विनोद यादव ने मनीकंट्रोल डॉट कॉम से इस्तीफा दिया

मुंबई से सूचना है कि पत्रकार विनोद यादव ने नटवर्क18 की बिजनेस वेबसाइट मनीकंट्रोल डॉट कॉम को पिछले दिनों अलविदा कह दिया।

वे यहां पिछले तीन साल से बतौर सब-एडिटर कार्यरत थे। विनोद इससे पहले टीवी9 महाराष्ट्र और ‘इंडिया न्यूज’ चैनल में भी कार्य कर चुके हैं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पाक ने जियो एंटरटेनमेंट और एआरवाई न्यूज़ पर लगाया बैन

इस्लामाबाद, 21 जून। पाकिस्तान ने ईश निंदा और कानून का मजाक बनाने को लेकर दो प्राइवेट टीवी चैनलों पर अस्थायी बैन लगा दिया है। इसमें एक चैनल जियो टीवी नेटवर्क का है। इसके अलावा इन चैनलों पर 1 करोड़ रुपये का फाइन भी लगाया गया है। पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेग्युलेटरी अथॉरिटी (पीईएमआरए) ने जियो एंटरटेनमेंट का लाइसेंस 30 दिनों के लिए वहीं एआरवाई न्यूज का लाइसेंस 15 दिनों के लिए निरस्त किया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले भी जियो टीवी का लाइसेंस 15 दिनों के लिए सस्पेंड किया गया था। शुक्रवार को धार्मिक भावनाओं का अनादर करने के लिए चैनल को अपना प्रसारण बंद करने का आदेश दिया गया। चैनल ने अपने मॉर्निंग शो में विवादित एक्ट्रेस वीना मलिक की नकली शादी समारोह में एक धार्मिक गाना चलाया था। इसके अलावा अपने एंटी ज्यूडिशरी कार्यक्रमों में कोर्ट का अनादर करने पर एआरवाई न्यूज़ चैनल को बैन किया गया है।(एजेन्सियां)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या मोदी सरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित करवा पाएगी?

16वीं लोकसभा के लिए देश के सभी सांसदों ने शपथ ले ली है। सत्र आरम्भ हो गया है। अगले पांच सालों तक चलने वाली सदन की कार्यवाई में अभी कई बैठकें होंगी। विभिन्न विधेयकों पर चर्चा होगी। नए विधेयक सदन में पेश किये जायेंगे। पुराने विधेयकों पर चर्चा कर उन्हें भी पारित करने का प्रयास किया जाएगा। संशोधन होंगे। बड़ी-बड़ी बहसे होंगी। हर बार की भांती इस बार भी सांसदों के वेतन और भत्तों से जुड़े विधेयक को निर्विरोध पारित कर दिया जाएगा। यूपीए सरकार के समय से लंबित पड़े विधेयकों पर शायद एनडीए सरकार को आपत्ति हो इसलिए इन पर विचार किये बिना ही इन्हें निरस्त कर दिया जाना है, हम सभी जानते हैं। सदन की कार्यवाही जैसे चलनी है, चलेगी। पर हम तो चर्चा कर रहे हैं महिला आरक्षण विधेयक की जो महत्त्वपूर्ण तो है परन्तु एक लम्बे समय से, या यूं कहें कि बाबा आदम के जमाने से लंबित पड़ा है।

इस विधेयक का जिक्र करना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि आज और न जाने कब से संसद से सड़क तक महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर एक लंबी बहस चल रही है। सरकार ने इस मुद्दे को ध्यान में रखकर ही संसद में अपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 2013 पारित किया था। जिसका मकसद महिलाओं को सुरक्षित माहौल देना है, जिससे वो मुख्यधारा में अपनी भागीदारी बढ़ा सकें। परन्तु बढ़ते अपराध महिलाओं की सुरक्षा की पोल खोल रहे हैं। हमारी सरकार की नाकामयाबी को प्रदर्शित कर रहे हैं। जहां हम महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज की कामना कर रहे हैं वहीं आज महिलाएं अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं। हम महिलाओं को विधायिका में 33 फीसदी आरक्षण के पक्ष में तो हैं, परन्तु उसे यह अधिकार न जाने कब से और किन कारणों से देने को राजी नहीं हैं।

