किया था।  फिर इसमें छत्तीसगढ़ के बहुत से कलाकारों ने भी काम किया। मेरी बेटी धनिया का किरदार निभाने वाली ऋचा मिश्रा की आज भी मुझे याद है। छोटी सी बच्ची थी वो..अब तो बड़ी हो गई है।
 

जंगल और गांव की लोकेशन पर आपने बहुत सी फिल्में की है। यह संयोग था या फिर आपकी पसंद..?

संयोग ही कह सकते हैं क्योंकि उस दौर में तो जैसी फिल्में मिली, हमें करनी ही थी। वैसे निजी तौर पर कुदरत के करीब रहना मुझे ज्यादा पसंद है। कुछ चेहरा-मोहरा भी वैसा ही है कि शुरूआती दौर में फिल्म बनाने वाले भी मुझे लेकर जंगल, गांव या दलित से जुड़े मुद्दे पर ही फिल्म बनाना चाहते थे। इसमें कई बार धोखे भी हुए। 1978 की बात है, एक सज्जन रस्किन बांड की कहानी ‘द लास्ट टाइगर’ पर फिल्म बनाना चाहते थे। मुझे, टॉम आल्टर और एक नए चेहरे नरेश सूरी को उन्होंने लिया। स्क्रिप्ट शायद प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी लिख रहे थे। हमारी 10 लोगों की टीम को वो सज्जन संथाल परगना (आज के झारखंड) में जंगल के अंदर 25 किमी दूर एक गांव में ले गए। वहां दो कमरे के एक कच्चे मकान में उन्होंने मुझे ठहरा दिया। अंदर जाकर देखता हूं तो उपर छत ही नहीं है। नीचे खटिया बिछाने जा रहा हूं तो पास से एक सांप रेंगते हुए आगे बढ़ रहा है। खैर, रात किसी तरह कटी लेकिन, सुबह वो जनाब खुद ही गायब हो गए। दोपहर तक हम लोगों ने इंतजार किया लेकिन जब वो नहीं आए तो हम लोगों ने 25 किमी पैदल सफर तय कर सर्किट हाउस तक पहुंचे और उस पूरी फिल्म के प्रोजेक्ट से ही तौबा कर ली।
 

फिल्मों की शूटिंग के जरिए जंगलों और गांवों को कितना देख या समझ  पाए?

फिल्में ही क्यों। जब भी मौका मिलता है मैं जंगल और गांव ही जाना पसंद करता हूं। अपने देश के ज्यादातर रिजर्व फारेस्ट में जा चुका हूं। अपने करियर के शुरूआती दौर में 1977 में किसी डाक्यूमेंट्री फिल्म के लिए बस्तर के किसी गांव में भी आया था। एक आदिवासी के झोपड़े के बाहर…चांदनी रात में खुला आसमान..क्या अद्भुत दृश्य था मैं बता नहीं सकता। मुझे लगा यही तो जन्नत है। पत्ते के बने दोने में छक कर महुआ पिया। मुझे तो महुआ चढ़ गया था। 
 

पर्यावरण को बचाने भारतीय फिल्म जगत अपना योगदान कैसे दे सकता है?

हमारा फिल्म जगत तो फिल्में ही बना सकता है। प्रकाश झा ने ‘चक्रव्यूह’ बनाई थी नक्सल मूवमेंट के बारे में। ऐसे ही पर्यावरण पर भी बड़े पैमाने पर फिल्म बनाई जा सकती है जिसमें शिकारी, फारेस्ट गार्ड, भ्रष्ट नेता, उद्योग जगत और समाज के दूसरे किरदार शामिल किए जा सकते हैं। क्योंकि हमारे जंगल इन्हीं तत्वों के गठजोड़ से बरबाद हो रहे हैं। ऐसी फिल्में जरुर बनाई जानी चाहिए, जिससे समाज में और ज्यादा जागरुकता आए।
 

लेकिन बड़े बजट की फिल्में तो दूर की बात है। फिलहाल तो पर्यावरण को लेकर जो डाक्यूमेंट्री बनती है, उन्हें दर्शक नसीब ही नहीं होते?

हमारे डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर तो अच्छे मन और बड़े पैशन के साथ डाक्यूमेंट्री बनाते हैं। सच है कि दर्शक इन्हें मिलते नहीं। इसलिए सबसे पहले तो हमारे नेताओं को ऐसी डाक्यूमेंट्री फिल्में दिखानी चाहिए। तब ही ये नेता समझेंगे कि हमारी नीतियों में कहां खराबी है। पर अफसोस कि उनके पास समय ही नहीं होता और वो दूसरी समस्याओं में उलझे रहते हैं। साफ कहूं तो यह पर्यावरण मंत्री की जवाबदारी है कि वो ऐसी फिल्मों को न सिर्फ देखे बल्कि दूरदर्शन के माध्यम से इसे प्रसारित भी करवाए। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पर्यावरण की वास्तविकता पहुंचे।
 

जंगलों में शिकार पर कानूनन रोक के बावजूद क्या अब तक हालात नहीं बदले हैं?

अगर हालात सुधरे होते तो आज संसार चंद जैसा शिकारी इतने सालों तक जंगल में जानवरों को अंधाधुंध तरीके से मारता न रहता। संसार चंद कोई टारजन नहीं था। मुमकिन है कि इन जैसे शिकारियों की कारगुजारी में फॉरेस्ट विभाग, कुछ एनजीओ और कुछ नेता भी इन्वाल्व होंगे। मुझे तो बचपन से उन तस्वीरों को देखकर बड़ा गुस्सा आता है, जिसमें ये बड़े-बड़े राजा-महाराजा शेर और दूसरे शिकार पर पैर रख कर बंदूक हाथ में लेकर नजर आते हैं। मैं तो कहता हूं अरे, नामर्दों अगर इतने ही बड़े शिकारी हो तो जाओ ना जंगल में निहत्थे। उसके बाद करो आमने-सामने की लड़ाई।
 

शहरीकरण तो बढ़ता ही जाएगा। ऐसे में एक आम शहरी अपना पर्यावरण बचाने क्या योगदान दे सकता है?

शहर में रहने वाले सभी लोगों से मुझे कहना है कि लकड़ी का कम से कम इस्तेमाल करो। क्योंकि आखिर लकड़ियां भी तो जंगल से ही आती है। मैं शहरों में देखता हूं आलीशान कोठियों से लेकर आम घरों तक में छत से लेकर टाइल्स तक ढेर सारी लकड़ियां इस्तेमाल होती है। इसे बंद करना होगा। अपने फिल्म वालों को भी मैं कहता हूं कि शूटिंग के दौरान अगर पेड़ की कोई टहनी बाधा बन रही है तो उसे बिना सोचे-समझे काट देते हैं। जबकि इसे बांधा जा सकता है। अभी हमारे मुंबई में एक बड़ा गलत काम हो रहा है। सड़क बनाने के दौरान बड़े-बड़े पेड़  के नीचे की जमीन पूरी की पूरी कांक्रीट से पक्की कर दी जा रही है। आखिर पेड़ की जड़ों तक पानी कैसे पहुंचेगा। कोई इन सरकारों को समझाए। तल्ख़ियां तो बहुत सी है लेकिन एक छोटी सी अपील मैं करना चाहता हूं कि कम से कम आप अपने बच्चों के जन्मदिन पर एक पौधा हर साल लगाकर अच्छी शुरूआत तो कर सकते हैं।
 

आप खुद भी जन आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं, ऐसे में आज के दौर में पर्यावरण जैसे मुद्दे पर जन आंदोलनों का क्या भविष्य देखते हैं आप?

देखिए, जन आंदोलन तो जनता का सबसे बड़ा हथियार है। दिल्ली में जब निभर्या वाला मामला हुआ। नौजवानों में इतना जोश आया कि वो अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। सर्दी के मौसम में उन पर ठंडा पानी फेका जा रहा है लेकिन वो हिले नहीं बल्कि सरकार को हिला दिया। नतीजा देखिए, नया कानून बन गया। तो पर्यावरण बचाने के लिए भी ऐसे ही जन आंदोलन की जरुरत है। जैसे गांधी जी और जयप्रकाश नारायण जी ने लोगों को एकजुट कर आंदोलन खड़ा किया, ठीक वैसा ही दबाव हो तो पर्यावरण और प्रदूषण जैसे मुद्दे पर सरकार जरूर जागेगी।
 

लेकिन जिस अन्ना आंदोलन में आपने मंच साझा किया, आपको नहीं लगता कि वह पूरा का पूरा आंदोलन भटक कर खत्म हो गया?

अन्ना आंदोलन कहां भटका? आखिर केजरीवाल तो अन्ना आंदोलन की ही उपज है। उसे तो जनता ने चीफ मिनिस्टर बनाया। पूरा हिंदुस्तान हिल गया था कि ये ‘आप’ पार्टी है कौन। सबके होश उड़ गए थे कि ‘आप’ तो अब नेशनल पार्टी बन जाएगी। लेकिन उसको (केजरीवाल को) अकल नहीं थी…भाग गया कुर्सी छोड़ कर। उसे बैठना चाहिए था, लड़ता वो जनता के हक के लिए…लेकिन, मुझे नहीं लगता उसका भविष्य उज्ज्वल है।
 

आपको लगता है कि चर्चित हस्तियों के जीवन पर लिखी गई किताबें बिना विवाद के हाथों-हाथ नहीं बिक सकती?

इस सवाल से मेरा क्या लेना-देना और आप मुझसे यह क्यों पूछ रहे हैं, मैं नहीं समझ पा रहा।
 

आपकी पत्नी नंदिता पुरी ने आपकी बायोग्राफी लिखी, उस पर खूब बवेला मचा तो किताब चर्चा में आ गई, इसलिए..

(टोकते हुए) मैं उस पर कोई बात नहीं करना चाहता। उस मुद्दे को मैं पीछे छोड़ आया हूं। यहां छत्तीसगढ़ में पर्यावरण पर कार्यक्रम में आया हूं। उससे जुड़ा कोई सवाल हो तो जरुर पूछिए या कुछ और भी..।
 

छत्तीसगढ़ में फिल्म सिटी की गुंजाइश देखते हैं क्या..?