लंबे समय से लटक रहे महिला आरक्षण बिल की तरफ सभी राजनीतिक दलों का ध्यान तो गया है और जा भी रहा है। परन्तु इसे पास करने के नाम पर हम इस विधेयक में कमियाँ ढूँढने लग जाते हैं। हाल ही में हुए लोक सभा चुनाव और पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में हम देख चुकें हैं कि महिलाओं की भागीदारी विधायिका में कितनी कम है। और अगर हम राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना चाहते हैं तो उसके लिए महिला आरक्षण विधेयक का पास होना अतिआवश्यक है।
 
देश के बाकी हिस्सों से राजधानी दिल्ली का सामाजिक और आर्थिक मिजाज अलग है। यहां की महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं, उन्हें अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों का अच्छी तरह ज्ञान है। वे अपनी लड़ाई लड़ना जानती हैं, फिर भी दिल्ली विधानसभा चुनावों में मात्र तीन महिला उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाईं थीं। जबकि विधानसभा की 70 सीटों के लिए विभिन्न दलों से 69 महिला उम्मीदवार मैदान में थी। मतलब साफ है कि 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा में मात्र तीन महिला विधायक होंगी। क्या इस आंकड़े को देखकर लगता है कि हमारी विधायिका में महिलाओं की भागीदारी की गिनती की जा सकती है? और हम बात कर रहे हैं महिला सशक्तिकरण की?

ऐसी ही हालत बाकी के अन्य राज्यों में भी हैं। मध्यप्रदेश में विधानसभा की 230 सीटें हैं, जिसके लिए लगभग 100 महिला उम्मीदवार मैदान में थी। लेकिन केवल 27 महिला उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। यही हालत बाकी के दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिला। दोनों राज्यों में सात-सात महिला उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। जबकि 200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा के लिए कुल 103 महिला उम्मीदवार मैदान में थी। इसी तरह से 90 सदस्यीस छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए 94 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में थी।

देश की सबसे बड़ी पंचायत में भी महिलाओं की संख्या बेहद कम है। 2009 के लोकसभा चुनावों में केवल 58 महिलाएं ही संसद पहुंच पाईं थीं। साथ ही अगर इस बार के लोकसभा चुनाव पर नज़र डालें तो इस बार की संसद के लिए कुल 639 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था जो कुल उम्मीदवारों का केवल 8 फीसद है। और इस बार भी संसद में पिछली बार के मुकाबले ज्यादा फर्क नहीं है, 62 महिला सांसद हैं, जो केवल 11 फीसद है। मतलब साफ है कि संसद में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व पिछली लोकसभा में 10.68 फीसदी रहा और इस लोकसभा में एक अंक बढ़कर 11 फीसदी हुआ है। राज्यसभा में भी महिला सांसदों की संख्या बेहतर नहीं कही जा सकती है। 2009 के आंकड़ों के मुताबिक राज्यसभा में 22 महिला सांसद थी, जो कि 8.98 फीसदी के करीब है। और इस बार 29 महिला सांसद हैं. साफ है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व चिंताजनक है। इसके लिए बहस और चर्चा तो होती रहती है, लेकिन इस मामले को लेकर राजनीतिक दल गंभीर नहीं दिखते। जिसका परिणाम है कि महिला आरक्षण विधेयक लंबे समय से अटका पड़ा है।

देश के कई राज्यों मे महिला मुख्यमंत्री हैं। अभी हाल में हुए पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, राजस्थान में महिला को मुख्यमंत्री चुना गया। लेकिन जब आप राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को गहराई से आंकते हैं तो पता चलता है कि ये भागीदारी केवल प्रतीकात्मक है। अभी भी मराजनीति में महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी से भी कम है। जबकि देश के प्रमुख राजनीतिक दल विधानसभाओं और संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की बात कहते रहे हैं। खुद राजनीतिक दल 33 फीसदी टिकट महिला उम्मीदवरों को देने की बात कहते हैं। लेकिन अभी तक किसी भी दल ने ऐसा करने का साहस नहीं दिखाया है।

पंचायतों और नगर निगम के चुनावों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया गया है। इसी के तहत चुनाव होते हैं और स्थानीय निकायों का गठन होता है। इन निकायों को महिलाएं प्रतिनिधित्व दे रही हैं, और सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं। फिर भी देश की सबसे बड़ी पंचायत में महिलाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर देश के प्रमुख राजनीतिक दल निर्णय लेने को तैयार नहीं दिखाई देते हैं। आखिर ऐसा क्यों है जनता जवाब चाहती है।

महिलाओं को अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का मतलब है कि उनकी आवाज सदन तक पहुंचाना है। जब तक महिलाओं से जुड़े रोजमर्रा के मुद्दों को गंभीरता से हल करने का प्रयास नहीं होगा, तब तक महिलाओं को दिए अधिकार केवल कानून की किताबों तक सीमित रहेंगे। अगर हम सही मायने में महिलाओं की सुरक्षा और उनको बराबरी का हक देना चाहते हैं तो उन्हें विधायिका में 33 फीसदी आरक्षण देना ही होगा। जिससे महिलाएं अपने हक की आवाज खुद उठा सकें। और बढ़ रही हिंसा पर लगाम लग सके। अगर इसके बिना हम महिला सुरक्षा की बात कह रहे हैं तो वह व्यर्थ की बात है। सरकारें बदल जाती हैं और उनके साथ मुद्दे भी अगर इस बार भी ऐसा ही हुआ तो लगता है कि महिला आरक्षण दूर की कौड़ी बनकर रह जाएगा।

परन्तु जनता को हमारी नवीन कबिनेट मंत्री और भाजपा सांसद श्रीमती सुषमा स्वराज ने एक विशेष सत्र के दौरान विश्वास दिलाया है और विपक्ष से अपील की है कि इस बार महिला आरक्षण विधेयक को पारित किया ही जाना चाहिए। अगर इस बार इस विषय को गंभीरता से लिया जाता है तो लगता है कि महिलाओं की स्थिति में बदलाव अवश्य होगा। और अगर नहीं तो सरकार घोषणा में पत्र में होता तो बहुत कुछ है पर उसे समय के साथ हम भूल भी तो जाते हैं, तो हमारी भी तो गलती हुई। अब देखना यह है कि क्या होता है। विशेयक पास होता है या ठण्डे बसते में और ठण्डा होता है।

अश्वनी कुमार
akp.ashwani@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘दिव्य मराठी’ में कॉस्ट कटिंग के नाम पर लिया जा रहा इस्तीफा, टेलिफोन ऑपरेटर ने श्रम विभाग में की शिकायत

जलगांव (महाराष्ट्र)। भास्कर समूह के मराठी अखबार ‘दिव्य मराठी’ का एचआर डिपार्टमेंट लगातार चर्चा में बना हुआ है। शुक्रवार को टेलिफोन ऑपरेटर चेतना वामन चव्हाण ने असिस्टेंट एचआर मैनेजर राजवंती कौर और एडमिन एक्जीक्युटिव प्रमोद वाघ के खिलाफ असिस्टंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में शिकायत दर्ज करायी। चेतना का कहना है कि ये दोनो उसके साथ बदसलूकी करते हैं तथा अपने उम्मीदवार को नौकरी दिलाने के लिए उस पर कॉस्ट कटिंग के नाम पर इस्तीफा देने का दबाव बना रहे हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल ही एचआर डिपार्टमेंट की मनमानी के विरोध में न्यूज़ एडिटर विक्रांत पाटील ने इस्तीफा देकर भास्कर प्रबंधन को मुश्किल में डाल दिया था। पहले यहां आरई की मनमानी चलती थी और अब एचआर डिपार्टमेंट की मनमानी चल रही है। ख़बरें तो यह भी हैं कि यूनिट हेड भी राजवंती के इशारों पर नाचते हैं।