फिल्म सिटी तो बाद की बात है। पहले आप फिल्में तो बेहतरीन बनाइए। फिल्म सिटी तो और भी कई स्टेट में बनाई गई। उनका क्या हश्र हो रहा है, सबको मालूम है। इसलिए फिल्म सिटी की तो बात ही ना करें।

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आत्महत्या करने को मजबूर हैं उत्तराखंड के आपदा प्रभावित व्यापारी

देश के कई राज्यों में पिछले कई सालों से किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आत्म हत्याओं का यह सिलसिला थम नहीं रहा है। इसके लिए संबधित राज्यों की सरकारों के साथ केन्द्र सरकार भी जिम्मेदार है। देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा उत्तराखंड में इस तरह के मामले न के बराबर हैं। लेकिन पिछले साल आई प्राकृतिक आपदा के चलते यहां एक नई परेशानी पैदा हो गई है। आपदा प्रभावित इलाकों के व्यापारी आत्महत्या करने लगे हैं। पहले गुप्तकाशी में एक युवा व्यापारी ने मौत को गले लगाया और अब उत्तरकाशी में दूसरे व्यापारी ने सरकार की उपेक्षा के चलते आत्महत्या कर ली। आपदा प्रभावित क्षेत्र में रह रहे प्रभावित अभी पहली घटना के कारणों का अध्ययन कर ही रहे थे कि दूसरी घटना ने राज्य सरकार की प्रभावितों के बारे में की जा रही कोरी बयानबाजी को उजागर कर दिया है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड में विग वर्ष जून माह के मध्य में भीषण आपदा आई थी जिसमें बड़ी मात्रा में जन धन की हानि हुई थी। देश दुनियां से आये हजारों श्रद्धालु भी इस आपदा के शिकार हुए। इस आपदा में जनपद चमोली, रूद्रप्रयाग व उत्तरकाशी के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। बदरी केदार सहित गंगोत्री व यमुनोत्री घाटी में सैकड़ों व्यवसायिक प्रतिष्ठान व स्थानीय लोगों की संपत्ति या तो पूरी तरह तबाह हो गई या जर्जर स्थित में पहुंच गई। राज्य व केन्द्र सरकार की योजनाओं के तहत स्थानीय लोगों ने बैंकों से लोन लेकर व्यवसायिक प्रतिष्ठान खोले। लेकिन आपदा में सब बह गया। जो बचा उसमें व्यवसायिक गतिविधि चलाई नहीं जा सकती।

आपदा के बाद यात्रियों का अवागमन भी कम हो गया है। इन चार घाटियों में रह रहे अधिकांश लोगों का जिनके परिजन सेना में या अन्यत्र कहीं सेवारत नहीं हैं का प्रत्यक्ष रोजगार पर्यटन पर ही आधारित था। लेकिन आपदा के बाद हालात बेहद नाजुक हो गये हैं। इस पर राहत राशि में की गई घांघलेबाजी से लोगों का धैर्य जबाव देने लगा है। शासन प्रशासन व उनके खुद के चुने हुए जनप्रतिनिधियों से लगाई गई गुहार जब उद्देश्यहीन होने लगी तो व्यापारियों ने मौत को गले लगाना शुरू कर दिया। एक के बाद एक दो व्यापारियों द्वारा की गई आत्महत्याओं ने प्रभावितों के जख्मों को फिर गहरा कर दिया।
 
दो व्यापारियों ने आत्महत्या क्यों की। इसके लिए सरकार अपनी ओर से जांच करवा रही है। जांच तो इससे पहले भी कई कराई गई हैं। क्योंकि इस तरह की जांच से कोई निष्कर्ष नहीं निकलने वाला। दरअसल सरकार द्वारा इस दिशा में की गई पहल धरातल पर दिखाई नहीं दे रही है। आपदा राहत राशि में बंदरबांट का आरोप शुरूआती दिनों से लग रहा है। लेकिन सरकार इस ओर मुंह फेरे रही। एक ही व्यक्ति द्वारा दो दो नामों से पैसा लिये जाना हो या बिना संपत्ति के ही राहत राशि डकारने का मामला, कहीं न कहीं इसमें अधिकारी व सफदेपोशों के गठजोड़ की संलिप्ता अवश्य रही है।
 
अब जब दो व्यापारियों ने इसी मामले को लेकर आत्महत्या की तो सरकार को भी लगने लगा कि लोगों ने जो आरोप लगाये हैं उसमें कहीं न कहीं सच्चाई जरूर है। रूद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि व ऊखीमठ विकासखंड के दर्जनों व्यापारियों को नोटिश जारी कर दिये गये हैं। उत्तरकाशी में भी ऐसा ही होगा। नोटिश जारी होगे के साथ ही उनके आका भी उनको बचाने के लिए आगे आ जायेंगे। कुछ दिन मामला सुर्खियों में रहने के बाद ठंडे बस्ते में चला जायेगा।
इस मामले में आपदा के बाद से ही राज्य सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है।

बात चाहे आपदा में मारे गये मृतकों की संख्या की रही हो या फिर आपदा के बाद की स्थितियों से निपटने का मसला। सरकार की कोशिश केवल मामले को निपटाने की रही। कुर्सी बचाने की कवायद भी इस दौरान ज्यादा रही। सरकार देहरादून में कम और दिल्ली से ज्यादा चली। आपदा प्रभावितों पर जिस धन का  उपयोग होना उसको देश की मीडिया को विज्ञापन के तौर पर बांट दिया गया। मीडिया प्रबंधन के नाम पर करोड़ों रूपाए पानी की तरह बहाए गए। अगर इस धन को आपदा प्रभावितों में बांट दिया जाता तो शायद व्यापारी आत्महत्या को विवश न होते।
 
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन लोगों ने पहले बिना जांच पड़ताल के राहत राशि की बदरबांट की अब वो ही इस प्रकरण की जांच भी करेंगे। क्या ऐसे में जांच सही निष्कर्ष पर पहुंच पायेगी। जो अधिकारी पहले सफदेपोशों के फरमानों पर राहत राशि बांट रहे थे क्या वो अब उन्ही के करीबियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति करेंगे। ये कई सवाल हैं जिनका जवाब शायद ही सरकार व सरकारी कारिन्दें देना चाहेंगे। न तो घटनाओं के मनोविज्ञान को पढ़ने की आवश्यकता है ओर नहीं किसी तरह की विवेचना की। मामला बिल्कुल साफ है। आपदा में अपनी जीवन भर की पूंजी गंवा चुके लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।

असल में राहत राशि के सही मायनों में हकदार थे उनकी सुनी नहीं जा रही है। सत्ता में पहुंच व पकड़ रखने वाले कागजी प्रभावितों के दोनों हाथों में मलाई है। अपनी उपेक्षा व सरकारी तंत्र की विफलता ने पहाड़ के लोगों का भी दिल पिघला दिया है। उनके पास अब कोई चारा नहीं है। यही कारण है कि उनको मौत को गले लगाना सबसे आसान काम लग रहा है। यदि वक्त रहते सरकार इस ओर गंभीर न हुई तो स्थिति विकट हो सकती है।

 

बृजेश सती/ देहरादून
09412032437

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नेपाल के राष्ट्रपति के आमंत्रण पर काठमाण्डू गए मधेपुरा वरिष्ठ पत्रकार देवाशीष बोस

मधेपुरा के वरिष्ठ पत्रकार और बिहार जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश महासचिव देवाशीष बोस नेपाल के राष्ट्रपति डॉ. राम बरन यादव के निजी आमंत्रण पर आज काठमाण्डू के लिए रवाना हो गये। डॉ. बोस नेपाल में पांच दिवसीय प्रवास पर रहेंगे। इस अवसर पर वे नेपाली राष्ट्रपति से भारत-नेपाल मैत्री और सांस्कृतिक एकता के अलावा दोनों देशों के संयुक्त आपदा प्रबंधन पर वार्ता करेगें तथा उन्हें बिहार यात्रा के लिए आमंत्रण देंगे।

रवाना होने से पूर्व डॉ. बोस ने बताया कि विश्व शान्ति के लिए भारत-नेपाल मैत्री आवश्यक है तथा इसके लिए नेपाल के राष्ट्रपति डॉ. रामबरन यादव का अप्रतिम योगदान है। जिसे याद करते हुए इसके समर्थन में कार्य करने का समय है। इस अटूट मैत्री की बदौलत न केवल एशिया बल्कि सम्पूर्ण विष्व में भारत और नेपाल की प्रतिष्ठा में इजाफा हुआ है। यह मैत्री विश्व राजनीतिक इतिहास में युगान्तकारी घटना के रूप में स्वर्णिम अध्याय का सृजन करेगी। उन्होंने कहा कि नेपाल के साथ भारत का सांस्कृतिक एकता के अलावा रोटी-बेटी का भी संबंध है।  

लोक स्वातंत्र्य संगठन बिहार तथा भारतीय युवा आवास संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में सक्रिय डॉ. बोस ने बताया कि नेपाल के महामहिम राष्ट्रपति डॉ. रामबरन यादव की पुत्रवधु डॉ. रष्मि यादव उनकी धर्म बहन हैं तथा उनके प्रयास से ही ये सौम्य भेंट संधारित हुयी है। दिनांक 11 अक्टूबर को जनकपुर, नेपाल से घरेलू बिमान से वे काठमाण्डू के त्रिभूवन अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा के लिए रवाना होंगे। जहां राष्ट्रपति के पुत्र तथा नेपाली कांग्रेस के सांसद डॉ. चन्द्र मोहन यादव उनकी आगवानी करेंगे। दूसरे दिन 12 अक्टूबर को राष्ट्रपतिजी के साथ रात्रि भोज में डॉ. बोस की भेंट होगी।

डॉ. बोस का कहना है कि वे मधेपुरा जिला के निवासी हैं, जिला के सिंहेश्वर धाम के शिव मंदिर में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के जन्म के निमित्त महर्षि श्रृंगी के द्वारा सम्पादित पुत्रेष्ठि यज्ञ सम्पन्न हुआ था। जबकि माता सीता डॉ. रामबरन यादव की जन्म भूमि जनकपुर में अवतरित हुई थी और उनका कार्यस्थल काठमाण्डू पशुपतिनाथ का दरबार है। इन तीनों स्थान को जोड़ने से शांति की अवधारणायें व्याप्त होती है। जो विश्व शांति के लिए आवश्यक हैं। लिहाज़ा उनकी नेपाल यात्रा जनतंत्र की मजबूती, पर्यटन और मानवाधिकार की रक्षा में सहायक होगी।

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फॉरवर्ड प्रेस पर दिल्ली पुलिस का छापा मोदी सरकार का फासीवादी कदम: जेयूसीएस

लखनऊ। जर्नलिस्टस् यूनियन फॉर सिविल सोसाईटी (जेयूसीएस) ने फॅारवर्ड प्रेस के दिल्ली कार्यालय पर दिल्ली की बसंतनगर थाना पुलिस द्वारा 8 अक्टूबर को छापा मारने तथा उसके चार कर्मचारियों को अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने की घटना की कठोर निंदा की है। जेयूसीएस ने दिल्ली पुलिस की इस कारवाई को फॉसीवादी हिन्दुत्व के दबाव में आकर उठाया गया कदम बताते हुए इसके लिए नरेन्द्र मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही फॉरवर्ड प्रेस की मासिक पत्रिका के अक्टूबर-2014 के अंक ’बहुजन श्रमण परंपरा विशेषांक’ को भी पुलिस द्वारा जब्त करने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए इसे मुल्क में फासीवाद के आगमन की आहट कहा है।

फारवर्ड प्रेस के दिल्ली कार्यालय पर छापे का विरोध करते हुए जेयूसीएस के नेता लक्ष्मण प्रसाद और अनिल कुमार यादव ने कहा कि देश का संविधान किसी भी नागरिक को उसके न्यूनतम मूल अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। संघ के साहित्यों में बेहद शातिराना तरीके से मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला जाता है और वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छपते हैं। ठीक उसी तरह, दलित समाज को भी अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक और संविधान प्रदत्त हक है। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस की यह कार्यवाही मोदी सरकार के दबाव में तथा हिन्दुत्ववादी ताकतों के हाथों खेलते हुए संविधान और देश के धर्म निरपेक्ष ताने बाने के खिलाफ जाकर की गई है।
 
इस अवसर पर जेयूसीएस के नेता तथा वरिष्ठ पत्रकार राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में ’ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम’ के तत्वाधान में 9 अक्टूबर, को महिषासुर शहादत दिवस के आयोजन स्थल पर जिस तरह से एबीवीपी के गुंडों द्वारा मापीट और तोड़फोड़ की गई, उससे यह साबित होता है कि अब संघ अपने बौद्धिक विरोधियों से तर्कों से निपटने में एकदम असहाय हो चुका है। अब वह झुंझलाहट में सीधे मारपीट पर उतर आया है। उन्होंने कहा कि भारत एक मिली जुली संस्कृतियों वाला देश रहा है। हर संस्कृति की अपनी एक प्रतीकात्मक पहचान रही है तथा उसका समाज उस संस्कृति की अस्मिता को अगर अपने स्तर पर लोकतांत्रिक तरीके से पूजना चाहता है तो किसी को क्या दिक्कत हो सकती है? उन्होंने कहा कि यह घटना नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा देश को फासीवाद के रास्ते पर धकेलने की खुली कोशिश है और लोकतंत्र के हित में पूरी ताकत के साथ इसका प्रतिकार किया जाएगा।
 