उधर अकोला-विदर्भ में ‘दिव्य मराठी’ की असफलता के बाद परेशानियों का दौर जारी है। अकोला में कॉस्ट कटिंग के नाम पर कर्मचारियों पर इस्तीफे का दवाब बनाया गया। इससे तंग आ कर 10 लोगों ने संस्थान को छोड़ दिया। विदर्भ के सभी स्ट्रिंगर और फोटोग्राफरों ने काम करना बंद कर दिया है। वाशिम का काम भी रुक गया है।

प्रबंधन द्वारा जलगांव के आरई दीपक पटवे का तबादला कर दिया गया है और प्रशांत दीक्षित को महाराष्ट्र राज्य का प्रधान संपादक बनाया गया है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

आपको भी कुछ कहना-बताना है? हां… तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कहां गुम हो गए राजनीतिक ख़बरों के महारथी दीपक चौरसिया?

इंडिया न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ दीपक चौरसिया मीडिया जगत का एक ऐसा नाम है जिसको राजनीतिक ख़बरें ब्रेक करने में महारत हासिल है। इंडिया न्यूज़ के प्राईम टाईम में दीपक दो शो को होस्ट करते हैं। ‘टु नाईट विद दीपक चौरसिया’ और ‘अंदर की बात।’ जनमानस में दीपक की छवि  राजनीतिक ख़बरों के मास्टर की ही रही है। दीपक चौरसिया किसी शो को होस्ट करते है और खासकर ऐसे शो जो देश- दुनिया के राजनीतिक मुद्दों से जुड़े हों तो शो को टीआरपी मिलना तय है। दीपक खबरों में वेरायटी देखते हैं और अपने ख़ास अंदाज़ में राजनेताओ की चुटकी भी लेते हैं। वे हंसी-मज़ाक और चुटकुलो के जरिये गंभीर डिबेट को सरल और सहज बना देते हैं ताकि व्यक्तिगत सम्बन्धो पर इसका असर ना पड़े।

दीपक की यही ख़ास कला उनकी यूएसपी है। श्रोता मंत्रमुग्ध होकर दीपक की एंकरिंग देखते थे। किन्तु इंडिया न्यूज़ पर दीपक द्वारा होस्ट किये जा रहे प्राईम टाईम शो में वो गंभीरता, संवेदनशीलता, गहनता और बौद्धिक ऊंचाईयां दिखाई नहीं देतीं जो आजतक, एबीपी न्यूज़, डीडी की रिपोर्टिंग और एंकरिंग में दिखाई पड़ती थीं। दीपक चौरसिया मध्यप्रदेश से ताल्लुक रखते है। अख़बार पढ़ने का बचपन से ही शौक था। दीपक ने खबरों को परखने, समझने की तालीम यहीं से सीखी। मां-बाप चाहते थे कि दीपक डॉक्टर बनें। छात्रसंघ चुनावो के जरिये दीपक को राजनीति को नज़दीक से देखने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में दीपक अव्वल रहते थे। वादविवाद प्रतियोगिता का विषय कितना भी जटिल या असामान्य हो दीपक सरल भाषा में उसको दर्शको तक पहुंचाने में कामयाब होते थे।

इसी लगन ने दीपक को टीवी पत्रकारिता में अर्श तक पहुंचा दिया। आईआईएमसी से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा करने वाले दीपक ने पत्रकारिता की शुरूआत मध्यप्रदेश से प्रकाशित दोपहर के हिंदी अखबार से की थी। दोपहर के अखबार के लिए दिल्ली से ख़बर भेजने के चलते दीपक को राजनीतिक ख़बरें ब्रेक करने मौका मिला। कल के अखबार में मेन लीड बनने वाली राजनीतिक स्टोरी दीपक दोपहर में ही ब्रेक कर देते थे।  राजनीतिक खबरों के चलते दीपक की प्रमुख राजनेताओ से नजदीकी बढ़ी। जिसका फायदा दीपक को पत्रकारिता में परदे के पीछे की राजनीतिक गतिविधि समझने में हुआ। राजनीतिक खबरों को ब्रेक करने में महारती चौरसिया ने आज तक के जरिये टीवी पत्रकारिता में कदम रखा और एसपी साहब के टीम का हिस्सा बने।

राजनीति से जुड़ी कई बड़ी खबरें दीपक चौरसिया ने ब्रेक की हैं। आज तक पर रहते हुए बड़े-बड़े राजनेताओ के इंटरव्यू लिए हैं। एबीपी न्यूज़ (पहले स्टार न्यूज़) में उनके कौन बनेगा मुख्यमंत्री? कौन बनेगा प्रधानमंत्री? जैसे चुनावी शो हिट हुए। इसके अलावा भी उन्होंने कई बेहतर शो किये। दीपक चौरिसया द्वारा नौटंकी फेम राखी सावंत का लिया गया इंटरव्यू काफी चर्चित रहा। दीपक पर यह आरोप भी लगे की उन्होंने सामाजिक सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता कभी नहीं की। देश के सामाजिक मुद्दो को गंभीरता से उठाया नहीं। जबकि खुद दीपक दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं। दीपक ने कभी भी राजनीतिक खबरों की दुनिया से बाहर निकलकर पत्रकारिता नहीं की।

‘आप’ के नेताओ के स्टिंग ऑपरेशन के बाद दीपक पर संगीन आरोप लगे की वो ‘सुपारी पत्रकारिता’ करते हैं। अपने फुहड़पन के कारण कई बार उनको मुंह की खानी पड़ी। आसाराम बापू की प्रवक्ता ने चौरसिया को लाइव शो में डिबेट के दौरान  कहा था ‘…आप पत्रकार नहीं दलाल हो……।’  एक इंटरव्यू के दौरान सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस काटजू ने दीपक को फटकार लगाईं थी। ‘गेट आउट!!….. आपको ठीक से बिहेव करना नहीं आता बकवास बंद करो…..’ बोलकर जस्टिस काटजू ने इंटरव्यू छोड़ दिया था।

अर्श से फर्श तक का सफर करने के बावजूद दीपक चौरसिया द्वारा होस्ट किये गए प्राईम टाईम शो को देखकर लगता है शायद यह आजतक, एबीपी न्यूज़ और डीडी न्यूज़ वाले दीपक चौरसिया नहीं है जो राजनीतिक खबरों के मास्टर कहे जाते थे।

सुजीत ठमके

sthamke35@gmail.com
पुणे- 411002

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एनएनआईएस न्यूज़ एजेन्सी के स्ट्रिंगर को नौ महीने से काम का पैसा नहीं मिला

सर जी नमस्कार,

एनएनआईएस न्यूज़ एजेन्सी की हालत बेहद ख़राब हो चुकी है। एजेन्सी में काम करने वाले स्ट्रिंगर भुखमरी की कगार पर पहुंच चुके हैं। पिछले 9 महीनो से स्ट्रिंगरों को पैसों के नाम पर सिर्फ तारीख दी जा रही है। लेकिन पेमेंट की वो तारीख कब आएगी, यह कोई नहीं जानता। इस पत्र को लिखने वाला मैं खुद इस न्यूज़ एजेन्सी से जुड़ा एक स्ट्रिंगर हूं और ख़राब माली हालत से गुजर रहा हूं।

इस पत्र को लिखने के पीछे न्यूज़ एजेन्सी की छवि खराब करने का मेरा कोई उद्देशय नहीं है। मैं तो इस पत्र के माध्यम से अपने जैसे सैकड़ो स्ट्रिंगरों की बात आप तक पहुंचा रहा हूं। कहा गया था कि ‘आपको सिर्फ ख़बरों पर ध्यान देना है, आपको पैसों की चिंता बिलकुल नहीं करनी…आपको हर महीने आपकी खबरों का पैसा मिलता रहेगा।’ ये तो भला हो भड़ास4मीडिया का जिसके माध्यम से अपना दुःख कहने का मौका मिल रहा है, अन्यथा चैनल व न्यूज़ एजेन्सी के अंदर तो स्ट्रिंगरो का दर्द सुनने को कोई तैयार ही नहीं है।