द्वारा जारी
 
राघवेंद्र प्रताप सिंह
प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य
जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी,
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
संपर्क- 09696545861

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जी हां, मुझे मलाल है कि उस सत्यार्थी को नोबल मिला जिसने हज़ारों हाथों को तराशने के बजाय भिखमंगा बना दिया

मुझसे कई मित्रों ने पूछा कि क्या आपको मलाल है कि सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिला? फिर मेरे देश प्रेम पर सवाल उठाया कि आप कैसे भारतीय हैं? तो मैं कहना चाहूंगा कि जी हां, मुझे मलाल है। क्योंकि मैं हर बजते ढोल की ताल पर नाचने में यकीन नहीं रखता। मुझे मलाल है क्योंकि शांति और अहिंसा के विश्वदूत “गांधी” अभी तक खारिज हैं, और मेरा भारत खामोश है।

मुझे मलाल इस बात का भी है क्योंकि सत्यार्थी जैसे लोगों की वजह से हमारे परंपरागत “तकनीकी कौशल” के विश्वविद्यालयों पर ताला लगा दिया गया। जैसे हम शहरी बच्चों को प्रैप स्कूल में भेज कर एबीसीडी सिखवाते हैं, ठीक उसी तरह से हमारे देश की बहुतेरी आबादी के बच्चे बचपन से परंपरागत तकनीकी कौशल सीखते हैं। मिर्जापुर और भदोही को कालीन उद्योग इसकी मिसालें थीं। सत्यार्थी जैसे लोगों के अभियान की वजह से इन उद्योगों से हुनर सीखने का मौका ना जाने कितने बच्चो सें छिन गया। स्वालंबी हाथों को तराशने की बजाय भिखमंगा बना दिया गया।

इतना ही नहीं “रग मार्क” की अनिवार्यता ने हमारे कालीन-गलीचा उद्योग को दुनिया में बहुत पीछे कर दिया है। क्या आप जानते हैं कि “रग मार्क” क्या होता है? आज यह बच्चे ना स्कूल के रहे ना घर के। इनके हाथ बेकार हो चुके हैं। हजारों पाठशालाओं पर ताला लगवा दिया। और कहते हैं कि मुझे मलाल ना हो। लाखों परिवारों की जीविका छिन चुकी है। वैकल्पिक स्रोत नहीं है इनके पास जीने के लिए। और यह सब उस अभियान के जरिए हुआ, जिसको प्रायोजित भी यूरोपीय धन से किया गया।

हम बाजार के खिलाड़ियों के हाथों खेले गए, खेले जा रहे हैं और आप कह रहे हैं कि मुझे मलाल ना हो। कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन ज्यादा कहूंगा तो आपका भ्रष्ट देशप्रेम और आहत हो उठेगा और हिंसक भी। पर क्या करूं, मेरा देशप्रेम तो वहां बसता है, जहां राशन का गल्ला और बिजली की रोशनी नहीं पहुंचती।

 

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के पेसबुक वॉल से।

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मासूम रुद्राक्ष की हत्या के गुनहगार हैं मीडिया और पुलिस

rudraaksh

Sumant Bhattacharya थोड़ी देर पहले ही एक राष्ट्रीय टीवी चैनल के राजस्थान प्रमुख का फोन आया और कहा कि सुमंत भाई इस पर कुछ लिखो। मुद्दा बेहद गैरजिम्मेदाराना किस्म की पत्रकारिता की वजह से एक मासूम की मौत का है। राजस्थान के कोटा में दो एक रोज पहले किन्ही बैंक मैनेजर के पांच सात साल के बेटे का अपहरण हो गया। अपहर्ताओं ने आज शुक्रवार को शाम तक का वक्त दिया और एक करो़ड़ बतौर फिरौती मांगी। पर आज ही राजस्थान के दो प्रमुख अखबारों राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर ने इस खबर को पहले पेज पर जोरदार तरीके से छाप दिया। सुबह पांच बजे खबर अखबारों में आई और दो घंटे के बाद मासूम की लाश तलाब से मिली। मीडिया ने पुलिस को अपना काम करने का वक्त ही नहीं दिया, खबर के बाद अपहर्ताओं को लगा कि बच्चा रहा तो पकड़े जाएंगे। सनसनी फैलाने वाले और सबसे तेज खबर के कारोबारियों ने अपने बाजारवाद में एक बच्चे को दुनिया से विदा कर डाला।

Piyush Rathi कोटा में 7 साल के रूद्राक्ष के अपहरण के बाद उसकी हत्या की घटना ने प्रदेश ही नहीं पूरे देश को झंकझोर कर रख दिया हैं। आखिर 7 साल के उस मासूम की क्या गलती रही जिसकी सजा उसे मिली है। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना हैं कि इस पूरी घटना में गुनाहगार माना जाये तो पुलिस की कार्यप्रणाली व मिडिया की सबसे तेज सबसे अलग खबर दिखाने की रेस हैं। रूद्राक्ष का जब अपहरण कर लिया गया और फिरौती के पैसे मांगे गये तो उसके पिता थाने पहुंचे और रिपोर्ट दर्ज करवाई पुलिस तुरंत एक्टिव हुई और जांच में जुट गई।

मगर पुलिस क्या जांच कर रही हैं किन पहलुओं को लेकर जांच को गति दे रही हैं इसकी विस्तृत जानकारी आखिर मिडिया को देने की कहां जरूरत पड़ गई। मिडियाकर्मियों ने भी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हुए अपने-अपने बैनर को उंचा उठाने के लिये पूरी की पूरी कहानियां अगले दिन अखबारों में छाप दी जिससे अपहरणकर्ता निश्चित रूप से भांप गया कि अब उसकी खैर नहीं है और ऐसे में उसे लगा होगा कि बच्चे को साथ लेकर चलना और कोटा क्षेत्र को पार करना उसके लिये नामुमकिन हैं क्यों कि जिस कार को संदिग्ध माना जा रहा था उसकी फोटो तक अखबारों में छाप दी गई जिससे कोई भी व्यक्ति उस कार को पहचान लेता।

इसी के चलते उसने मासूम रूद्राक्ष की हत्या कर दी। ऐसे में सवाल उठता हैं कि आखिर पुलिस को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि उन्होने पूरी जांच की कहानी मिडिया के सामने रख दी जिससे अपहरणकर्ता तक ये सारी डिटेल पहुंच जाये। यदि पुलिस व मिडिया दोनों ही संयम से काम लेते तो शायद आज उस मासूम की जान बचाई जा सकती थी।

जहां तक मेरा अनुभव हैं पुलिस किसी साधारण से मामले में भी क्या जांच कर रही हैं यह भी किसी को पता नहीं लगने देती और जांच अधिकारी सचेत रह कर इस बात का ख्याल रखता हैं कि आखिर जांच का एक भी पहलू आउट ना हो।

 

सुमंत भट्टाचार्य और पीयूष राठी के फेसबुक वॉल से।

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चंदन के भोजपुरी गानों को सभी घर-परिवार में बैठ सुन सकते हैं

gyaneshwar

पिछले कई महीनों से यहां-वहां सुन रहा था। लोग कह रहे थे कि भोजपुरी को नई शारदा सिन्‍हा व विंध्‍यवासिनी देवी मिलती दिख रही है। कोई चंदन तिवारी है, जो भोजपुरी गाती है। उम्र अभी कम है, लेकिन टपकेबाजों को सुनने के लिए नहीं गाती। सड़कछाप भी दूर हैं। चंदन की भोजपुरी को सभी घर-परिवार में बैठ सुन सकते हैं। मैंने कभी सुना नहीं था, सो कहने वालों के लिए कुछ जोड़-घटा नहीं सकता था। पिछले महीने रांची के रास्ते जमशेदपुर जा रहा था। बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। थकान के कारण मन अलसाया था। तभी सारथी समीर ने कोई सीडी बजा दी। भोजपुरी सुन पहले तो मन नहीं रमा। तभी अचानक ‘बेटी की विदाई’ की गीत के बोल निकले। विदाई की कसक थी, दर्द भरे शब्‍द थे। मन की अलसाहट खत्‍म हुई। ध्‍यान से सुनता गया। रोने के अलावा कुछ नहीं बचा था। लगा घर से मेरी बिटिया जाएगी, तब भी ऐसा ही होगा।

सारथी समीर से सीडी का कवर देने को कहा। अब समझ में आया कि लोग जिस चंदन तिवारी की बात कर रहे थे, वह गा रही थी। सचमुच, भोजपुरी के नये दौर में उच्‍छृंखलता मुक्‍त ऐसे किसी सीडी की उम्‍मीद नहीं थी। पटना में मीडिया के साथियों से चंदन तिवारी के बारे में पूछा। बताया गया कि पैदा तो पीरो में हुई, अभी बोकारों में रहती है। फिर बोकारो के साथी लाइन पर आये। मैंने चंदन से मिलने की इच्‍छा जताई। कहा गया कि अगले दिन शो है, मुलाकात होने पर बात करा दी जायेगी। बात हुई भी। यह मेरे लिए और दंग करने की बात थी कि वह मुझे जानती थी। फेसबुक में मेरे साथ कनेक्‍ट थी। चंदन ने कहा कि पटना आकर मिलूंगीं।

मिलना अभी शेष था। लेकिन जानकारियों ने चंदन के प्रति मेरा स्‍नेह कुछ और बढ़ा दिया। अभी संघर्ष पथ पर है चंदन। संघर्ष पथ के वक्‍त मिले मौके को कई गंवाना नहीं चाहता। लेकिन कमिटमेंट के आगे आफर को आगे के लिए टाल देना बड़ी बात होती है। मारीशस में 31 अक्‍तूबर से विश्‍व भोजपुरी सम्‍मेलन का आयोजन है। चंदन को न्‍योता आया। कौन नहीं जाता। किंतु चंदन ने यह कहकर माफी मांग ली कि इस दौरान अनाथाश्रम के बच्‍चों के साथ रहना है। कई माह पहले वचन दे चुकी हूं। बच्‍चे चंदन की गीतों पर पिछले तीन माह से डांस की तैयारी कर रहे हैं। बिना मिले चंदन की भावनाओं की मैंने कद्र की।

अब मंगलवार सात अक्‍तूबर की बात करते हैं। शाम को मैं अपने कार्यालय में था। पुराने जान-पहचान वाले के साथ कोई लड़की आई। सीधे पैर छूकर आशीष लिया। जानने वाले ने कहा कि सर चंदन है। मैं फिर कंफ्यूज कर गया। जब बोकारो की बात हुई, तो मैंने समझा। चंदन ने बताया कि डुमरांव में शो था। लौटते वक्‍त बिना मिले न जाने की प्रतिज्ञा ली थी। ट्रेन पकड़ने के पहले आ गई स्‍नेह लेने। चंदन की शिष्‍टता कायल करने के लिए काफी थी। फिर आधे घंटे की लंबी बातचीत हुई। आदतन मैंने चंदन के भोजपुरी अवतार के बारे में पूछ लिया। चंदन ने कहा कि मां को गायन का शौक था। बचपन में देखा करती थी कि मां मंदिर-घरों में जाकर भजन करती है। हारमोनियम पर मां की चलती हुई अंगुलियां दिखती थी। जब कुछ बड़ी हुई व बोकारो आ गई, तो मां से उन दिनों के बारे में पूछा। मन संगीत की ओर मेरा मुड़ चुका था। मां ने कहा कि वह खुद बड़े कैनवास पर गाना चाहती थी, लेकिन भोजपुर की मिट्टी-पानी तब ऐसी नहीं थी कि देहरी से बाहर घर की महिला को स्‍टेज पर आने दे। चंदन ने इसी बहाने मुझे शारदा सिन्‍हा, विंध्‍यवासिनी देवी, मालिनी अवस्‍थी आदि की याद दिला दी। ये सभी जरुर भोजपुरी गाती हैं, लेकिन भोजपुरीभाषी हैं नहीं।