अभी कुछ ही दिन पहले जब मैंने अपनी स्टोरी के पेमेंट की बात की तो कहा गया कि जल्द ही आपका पैसा आप तक पहुंच जाएगा। लेकिन यह नहीं बताया कि यह जल्दबाजी कब दिखाई जाएगी। यह हालत सिर्फ मेरे अकेले की नहीं है, मेरे जैसे सैकड़ो स्ट्रिंगरों की हालत ऐसी ही है जो यह सब झेल रहे हैं। अब तो एजेन्सी को स्टोरी आइडिया भी भेजने को मन नहीं करता। काफी संख्या में स्ट्रिंगरों ने तो एजेन्सी को ख़बरें भेजनी भी बंद कर दी हैं।

भड़ास4मीडिया हमेशा ही हमारे जैसे हजारों लोगों की आवाज उठाता रहा है। अब एक आखिरी उम्मीद सिर्फ भड़ास4मीडिया से ही है जो हमारी आवाज उन चैनलों और न्यूज़ एजेन्सी के मालिकों तक पंहुचा सकता है जिन्हे स्ट्रिंगरों की तकलीफ समझ नहीं आ रही।

धन्यवाद
xyz

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उत्तराखण्ड से लगी चीनी सीमा पर हमें चौकन्ना रहने की ज़रूरत है

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने एक बार फिर भारतीय सीमा के अंदर हेलीकाप्टर उड़ाकर हवाई सीमा का उल्लंघन किया है। यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई बार इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं। लेकिन इस बार जो नया है वह यह कि पीएलए ने शांत माने जाने बाले उत्तराखंड के चमोली जनपद के इलाके को चुना। हालांकि पूर्व में भी यहां चीनी सैनिक सीमा पार कर भारतीय क्षेत्र में आते रहे हैं लेकिन किसी भी बड़ी घटना को अंजाम नहीं दिया गया। इस साल दो माह के अन्तराल में पीएलए के हैलीकाप्टर ने एक बार नहीं दो बार हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है।

इस बार की घुसपैठ 13 जून को हुई बताई जा रही है। यह बाराहोता के रिमखिम सेक्टर में हुई है। यहां भारतीय तिब्बत सीमा की चैक पोस्ट है। यहां सैनिक मूवमेन्ट अन्य सीमाओं की अपेक्षा कम है। कुछ समय पहले भारत व चीन के बीच सहमति बनी थी कि इस सीमा पर दोनो देश सैनिक नहीं रखेंगे। यही कारण है कि भारत के सैनिक सीमा से लगभग सौ किमी दूर जोशीमठ तक ही सीमित हैं। जहां पर भारतीय सेना के माउन्टेन ब्रिगेड का मुख्यालय है। यह सीमा भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस के नियंत्रण में है। पिछले कुछ सालों में अन्य सीमाओं पर घुसपैठ की घटना हुई थी लेकिन इस सीमा पर स्थिति सामान्य ही रही। लेकिन जिस तरह से पीएलए ने हवाई सीमा का उल्लंघन किया है, वह चिन्तनीय अवश्य है।

यदि भारत व चीन की सीमाओं पर स्थिति की तुलना करें तो चीन बेहतर स्थिति में है। वह सरहद पर चारों ओर से सीमा विस्तार में लगा है। दक्षिण-पूर्व की अपनी सागरी सीमा में विस्तार वो कुछ साल पहले ही कर चुका है। भारतीय सीमा पर भी उसकी घुसपैठ बदस्तूर जारी है। भले ही चीनी सैनिकों की इस हरकत को भारत सरकार हल्के में ले, लेकिन देश की संप्रभुता को बचाए रखने के लिए चैकन्ना होने की जरूरत है। खासतौर से उन सीमाओं पर सतर्क होना आवश्यक है जहां चीन इस तरह की घटनाओं की शुरूआत कर रहा है। इसमें उत्तखंड राज्य से लगी सीमाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। हालांकि सरकार की ज्यादा चिन्ता सैंट्रल सेक्टर को लेकर है।

सीमा पर चीन की स्थिति का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वहां सन् 1954 से ही सड़को का जाल बिछना शुरू हो गया था। वर्तमान में संसाधनों के मामले में वो हमसे कहीं आगे है। सिनच्यांग राज्य से ल्हासा तक 1800 किलोमीटर राजमार्ग बन चुका है। पेंचिंग से ल्हासा रेल मार्ग द्वारा आठ साल पहले ही जुड़ चुका है। इन दोनों शहरों के बीच 4,040 किलोमीटर की दूरी को 48 घंटे में तय किया जा सकता है। इस रेल लाइन को बिछाने में चीनियों ने सराहनीय कार्य किया। विषम परिस्थितियां भी चीनियों के हौसले नहीं डिगा पाई।

यहां हमें अपने और चीनियों के काम करने के ढंग और जज्बे को समझना होगा। जहां चीनियों ने विपरीत परिस्थितियों में भी रेल मार्ग को पूरी प्राथतिकता दी वहीं हम प्रकृति पर निर्भर है। बर्फबारी के चलते हमारी सीमाओं पर चार पांच महीने काम नहीं होता है, लेकिन चीनी कामगारों ने रात का तापमान शून्य से 43 डिग्री सेंटिगे्रड कम होने के बावजूद काम जारी रखा। चीन ने रिकार्ड पांच सालों में चार हजार किमी रेल लाइन बिछा दी और हम पांच सालों मं चालीस किलोमीटर तक सड़क नहीं बना पाये हैं। इसमें भी भारी अनियमितताएं हैं।

यदि हम चीन से सरहद पर अपनी स्थिति की तुलना करें तो हमारी स्थिति चिंताजनक है। चीन अपनी राजधानी से सीमा पर दो दिन में पहुंच सकता है, जबकि दिल्ली से इस सीमा पर आने में हमें पांच से छह दिन का वक्त लगेगा। गौर करने वाली बात यह है कि उत्तराखण्ड राज्य से लगी सरहद पर पिछले छह साल से सड़कों के निर्माण का कार्य चल रहा है, लेकिन अभी ये सड़कें पूरी नहीं बन पाई हैं। शीतकाल के बाद जब भारतीय सैनिक सीमा पर जाते हैं तो उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अस्थाई पुलों के ध्वस्त होने के चलते उन्हें रस्सियों के सहारे नदी नालों को पार करना पड़ता है। यह स्थिति हमेशा की है। माणा- बाडाहोती मार्ग अभी पूरा नहीं हो पाया है। माणा-माणा पास पर डामरीकरण का काम चल रहा है। यही स्थिति भैंरोघाटी-चोकला सड़क की भी है। सड़क निर्माण के प्रति निर्माण ऐजेंसी कितनी संवेदनशील है उसकी बानगी जोशीमठ-मलारी राष्ट्रीय राजमार्ग है। जहां भारतीय सीमा के अंतिम आबाद गांव जुम्मा के पास घौली नदी पर उल्टा गार्डर पुल बनाया गया है। पुल का अलाइमेन्ट आउट है। समझना कठिन नहीं है कि सीमा पर फिर सड़क की क्या स्थिति होगी।
 