बेटी की इच्‍छा को देख मां ने अपने अधूरे ख्‍वाब को पूरा करने को पंख दिया। कंपीटिशन में चंदन भाग लेती रही। आगे-पीछे मुकाबले में जरुर रही। मुंबई से बुलावा आया। गये तो कई महंत मिले। कहा, ‘मुंबई में रहो, कहा करो’ -तभी बात बनेगी। लेकिन चंदन को यह बात रास नहीं आई। वह न तो फूहड़ गाने को तैयार थी और न ही समझौते के लिए राजी। यह भी देखा कि शारदा सिन्‍हा व अन्‍य तो बिहार में रहकर ही पॉपुलर हुई। फिर मैं क्‍यों नहीं हो सकती। ठोस मन से मुंबई छोड़ अपने शहर को आई। पुरबिया तान नाम से चंदन अभियान की शुरुआत की। महेंदर मिसिर व भिखारी ठाकुर के गीतों की सीरीज तैयार की। साउंड क्‍लाउड व यू ट्यूब के जरिये गीतों को साझा किया। चंदन की खुशी का ठिकाना तब न रहा, जब मालूम हुआ कि एक गीत को 48 घंटे में 30 हजार से अधिक लोगों ने सुना। इस बड़ी सफलता ने आरा, छपरा, बक्‍सर की जगह चंदन के लिए आने वाले स्‍वर्णिम दिनों ने सूरत, दुबई, अहमदाबाद, अमेरिका आदि में भी स्‍पेस बना दिया।

चंदन ने सीडी के जाल-बट्टे की तुलना में आनलाइन माध्‍यम को गीत-संगीत की लांचिंग का जरिया बनाया। वैसे सीडी से बिलकुल अलग नहीं हुई। हां, इसका ध्‍यान अवश्‍य रखा कि सब कुछ सबों के साथ मिलकर सुना जा सके। भोजपुरी में अश्‍लीलता के खिलाफ अभियान चलाने वाले लोकराग व बिदेसिया का साथ मिला। मीडिया ने भी सुर्खियां दी। सुनने के बाद मनोज वाजपेयी, भरत शर्मा व्‍यास के साथ मालिनी अवस्‍थी व शारदा सिन्‍हा ने भी चंदन की तारीफ की।
 
मारीशस न जाने के बारे में चंदन ने कहा कि सर, कभी भी चले जायेंगे। लेकिन अनाथाश्रम के बच्‍चे तो मना करते ही उदास हो जाते। मैं उन्‍हें उदास नहीं देख सकती थी। मारीशस के भोजपुरी फेस्टिवल में लोकार्पण के लिए मेरे गाये गीतों का अलबम ‘पुरबिया तान’ जरुर जा रहा है। मार्च, 15 में अमेरिका का न्‍योता मिल चुका है। चंदन फिलहाल एक नई श्रृंखला पर काम कर रही है, जिसमें वह बच्‍चों के लिए गांव की गलियों से संजोकर लाये गीतों को आवाज देने जा रही है। मैंने नई श्रृंखला के लिए चंदन को शुभकामनाएं दी। चंदन को साफ-सुथरे पथ में कुछ समय तक आने वाली आर्थिक दिक्‍कतों का ख्‍याल भी है, पर फूहड़ता में जाने को बिलकुल तैयार नहीं है। जाते-जाते चंदन को मैंने फिर से ‘बेटी की विदाई’ वाले गीत की बधाई दी। साथ में यह वचन भी लिया कि स्‍टार चाहे जितनी बड़ी बन जाना, बुलाने पर कभी मेरे घर भी आ जाना।

 

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर के फेसबुक वॉल से।

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भाजपा और मोदी को कोसने में बीत गया सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन

कुछ बड़े राजनेताओं का जब मुंह खुलता हैं तो उनके श्रीमुख से जहरीली वाणी ही निकलती है। मनोरोगी की तरह व्यवहार करने वाले इन नेताओं को अपने अलावा सारी दुनिया साम्प्रदायिक, चोर, भ्रष्टाचारी, खूनी, वहशी नजर आती है। न यह उस मिट्टी का मान रखते हैं जिसमें वह पल कर बढ़े हुए हैं, न ही इन्हे देश-समाज की प्रतिष्ठा की चिंता रहती है। भारत मां को डायन कहने वाले ऐसे नेता अपने आप को बहुत ही समझदार और काबिल मानते हैं, लेकिन किसी गंभीर मसले पर बात करते समय इनके मुंह पर ताला जड़ जाता है। हां, बात का बतंगड़ बनाने की महारथ इन्हें जरूर हासिल होती है, जिसकी नुमाईश यह समय-समय पर करते रहते हैं। दूसरों की बैसाखियों के सहारे अपनी राजनीति चमकाने वाले इन नेताओं की भले ही उनके अपने जिले में कोई न पूछता लेकिन यह अपने आप को राष्ट्रीय नेता समझने का मुगालता पाले रहते है।

धर्म गुरुओं को गाली देना, लोकतंत्र का उपहास उड़ाना, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं पर छींटाकशी, जिस थाली में खाये उसी में छेद करना, हिन्दू-मुस्लिमों के बीच नफरत के बीज बोना, समय-समय पर गड़े मुर्दे उखाड़ना, विरोधियों को नीचा दिखाना इनका शगल है। एक-दो नहीं तमाम राजनैतिक दलों में ऐसे कई नेता मिल जायेंगे जो राजनीति की सीढ़िया मेहनत की बजाये शार्टकट से चढ़ना ज्यादा पंसद करते हैं। या यह कहा जाये कि इनमें इतनी काबिलियत ही नहीं होती है कि यह जनता का दिल जीत कर राजनीति कर पायें। ऐसे नेताओं के कारण ही देश-प्रदेश का साम्प्रदायिक माहौल खराब होता है, दंगे-फंसाद होते हैं। फिर यह लोग दंगों की पिच पर राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। आम आदमी मरे या जिये, इनको इससे मतलब नहीं रहता है। हिंसा में जितने अधिक से अधिक लोगों का घर-व्यापार जलते हैं उतना ही इनकी राजनीति को खाद-पानी मिलता है।

चुनावी मौसम में तो ऐसे नेताओं की बाढ़ ही आ जाती है। इसका नजारा पिछले कुछ महीनों में खूब देखने को मिला। 2014 के लोकसभा और उसके बाद हुए उप-चुनाव में इन नेताओं की जहरीली जुबान ने खूब कोहराम मचाया। कुछ जगहों पर जनता इनके बहकावे में आ भी गई, जिसकी परिणिति दंगे-फंसाद के रूप में हुई, लेकिन अधिकांश मौकों पर यह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। बात यूपी की कि जाये तो पिछले छः महीने में अपने विवादित बयानों से भाजपा के साक्षी महाराज, कांग्रेस के इमरान मसूद, जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी, भाजपा के योगी आदित्यनाथ, सपा के आजम खॉ ही नहीं कद्दावर नेताओं में शुमार कांग्रेस के राहुल गांधी, बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, बसपा सुप्रीमों मायावती, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह, सपा के रामगोपाल यादव, शिवपाल यादव, नरेश अग्रवाल ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थी। कई नेता तो आचार संहित के दायरे में भी आये, लेकिन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

उक्त नेताओं ने एक से एक बढ़कर विवादित बयान दिये, इनके बयानों का मकसद यही था कि किसी भी तरह से उनको रातोंरात पहचान मिला जाये और पार्टी को जीत हासिल हो जाये। इन नेताओं की विवादित बयानबाजी का मतदाताओं पर कितना असर पड़ा, इसको जांचने और नापने का तो कोई पैमाना नहीं है, लेकिन चुनाव सम्पन्न होते ही ऐसे नेताओं के मुंह से जहर बुझे तीन छुटना बंद जरूर हो गये। परंतु समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और अखिलेश कैबिनेट के मंत्री आजम खॉ, शिवपाल यादव और राज्यसभा सदस्य रामगोपाल यादव की जुबान आज भी जहर उगल रही है। अगर ऐसा न होता तो यह नेता समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपने दल की खामियां दूर करने की बजाये मोदी और भाजपा को कोसने में समय न बिताते। अखबार वालों और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की यह खासियत है कि वह दो नेताओं के बीच की बयानबाजी की कवरेज करते हैं तो ‘सबसे बड़ा या तीखा, तगड़ा हमला’ जैसे शब्दों का तो खूब इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इनके शब्दकोश से बेतुका हमला जैसे शब्द नहीं निकलते हैं। मीडिया के पास शायद स्टैडर्ड मापने का कोई पैमाना नहीं होगा इसी लिये वह दो नेताओं की तुलना को काफी हास्यास्पद बना देते हैं। भले ही नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी की सोच, राजनीति काबलियत में जमीन आसमान का फर्क हो लेकिन यह अंतर मीडिया को दिखाई नहीं देता है। वह दोनों की तुलना करते नहीं थकता।

अब समाजवादी पार्टी के अधिवेशन का ही उदाहरण ले लिया जाये। समाजवादी नेता लखनऊ में जुटे तो थे आत्म मंथन करने के लिये लेकिन उनका सारा ध्यान भाजपा और मोदी पर लगा रहा। यहां तक की मोदी के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव तक पास कर दिया गया। मंच पर जिसको भी मौका मिला उसने मोदी को कोसने के अलावा शायद ही कोई सार्थक बात-बहस की होगी, लेकिन इस हकीकत को अनदेखा करते हुए लिखा यह गया कि सपा ने प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस पर अब तक का सबसे तगड़ा हमला बोला। आजम खॉ ने मोदी को दंगा कराने वाला बताया तो एक महासचिव किरनमय नंदा ने आरएसएस को आतंकी संगठन करार दे दिया। अधिवेशन की शुरूआत में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अधिवेशन के एजेंडे से भटके तो उनके बाद आने वाले वक्ता भी नेताजी जैसी ही गलती करते चले गये। मोदी पर हमला शुरू हुआ तो उनके स्वच्छ भारत अभियान का उपहास उड़ाते हुए यहां तक कह दिया गया कि मोदी झाड़ू वालों की रोजी छीन रहे हैं। मंगलयान की लाचिंग के मौके पर वैज्ञानिकों के बीच मोदी की उपस्थिति भी समाजवादियों को रास नहीं आई और आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री दूसरों की कामयाबी का सेहरा अपने सिर बांधने की कोशिश कर रहे हैं।

अधिवेशन के अंतिम दिन मुलायम और अखिलेश यादव का ही भाषण हुआ। दोनों ने ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे समाजवादियों का मनोबल बढ़ता। मुलायम सिंह ने सभी हदें पार करते हुए आरोप लगाया कि भारत-पाक सीमा पर चल रही गोलीबारी के बीच कुछ ताकतें इस बहाने देश में साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ना चाहती है। नेताजी ने भाजपा और उससे जुड़े संगठनों की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह लोग सद्भावना तोड़ना चाहते हैं। यह बात और थी कि जब मुलायम और उनके सेनापति लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में विरोधियों पर चुन-चुन कर हमले कर रहे थे, तभी हाईकोर्ठ की लखनऊ पीठ अखिलेश सरकार की नियत पर सवाल खड़े कर रही थी। एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति वीके शुक्ला और न्यायमूर्ति बीके श्रीवास्तव द्वितीय की खंडपीठ ने समाजवादी पेंशन योजना के तहत अल्पसंख्यकों को 25 फीसदी कोटा तय करने पर सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश सुना दिया। इसी तरह की हरकत अखिलेश सरकार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए दंगे के बाद मुआवजे का ऐलान करते की थी।तब भी सरकार की तरफ से कहा गया था कि मुआवजा सिर्फ मुस्लिम पीड़ितों को दिया जायेगा।बाद में उसे यह आदेश वापस लेना पड़ा था।

बड़े मियां तो बड़े मियॉ, छोटे मियां भी धार्मिक भावनाओं का बंटवारा करने में पीछे नहीं रहे। गंगा की धार्मिक और सामाजिक मान्यता से शायद ही किसी हिन्दुस्तानी को गुरेज होगा, मगर मुख्यमंत्री अखिलेश इस बात से नाराज दिखे कि उनकी नजर में जो गंगा समाजवादी है, उसे मोदी धर्म से जोड़कर साम्प्रदायिक रूप दे रहे हैं। लगता है अखिलेश यादव को ऐसा कहते समय अपने संस्कार भी याद नहीं रहे। अगर ऐसा न होता तो उन्हें अच्छी तरह से पता होता कि हिन्दू धर्म में गंगा की क्या महत्ता बताई गई है।

हॉ, राज्यसभा सदस्य जया बच्चन ने जरूर बिना किसी का नाम लिये कहा कि जिन्हें आगे नहीं बढ़ाना होता है उन पर ज्यादा नहीं बोला जाता है, जिससे दूरी रखनी है उस पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। जया ने तो अपनी बात साफगोई से कह दी, लेकिन अन्य नेता ऐसा नहीं कर पाये और उनका सारा ध्यान एक-दूसरे को खुश करने में ही रहा। सबसे अफसोसजनक बात यह रही कि सपा के अधिवेशन में काफी मंथन हुआ होगा, लेकिन इस मंथन से ‘अमृत’ कम  हलाहल ज्यादा निकला। यही वजह थी राज्यपाल राम नाइक ने समाजवादी पार्टी के अधिवेशन के उस प्रस्ताव को मंगा कर पढ़ा, जिसमें उन पर तीखे हमले किये गये थे। भारतीय जनता पार्टी ने भी जबाब देने में देरी नहीं की। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने समाजवादी सोच पर हमला करते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार से सपाई बौखला गये हैं। ऐसे में अपनी कमी खोजने के बजाये इनके छोटे-बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, सर्वोच्च न्यायालय, राज्यपाल और मीडिया पर भड़ास निकाल रही है। राज्यपाल पर हमले से भाजपा तिलमिला गई और उसके प्रदेश प्रवक्ता डॉ. चन्द्रमोहन ने सपा नेताओें पर निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता के नशे में चूर होकर सपा बौखला गई है जिसके चलते उसे राजनैतिक और संवैधानिक शिष्टाचार की भी चिंता नहीं रही।

खैर, लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का सफाया होने के बाद भी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव का यह बयान आना अचंभित करने वाला रहा कि जनता का विश्वास उनके परिवार के ऊपर से उठा नहीं है। यह बात मुलायम अपने परिवार के पांच सदस्यों के लोकसभा चुनाव जीतने के संद्रर्भ में कह रहे थे। किसी बड़े नेता को इस तरह का बयान शोभा नहीं देता है। स्पष्ट सोच नहीं होने के कारण ही संभवता अधिवेशन का रंग फीफा ही रहा। अलबत्ता मुलायम ने अपनी परिपक्व राजनीति के सहारे इतना संकेत जरूर दे दिया कि उनके बाद समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव के हाथों में ही महफूज रहेगी। अधिवेशन में अखिलेश की युवा टीम ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया जिससे यह समझने में देरी नहीं लगी कि एक तरफ कांग्रेस और भाजपा में जबर्दस्ती पुरानी पीढ़ी को पीछे धकेलने की कोशिश की जा रही है, वहीं सपा के बड़े नेता स्वयं युवा नेताओं के लिये मंच तैयार कर रहे हैं। अधिवेशन में मुलायम के साथ-साथ तमाम बुर्जुग नेताओें ने युवाओं को आगे आकर पार्टी संभालने की हिदायत दी। कुल मिलाकार समाजवादी नेता अपनी चाल-चरित्र और चेहरा दुरूस्त करने में ही लगे रहे।

 

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट।

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अरनब गोस्वामी का महान दुख और प्रधानमंत्री-पत्रकारों के रिश्ते

arnab modi

सुनने में आ रहा है कि इन दिनों टाइम्स नॉउ के अरनब गोस्वामी बेहद दुखी हैं। करीब सवा सौ ईमेल भेज चुके हैं फिर भी उन्हें नरेंद्र मोदी ने मुलाकात के लिए समय देना तो दूर रहा, जवाब तक नहीं दिया। चुनाव के पहले भी यही हुआ था। अरनब को लग रहा था कि जैसे वे राहुल गांधी का इंटरव्यू हासिल करने में कामयाब हो गए थे वैसे ही मोदी भी तैयार हो जाएंगे। मगर मोदी ने उनकी जगह ईटीवी को चुना।

अरनब के पसीने छूट गए, दर्जनों बार फोन किया पर मोदी लाइन पर ही नहीं आए। फिर भाजपा के तमाम नेताओं को पकड़ा और गांधीनगर स्थित अपने संवाददता को संदेश भिजवाया कि किसी भी तरह से उनके इंटरव्यू का जुगाड़ करवाओ।

संवाददाता उनके पास गया और बोला कि अगर आपने समय नहीं दिया तो मेरी नौकरी चली जाएगी। मोदी ने कहा कि मैं तुम्हें इंटरव्यू दे देता हूं। वह और भी घबरा गया। बड़ी मुश्किल से वे अरनब से बात करने के लिए तैयार हुए। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अरनब तो क्या कोई पत्रकार यह नहीं कह सकता है कि वह नरेंद्र मोदी के काफी करीब है। या प्रधानमंत्री उनके साथ तमाम जानकारियां साझा करते हैं।

पत्रकारिता और राजनीति का रिश्ता जितना पुराना है उतना ही करीबी रिश्ता प्रधानमंत्रियों व पत्रकारों का भी रहा है। बुजुर्ग पत्रकार मनमोहन शर्मा बताते हैं कि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु अक्सर अपने तीन मूर्ति स्थित निवास पर पत्रकारों को अलग-अलग चाय पर आमंत्रित करते थे। उन पर सामयिक विषयों पर चर्चा करते थे। उन दिनों पत्रकारों की संख्या मुश्किल से दो दर्जन हुआ करती थी। आमतौर पर सारी मुलाकात सिर्फ विचारों के आदान-प्रदान तक ही सीमित रहती थी। वे किसी और तरह की भूमिका नहीं निभाते थे।

लाल बहादुर शास्त्री बहुत कम समय के लिए प्रधानमंत्री रहें। उनके बाद जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो कुछ पत्रकारों से उनकी निकटता हो गई। इनमें महिला पत्रकार अमिता मलिक, उमा वासुदेव, मनुहरी पाठक आदि शामिल थीं। जर्नादन ठाकुर भी अक्सर उनके यहां पहले आया जाया करते थे। सबसे करीबियों में खुशवंत सिंह थे। खुशवंत सिंह की योग्यता पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता है। पर मरने के पूर्व दिए अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान टाइम्स का संपादक, उस समय की केंद्र सरकार तय करती थी। मुझे भी संजय गांधी के कहने पर बिड़लाजी ने संपादक बनाया था।

इंदिरा गांधी को पत्रकारिता का सबसे ज्यादा कटु अनुभव भी हुआ। उन्होंने जब देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की तो अखबारों व पत्रकारों को भी निशाना बनाया। कुलदीप नैय्यर, श्याम खोसला, वीरेंद्र कपूर, के जी गोरवाला, के. सुंदरराजन जेल भेजे गए। वही 89 पत्रकारों की पीआईबी मान्यता रद्द की गई। बाद में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सरकार ने पत्रकारों को झुकने के लिए कहा था पर वे रेंगने लगे।

इंडियन एक्सप्रेस, सर्चलाइट आदि अखबारों की बिजली काट दी गई। इसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा। पूरी पत्रकार बिरादरी उनके खिलाफ हो गई। जब जनता पार्टी सत्ता में आयी व मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनें तो, स्वभाव से रुखे गुजराती नेता ने भी पत्रकारों को ज्यादा भाव नहीं दिया। उनके समय में कोई पत्रकार यह दावा नहीं कर सकता था कि वह प्रधानमंत्री के करीब है या सरकार के बारे में तमाम अंदरुनी जानकारियां रखता है। इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका व अरुण शौरी की जनता पार्टी के नेताओं से जरुर घनिष्ठता थी। यही वजह थी कि उस दौरान जनता पार्टी के अंदरुनी झगड़ों की आए दिन सुर्खियां बनती रहती थीं।

जब दोबारा इंदिरा गांधी सत्ता में आयीं तो उन्होंने आपातकाल से सबक लेते हुए मीडिया के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाया। सूचना सेवा के अधिकारी एम वाई शारदा प्रसाद को अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त किया जो कि उनका भाषण लिखने के साथ ही उन्हें अखबारों से संबंधित सलाह भी दिया करते थे।

इंदिरा गांधी के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे तो शुरु में उनके बाल सखा रहे पत्रकार सुमन दुबे चर्चा में आए। उन्हें बाद में रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सप्रेस का संपादक भी बनाया। राजीव गांधी के शुरु में पत्रकारों से अच्छे संबंध रहे। इनमें वीर अर्जुन के संपादक से लेकर रविवार के राजीव शुक्ल तक शामिल थे। जब राजीव गांधी और वीपी सिंह का टकराव हुआ तो राजीव शुक्ला ने उनकी खुलकर मदद की। रविवार जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका के मुखपृष्ठ पर वीपी सिंह की तस्वीर के साथ ही यह छपा कि ‘राजा मांडा, फूटा भांडा’। इसमें वीपी सिंह द्वारा अपनी मांडा रियासत की जमीन पहले विनोबा भावे को दान में देने व उसके बाद उनकी पत्नी द्वारा उन्हें पागल करार देकर यह जमीन वापस लेने की कहानी थी।

राजीव गांधी के सत्ता से हटने के बाद जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो कुछ पत्रकारों की लाटरी खुल गई। इनमें रविवार के संवाददता रह चुके संतोष भारतीय भी शामिल थे। संतोष भारतीय को उन्होंने फर्रुखाबाद से टिकट दे कर सांसद बना दिया। मार्निंग इको के अजय सिंह भी रेल राज्य मंत्री बने। उदयन शर्मा की किस्मत खराब थी इसलिए वे आगरा से चुनाव हार गए। वीपी सिंह की एक खासियत यह थी कि वे पत्रकारों का इस्तेमाल करना बखूबी जानते थे। मतलब निकल जाने पर एक जाति विशेष के पत्रकारों को छोड़कर दूसरों से कोई लगाव नहीं रखते थे।

उन्हें पता था कि राजीव गांधी के खिलाफ इतना जबरदस्त माहौल है कि उनका समर्थन करना पत्रकारों व अखबारों की मजबूरी है। वैसे भी एक्सप्रेस ग्रुप पूरी तरह से खुलकर उनके समर्थन में उतर आया था। हालांकि उनका भी वही हश्र हुआ जो कि बाद में आप पार्टी का हुआ। जिस मीडिया ने उनकी हवा बनाई थी उसी मीडिया ने मंडल को लेकर उनकी ऐसी हवा खराब की कि फिर वे कभी सुर्खियों में नहीं रह पाए। जब उनका निधन हुआ तो अखबारों में सिंगल कालम खबर छपीं।

राजीव गांधी के निधन से सबसे ज्यादा नुकसान राजीव शुक्ल का हुआ। वे दोनों इतने करीब आ चुके थे कि अगर वे दोबारा प्रधानमंत्री बनते तो मणि शंकर अय्यर का विदेश मंत्री व राजीव शुक्ल का सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनना तय था। राजीव शुक्ला ने उनके बुरे दिनों में भी किसी की कोई परवाह न करते हुए उनका पूरी तरह से साथ दिया था। इन तीनों का चोली दामन का साथ था। इस बीच पी वी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बनें। वे बेहद चंद लोगों तक खुद को सीमित रखते थे। उनके करीब सिर्फ एक ही पत्रकार, कल्याणी शंकर थीं जो कि खुद भी संयोग से आंध्रप्रदेश की ही थीं। जब कल्याणी शंकर ने महिला पत्रकार क्लब बनाया तो 24 घंटे के अंदर क्लब को ली मिरीडियन के ठीक सामने बंगला अलाट कर दिया गया व तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम ने एमटीएनएल के जीएम को बुलाकर कहा कि शाम तक वहां फोन लग जाना चाहिए।

ये वही सुखराम थे जिनके मंत्री रहते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का फोन भुगतान न होने के कारण कट गया था। तब उन्होंने जीएम को बुलाकार कहा था कि भाई थोड़ा ध्यान रखा करो। बाद में एचडी देवगौडा आए उन्होंने एच के दुआ को अपना मीडिया सलाहकार बनाया।

अटल बिहारी वाजपेयी के समय में पत्रकारों खासतौर से संघ की पृष्ठभूमि वालों की काफी मौज रही। जहां उन्होंने योग्यता की कसौटी पर अशोक टंडन सरीखे वरिष्ठ पत्रकार को अपना मीडिया सलाहकार बनाया वहीं, बलबीर पुंज, दीनानाथ मिश्र, चंदन मित्रा राज्यसभा पहुंचे। अरुण शौरी केंद्र में मंत्री बनाए गए। वैसे खासतौर से हिंदुस्तान टाइम्स समूह की कुछ महिला पत्रकारों से उनका पहले से ही जुड़ाव रहा था। जितना अधिकार उनका हिंदी व अंग्रेजी भाषाओं पर था उससे कहीं ज्यादा दोनों ही भाषाओं की पत्रकार उन पर अपना अधिकार मानती थीं।

वाजपेयी ने भी कभी इन बातों का खंडन नहीं किया। एक पत्रकार ने तो अपनी पुस्तक में इसका उल्लेख करते हुए लिखा कि जब मैंने उनसे महिलाओं के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मुझे तो आप भी बहुत अच्छी लग रही हैं। दूसरी तो बिना कुछ लिखे ही सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं। मनमोहन सिंह बेहद रुखे स्वभाव के थे। फिर भी उन्होंने पत्रकारों को अपना मीडिया सलाहकार बनाया और उन्होंने ही उनका बंटाधार किया।

हो सकता है कि उनसे सबक लेते हुए ही नरेंद्र मोदी किसी पत्रकार को अपने पास फटकने देना नहीं चाहते हैं। मीडिया सलाहकार बनाना तो बहुत दूर की बात है। वे अपने गुजरात के जनसंपर्क अधिकारियों से ही अपना मीड़िया शो चलाएं हुए हैं।

 

लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार है। विनम्र उनका लेखन नाम है। प्रस्तुत लेख नई दुनिया से साभार लिया गया है।

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पत्रकारिता के सिद्धांत, नैतिक मूल्य और उनकी सच्चाई

एक दिन मैं विश्वविद्यालय से घर के लिए निकल रहा था। थोड़ी ही दूर पहुंचा तो देखा कि जाम लगा था। मैंने अपनी गाड़ी को सड़क किनारे लगाया और पास ही बनी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। ट्रैफिक जाम ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन सबको जल्दी थी इसलिए साफ नहीं हो रहा था। मैं चाय पी ही रहा था कि अचानक से एक एंबुलेंस बहुत तेजी में आई। उसे देखकर समझ आ गया कि कोई इमरजेंसी है। लेकिन लोग उस एंबुलेंस को निकलने ही नहीं दे रहे थे।

जब मैंने ये देखा तो अपनी चाय रखी और एंबुलेंस को निकालने में मदद करने लगा। मेरी देखा-देखी कई लोग और आ गए मदद करने। लेकिन अचानक एक पत्रकार महोदय भी वहां अपना कैमरा लिए आ गए और एंबुलेंस की फोटो लेने लगे। मैंने और मेरे साथ कई लोगों ने मिलकर जाम को थोड़ा साफ किया ताकि वो एंबुलेंस निकल जाए। लेकिन जैसे ही जाम साफ हुआ और एंबुलेंस निकलने लगी तो उस पत्रकार ने एक गाड़ी वाले को आगे बुलाया और उसको एंबुलेंस के सामने खड़ा करा दिया और वो फिर एंबुलेंस की फोटो लेने लगा।

ये देखकर हम सबको बहुत गुस्सा आया और उस पत्रकार से थोड़ी बहस भी हुई और फिर वो पत्रकार वहां से चला गया। इस घटना के बाद मेरे मन में कई सवाल आ रहे थे। मैं सोच रहा था कि समाजोत्थान और समाज के विकास के लिए बनी पत्रकारिता वाकई आज निजी स्वार्थ का साधन बन गई है। मुझे बहुत बुरा लग रहा था कि मैं भी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूं और शायद कल को मुझे भी अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए ऐसी ही कोई हरकत करनी पड़े।

मैं जबसे पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूं तभी से मुझे पढ़ाया और सिखाया गया है कि हमें कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करना है जिससे समाज को कोई नुकसान पहुंचे। ये बात मुझे या किसी पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी को ही नहीं बल्कि सभी को पढाई और सिखाई जाती है।

लेकिन इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मेरा मन अशांत सा रहने लगा और मैं सोच में पड़ गया कि जो बात हमें पत्रकारिता में पढाई और सिखाई गई है वैसा कुछ भी नहीं है। बल्कि पत्रकारिता के सिद्धांत और मूल्यों के ठीक विपरीत एक पत्रकार समाज में काम करता है।

 

प्रियांक द्विवेदी पत्रकारिता के छात्र हैं। प्रस्तुत लेख उनके ब्लॉग से साभार से लिया गया है।

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वयोवृद्ध पत्रकार कुंवर नेगी ‘कर्मठ’ का निधन

कोटद्वार: समाज सेवी एवं गढ़गौरव पत्रिका के प्रधान सम्पादक कुंवर नेगी कर्मठ का 103 साल की उम्र में निधन हो गया। कुंवर सिंह नेगी कर्मठ के निधन पर सामाजिक संगठनों एवं पत्रकारों ने शोक व्यक्त किया है। वरिष्ठ पत्रकार एवं गढ़गौरव पत्रिका के सम्पादक कुंवर सिंह नेगी के आकस्मिक निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर का यहां गाड़ीघाट स्थित मुक्तिधाम में सैकड़ों लोगों ने नम आंखों के साथ उनका अतिंम संस्कार किया।

कांग्रेस, भाजपा, के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके अंतिम संस्कार में पहुंचकर उन्हें अंतिम विदाई दी। इस अवसर पर जिलाध्यक्ष दीपक बड़ोला, दर्शन सिंह रावत, बीबी ध्यानी,दिनेश गुंसाई, संजय मित्तल, मातबर सिंह, मंगल सिंह रावत, विपिन चढ़ा, ब्लाक प्रमुख सुरेश असवाल, मनवर सिंह आर्य, मनोज रावत, हिम्मत सिंह नेगी, प्रवेश रावत, राकेश मित्तल, राकेश अग्रवाल, प्रताप सिंह सहित कई लोग मौजूद थे।

कांग्रेस एवं भापजा कार्यकर्ताओं ने अपने कार्यालयों में शोक सभा व्यक्त कर कुंवर सिंह नेगी कर्मठ को श्रद्धा सुमन अर्पित किये। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कर्मठ को कांग्रेस का सच्चा सिपाही एवं लेखनी का धनी बताते हुए उनके कार्यो की सराहना की है, वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं ने कर्मठ के निधन को समाज के लिए क्षति बताया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने कहा कि कर्मठ ने अपनी लेखनी के माध्यम से समस्याओं को उठाने का भरसक प्रयास किया।

शोक व्यक्त करने वालों में लैंसडौन विधायक दलीप रावत, शैलेन्द्र गढ़वाली, धर्मवीर गुसांई, जिलाध्यक्ष धीरेन्द्र सिंह चौहान, प्रवीन चौहान, मंगतराम अग्रवाल, कुलदीप अग्रवाल, मनोज लखेड़ा, आरजा भट्ट, कैलाश थलेडी, संग्राम सिंह भंडारी, रानी नेगी, शशि नैनवाल, भुवनेश खर्कवाल, प्रमोद अग्रवाल मौजूद थे।

प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी ने कर्मठ के आकस्मिक निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कर्मठ जी कांग्रेस कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि लेखनी के भी धनी थे, उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में पार्टी को नई ऊंचाइयों में पहुंचाने का काम किया है तथा पत्रकारिता के रूप में जनसमस्याओं को उठाने का काम किया है।

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निर्वाचन आयोग ने ‘राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार’ के लिए आवेदन आमंत्रित किए

चंडीगढ़। निर्वाचन आयोग ने लोकसभा चुनाव-2014 के दौरान लोगों को वोट डालने हेतु शिक्षित एवं जागरूक करने के लिए प्रिंट एवं इलैक्ट्रोनिक मीडिया हाउसेज़ से ‘राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार’ के लिए 30 अक्टूबर तक आवेदन आमंत्रित किए हैं।

इसके लिए प्रिंट एवं इलैक्ट्रोनिक मीडिया को एक-एक पुरस्कार दिया जाएगा। हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्रीकांत वाल्गद ने बताया कि 15 जनवरी को राष्ट्रीय मतदान दिवस के अवसर पर दिए जाने वाले इस पुरस्कार में एक प्रशस्ति पत्र एवं पट्टिका भेंट दी जाएगी।

यह पुरस्कार किसी भी मीडिया हाउस को उसके द्वारा मतदाताओं को मतदान में भाग लेने के लिए मतदान का महत्व एवं पंजीकरण के लिए प्रोत्साहित एवं शिक्षित करने में अमूल्य योगदान के लिए दिया जाएगा।

पुरस्कार की योग्यता के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए एक निर्णायक मंडल द्वारा ‘प्रचार की गुणवत्ता’, उसकी मात्रा, जनता तथा संबंधित लोगों पर इसके प्रभाव के प्रमाण की जांच करेगा। उन्होंने कहा कि भेजी जानी वाली सभी प्रविष्टिïयां संबंधित अवधि के दौरान प्रसारित तथा प्रकाशित होनी चाहिए।

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भाजपा का चुनावी वादा, सत्ता में आने पर महाराष्ट्र के पत्रकारों को मिलेगी पेंशन

महाराष्ट्र बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में राज्य के वयोवृध्द पत्रकारों को हर माह 1500 रूपये पेन्शन देने का वादा किया है। महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती के ओर से राज्य के सभी प्रमुख राजनैतिक दलों को एक पत्र लिखकर पत्रकारो के मांगों के विषय में अपनी भूमिक चुनाव घोषणा पत्र के माध्यम से स्पष्ट करने की मांग की थी।

महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती की इसी मांग के चलते आज बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में पत्रकार पेन्शन योजना शुरू करने का आश्वासन दिया है। समिती के अध्यक्ष एस.एम. देशमुख ने बीजेपी की इस घोषणा का स्वागत किया है।

उन्होने कहा कि बीजेपी ने 1500 रूपये पेन्शन देने की बात कही है। यह रकम पर्याप्त नहीं है, इस पर चर्चा हो सकती है लेकिन बीजेपी ने यह बात मान ली है इसका स्वागत होना चाहिए।

देशमुख ने इस बात पर दुख जताया कि पत्रकार सुरक्षा कानून के विषय में बीजेपी ने कोई वादा नहीं किया है।

शिवसेना का चुनाव घोषणा पत्र भी जारी कर दिया गया है लेकिन इसमें पत्रकारों की मांगे अनदेखी की गई है। कांग्रेस, एनसीपी, एमएनएस ने भी पत्रकारों के मांगो के विषय में अपने घोषणा पत्रों में कोई आश्वासन नहीं दिया है।

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खस्ताहाल हैं कन्नौज के स्ट्रिंगर, कई ने दिया इस्तीफा

कन्नौज को वीवीआईपी जिला कहा जाता है लेकिन यहां काम करने वाले स्ट्रिंगरों (पत्रकारों) की हालत खस्ता है। उनको संस्थान से नए-नए निर्देश और प्लान तो दिए जाते हैं लेकिन वेतन नहीं बढ़ाया जाता है। कोई पत्रकार समय से वेतन नहीं मिलने, तो कोई अन्य समस्याओं के कारण संस्थानों से इस्तीफा दे रहा है।

दैनिक जागरण, कन्नौज में बीते तीन महीने से अनुभव अवस्थी काम कर रहे थे। पैसा नहीं मिला और वह काम छोड़ गए। उन्होंने कानपुर से लेकर लखनऊ तक कई बार दौड़ लगाई पर जागरण को तरस नहीं आया। इससे पहले वीवीआईपी जिले में हिन्दुस्तान समाचार पत्र में काम करने वाले क्राइम रिपोर्टर रीतेश चतुर्वेदी भी पैसा न बढ़ने से आजिज थे। उनका कहना है कि सरकारी विज्ञापन में कमीशन नहीं मिलता, जिम्मेदारों ने ध्यान नहीं दिया इसलिए उन्होने संस्थान छोड़ दिया।

इसी तरह अमर उजाला कन्नौज में काम कर रहे राहुल त्रिपाठी को बिल्हौर से आना पढ़ता था। अब वह भी बिल्हौर में रिर्पोटिंग करने लगे हैं। बताया गया है कि बिल्हौर के संवाददाता अवनीश यादव अमर उजाला से हट चुके हैं।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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जब कैलाश सत्यार्थी को ग्रेट रोमन सर्कस के मालिक ने बुरी तरह मारा था

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हर भारतीय की तरह मैं श्री कैलाश सत्यार्थी के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने की ख़ुशी में फूला नहीं समा रहा हूँ और जून 2004 की करनैलगंज, गोंडा की उस घटना को याद कर रहा हूँ जब श्री सत्यार्थी को नेपाली सर्कस बालाओं को मुक्त करने के प्रयास में ग्रेट रोमन सर्कस के मालिक द्वारा बुरी तरह मारा-पीटा गया था.

हम पहली बार सर्कस में ही मिले थे जहां उनके सिर से बहुत खून निकल रहा था. मेरे प्रयास और गोंडा पुलिस की तत्परता से हम समय रहते उन्हें विषम स्थिति से निकाल सके थे और साथ ही कई नेपाली लड़कियों को भी मुक्त करने में सफल रहे थे, जिसकी श्री सत्यार्थी और मीडियाकर्मिओं ने भूरी-भूरी प्रशंसा की थी.

इस अवसर पर मैं अपने आप को अत्यंत सौभाग्यशाली समझता हूँ कि जीवन के किसी मोड़ पर मैं इस महान विभूति के संपर्क में आया और उनके किसी काम आ सका था.

 

अमिताभ ठाकुर

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कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफज़ई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

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बवाल कर रहे युवकों ने एएनआई संवाददाता को धमकाया, कैमरा छीनने का प्रयास

फर्रुखाबाद जनपद के एशियन न्यूज़ इंटरनेश्नल (ANI) जिला संवाददाता देर रात तकरीबन साढ़े दस बजे डॉ. के एम द्विवेदी अस्पताल में एक घायल पुलिस कर्मी की न्यूज़ कवर करने गए थे। वापस लौटते समय बस स्टैंड के सामने स्थित एक होटल पर करीब 15-18 युवकों को मार-पीट, गाली गलौज करते देख ANI रिपोर्टर घटना को अपने कैमरे से शूट करने लगे। कैमरा देख वहां मौजूद एक युवक रिपोर्टर के निकट आया और स्वयं को एक राजनैतिक दल का नेता बताते हुए हथियार निकाल कर धमकाने लगा।

बवाल कर रहे युवकों में से एक ने रिपोर्टर सूर्या बाजपेयी के साथी कैमरामैन का कैमरा खींचने का भी प्रयास किया। सूर्या बाजपेयी ने मौका देख कर तुरंत ही गाड़ी आगे बढ़ा दी। उनकी शिकायत पर जिला पुलिस अधीक्षक ने एफआईआर दर्ज करने के साथ ही बीएसपी नेता देवेश तिवारी पर कार्यवाही करने का आदेश दिया है।

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लोक कवि जब अपनी सफलता के लिए डांसर लड़कियों के मोहताज़ हो जाते हैं

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दयानंद पांडेय

लोक कवि अब गाते नहीं

यह उपन्यास एक ऐसे भोजपुरिया लोक कवि के बारे में है जो दरिद्रता और फटेहाली का जीवन व्यतीत करते हुए  गांव से शहर की दुनिया में प्रवेश करता है। और फिर संघर्ष करते हुए धीरे-धीरे उस के जीवन की काया पलट होने लगती है या कहिए कि जैसे घूरे के दिन किसी दिन बदलते हैं वैसे ही उस की घूरे जैसी जिंदगी भी पैसा व शोहरत की मेहरबानी से चमकने लगती है। कुछ लोगों के अँधेरे जीवन में किस्मत से अचानक आशा की किरने फूटती हैं और रोशनी का समावेश होने लगता है तो ऐसा ही होता है लोक कवि के साथ भी। वरना पिछड़े वर्ग के कम पढ़े-लिखे गरीब इंसान कहां इतने ऊंचे सपने देख पाते हैं। Continue reading

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कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफज़ई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

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इस साल शांति का नोबेल पुरस्कार भारत के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफज़ई को संयुक्त रुप से दिया गया है।

दिल्ली में रहने वाले सत्यार्थी बाल मजदूरी के खिलाफ लंबे अर्से से लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने इसके लिए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ नाम की ग़ैर सरकारी संस्था भी बनाई है और इसी के जरिए वो 1990 से बच्चों के अधिकारों पर काम कर रहे हैं।

कैलाश सत्यार्थी ने अब तक 1 लाख से ज्यादा बच्चों को मजदूरी से मुक्त कराया है। वे इंटरनेशनल सेंटर ऑन चाइल्ड लेबर और यूनेस्को से जुड़े रहे हैं।

 
नोबेल पुरस्कार से पहले सत्यार्थी को 1994 में जर्मनी का ‘द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड’, 1995 में अमरीका का ‘रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड’, 2007 में ‘मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट’ और 2009 में अमरीका के ‘डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड’ सहित एक दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके हैं।

1954 में मध्य प्रदेश के विदिशा में जन्मे हुआ सत्यार्थी 8वें भारतीय हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे कैलाश सत्यार्थी ने 26 वर्ष की उम्र में ही करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। उन्होने बाल श्रम के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर हज़ारों बच्चों की ज़िंदग़ियों को बचाया है। इस समय वे ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ (बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान) के अध्यक्ष भी हैं।

सत्यार्थी का सफर आसान नहीं रहा है। बाल श्रम के खिलाफ आंदोलन चलाने और बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के अभियान के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमला भी हुआ। मार्च 2011 में दिल्ली की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री पर छापे के दौरान उन पर हमला किया गया। इससे पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान भी उन पर हमला हुआ था।

वहीं मलाला यूसुफज़ई को बच्चों के अधिकारों की कार्यकर्ता होने के लिए जाना जाता है। पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में लड़कियों की शिक्षा की मुहिम चलाने के लिए महज़ 14 वर्ष की उम्र में चरमपंथियों की गोली का निशाना बनना पड़ा था। इस हमले वे बुरी तरह घायल हो गईं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आ गई।

मलाला ने 11 साल की उम्र में ही डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। वर्ष 2009 में “गुल मकई” के छद्म नाम से बीबीसी ऊर्दू के लिए डायरी लिख मलाला पहली बार दुनिया की नजर में आई थी। जिसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था और अपने दर्द को डायरी में बयां किया। वर्ष 2009 में न्‍यूयार्क टाइम्‍स ने मलाला पर एक फिल्‍म भी बनाई थी।

मलाला सबसे यूवा नोबेल पुरस्कार विजेता हैं।

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मोदी की रैली में पुलिस ने पत्रकारों को अंदर जाने से रोका, चपरासी को पास थमा गायब हुए भाजपा के पीआरओ

मोदी मीडिया की परवाह नहीं करते, ये बात तो सुर्खियों में है ही। यहां संगठन के निचले स्तर पर भी यह झलकने लगा है। बुधवार को हरियाणा के यमुनानगर में हुई मोदी की रैली में पत्रकारों को अपमान का वो घूंट पीना पड़ा, जो वो इस जन्म में तो भूलेंगे नहीं। रैली के लिए पत्रकारों को पास देने का जो जिम्मा स्थानीय भाजपा के जनसंपर्क अधिकारी राजेश सपरा को दिया गया था, वो ही जनाब ऐन मौके पर पास देने की बजाए गायब हो गए।

उधर पुलिस पत्रकारों को अंदर न जाने दे। उल्लेखनीय है कि इस हो-हल्ले में खुद वरिष्ठ भाजपा नेता वा हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. धूमल भी गेट पर फंस गए। पत्रकारों और पुलिस की चर्चा में किसी का ध्यान नहीं गया कि इतना बड़ा लीडर किनारे खड़ा है। खैर उन्हे जैसे तैसे प्रवेश कराया गया।

विडंबना ये कि भाजपा के अन्य किसी पदाधिकारी ने गेट पर खड़े होकर पत्रकारों को भीतर प्रवेश कराने की जहमत नहीं उठाई। आखिर बेचारा जनसंपर्क विभाग का एक चपरासी बोला जनाब पास तो मेरी जेब में हैं। यानी सरकारी पीआरओ और भाजपा वाले दोनों उस बेचारे के हवाले ये काम सौंप चले गए। पुलिस वाले भी सकते में कि ऐसे कैसे किसी को अंदर जाने दें। आखिर उस चपरासी ने पहचान करके कहा कि मैं इन पत्रकारों को जानता हूं और अपनी जिम्मेदारी पर पास दे रहा हूं।

जब तक उसकी गवाही पड़ी तक तब पुलिस पत्रकारों की अच्छी कसरत करवा चुकी थी। अपमान जहर पीकर पत्रकार मोदी की रैली कवर करने बैठ गए। एक जहर का बड़ा प्याला पत्रकारों का और इंतजार कर रहा था। भाजपा के पीआरओ सपरा अंदर प्रेस गेलरी में भी नहीं मिले।

चलो सब भूल मोदी मोदी शुरू हो गया। अभी पत्रकारों के मुंह पर एक ओर तमाचा लगना बाकी था। पत्रकारों को रैली के दौरान कुछ भी खाने को भाजपा की तरफ से नहीं दिया गया। जब पत्रकार रैली खत्म होने पर घर जा रहे थे, तो पीछे से आवाज लगाते हुए भाजपा पीआरओ बोले दोस्तो आपके खाने के डिब्बे रह गए थे, देने भूल गए, घर ले जाना।

इस घटना पर पत्रकार आक्रोशित हैं। हां, इस बात पर भी आक्रोशित हैं कि यमुनानगर के कुछ उनके साथियों ने बाजार के बीच में जाते वक्त भी वो डिब्बे स्वीकार कर लिए। भाजपा की राज्य इकाई को इस वाकये के बारे अवगत कराया गया है।

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आसाराम मामले में हाई कोर्ट ने दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्जी खारिज की

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एक आपराधिक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंडिया न्यूज टीवी चैनल के एडिटर-इन-चीफ दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी है। चौरसिया व अन्य पर आसाराम बापू के विषय में आपत्तिजनक कार्यक्रम प्रसारित करने का आरोप है।

इस संबंध में चौरसिया तथा अन्य के विरुद्ध आईपीसी की धारा 469, 471, 120B, आईटी एक्ट की धारा 67B और पाक्सो एक्ट की धारा 13C के अंतर्गत मुक़दमा दर्ज किया गया था। चौरसिया पर आरोप है कि उन्होने आसाराम बापू से संबंधित कुछ दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की और उन्हे अपने चैनल के शो ‘सलाखें’ में दिखाया।

चौरसिया तथा अन्य पर आसाराम से संबंधित कुछ आपत्तिजनक क्लिपिंग भी दिखाने का आरोप है जो कि आईपीसी के साथ ही आईटी एक्ट और पाक्सो के अंतर्गत अपराध है।

हाई कोर्ट ने ज़मानत अर्जी खारिज करते हुए पुलिस को मामले की जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। पुलिस चौरसिया को इस मामले में गिरफ्तार भी कर सकती है।

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रामविलास शर्मा आर्य-अनार्य की बहस को साम्राज्यवाद का हथियार मानते थे

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डॉ. रामविलास शर्मा (10 अक्टूबर 1912- 30 मई, 2000) हिंदी के महान समालोचक और चिंतक थे। 10 अक्टूबर, 1912 को जिला उन्नाव के ऊंचगांव सानी में जन्मे रामविलासजी ने 1934 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. और फिर 1938 में पी-एच.डी की। 1943 से 1971 तक आगरा के प्रसिद्ध बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते रहे। 1974 तक आगरा विवि के कुलपति के विशेष आग्रह पर के.एम. मुंशी विद्यापीठ के निदेशक का कार्यभार संभाला। ‘राष्ट्रवाद’ और ‘मार्क्सवादी  चेतना’  रामविलास शर्मा के चिंतन-दर्शन का केंद्र-बिंदु है। बाल्मीकि, कालिदास, भवभूति,  भक्ति आंदोलन से लगायत भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद्र, निराला, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन और अमृतलाल नागर तक उन्होंने विश्वसनीय, वस्तुनिष्ठ (और ‘विवादास्पद’ भी!) मूल्यांकन किया।

उनकी सभी मान्यताओं से सहमति नहीं रखने वाले लोग भी उनकी वैचारिक साधना और संघर्ष-साधना के प्रति आदर रखते हैं। डॉ. शर्मा ने हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को कई महत्वपूर्ण और मौलिक अवदान दिए। उनकी भाषा में सहजता, स्पष्टता व मौलिकता देखते ही बनती है। उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद हिंदी की प्रगतिशील आलोचना को समृद्ध करने में महती भूमिका तो निभायी ही, भाषा विज्ञान, दर्शनशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र और भारतीय संस्कृति को व्याख्यायित करने में अपनी अद्भुत व अप्रतिम मेधा एवं दृष्टि का परिचय दिया। उनकी ज्ञान -मीमांसा का परिक्षेत्र जितना व्यापक है, उतना ही गंभीर। उन्होंने अपने पी-एच.डी. शोध पत्र (जिसका परीक्षण इंग्लैंड में हुआ) और कुछ शुरुआती  निबंधों को छोडक़र आजीवन हिंदी में ही लिखा।

हिंदी और अंग्रेजी भाषा-साहित्य के प्राय: सभी जानकार एवं मूर्धन्य यह भलीभांति जानते हैं कि वे चाहते तो ‘ग्लोबल गांव’ में अंग्रेजी में लिखकर ‘इंटरनेशनल’ हो सकते थे। लेकिन नहीं, हजार वर्ष के हिंदी भाषा और साहित्य की परंपरा को वे पूरी दुनिया में अपनी भाषा में ही उल्लेखित कर रहे थे। उनका साहित्यिक जीवन 1933 से शुरू हुआ, जब वे महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के संपर्क में आये। निराला साहित्य की समालोचना में उनका महान योगदान है। जब चारों तरफ से निराला की कविताओं को कमतर सिद्ध किया जा रहा था, उस समय उन्होंने उनकी सृजनात्मकता को ऊंचाई प्रदान किया। बौधिक समर्थन दिया। ‘निराला की साहित्य साधना (तीन भागों में) में निराला के जीवन और साहित्य को जैसा रचा गया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। निराला के बारे में उन्होंने लिखा है कि ‘जैसे 1857 का कोई योद्धा साहित्य के मैदान में चला आया हो।’

वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह का कहना है कि ‘ज्यादा सही है कि वह योद्धा रामविलास जी ही हैं।’ आचार्य भोला शंकर व्यास जैसे मूर्धन्य संस्कृत और हिंदी आचार्य, घोर परम्परावादी पंडित विद्यानिवास मिश्र और वामपंथी नामवर सिंह एक साथ डॉ. शर्मा के प्रति नतमस्तक हैं।

डॉ. शर्मा आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित और विश्वसनीय समालोचक हैं। शुक्लजी की तरह उन्होंने भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर आलोचना रची। उनका कहना था कि ‘यदि हमें भारतीय इतिहास का सही-सही मूल्यांकन करना है तो हमें अपनी परंपरा और प्राचीन साहित्य को देखना होगा।’ जिस समय कम्युनिस्ट विचारधारा के ‘जड़’ लेखक-विचारक तुलसी, परंपरा, वेद, पुराण पर लिखने- बोलने से हिचकते और लजाते थे उस दौर में रामविलासजी ने परंपरा और ऋग्वेद पर लिखकर यह बताया कि परंपरा से पीछा छुड़ाना और बिना जाने उसे बुर्जुवा साहित्य घोषित करना एक बड़ी भूल होगी। राजनीति की तरह साहित्य और चिंतन में भी प्रगतिशील लेखक ‘ऐतिहासिक भूल’ को बार-बार दोहराते रहे।

जिंदगी की अंतिम सांसों तक मार्क्सवादी दर्शन और विचारधारा के प्रति विश्वास रखते रहे रामविलास शर्मा जड़ कम्युनिस्ट नहीं थे। वे ईमानदार भारतीय चिंतक थे, जिनके लिए परंपरा, तुलसीदास, वेद -पुराण-शास्त्र का भी अत्यन्त महत्व था। इसीलिए उन्हें ‘ऋषि मार्क्सवादी कहा गया। जब वामपंथी लेखक तुलसीदास को दरकिनार कर रहे थे, तब डॉ. शर्मा सत्साहस के साथ तुलसी साहित्य के सौंदर्य शास्त्र को रच रहे थे और बता रहे थे कि तुलसीदास भारतीय मानस को समझने के सर्वोत्तम माध्यम हैं। प्रेमचंद को तुलसी के बाद सर्वाधिक जनप्रिय सर्जक माना।

आर्यों के मुद्दे पर वे अटल रहे कि आर्य भारत के मूल थे। आर्य-अनार्य की बहस को साम्राज्यवाद का हथियार मानते थे। उनके शब्दों में- ‘हमारे जितने पूंजीवादी और मार्क्सवादी इतिहासकार हैं वे आर्यों को एक अखंड इकाई मानकर चलते हैं। हमारा कहना है कि भारत में आर्यों की कोई अखंड इकाई नहीं थी। नस्ल के आधार पर कभी भी भारतीय समाज या संसार के किसी भी समाज का संगठन नहीं हुआ है।’ रामविलासजी नास्तिक थे, सेकुलर थे, लेकिन ‘राष्ट्रनिरपेक्ष’ मार्क्सवादी चिन्तक नहीं थे।

रामविलास जी ने महाप्राण निराला और आचार्य शुक्ल के मार्फत एक लेखक की छवि का भी निर्माण किया। साम्राज्यवाद विरोध के प्रति उनका नजरिया हमेशा अडिग रहा। ऋग्वैदिक ऋषियों से लेकर रामविलास जी तक एक चरित्र देखने को मिलता है।

उन्हें अनेक पुरस्कार-सम्मान मिले। लेकिन पुरस्कारों के प्रति उदासीनता प्रकट कर उन्होंने साहित्यकार और चिंतक की वास्तविक भूमिका के प्रति सचेत किया। साहित्य अकादमी और अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित हुए। लाखों रुपयों की पुरस्कार राशि को अहिंदी प्रान्तों में हिंदी के उत्थान ओर विकास के लिए दान कर दिया। निराला ने शुक्ल जी को हिंदी के हित का अभिमान कहा। यही बात डॉ. शर्मा पर भी लागू होती है। हम सभी को उनसे प्रेरणा लेकर ‘अपनी धरती और अपने लोग’ (रामविलास जी की आत्मकथा) के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास करना चाहिए।

हिंदी प्रदेश का और सारे देश का सांस्कृतिक विकास इस प्रयास की सफलता पर निर्भर है। साहित्य और लेखक की जिम्मेदारी को वह पिछलग्गू नहीं मानते। उनकी स्पष्ट धारणा है कि ‘ऐसा नहीं होता कि समाज के रथ में लेखक पीछे बंधा हुआ हो और उसके पीछे लीक पर घिसरता हुआ चलता है। लेखक सारथी होता है जो लीक देखता हुआ साहित्य की बागडोर संभाले हुए उसे उचित मार्ग पर ले चलता है।’ हिन्दी जाति, हिन्दी संस्कृति की उनकी अवधारणा बिल्कुल मौलिक है। उनका कहना था कि ‘हिन्दी भाषा जनता को अपनी शक्ति पहचानना है। स्वयं संगठित होकर ही वह राष्ट्रीय एकता की अडिग आधारशिला बन सकती है। स्वयं एकताबद्ध होकर, अपना आर्थिक-सांस्कृतिक विकास करते हुए हिंदी प्रदेश समस्त भारतीय गणतंत्र को दृढ़ता और विश्वास से आगे बढ़ा सकता है।’

रामविलास जी का सारा जीवन और लेखन हम सब के लिए प्रकाश स्तम्भ है।

 

पी.के. पांडे <pramodsudarshantvacademy@gmail.com>

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