यहां भारतीय सीमा पर आईटीबीपी के जवान तैनात हैं। इस सीमा पर दोनों देशों के बीच बनी सहमति के कारण सैनिकों के बजाय पैरा-मिलिट्री फोर्स के जवानों की तैनाती है। यहां की चार सौ किलोमीटर सीमा की रखवाली का जिम्मा आईटीबीपी के पास है। इस सीमा पर वैसे अन्य सीमाओं की अपेक्षा कम तनाव है। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी यहां स्थिति सामान्य रही थी। घुसपैठ की घटनाएं भी मामूली ही रहती है। कभी चीनी सैनिक तो कभी भारतीय सैनिक एक दूसरे के इलाकों में आते जाते रहते है। लेकिन हाल में इस सीमा में दो बार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के हैलीकाप्टरों ने हवाई सीमा का उल्लंघन किया है, उसको देखते हुए भारत सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। यहां समझना जरूरी है कि चीन इस भारतीय क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर अपनी दावेदारी करता है। संसाधनों के मामले में भी चीन भारत से काफी आगे है। यहां उसने सड़क व रेल दोनों मार्ग बना लिए हैं। हम बेफिक्र हैं, कहीं हमारी बेफिक्री की बड़ी कीमत न चुकानी पड़ जाए। क्योंकि हिन्दु चीन भाई-भाई के जुमले के बीच चीन ने क्या गुल खिलाया था?

बृजेश सती
देहरादून
94120324371

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

24वें हफ्ते की टीआरपी : आजतक के गर्दन तक पहुंचा इंडिया टीवी

24वें हफ्ते की टीआरपी आ गई है. टॉप टेन चैनलों में आजतक नंबर वन पर बरकरार तो है लेकिन उसकी टीआरपी काफी कम हुई है. इंडिया टीवी का बढ़त बनाओ अभियान जारी है. उसने इस हफ्ते भी अच्छा खासा गेन किया है. इंडिया टीवी धीरे धीरे आजतक के गर्दन तक पहुंच गया है.

एबीपी न्यूज लगातार गोता लगा रहा है. वह इस हफ्ते काफी नीचे गया है. हालांकि तीसरे पोजीशन पर बरकरार है. पी7न्यूज चैनल ने टॉप बारह में जगह बनाई है. इसने सरकारी डीडी न्यूज़ को तेरहवें स्थान पर धकेल दिया है. बाकी चैनलों की क्या पोजीशन है, इसके लिए देखिए 24वें हफ्ते की टीआरपी…

WK 24 2014, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM:

Aaj tak 17.5 dn 1.6 

India TV 15.8 up .8

ABP News 12.7 dn 1.9

ZEE News 9.9 up .7

India news 8.7 dn .1 

News Nation 8 up .7 

News 24 6.7 up .5

IBN7 5.5 up .1

NDTV 5.3 up .3

TEZ 3.4 up .2 

Samay 2.7 up .1

P7 News 2.1 up .1 

DD 1.8 up .1


इसके पहले वाले हफ्ते की टीआरपी जानने देखने के लिए यहां क्लिक करें…

टीआरपी : इंडिया टीवी ने एबीपी न्यूज को इंडिया न्यूज ने न्यूज नेशन को पीछे किया

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक जागरण में अवनींद्र कमल, संजीव जैन, मनीष शर्मा, अश्विनी त्रिपाठी, नीरज गुप्ता, सुमन लाल की जिम्मेदारी बदली

दैनिक जागरण मेरठ यूनिट में एडिटोरियल हेड मनोज झा के लंबी छुट्टी से लौटने के बाद बड़ा फेरबदल कर दिया गया है. इसमें सबसे अहम निर्णय लंबे समय से रिपोर्टिंग का सुख भोग रहे अवनींद्र कमल की बाबत लिया गया है. उन्हें सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट इंचार्ज से हटाकर मेरठ हेड आफिस से अटैच किया गया है. कमल को फिलहाल कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई है. उनके स्थान पर संजीव जैन को सहारनपुर भेजा गया है.

इसके अलावा शामली के ब्यूरो चीफ मनीष शर्मा को मुजफफरनगर भेजा गया है. अश्विनी त्रिपाठी को शामली का इंचार्ज बनाया गया है. मुजफ्फरनगर से नीरज गुप्ता को हटाकर खुर्जा इंचार्ज की जिम्मेदारी दी गई है. बुलंदशहर से सुमन लाल करण को मेरठ रिपोर्टिंग टीम में शामिल किया गया है. इसके अलावा और कई फेरबदल की संभावना जताई जा रही है.

आपको भी कुछ कहना-बताना है? हां… तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: