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सपा – बसपा गठबंधन : संभावना एवं सफलता

एस.आर.दारापुरी

भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल के उपचुनावों के परिणामों के बाद सपा, बसपा के गठबंधन के भविष्य, संभावनाएं एवं संभावित खतरों की चर्चा बहुत जोर शोर से चल रही है. उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा  के समर्थन से दो सीटें जीतने को उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि यदि 2019 में भी सपा और बसपा का यह गठबंधन कायम रहे तो इससे भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. कुछ अतिउत्साही लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि इससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि शेष भारत में भी भाजपा को हराया जा सकता है. कुछ लोग इसे 1993 के गठजोड़ की पुनरावृति के रूप में भी देख रहे है.

अतः उपरोक्त उत्साहपूर्ण परिस्थितियों में यह देखना ज़रूरी है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में  सपा-बसपा गठबंधन की सम्भावना क्या है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हाल के उपचुनाव में सपा- बसपा का गठजोड़ निस्वार्थ नहीं था. मायावती ने सपा को समर्थन इस शर्त पर दिया था कि वह राज्यसभा चुनाव में बसपा के प्रत्याशी को जिताने के लिए अपने विधायकों के फालतू वोट बसपा प्रत्याशी को देगी. बहरहाल बसपा के समर्थन से सपा गोरखपुर और फूलपुर की दोनों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही परन्तु भाजपा की तगड़ी सेंधमारी के कारण राज्यसभा चुनाव में सपा के समर्थन के बावजूद बसपा प्रत्याशी हार गया. अतः उपचुनाव के दौरान बसपा का समर्थन राज्यसभा के चुनाव में सपा के समर्थन से सीधा जुड़ा हुआ था. एक तरीके से यह समर्थन सशर्त था.

उपचुनाव के बाद सपा–बसपा के कार्यकर्ताओं द्वारा आगामी चुनाव के लिए भी आपसी गठजोड़ की मांग को जोर से उठाया गया है.  अब तक मायावती और अखिलेश ने भी राज्यसभा में हार के बावजूद भविष्य में गठबंधन को बनाये रखने की बात कही है. इस सन्दर्भ  में 1993 का गठबंधन जिसके बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की मिलीजुली सरकार बनीं थी, के इतिहास को भी देखना होगा. उस समय भी दलितों और पिछड़ों की सरकार बनने  से इन वर्गों में बहुत उत्साह पैदा हुआ था और पिछड़ी जातियां ख़ास करके यादव और कुर्मी  सामाजिक भेद भाव भूल कर राजनीतिक स्तर पर दलितों के नजदीक आये थे और इससे राष्ट्रीय स्तर पर नए राजनीतिक समीकरण की सम्भावना बनती दिखाई दे रही थी.

परन्तु उक्त गठजोड़ शीघ्र ही व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया. इस विघटन के पीछे उस समय भी भाजपा की मुख्य भूमिका थी क्योंकि इससे उसे अपना भविष्य धूमिल होता दिखाई दे रहा था. अतः उसने कांशी राम को मायावती को मुख्य्मंत्री बनाने का लालच देकर मुलायम सिंह की सरकार  गिराने के लिए प्रेरित किया. गेस्ट हाउस काण्ड तो केवल निमित मात्र था जबकि उसमें भी भाजपा की बहुत बड़ी भूमिका थी.

गेस्ट हाउस काण्ड के बाद भाजपा ने दलितों और पिछड़ों खास करके यादव जातियों और चमार जाति  में अधिक से अधिक दुश्मनी और दूरी पैदा करने की कोशिश की और दुर्भाग्यवश कांशी राम और मायवती उनके इस कुचक्र में बुरी तरह से फंस गये. नतीजतन जिन्हें कुदरती दोस्त होने के नाते बड़े दुश्मन के खिलाफ एकजुट होना चाहिए था वे आपस में ही उससे से भी बड़े दुश्मन बन गये. यह भाजपा की दलितों-पिछड़ों के सामाजिक तथा राजनीतिक गठजोड़ को ध्वस्त करने की सबसे बड़ी सफलता थी.

इतना ही नहीं इसके बाद भाजपा की बराबर कोशिश रही कि दलितों और पिछड़ों का पुराना गठजोड़ किसी भी तरह से पुनर्जीवित न हो पाए. इसके बावजूद भी 1996 में सपा के कुछ दलित विधायकों द्वारा मुलायम सिंह की अनुमति से पुनः गठजोड़ करने हेतु दिल्ली जाकर कांशी राम से बातचीत की गयी थी.

आश्चर्यजनक तौर पर कांशी राम इसके लिए राजी हो गए थे और उन्होंने उसी दिन दिल्ली में इसकी घोषणा भी कर दी. उस दिन मायावायी लखनऊ में थी और उसने अगले दिन यह कह कर कि ”इसका सवाल ही पैदा नहीं होता” इसका प्रतिकार कर दिया और उस समय भी उक्त गठबंधन पुनर्जीवित होते होते मर गया. यह इस लिए हुआ क्योंकि उस समय मायावती पूर्णतया भाजपा के प्रभाव में थी और कांशी राम मायवती के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद काफी कमज़ोर स्थिति में आ गये थे. इस प्रकार 1996 में भी उक्त गठबंधन बीजेपी के कारण पुनर्जीवित होने से रह गया. इसके बाद भाजपा ने दोबारा दो बार मायावती को केवल इस आशय से समर्थन दिया कि कहीं सपा-बसपा गठबंधन पुनर्जीवित न हो जाये और इसमें वह पूरी तरह से सफल भी रही थी.

वर्तमान में भाजपा केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार चला रही है. भाजपा मायवती की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को भी पूरी तरह से जानती है और मायवती की कमजोरियों को भी. यह सर्वविदित है कि मायावती और उसका भाई आनंद कुमार  भ्रष्टाचार के कई मामलों में बुरी तरह से फंसा हुआ है और सीबीआई और ईडी का फंदा भाजपा के हाथ में है. ऐसा हो सकता है कि मोदी सरकार लालू प्रसाद की तरह सीबीआई का फंदा मायावती पर भी कसने लगे. क्या ऐसी परिस्थिति में मायावती इसी प्रकार की स्वतंत्र राजनीति करने का साहस दिखा पाएगी और सपा के साथ आसानी से गठजोड़ कर पायेगी?

भाजपा की अब तक यह कोशिश रही है कि अगर मायवती उसके साथ खुले गठबंधन में नहीं आती तो उसे किसे दूसरे के साथ भी गठबंधन न करने दिया जाये. उसकी हमेशा कोशिश रही है कि मायावती सभी सीटों पर अकेली लड़े ताकि उसका दलित वोट किसी दूसरी पार्टी खास करके कांग्रेस को न जाये. अब तक के सभी लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव में यही स्थिति देखने को मिली है. इससे भाजपा को दोहरा लाभ होता है. एक उसका अपना प्रतिबद्ध वोट तो उसे मिलता ही है दूसरे वह मायावती के माद्यम से दलित वोट कांग्रेस को जाने से रोकने में भी सफल रहती है जैसा कि पिछले गुजरात चुनाव में भी देखा गया है. 

अतः भाजपा संभावित सपा-बसपा गठबंधन को रोकने के लिए मायावती पर दबाव बना कर उसे अकेले ही सभी सीटों पर लड़ने के लिए बाध्य कर सकती है. यह भी उल्लेखनीय कि मायावती इससे पहले सत्ता पाने के लिए तीन बार भाजपा से गठजोड़ कर चुकी है. कुछ लोगों की आशंका है कि वह चौथी बार ऐसा नहीं करेगी, की भी कोई गारंटी नहीं है. 

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान में भाजपा को मायावती की सोशल इन्जीनीरिंग से कोई खतरा नहीं है क्योंकि उसने भी उसी फार्मूले का इस्तेमाल करके दलितों और पिछड़ों के बहुत बड़े हिस्से को वृहद हिंदुत्व के छाते के तले ले लिया है.  इसके परिणामस्वरूप अब सपा के साथ पिछड़ों में केवल यादव ही प्रमुख वर्ग बचा है और अतिपिछड़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पास चला गया है. इसी प्रकार बसपा के दलित मतदाताओं का भी बहुत बड़ा हिस्सा चमार/जाटव उपजाति को छोड़कर हिंदुत्व के छाते तले भाजपा के साथ जा चुका है जैसा कि पिछले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव से स्पष्ट हो चुका है.

अतः इस समय यह कहना कि सपा- बसपा  गठजोड़ से पिछड़ा और दलित वर्ग उसी संख्या में एकजुट हो जायेगा जितना कि वह 1993 में था, केवल दिवास्वपन होगा और यथार्थ से कोसों दूर. ऐसी परिस्थिति में अगर किसी तरह सपा-बसपा गठबंधन बनता भी है तो बहुत मजबूत नहीं होगा जब तक अपने जाति वोट के इलावा इसमें दूसरी जातियों/वर्गों के वोट नहीं मिलते.

उपरोक्त वर्णित परिस्थियों में यह प्रशन पैदा होता है कि क्या सपा–बसपा का जातिगत गठजोड़ भाजपा को हराने में सक्षम होगा? क्या उनके गठजोड़ की घोषणा मात्र से सभी दलित, पिछड़े और मुसलमान बड़ी संख्या में इसके साथ आ जायेंगे? क्या सपा- बसपा उन पिछड़ों  और दलितों को जो वृहद हिंदुत्व के छाते तले भाजपा में चले गये हैं, आसानी से अपनी पार्टियों में वापस ला पाएगी? क्या जाति की राजनीति की काट जाति की राजनीति से हो पाएगी?

वास्तव में अब तक की जाति की राजनीति ने हिंदुत्व को कमज़ोर करने की बजाये उसे मजबूत ही किया है जिसका फायदा भाजपा ने उठाया है. यह भी एक सत्य है कि जिस प्रकार कांग्रेस हिंदुत्व की राजनीति में भाजपा को नहीं हरा पायी है उसी तरह  जाति की राजनीति जो कि हिंदुत्व की पोषक है में सपा-बसपा गठबंधन भी उसे हरा नहीं पाएगी. अतः सपा-बसपा गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने से अलग हुए वोट बैंक को भाजपा से वापस छीनने की होगी और क्या वह केवल गठजोड़ हो जाने से ही वापस आ जायगा? भाजपा की वर्तमान साम,दाम, दंड,भेद की राजनीति के सामने यह आसान नहीं लगता.

यह भी उल्लेखनीय है कि जाति की राजनीति जातिगत भावनाओं के जोड़तोड़ की राजनीति है जिसमे जातिहितों के टकराव और अलगाव की भी प्रमुख भूमिका रहती है. अब तक भाजपा जातिगत भावनाओं को भुनाने का हुनर बहुत अच्छी तरह से सीख चुकी है. अतः अब जातिगत गठजोड़ और टकराव को तोड़ने के लिए जातिगत भावनाओं को भुनाने के  स्थान पर वर्गहित को आगे लाने  की जरूरत  है. इसके लिए ज़रूरी है कि वर्तमान जाति आधारित गठजोड़ के एजंडा की बजाये वर्गहित आधारित राजनीतिक एजंडा आगे लाया जाये जो बेरोज़गारी, गरीबी, कृषि संकट, निजी क्षेत्र में आरक्षण,आदिवासी समस्या, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के निजीकरण को रोकने और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से आगे लाया जाये. इसके साथ ही वर्तमान सरकार की कार्पोरेट परस्त नीतियों के स्थान पर वैकल्पिक नीतियों को लाने की भी ज़रुरत है.

मेरा यह निश्चित मत है कि केवल इस प्रक्रिया द्वारा ही सपा-बसपा वर्गहित को आधार बना कर अपने खोये हुए वोट बैंक को भाजपा की झोली से वापस लाने में सीमित सफलता प्राप्त कर सकती है. डॉ. आंबेडकर ने भी कहा है- “जो राजनीति वर्गहित की बात नहीं करती वह धोखा है.” क्या अब तक जातिगत जोड़तोड़ करके सत्ता की दौड़ में लगी रही सपा और बसपा अपनी कार्यशैली में उक्त आमूलचूल परिवर्तन ला पायेगी? इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर सपा-बसपा जाति की राजनीति को त्याग कर वर्गहित की राजनीती का राजनीतिक एजंडा अपनाती है तो वह भाजपा को 2019 में पुनः सत्ता में आने से काफी हद तक रोकने में सफल हो सकती है. मायावती और अखिलेश को यह भी याद रखना चाहिए कि यह उनके लिए अपना अस्तित्व बचाने का आखिरी मौका है.

S.R. Darapuri

I.P.S.(Retd)

Organiser,

Jan Manch Uttar Pradesh

srdarapuri@gmail.com

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Zoutons क्रोम एक्सटेंशन

क्या आप क्रोम ब्राउसर का उपयोग करते हैं, और आप अपने हजारों रूपये बचाना चाहते हैं? और बहुत सारी अच्छी कूपन्स और डील्स खोज कर थक चुके है? अगर मैं आपसे कहूँ कि आपके सारे सवालों के जबाव सिर्फ एक app दे सकता है तो आप क्या कहेंगे? जी हाँ आपने बिलकुल सही सोचा आप अपने हर सवालों के जबाव इसमें पा सकते है वो है- Zoutons क्रोम एक्सटेंशन!

Zoutons आपकी खोज को आसन, जल्द और आरामदायक बनाता है। इस वेबसाइट ने हाल ही में एक app लॉन्च किया है, इस बार Zoutons अपने साथ क्रोम एक्सटेंशन ले कर आया है।

क्रोम एक्सटेंशन आपको जल्दी और बहुत ही शीघ्रता से चीजों तक पहुँचा देता है। जौटोंस लगभग 150 दुकानों तक अपने कूपन्स उपलब्ध कराता है, जिससे आपको अपने लिए सबसे अच्छे ऑफर्स को खोजने की जरूरत नहीं पड़ती। आपके सारी समस्याओं को हल करने के लिया आ गया है जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन। अब आपको कहीं और जाने की कोई जरुरत नहीं है, आपको किसी कूपन्स और डील्स को खोजने की जरूरत नहीं है। आपको सब कुछ देगा बड़ी ही आसानी से उपलब्ध कराएगा ये जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन। अगर आप इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं, तो कोई बात नहीं आइये मैं देती हूँ आपको इसके बारे पूरी जानकारी।

Zoutons के बारे में

Zoutons एक प्रकार का कूपन्स और डील्स की सुचना देने वाला वेबसाइट है, जहाँ आप अपने हर खरीदारी पर बहुत ही अच्छी डील्स और कूपन्स पा सकते हैं। आप अपने सभी कामों के लिए इस वेबसाइट पर बेहतरीन डील्स पा सकते हैं जैसे:- भोजन मँगाने पर, cabs बुकिंग करने पर, आप अपने फैशन से जुड़े सामानों पर आदि और आप इसमें पा सकते है wallet ऑफर्स, रिचार्ज आप्शन और भी बहुत सारी अच्छी डील्स। यह वेबसाइट सन् 2013 में बनाया गया था, और तब से लेकर आज तक यह वेबसाइट अपने यूजर्स को बेहतरीन सेवाएँ देती आ रही है।

आप हमेशा अपने लिए सही और अच्छी कूपन्स चुन सकते हैं, और आप अलग- अलग कूपन्स के लिस्ट में से खुद के लिए जो कूपन्स चाहते हैं वह पा सकते हैं। हाल ही में जौटोंस app ने एक ऐसी चीज लॉन्च की है जिसमें आप अपने कंप्यूटर को क्रोम एक्सटेंशन से जोड़कर कूपन्स और डील्स के बारे में सारी जानकारी ले सकते हैं। इस app के जरिये आप बड़ी ही आसानी से अपने डील्स तथा कूपन्स के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं, और इस app को चलाना भी बहुत ही आसन है।

क्रोम एक्सटेंशन क्या है –

हम सभी मन बहलाने के लिए तथा किसी चीज की खरीदारी करने के लिए क्रोम पर निर्भर करते हैं। क्रोम एक्सटेंशन एक छोटी सॉफ्टवेर प्रोग्राम है, जो आपने अनुसार ही कम करता है, जिस प्रकार आप उसको निर्देश देंगे उसी प्रकार वह आपका काम करेगा। जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन के साथ, जब आप इसे डाउनलोड करेंगे तो हर नए tab खोलने के साथ इसमें आपके लिए अच्छे और नए ऑफर्स आयेंगे। इससे यह पता चलता है कि आप अपना मन बहलाने कए लिए अपने मन पसंद सामान और आप जो उत्पाद चाहें वो आप देख तथा खरीद सकते है और बाकि ऐसे ही छोड़ सकते हैं।

क्रोम एक्सटेंशन के पीछे का मकसद ग्राहकों को खुद से अपने उत्पाद चुनें और उसे ख़रीदे। अगर कोई यूजर बहुत सारे ऑफर्स के बारे में नहीं जानता हो और वह बहुत सारे वेबसाइट पर ऑफर्स ढूँढ रहा हो तो आप इसके बारे में जन लीजिये। इसके नए फीचर्स आपके लैपटॉप में उपलब्ध हैं, जिससे आप जो चाहते हैं उसकी खरीदारी के लिए आपके सामने कूपन्स code बॉक्स में उपयुक्त कूपन अपने आप आ जाता है। इस एक्सटेंशन की सबसे अच्छी और खास बात यह है कि यह बहुत हल्का और इसका पैमाना सिर्फ 477 KB है।

क्रोम एक्सटेंशन काम कैसे करता है –

किसी भी ग्राहक के लिए एक्सटेंशन system को अपने कंप्यूटर में जोड़ना परेशानी की बात नहीं है। आप सभी इस app को डाउनलोड करके आप अपने मन पसंद उत्पाद चुन सकते हैं इससे आपको कूपन code मिलेंगे। और जब आप ऑनलाइन खरीदारी करेंगे, तब ajio को like करके अपने cart को उस उत्पाद से भरें जो आपको पसंद आया हो तब जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन खुद ब खुद सही से उसमे भर देंगे आपके लिए ज्यादा पैसे बचाने वाला कूपन्स उपलब्ध करेंगे। यह आपका समय तथा रूपये बचाएगा और आपको नए पहलुओं से अवगत कराएगा।

Zoutons ने क्रोम एक्सटेंशन को क्यों जोड़ा

जौटोंस में क्रोम एक्सटेंशन को जोड़ना चाहिए था या नहीं ये सोचने से पहले आइये जानते है क्रोम एक्सटेंशन की कुछ अच्छी और खास फायदें. आप इस फायदों को पढ़ें और खुद सोचें यह सही है या नहीं, तो ये रहे वो फायदे-

1. समय बचाता है

सही कूपन्स को खोजना कठिन काम हो सकता है, और इसमें समय भी बर्बाद होता है। कूपन्स के लिए आपको बहुत सारी वेबसाइट पर जाना पडेगा, उत्पादों को देखना पडेगा, कूपन्स code खोजना पड़ेगा और क्या नहीं! पर इस एक्सटेंशन के साथ सारी उत्पाद आपके सामने होंगे। क्रोम में आपके सरे अच्छे डील्स आपकी आँखों के सामने होंगे और आप उसमें से अपने मन पसंद चीजें चुन सकते हैं।

2. हर नए tab के लिया नए ऑफर्स

हम सब कूपन्स और डील्स को पसंद करते हैं, पर किसी के पास उतना समय नहीं होता कि वे एक एक करके सारे डील्स को बार-बार चेक करे। जौटोंस के क्रोम एक्सटेंशन पर आपको हर नए tab को खोलते ही आपके सामने नए ऑफर्स होंगे, आप अपने समय को बचाते हुए अपने उत्पाद को चुन कर खरीद सकते हैं।

3. एक्सटेंशन आपके लिए सबसे अच्छा ऑफर चुनता है

अब वह दिन चला गया जब आपको सौ डील्स में चुनना पड़े। अब समय आ चूका है आप इस वेबसाइट को डाउनलोड करें और खरीदारी करें बिना किसी कूपन्स की खोजबीन किये। यह एक्सटेंशन अच्छे तरीके से कूपन्स को खोजकर आपके सामने रखता है जिससे आप अपनी खरीदारी सही से करें।

4. नए ऑफर्स से अवगत कराना

जब कोई सेल आता है तो हम नयी चीज खरीदने से पहले उसपर लग रहे कूपन्स और डील्स को देखते है। इस एक्सटेंशन पर आपको कूपन्स खोजने की जरूरत नहीं पड़ेगी यह आपको खुद सारी डील्स से अवगत कराता है।

जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन को कैसे पा सकते है –

अगर आप नहीं जानते की इस क्रोम एक्सटेंशन को कैसे उपयोग में लायें, तो घबराये नहीं यह सिर्फ 2 मिनट का काम है. सिर्फ ये कुछ सही कदम लेकर आप इसे आसानी से पा सकते हैं।

1. आप अपने क्रोम ब्राउज़र पर क्रोम वेब स्टोर खोलें

2. आगे, अपने वेब बार पर बाएं कोने पर जौटोंस खोजें

3. इसके बाद आप पायेंगे कि वहाँ जौटोंस कूपंस फाइंडर आ गया है

4. इसे खोलें और इनस्टॉल बटन पर क्लिक करें

5. इसके बाद वह आपसे आपकी अनुमति मांगेगा तब उसे एक्सेप्ट करें

6. ये कदम लेते ही आपके कंप्यूटर में एक्सटेंशन जुड़ जायेगा

तो यह थी कुछ बातें जौटोंस क्रोम एक्सटेंशन के बारे में। इस पर काम करना बहुत ही आसान और साधारण है, इससे आपका समय भी बर्बाद नहीं होगा और आप अपने लिए खरीदारी भी कर पाएंगे। आप इसे इनस्टॉल करके इसका इस्तेमाल कर सकते है, और अपने लिए काफी अच्छे कूपन्स और डील्स भी पाकर इसका आनंद ले सकते हैं। उम्मीद करती हूँ, कि आपको यह वेबसाइट बहुत पसंद आएगा और आपको इससे आपका मन पसंद सामान सस्ती कीमतों पर पा सकेंगे। और आपको अच्छी डील्स तथा कूपन्स भी मिले।

सौजन्य : collegedunia.com

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GATE 2018 के परिणाम घोषित, स्कोर कार्ड्स मार्च 31 तक उपलब्ध

GATE स्कोर कार्ड 20 मार्च 2018 को आईआईटी गुवाहाटी के आधिकारिक वेबसाइट  http://gate.iitg.ac.in  पर जारी कर दिया गया है। । इसके पूर्व, गेट 2018 का परिणाम 16 मार्च को घोषित किया गया था । 19 मार्च को गेट 2018 प्रश्न पत्र एवं उत्तर कुंजी भी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की गयी थी| इस वर्ष GATE परीक्षा आईआईटी गुवाहाटी द्वारा आयोजित की गयी थी|

परीक्षा का परिणाम आईआईटी गुवाहाटी ने पूर्व निर्धारित तारीख़, 17 मार्च, से एक दिन पहले ही घोषित कर दिया था| यह परीक्षा भारत और विदेशों में कंप्यूटर आधारित मोड में 3 फरवरी, 4, 10 और 11, 2018 को आयोजित की गई थी। पूरे देश के 199 शहरों और विदेशों में 6 शहरों के परीक्षा केन्द्रों में आयोजित यह परीक्षा 23 विषयों के लिए आयोजित किया गया था|

GATE 2018 की काउंसलिंग एवं अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए यहां क्लिक करें..   

उम्मीदवार अपने परिणाम सीधे गेट ऑनलाइन आवेदन प्रसंस्करण प्रणाली (GOAPS) पर प्रवेश कर जांच कर सकते हैं| GATE 2018 के परिणामों की जांच के लिए सीधा इस वेबसाइट पर जाएँ: https://appsgate.iitg.ac.in

उम्मीदवारों अपने नामांकन आईडी, पंजीकरण संख्या और जन्म तिथि का उपयोग कर GATE 2018 के परिणाम का जानने के लिए GOAPS में प्रवेश कर सकते हैं। GATE स्कोर कार्ड्स केवल उन उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध होगा जो कटऑफ अंकों से बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त करेंगे| उम्मीदवार द्वारा प्राप्त अंकों और ऑल इंडिया रैंकों के साथ क्वालीफाइंग अंक परिणाम में प्रदर्शित होंगे| उम्मीदवार GOAPS पोर्टल से 31 मार्च तक गेट 2018 स्कोर कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं।

यदि गेट के योग्य उम्मीदवारों को 31 मई 2018 के बाद और 31 दिसंबर 2018 तक उनके गेट स्कोरकार्ड की सॉफ्ट कॉपी की आवश्यकता होती है, तो उन्हें उसके लिए अतिरिक्त 500 (पांच सौ) फीस देना होगा।

GATE आईआईटी, आईआईएससी, एनआईटी, जीएफटीआई और अन्य विश्वविद्यालयों में एमए / एमटेक और पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर की स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा है। यह परीक्षा हर वर्ष आईआईएससी बैंगलोर और 7 आईआईटी (बॉम्बे, दिल्ली, गुवाहाटी, कानपुर, खड़गपुर, मद्रास और रुड़की) द्वारा आयोजित की जाती है| GATE कई विकल्प और संख्यात्मक प्रकार के प्रश्नों का एक ऑनलाइन परीक्षा है| ज्यादातर सवाल मौलिक हैं, अवधारणा आधारित, और सोचा उत्तेजक होते हैं। गेट परीक्षा में 3 अनुभाग में विभाजित 65 प्रश्न शामिल हैं –

  • सामान्य योग्यता
  • मइंजीनियरिंग गणित
  • मसंबंधित विषयों से

एक विद्यार्थी केवल एक ही विषय में उपस्थित हो सकता है| GATE स्कोर कार्ड केवल गेट के परिणाम की घोषणा की तारीख से एम.टेक प्रवेश के लिए 3 वर्षों की अवधि के लिए वैध होता है|

GATE 2018 के स्कोर कार्ड्स के फायदे:

  • मास्टर्स और पीएचडी कार्यक्रमों में नामांकन:

आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों ने गेट स्कोर के आधार पर स्नातक होने के तुरंत बाद पीएचडी, पीजीडीएम, और पीजीडीआईई कार्यक्रमों के प्रवेश मिलती हैं। कुछ आईआईएम GATE के माध्यम से डॉक्टरेट कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए आरक्षित सीटें रखती हैं|

  • GATE के माध्यम से छात्रवृत्ति:

GATE 2018 के माध्यम से स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों का चयन करने वाले उम्मीदवारों को MHRD – AICTE द्वारा छात्रवृत्ति दी जाती है।

  • PSU(s) में भर्ती:

विभिन्न पीएसयू (पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग) विभिन्न पदों के लिए योग्य उम्मीदवारों की भर्ती करा रहे हैं| उम्मीदवारों को उच्च मुआवजा पैकेज और अन्य लाभ (चिकित्सा लाभ, आदि) की पेशकश की जाती है।

बी. टेक पाठ्यकर्मों में प्रवेश के लिए आयोजित JEE के विपरीत, एम. टेक और पीएच. डी. में प्रवेश के लिए GATE के सफल उम्मीदवारों के लिए कोई सामान्य काउन्सेलिंग नहीं होगी| उम्मीदवारों को गेट के लिए आईआईटी, एनआईटी, आईआईएससी बैंगलोर, जीएफटीआई और अन्य संस्थाओं द्वारा आयोजित अलग काउन्सेलिंग के माध्यम से स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवेदन देना होगा। आईआईटी जैसी संस्थान आम प्रस्ताव स्वीकृति पोर्टल (COAP) के माध्यम से गेट 2018 काउन्सेलिंग करेंगे। इस पर, एक उम्मीदवार को पहले से संबंधित आईआईटी और विभागों में पंजीकरण करना होगा, जिनके लिए वे प्रवेश चाहते हैं।

एनआईटी और आईआईआईटी जैसे संस्थान GATE 2018 की काउन्सेलिंग एम टेक के लिए केन्द्रीकृत काउन्सेलिंग (CCMT) द्वारा करेंगे| यह ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया सारे एनआईटी और कुछ केंद्र सरकार द्वारा वित पोषित संस्थानों जैसे आईआईआईटीएम ग्वालियर, सेंट्रल युनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान, एनआईएफ़एफ़टी राँची, इत्यादि के लिए है| इसी प्रकार अन्य निजी और राज्य सरकारी कॉलेज के अपने अपने काउन्सेलिंग प्रक्रिया होती हैं| काउन्सेलिंग प्रक्रिया प्रायः अप्रैल के महीने से शुरू होती है|

सौजन्य : collegedunia.com

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इकलौती बेटी को पत्रकारिता के दलदल में झोंक कर मैं काफी दुखी हूं

हर पिता से विनती करता हूं कि अपनी बेटी को पत्रकार न बनने दें…

मान्यवर महोदय,

ज्ञात हुआ कि आपके मंच पर पत्रकारिता से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा होती है, इसीके चलते यह पत्र लिख रहा हूं. मेरी आत्मजा मुंबई में करीब साढ़े छह साल काम करने के बाद हाल ही में दिल्ली शिफ्ट हुई. वह टाइम्स ऑफ इंडिया के अखबार नवभारत टाइम्स में काम कर रही है. सोमवार को जब वह अपने दफ्तर में अपने काम में तल्लीनता से लगी हुई थी. तभी, सोनी सर नामक एक व्यक्ति ने उसके सर पर मुक्का मारा.

मुक्का इतना जोर का था कि मेरी लड़की वहीं बिलबिला उठी. जब उसने विरोध किया तो उसे कहा गया कि यह उक्त व्यक्ति का स्नेह जताने का तरीका है. एक 26 साल की लड़की से प्यार जताने की किसी 46 साल के व्यक्ति को क्या आवश्यकता.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. जब प्रार्थी की पुत्री ने अपनी बॉस नम्रता मेडम को इस बारे में बताया तो वह कहने लगी कि कौनसा तुम्हारा मोलेस्टेशन हो गया है जो रो रही हो. महोदय क्या पत्रकारिता में लड़कियों को पलख पांवड़े बिछा कर मोलेस्ट होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए?

पुत्री इस वक्त 100.8 बुखार से जूझ रही है. मैं, मेरी धर्मपत्नी, मेरी तीनों बहने, उनके पति, मेरी पत्नी की बहनें और उनके पति सभी काम काजी हैं, क्या हम यह नहीं जानते कि कार्यस्थलों पर इस तरह का व्यवहार नहीं होना चाहिए?

ज्ञातव्य हो कि वह पहला मौक़ा नहीं है जब प्रार्थी की पुत्री के साथ दुर्व्यवहार किया गया हो. करीब तीन महीने पहले जब उसे पीठ का दर्द हुआ तो डॉक्टर के कहने के बावजूद वरिष्ठों के अहम के चलते उसे ‘कुशन’ का प्रयोग तक नहीं करने दिया गया अपितु ‘कुशन’ ले जाने के लिए उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया.

इसके अलावा भी कई किस्से हैं. कुछ महीनों पहले रविवार को अवकाश होने के उपरांत भी मेरी लड़की को रात साढ़े आठ बजे दो खबरे बनाने के लिए उसके इमिजिएट बॉस ने फोन किया, पुत्री ने बताया कि उसे 101 बुखार है, तब भी यह कह कर कि बुधवार को आने वाले मंगलवार एडिशन के लिए चाहिए उससे काम करवाया गया. काम करने में संकोच नहीं है महोदय पर यह खबरे उस बुधवार नहीं बल्कि उसके भी अगले बुधवार को छप कर आई.

अनेकों बार यह कह कर कि तुम तो अकेले रहती हो. पति बच्चें तो है नहीं, उसे बहुत ज्यादा काम दिया गया. जब उसने प्रतिकार किया तो उसे कामचोर या काम न करने की अभ्यस्त कहा गया जिसके चलते उसने चुपचाप सुनना शुरू किया. क्या अपनी पर्सनल लाइफ कुछ नहीं.

उसे बालीवुड का पूरा एक पेज बनाना होता है जिसके लिए मुंबई से छपने वाले एक अखबार से ही सब न्यूज का अनुवाद करके लिया जाता है, यह पूरा अनुवाद उसके जिम्मे रहा. इसके बाद भी यह कह कर कि तुम्हारा अनुवाद सटीक नहीं है, अभ्यास करो और अभ्यास के नाम पर उसे इसी अखबार की बालीवुड से इतर न्यूज का भी अनुवाद करने को दिया जाता जो फेमिना आदि में छप सके. परिस्थिति यह रही कि यदि उन न्यूज का अनुवाद करके दे दिया जाता तो और न्यूज दे दी जाती.

महोदय एक व्यक्ति से रोजाना 5000 शब्द करवाएंगे तो उसकी गुणवत्ता तो प्रभावित होगी ही. गुणवत्ता प्रभावित होने पर फिर प्रताड़ना. साथ ही ऑफिस में थक जाने और घर लाकर वह काम करके देने के बाद यह सूचित करने की मुझे घर पर भी काम करना पड़ रहा है यह कहा जाता, ‘मत करो घर, यहीं बैठे रहो.’

यह तर्क देकर कि वह घर पर क्या करेगी, उसे सुबह आठ बजे ओफिस बुलाया जाता जबकि बाकी सारे लोग साढ़े नौ से दस के बीच आते. इसके उपरांत भी यह लोग तीन बजे चले जाते और प्रार्थी की पुत्री को साढ़े चार -पांच से पहले निकलने का अवसर नहीं मिला. जब उसने इस बात का विरोध जताना चाहा तो यह कहकर कि एक बार डोक्टर के जाने के लिए, एक बार घर पर प्लम्बर आने के चलते तुम दो -ढाई बजे भी तो निकल गई हो, उसे चुप करवा दिया गया.

आज इस बात को लेकर कि मैंने अपनी एक ही बेटी को पत्रकारिता के दलदल में झोंक दिया मैं काफी दुखी हूं और हर पिता से विनती करता हूं कि अपनी बेटी को पत्रकार न बनने दे, क्योंकि रोज दफ्तर से आकर फोन पर फूट फूट कर रोती बेटी को सुनना बेहद तकलीफदेह है.

भवदीय
विद्यारतन व्यास
vidhyaratnavyas@gmail.com

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सूचना विभाग में पदस्थ एक बाबू से परेशान हैं बनारसी टीवी पत्रकार

वाराणसी :  बनारस में बीते रोज 27 मार्च को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक प्रतिनिधि मंडल सूचना विभाग में नियुक्त अनिल श्रीवास्तव के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैये के खिलाफ सूचना प्रसारण राज्य मंत्री नीलकंठ तिवारी से मिलने उनके आवास पर पहुंचा. पत्रकारों ने अनिल श्रीवास्तव के रवैये और उनकी दुर्भावना को लेकर अपनी व्यथा मंत्री से बताई. 

बताया जा रहा है कि इसके बाद माननीय मंत्री ने मोबाइल पर अनिल श्रीवास्तव की जम कर क्लास लगाई और अपना व्यवहार  सभी पत्रकारों के साथ एक समान रखने की हिदायत दी. साथ ही मंत्री जी ने एक लिखित शिकायत भी देने की बात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों से कही ताकि अनिल श्रीवास्तव के खिलाफ विधिक कार्यवाही की जा सके. मंत्री से मिल कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों ने निम्न बातों की शिकायत की…

1 — वीवीआईपी दौरे के समय पास बनाने के नाम पर खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को परेशान करना

2– कवरेज के दौरान सूचनाओं के आदान प्रदान में लेट लतीफी करना… अक्सर सूचनाएं छिपा लेना

3– पोर्टल के प्रतिनिधियों के संबंध में सीधे मना कर देना जबकि कई पत्रकार कई वर्षों से इसी बनारस में कर्यरत हैं…

4– कवरेज के दौरान मीडिया के प्रतिनिधियों के लिए चाय नाश्ते के लिए फण्ड आता है वो कुछ चुनिंदा प्रिंट के प्रतिनिधियों के साथ बंदरबाट कर लेना और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को मना कर देना जैसा कि कल राष्ट्रपति महोदय के कार्यक्रम के दौरान देखा गया…

5 – सामान्य दिनों में भी सूचना विभाग के बाबू अनिल श्रीवास्तव जो करीब 15 वर्षों से यहां जमे हुए हैं, उनका व्यवहार सूचना सही समय से देने के मामले में और बात करने के तरीके को लेकर हमेशा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगो के लिए उपेक्षा पूर्ण रहता है…

बनारस के एक टीवी पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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पत्रकारों की लगातार हो रही हत्याओं के खिलाफ एक प्रतिरोध सभा, देखें तस्वीर

देश भर में पत्रकारों की हत्याएं लगातार हो रही हैं. बिहार से लेकर मध्य प्रदेश और कनार्टक से लेकर उत्तर प्रदेश तक में पत्रकार मारे जा रहे हैं, कुचले जा रहे हैं. कलम के सिपाहियों पर हमले भी लगातार जगह जगह हो रहे हैं. इसके खिलाफ पाकुड़ प्रेस क्लब के सदस्यों ने एक प्रतिरोध सभा का आयोजन किया. इसके बाद इन लोगों ने राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा.

देखें तस्वीर और पढ़ें ज्ञापन के डिटेल…

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भारतीय रेलवे की मूर्खता का नमूना… Howrah को Hawrah बना दिया

रेलवे वालों को अंग्रेजी में ‘हावड़ा’ शुद्ध नहीं लिखना आता… देखें बानगी… पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बाद हावड़ा दूसरा बड़ा और नामी शहर है। एक ट्रेन है शक्तिपुंज एक्सप्रेस… जो मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर से हावड़ा तक जाती है।

अब आश्चर्य की बात कहें या भारतीय रेलवे की अव्वल दर्जे की मूर्खता का प्रमाण, इस ट्रेन में Howrah को Hawrah लिखा गया है। ऐसा एकाध जगह नहीं बल्कि पूरी ट्रेन में स्पेलिंग मिस्टेक की गई है।

मेरी तरफ से रेलवे विभाग और तमाम मंत्रियों को सलाह है कि विभाग में पढ़े-लिखे लोग शामिल करें या जिसको भी इस तरह का काम सौंपे तो कम से कम उसे स्टेशनों की सही स्पेलिंग बता दें।

ऐसा भी किया जा सकता है कि पूरे रेल विभाग के स्टाफ का फिर से नर्सरी में दाखिला करा दिया जाए ताकि उनकी भूल चुकी पढ़ाई-लिखाई फिर से दुरुस्त हो सके।

आशीष चौकसे

पत्रकार

संपर्क : ashishchouksey0019@gmail.com

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टीवी के एक संपादक ने कायम किया इतिहास, लाइव प्रसारण के दौरान नेताओं के पैर छुए, देखें वीडियो

जी बिहार के संपादक स्वयं प्रकाश : पत्रकारिता के पतित पुरुष

जी ग्रुप के रीजनल न्यूज चैनल ‘जी बिहार’ के संपादक हैं स्वयं प्रकाश. इन्होंने हाल में ही चैनल के संपादक पद को सुशोभित किया है. इन्होंने पिछले दिनों अपने रीजनल चैनल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के लाइव प्रसारण में बिहार के सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया.

दरसअल 26 मार्च को जी बिहार चैनल ने पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में ”एक शाम जवानों के नाम” कार्यक्रम आयोजित किया था… कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को आना था. संपादक महोदय को दोनों नेताओं के आगवानी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. सो, जैसे ही दोनों नेता कार्यक्रम स्थल पर आए, संपादक महोदय ने झट से उनके पैर छूकर आशीर्वाद ले लिया और फिर उन्हें अंदर ले गए…

पूरा वाकये का live प्रसारण हो रहा था… सो उनकी  यह हरकत भी दर्शकों तक पहुंच गयी.. कहा जा रहा है कि संपादक महोदय सरकार से विज्ञापन लेने के लिये एड़ी चोटी एक किये हुए हैं.. लेकिन सरकार का दिल नही पसीज रहा है… अब संपादक महोदय ने राजा के सामने  दंडवत दिया है..देखिये आगे-आगे क्या होता है…  एक दौर था जब संपादक का कद इतना बड़ा होता था कि नेता-मंत्री उनसे मिलने के लिए टाइम लेते थे और संपादक के आफिस आकर मिलने का इंतजार करते थे. अब दौर ऐसा बदला कि संपादक लोग नेता-मंत्री की अगवानी के लिए खड़े होते हैं और नेता-मंत्री के आते ही लपक कर पैर छू लेते हैं…

वाह रे संपादक नामक संस्था / पद का पतन… यूं ही नहीं कहा जा रहा कि मीडिया का ये ‘गोदी’ काल है… जो संपादक नेता-मंत्री के गोद में बैठेगा, उसकी कुर्सी बची रहेगी… जो सच्ची पत्रकारिता करेगा, उसका हुक्का-पानी सत्ता द्वारा बंद कर दिया जाएगा…. स्वयं प्रकाश का नेताओं का पैर छूना पत्रकारिता के गिरते स्तर की बानगी है… शायद टीवी पत्रकारिता के इतिहास में इस तरह की तस्वीर देखने को नहीं मिली हो…

स्वयं प्रकाश ऐसे पहले टीवी संपादक बन गए हैं जिन्होंने अपने ही चैनल के लाइव प्रसारण के दौरान नेताओं के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और इसे लाखों दर्शकों ने देखा… जी बिहार के संपादक स्वयं प्रकाश द्वारा पैर छूने का वीडियो आप जियो टीवी पर आप 26 मार्च की शाम 7 बजे से 7.5 मिनट तक वाले फुटेज में देख सकते हैं… अगर नहीं देख पाए हों या नहीं देख पा रहे हों तो वीडियो देखने के लिए नीचे दिए यूआरएल पर क्लिक करें :

https://youtu.be/0NrfqYEI9K8

कौन हैं ये स्वयं प्रकाश… इनके बारे में ज्यादा जानने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.bhadas4media.com/edhar-udhar/14294-swayam-prakash-zee-bihar-jharkhand

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दुनिया में फिर से शीतयुद्ध शुरू… अबकी जाने क्या होगा अंजाम…

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले हफ्ते जब यह घोषणा की कि वे अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर जाॅन बोल्टन को लाएंगे और माइक पोंपियो को विदेश मंत्री बनाएंगे, तभी मैंने लिखा था कि इन दोनों अतिवादियों के कारण अब नए शीतयुद्ध के चल पड़ने की पूरी संभावना है। इस कथन के चरितार्थ होने में एक सप्ताह भी नहीं लगा। अब ट्रंप ने 60 रुसी राजनयिकों को निकाल बाहर करने की घोषणा कर दी है।

अमेरिका अब सिएटल में चल रहे रुसी वाणिज्य दूतावास को बंद कर देगा और वाशिंगटन व न्यूयार्क में कार्यरत राजनयिकों को यह कहकर निकाल रहा है कि वे जासूस हैं। अमेरिका के नक्शे-कदम पर चलते हुए 21 राष्ट्रों ने अब तक लगभग सवा सौ से ज्यादा रुसी राजनयिकों को अपने-अपने देश से निकालने की घोषणा कर दी है। इन देशों में जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क, इटली जैसे यूरोपीय संघ के देश तो हैं ही, कनाडा और उक्रेन जैसे राष्ट्र भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में इस तरह की यह पहली घटना है। किसी एक राष्ट्र का इतने राष्ट्रों ने एक साथ बहिष्कार कभी नहीं किया।

यह कूटनीतिक बहिष्कार इसलिए हो रहा है कि 4 मार्च को ब्रिटेन में रुस के पुराने जासूस कर्नल स्क्रिपाल और उसकी बेटी यूलिया की हत्या की कोशिश हुई। वे दोनों अभी अस्पताल में अचेत पड़े हुए हैं। इस हत्या के प्रयत्न के लिए ब्रिटेन ने रुस पर आरोप लगाया है। रुस ने अपने इस पुराने जासूस की हत्या इस संदेह के कारण करनी चाही होगी कि यह व्यक्ति आजकल ब्रिटेन के लिए रुस के विरुद्ध फिर जासूसी करने लगा था। इस दोहरे जासूस को रुस में 2005 में 13 साल की सजा हुई थी लेकिन 2010 में इसे माफ कर दिया गया था। तब से यह ब्रिटेन के शहर सेलिसबरी में रह रहा था। रुस ने ब्रिटिश आरोप का खंडन किया है और कहा है कि अभी तो इस मामले की जांच भी पूरी नहीं हुई है और रुस को बदनाम करना शुरु कर दिया गया है।

यह सबको पता है कि ब्रिटेन की यूरोपीय राष्ट्रों के साथ आजकल काफी खटपट चल रही है और ट्रंप और इन राष्ट्रों के बीच भी खटास पैदा हो गई है लेकिन मजा देखिए कि रुस के विरुद्ध ये सब देश एक हो गए हैं। जहां तक रुसी कूटनीतिज्ञों के जासूस होने का सवाल है, दुनिया का कौनसा देश ऐसा है, जिसके दूतावास में जासूस नहीं होते ? किसी एक दोहरे जासूस की हत्या कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है कि दर्जनों देश मिलकर किसी देश के विरुद्ध कूटनीतिक-युद्ध ही छेड़ दें। रुस के विरुद्ध ट्रंप का अभियान तो इसलिए छिड़ा हो सकता है कि वे अपने आप को पूतिन की काली छाया में से निकालना चाहते हों और रुस के विरुद्ध सीरिया, एराक, ईरान, उ. कोरिया और दक्षिण एशिया में भी अपनी नई टीम को लेकर आक्रामक होना चाहते हों। घर में चौपट हो रही उनकी छवि के यह मुद्रा शायद कुछ टेका लगा दे।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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कोबरा पोस्ट द्वारा न्यूज चैनलों, अखबारों और वेबसाइट्स पर किए गए स्टिंग के सारे वीडियोज देखें

कोबरा पोस्ट की टीम ने अपने ताजे स्टिंग आपरेशन में मीडिया हाउसेज पर डंक मारा है. कई न्यूज चैनल, अखबार और वेबसाइड पेड न्यूज के धंधे में लिप्त हैं. इसका खुलासा कोबरा पोस्ट ने किया है. इस बाबत आज दिल्ली के प्रेस क्लब आफ इंडिया में अनिरुद्ध बहल और उनकी टीम के लोगों ने एक प्रेस कांफ्रेंस किया. इस पीसी में उन्होंने स्टिंग आपरेशन की सीडी दिखाई.

बाद में एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें प्रशांत भूषण समेत कई जाने-माने लोग शामिल थे. कोबरा पोस्ट की टीम ने स्टिंग आपरेशन के वीडियोज अपने यूट्यूब चैनल पर डालने शुरू कर दिए हैं.  मीडिया पर किए गए इस स्टिंग की खबर शायद ही किसी चैनल और अखबार में विस्तार से आए, इस कारण यह जरूरी है कि आप सभी सजग पाठक सारे वीडियोज आनलाइन ही देखें और इसे अपने अपने स्तर पर दूसरों तक शेयर करें..

नीचे कोबरा पोस्ट के यूट्यूब चैनल का लिंक है, उस पर क्लिक करें. स्टिंग से संबंधित सारे वीडियोज आप देख पाएंगे…

https://www.youtube.com/channel/UCJbGQNou2GBFAi_fnMP2_4A/videos  

इन्हें भी पढ़ें-देखें :

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कोबरा पोस्ट द्वारा किए गए ‘समाचार प्लस’ चैनल के स्टिंग का वीडियो देखें

यूपी और उत्तराखंड के न्यूज चैनल समाचार प्लस का स्टिंग आपरेशन कोबरा पोस्ट की टीम ने किया. समाचार प्लस चैनल के उत्तराखंड के मैनेजर सेल्स मुकेश बगियाल से कोबरा पोस्ट की टीम मिलती है और हिंदुत्व के एजेंडे समेत कई मुद्दों पर डील करने का आफर देती है जिसने उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

इसके बाद कोबरा पोस्ट की टीम समाचार प्लस के नोएडा आफिस जाकर उनके मार्केटिंग हेड अमित त्यागी से मिलती है. इन दोनों से हुई बातचीत से कई बड़े राज खुलते हैं. समाचार प्लस चैनल से जुड़े लोगों के स्टिंग का वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=J3TbL6BtJGk

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कोबरा पोस्ट का डंक इंडिया टीवी, समाचार प्लस, साधना प्राइम, हिंदी खबर, दैनिक जागरण समेत कई मीडिया हाउसों को लगा

कोबरा पोस्ट ने आज प्रेस क्लब आफ इंडिया में मीडिया पर आधारित एक स्टिंग आपरेशन के डिटेल शेयर किए और संबंधित सीडी सबके सामने चलाई. इस स्टिंग आपरेशन का नाम ‘ऑपरेशन 136’ है. इसके तहत कोबरा पोस्ट ने पैसे लेकर खबर चलाने के लिए तैयार कई मीडिया हाउसों का पर्दाफाश किया है.

कोबरा पोस्ट के स्टिंग आपरेशन में यह भी दिखाया गया है कि कई मीडिया समूह हिन्दुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पैसे लेकर राजनीतिक अभियान चलाने को तैयार हैं. कोबरा पोस्ट ने ‘ऑपरेशन 136’ नाम के अपने स्टिंग में दिखाया है कि देश के कई बड़े मीडिया समूह पैसे लेकर खबरें चलाने के लिए तैयार हैं. ये मीडिया हाउस इसके लिए काला धन भी लेने को तैयार हैं.

जो मीडिया समूह पैसे के बदले खबरें चलाने को तैयार थे, उनमें हिंदी न्यूज चैनल ‘इंडिया टीवी’, ‘समाचार प्लस’, ‘साधना प्राइम’, ‘हिन्दी खबर’, हिन्दी अखबार ‘दैनिक जागरण’, नामी वेबसाइट ‘स्कूप हूप’ के नाम शामिल हैं. कोबरा पोस्ट ने इन न्यूज चैनलों, अखबार, वेबसाइट के उच्च प्रबंधन से बातचीत के वीडियो भी साझा किए हैं.

शुरुआती खबर ये है…

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कोबरा पोस्ट के स्टिंग आपरेशन में कई न्यूज चैनल उगाही करते हुए पकड़े गए

अनिरुद्ध बहल और उनकी टीम इस वक्त प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस कर एक नए स्टिंग आपरेशन के डिटेल का पत्रकारों के सामने खुलासा कर रही है. अबकी ‘कोबरा पोस्ट’ ने मीडिया पर ही डंक गड़ा दिया है. चौथे स्तंभ के रूप में विख्यात मीडिया आजकल किस तरह उगाही और ब्लैकमेलिंग का माध्यम बन गया है, इसका आंख खोलने वाला सुबूत अनिरुद्ध बहल की टीम ने जुटाया है. साथ ही यह भी बताया है कि किस तरह ये मीडिया हाउस हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पैसे लेकर खबर चलाने दिखाने को तैयार हैं.

कई महीनों तक किए गए स्टिंग आपरेशन में कई बड़े नामी चैनल फंसे हैं. इनमें से ज्यादातर हिंदी के रीजनल न्यूज चैनल हैं. ‘कोबरा पोस्ट’ ने अपने स्टिंग आपरेशन में पैसे ले कर फ़र्ज़ी ख़बर बनाने और चलाने वाले न्यूज़ चैनलों को बीच चौराहे पर नंगा कर डाला… प्रेस क्लब आफ इंडिया में अनिरुद्ध बहल की टीम अपने स्टिंग आपरेशन की सीडी चलाकर पत्रकारों को दिखा रही है. इसके बाद एक पैनल डिस्कशन होगा.

दिल्ली के प्रेस क्लब आफ इंडिया में कोबरापोस्ट के स्टिंग की सीडी चलने की खबर पूरे मीडिया जगत में फैल चुकी है और खासतौर पर मीडिया प्रबंधकों की सांसें फूली हुई हैं कि कहीं इनमें उनका चैनल तो नहीं. कोबरा पोस्ट का जो डंक इस बार मीडिया को लगा है, उसका असर दूर तक और देर तक देखने को मिलेगा. देखना यह भी होगा कि इस स्टिंग की खबर कितने चैनलों पर चलती है और कितने अखबार इसे छापने की हिम्मत जुटा पाते हैं. हां, सोशल मीडिया पर जरूर इस स्टिंग आपरेशन के डिटेल शेयर किए जाएंगे और संबंधित चैनलों के कर्ताधर्ताओं को घेरा जाएगा.

अनिरुद्ध बहल आज के दौर के मीडिया के असली नायकों में से एक हैं. वे लगातार अदभुत काम कर रहे हैं पत्रकारिता के क्षेत्र में. बिलकुल चुपचाप. कोबरा पोस्ट के बैनर तले अनिरुद्ध बहल का ताजा धमाका जो मीडिया को लेकर है, इसे कर पाने का साहस केवल अनिरुद्ध बहल और उनकी कोबरा पोस्ट की टीम ही दिखा सकती थी.

भड़ास भी पिछले एक दशक से मीडिया के भीतर की गंदगी, उगाही, ब्लैकमेलिंग, पेड न्यूज और कारपोरेटाइजेशन को लगातार उजागर करता रहा है. इसके कारण भड़ास और इसकी टीम को लगातार मीडिया हाउसों का उत्पीड़न तरह-तरह से झेलना पड़ा. अनिरुद्ध बहल ने मीडिया का स्टिंग कर यह साबित कर दिया है कि वे सच्चे पत्रकार हैं जो दूसरों के घर के साथ-साथ अपने घर में भी झांकने और उसकी बुराइयों को सार्वजनिक करने का साहस रखते हैं. इसके पहले अनिरुद्ध बहल बैंकिंग, हेल्थ, पालिटिक्स समेत कई फील्ड्स के भीतर की गंदगी के बारे में स्टिंग कर चुके हैं.

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अश्वनी मिश्र पहुंचे नेशन फर्स्ट, राकेश कुमार भगत की नई पारी

खबर आ रही है कि ज़ी न्यूज़ भोपाल में रेजिडेंट एडिटर के पद से अश्वनी मिश्रा ने इस्तीफ़ा दे दिया है। अश्वनी ईटीवी एमपी में एडिटर भी रहे चुके है। ज़ी में सब कुछ सही नहीं चल रहा है। अश्वनी को जगदीश चंद्र का करीबी लोगों में से बताया जाता है।

अश्वनी ने खुद के प्रोजेक्ट में दिलचस्पी लेते हुए नेशन फर्स्ट को लांच करने का मन बनाया है। अश्वनी के साथ लखनऊ के एक और पत्रकार अनुराग श्रीवास्तव बतौर उनके पार्टनर के रूप में हैं। अनुराग भी हिंदी खबर और कई संस्थानों का हिस्सा रहे हैं। नेशन फर्स्ट की लॉन्चिंग को लेकर जोर-शोर से तैयारी चल रही है।

रांची से खबर है कि राकेश कुमार भगत को जनपथ न्यूज टुडे मासिक पत्रिका समूह में झारखंड ब्यूरो हेड का प्रभार सौंपा गया है। राकेश कुमार भगत तीन वर्षों तक हिंदुस्तान व प्रभात खबर में जिला संवाददाता के रूप में कार्यरत रह चुके हैं।

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झूठ के कारोबार में अब ‘राज्यसभा टीवी’ भी शामिल

बीते 24 मार्च, 2018 को राज्य सभा टीवी की मुख्य ख़बर रही कि भाजपा अब राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है। सच ये है कि भाजपा पिछले साल से ही सदन में सबसे बड़ी पार्टी है। उसके अब तक 58 सदस्य हैं और कांग्रिस के 54 हैं।

राज्यसभा के अधिकारिक चैनल द्वारा ये ग़लत जानकारी देना बहुत ही आपत्तिजनक है। लोग इसको लेकर तरह-तरह के सवाल उठा रहे हैं। मीडिया के कुछ लोगों का कहना है कि क्या ये ख़बर बाक़ी मीडिया को भ्रमित करने के लिए चलायी गयी है, जो राज्यसभा टीवी की जानकारी को सत्य मान कर चलते हैं…

वहीं कुछ का कहना है कि मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सरकारी षड्यंत्र में राज्यसभा टीवी भी शामिल हो गया है… वहीं, कुछ लोग व्यंग्य करते हुए कह रहे हैं- तो माना जाए कि नए उप राष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू और उनकी मीडिया प्रबंधन टीम की ये ‘ज़बरदस्त उपलब्धि’ है…

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केंद्र सरकार के मंत्री ने माना- पत्रकारों के मजीठिया वेज बोर्ड का लागू न हो पाना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर कर रहा

संतोष गंगवार बोले- पत्रकारों के कमज़ोर होने से कमज़ोर होगा लोकतंत्र…  नयी दिल्ली : सरकार ने आज स्वीकार किया कि मीडिया संस्थानों में पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों को अनुबंध पर नौकरी और मजीठिया वेतनबोर्ड के क्रियान्वयन न होने का मामला वाकई में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमज़ोर कर रहा है तथा इसके समाधान के लिए विशेष प्रयास की ज़रूरत है।

केन्द्रीय श्रम एवं रोज़गार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष गंगवार ने यहां एक कार्यक्रम में नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट और दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसियेशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को सम्मानित किया। कार्यक्रम में जल संसाधन एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल एवं सांसद धर्मेन्द्र कश्यप भी मौजूद थे।

कार्यक्रम में देश के जाने-माने पत्रकारों ने मंत्रियों को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कामकाज की दशाओं की जानकारी दी। वयोवृद्ध पत्रकार एवं एनयूजे आई के संस्थापक सदस्य राजेन्द्र प्रभु, के एन गुप्ता, विजय क्रांति ने कहा कि ठेके पर नौकरी के चलन ने पत्रकारों एवं पत्रकारिता को कमज़ोर कर दिया है। पत्रकारों को सामाजिक सुरक्षा नहीं है और उनका जीवन अनिश्चितता से भरा है। सरकार को इन विसंगतियों को दूर करने के लिए कुछ करना चाहिए। महिला पत्रकारों ने भी अपनी दिक्कतों से उन्हें अवगत कराया।

इस असवर पर श्री गंगवार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को सुचारु रूप से लागू करने, पत्रकारों की समस्याओं को दूर करने और उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें मीडिया संस्थानों में पत्रकारों को अनुबंध पर नियुक्त  करने, मजीठिया वेतन बोर्ड को लागू करने से जुड़ी दिक्कतों और पत्रकारों की अन्य समस्याओं से अवगत कराया जाता रहा है। वह पत्रकारों की दिक्कतों को दूर करने को लेकर काफी संजीदा है और इस बारे में चर्चा करने के लिए हमेशा उपलब्ध हैं। उन्होंने अगले सप्ताह पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों को वार्ता के लिए अपने कार्यालय में आमंत्रित भी किया।

केन्द्रीय श्रम मंत्री ने कहा कि वह असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की समस्याओं को लेकर बहुत गंभीर हैं। देश में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ लोगों को राहत एवं सुरक्षा देने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार श्रम कानूनों को तर्कसंगत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और वह 40 कानूनों को मिला कर चार कानून बनाने वाली है जिनमें श्रमजीवी पत्रकारों से जुड़े मामलों का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

श्री मेघवाल ने माना कि यदि पत्रकार स्वतंत्र, सुरक्षित एवं निर्भीक नहीं रहेंगे तो लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रहेगा। उन्होंने स्वीकार किया कि संसद की विभिन्न समितियों की बैठक में ठेके पर नौकरियों एवं मजीठिया वेतन बोर्ड का मामला आता रहा है लेकिन पहले यह उतना गंभीर नहीं लगा लेकिन आज उन्हें इसकी गंभीरता का अहसास हुआ है। वह मानते हैं कि निश्चित रूप से पत्रकार समाज की सूरत में बदलाव आना चाहिए और सरकार इसके लिए गंभीरता से विचार करेगी।

श्री गंगवार और श्री मेघवाल ने इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र प्रभु, अच्युतानंद मिश्र और अन्य पत्रकारों को सम्मानित किया। इनमें श्री प्रभु, श्री गुप्ता, श्री हेमंत विश्नोई, रवीन्द्र अग्रवाल, यूनीवार्ता के विशेष संवाददाता एवं यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष राजकुमार मिश्रा, एनयूजे आई के अध्यक्ष अशोक मलिक, महासचिव मनोज वर्मा, कोषाध्यक्ष राकेश आर्य, पाँच्यजन्य के संपादक हितेश शंकर, दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष मनोहर सिंह, महासचिव प्रमोद कुमार आदि शामिल थे।

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दिल्ली में चल रहे बेरोजगार युवकों और किसानों के आंदोलनों को इग्नोर कर टीवी वाले ‘भाजपा-पर्व’ चलाने में मगन हैं!

Anil Sinha : रात दस बजे टीवी खोला तो एनडीटीवी पर खबर देखी कि देश भर से आए बेरोजगार दिल्ली में मोर्चा निकाल रहे हैं और हरियाणा के किसानों को सरसों का समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है। हिंदी में खबर देखने के बाद अंग्रेजी की ओर आया तो इंडिया टुडे पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का इंटरव्यू चल रहा था।

सोचा उपचुनावों के बाद जी और दूसरे चैनलों पर उन्हें देख चुका हूं, दूसरे चैनल देख लूं। वहां भी अमित शाह बैठे थे। नाविका कुमार जरूरत से ज्यादा विनम्र थीं। इतनी विनम्र वह हैं नहीं। दूसरी पार्टियों के साथ तो बेहद बदसलूकी करती हैं। उनके सवाल भी मजेदार थे-राहुल गांधी यह कहते हैं और सोनिया गांधी वह कहती हैं। उनका अपना कोई सवाल नहीं था।

आगे न्यूज 18 पर राइजिंग इंडिया समिट को दोहराया जा रहा था और वहां स्मृति ईरानी सोशल मीडिया के नियमन की बात कर रही थीं। रिपब्लिक पर महाभारत की द्रौपदी रामनवमी पर बात कर रही थीं। एक अन्य चैनल पर भाजपा के प्रवक्ता आधार पर ग्यान बघार रहे थे।

मैं बेरोजगारी और किसानों की समस्या भूल गया। समझ में आ गया कि रविवार के दिन टीवी पर भाजपा-पर्व क्यों चल रहा है और अंग्रेजी वाले हिंदी में क्यों इंटरव्यू चला रहे हैं!

पत्रकार अनिल सिन्हा की एफबी वॉल से.

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बिहार में बाइक सवार दो पत्रकारों की स्कॉर्पियो गाड़ी से कुचलकर हत्या

बिहार के आरा से एक बहुत बड़ी खबर आ रही है. आरा में बाइक से जा रहे दो पत्रकारों की हत्या स्कॉर्पियो गाड़ी से कुचलकर कर दी गई. इन पत्रकारों ने हत्या की आशंका को लेकर प्रशासन को सूचित कर रखा था. इसके बावजूद यह घटना हो गई. मृतकों में एक दैनिक भास्कर के प्रखंड संवाददाता नवीन कुमार निश्चल हैं. दूसरे रिपोर्टर का नाम विनोद सिंह है. हत्या की सूचना मिलने के बाद गुस्साये लोगों ने स्कॉर्पियो को फूंक दिया और शव के साथ रोड जाम कर दिया.

दोनों पत्रकारों की फाइल फोटो.

दोनों पत्रकारों की हत्या के बाद की फोटो.

यह वारदात आरा-सासाराम स्टेट हाईवे पर गड़हनी थाना क्षेत्र के नहसी गांव के समीप हुई। दोनों पत्रकारों का जिले के गड़हनी पंचायत के पूर्व मुखिया हरशु से खबर को लेकर काफी दिनों से विवाद था. मुखिया ने पहले भी दोनों पत्रकारों को धमकी दी थी. घटना के बाद नाराज लोग सड़कों पर उतर आए हैं. पूर्व मुखिया की स्कॉर्पियो गाड़ी को आग के हवाले कर दिया. दूसरी गाड़ियों को भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किया गया.

दोनों पत्रकार एक बाइक पर सवार होकर जा रहे थे. इसी दौरान गड़हनी थाना क्षेत्र के पुल के पास उनकी बाइक को स्कॉर्पियो गाड़ी से टक्कर मारकर गिरा दिया गया और फिर दोनों को कुचल दिया गया. दोनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई है. जानकारी मिलने के बाद कई थानों की पुलिस घटनास्थल पर पहुंची. नाराज लोग जमकर हंगामा कर रहे हैं.

दैनिक भास्कर के संवाददाता ने पहले भी किसी अनहोनी की आशंका जताई थी. पुलिस के अधिकारियों को इस बाबत पूरी जानकारी दे दी थी कि उनके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है लेकिन प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. कलम के दो सिपाहियों की पत्रकारिता से उत्पन्न विवाद के कारण हत्या के बाद इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई है.

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Struggle of Keezhattoor Vayalakilikal for Protecting Life, Livelihood and Precious Natural Resources

NHAI Must Accept Demand of the Struggle and Change the Alignment of NH 66, Kerala Government Should Hold Dialogue with the Struggle and find an Amicable Solution

New Delhi : Keezhattoor Vayalakilikal’s Struggle has been going for more than a year now to protect their Paddy fields and precious drinking water, in a state where fertile land is fast declining due to rapid urbanization and infrastructure development. They have been protesting acquisition of 250 acres of fertile paddy fields for National Highway 66.

The struggle has remained peaceful and non-violent even in face of violent attack by ruling party cadres and state repression. National Alliance of People’s Movements stands in solidarity with their struggle and endorses their demand to change the alignment of the highway to save the precious ecosystem.

The movement has even proposed alternative alignment for the highway prepared by Kerala Sasthra Sahithya Parishad to avoid environmental destruction, but the Union Surface Transport Ministry led by Shri Nitin Gadkari has refused to heed to this. It is unfortunate that Kerala government is also siding with the Union government on this issue and is not siding with the movement to press for change of the alignment. We urge that the government of Kerala pressurize the Union government and get NHAI to change the alignment to save the fields and drinking water sources. 

Kerala had an estimated 9 lakh hectares of land for paddy cultivation 40 years ago and today it has come to 1.75 lakh hectares, where as the population has increased several fold now. It was due to the persistent demand and agitation of agricultural labourers and environmentalists that the Kerala Government passed an Act for the protection of paddy fields and wetlands in 2008. However, till date required rules have not been framed, because of lack of political will. This has led to complete non-compliance with various provisions. On the other hand, government has bought in an ordinance and relaxed the provisions for filling up paddy fields, to facilitate so called ‘development projects’. We strongly feel that these incidents give a clear indication of the growing corporate development attitude of the Kerala government in developmental projects. 

We demand the government of Kerala listens to the demands of the movement and hold dialogue with the people of Keezhattoor to find an amicable solution for the issues raised by the Vayalkilikal and the affected people of Keezhattoor.  We also urge Union Transport Minister to take appropriate action and save the precious ecosystem and not destroy it when other options are available for the same.

Medha Patkar, Narmada Bachao Andolan (NBA) and National Alliance of People’s Movements (NAPM)
Aruna Roy, Nikhil Dey and Shankar Singh, Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS), National Campaign for People’s Right to Information, NAPM
Vilayodi Venugopal, Prof. Kusumam Joseph, Sharath Chelloor, John Peruvanthanam, V D Majeendran, Purushan Eloor, Suresh George, NAPM, Kerala
Prafulla Samantara, Lok Shakti Abhiyan; Lingraj Azad, Samajwadi Jan Parishad & Niyamgiri Suraksha Samiti, NAPM Odisha
Dr. Sunilam, Adv. Aradhna Bhargava, Kisan Sangharsh Samiti, NAPM, Madhya Pradesh
P.Chennaiah, Andhra Pradesh VyavasayaVruthidarula Union-APVVU, Ramakrishnam Raju, United Forum for RTI and NAPM, Meera Sanghamitra, Rajesh Serupally, NAPM Telangana – Andhra Pradesh
Dr Binayak Sen, Peoples’ Union for Civil Liberties (PUCL); Gautam Bandopadhyay, Nadi Ghati Morcha; KaladasDahariya, RELAA, NAPM Chhattisgarh
Kavita Srivastava, People’s Union for Civil Liberties (PUCL); Kailash Meena, NAPM Rajasthan
Sandeep Pandey, Socialist Party; Richa Singh, Sangatin; Arundhati Dhuru, Manesh Gupta, Suresh Rathor, Mahendra, NAPM, Uttar Pradesh
Gabriele Dietrich, Penn UrimayIyakkam, Madurai; Geetha Ramakrishnan, Unorganised Sector Workers Federation; Arul Doss, NAPM Tamilnadu
Sister Celia, Domestic Workers Union; Maj Gen (Retd) S.G.Vombatkere, NAPM, Karnataka
Anand Mazgaonkar, Swati Desai, Krishnakant, Paryavaran Suraksha Samiti, NAPM Gujarat
Vimal Bhai, Matu Jan sangathan; Jabar Singh, NAPM, Uttarakhand
Dayamani Barla, Aadivasi-MoolnivasiAstivtva Raksha Samiti; Basant Kumar Hetamsaria and Ashok Verma, NAPM Jharkhand
Samar Bagchi, Amitava Mitra, NAPM West Bengal
Suniti SR, Suhas Kolhekar, Prasad Bagwe, & Bilal Khan, Ghar Bachao Ghar Banao Andolan, Mumbai NAPM Maharashtra
Anjali Bharadwaj, National Campaign for People’s Right to Information (NCPRI), NAPM
Faisal Khan, KhudaiKhidmatgar; J S Walia, NAPM Haryana
Guruwant Singh, NAPM Punjab
Kamayani Swami, Ashish Ranjan, Jan Jagran Shakti Sangathan; Mahendra Yadav, Kosi Navnirman Manch; Sister Dorothy, Ujjawal Chaubey, NAPM Bihar
Bhupender Singh Rawat, Jan SangharshVahini; Sunita Rani, Domestic Workers Union; Rajendra Ravi, Nanhu Prasad, Madhuresh Kumar, Amit Kumar, Himshi Singh, Uma, NAPM, Delhi

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कांग्रेस राज में मीडिया वालों के लिए एडवाइजरी आती थी, भाजपा शासनकाल में सीधे आदेश आते हैं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

Sanjaya Kumar Singh : यादों में आलोक – “सत्यातीत पत्रकारिता : भारतीय संदर्भ”… दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में कल (शनिवार को) आयोजित एक सेमिनार में देश में मीडिया की दशा-दिशा पर चर्चा हुई। विषय था, “सत्यातीत पत्रकारिता भारतीय संदर्भ”। संचालन रमाशंकर सिंह ने किया और बताया कि अंग्रेजी के पोस्ट ट्रुथ जनर्लिज्म के लिए कुछ लोगों ने “सत्योत्तर पत्रकारिता” का सुझाव दिया था पर सत्योत्तर और सत्यातीत पत्रकारिता में अंतर है और आखिरकार सत्यातीत का चुनाव किया गया।

सबसे पहले आईटीएम विवि के पत्रकारिता विंभाग के जयंत तोमर ने आलोक तोमर के लेखन व पत्रकारिता पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। विषय प्रवर्तन (भारत सरकार के) भारतीय जनसंचार संस्थान के आनंद प्रधान ने किया और मुख्य वक्ताओं में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, पुण्य प्रसून वाजपेयी और राजदीप सरदेसाई रहे। एनके सिंह भी आने वाले थे, नहीं आए। इस बारे में रमाशंकर सिंह ने लिखा है, “वक़्ता के रूप में सहमति देकर भी एन के सिंह न जाने क्यों नहीं आये?”

सबने वही कहा जो उनसे अपेक्षित था। फिर भी सूचनाप्रद और दिलचस्प। उर्मिलेश ने अपने अनुभव से कुछेक उदाहरण दिए और कहा कि सत्यातीत पत्रकारिता काफी समय से हो रही है। राजदीप सरदेसाई ना विवाद में गए और ना विवाद से बचने की कोशिश करते दिखे (मैंने उन्हें पहली बार सुना) और विषय पर केंद्रित रहे। उन्होंने कहा कि तकनीक है, समाज में बदलाव आया है उसका असर है। खबर सही हो या गलत खबर है तो कुछ ही देर में फैल जाती है और यह इनमें गढ़ी हुई तथा गलत खबरें भी होती हैं। उन्होंने भी अच्छे उदाहरण दिए। पुण्य प्रसून वाजपेयी का यही कहना था कि स्थिति लगातार खराब हो रही है। पहले एडवाइजरी आती थी अब आदेश आते हैं। राम बहादुर राय ने मीडिया आयोग बनाने की मांग की और इस बारे में अपने प्रयासों की जानकारी दी।

राम बहादुर राय ने अपनी 2008 से जारी मीडिया कमीशन की मांग को जारी रखा। उन्होंने तमाम उतार-चढ़ाव, बदलाव के दौर से गुजर रही पत्रकारिता के लिए पचास के दशक, फिर सत्तर के दशक में लाए गए प्रेस आयोग का जिक्र करते हुए इसे एक बार फिर मौजूं बताया। राम बहादुर राय ने कहा कि इस पत्रकारिता का भला तभी हो सकता है, जब पत्रकार अपना दायित्व, कर्तव्य दोनों ईमानदारी के साथ समझे। उसे निभाए। वह संसद भवन में राज्य सभा सदस्य बनकर प्रवेश करने का सपना देखना छोड़ दे। पत्रकारिता और लोकतंत्र दोनों का भला हो जाएगा।

मैं समझ रहा था कि राम बहादुर राय को सरकार के करीबी होने के नाते बुलाया गया था पर उन्होंने कहा कि वे आलोक से संबंधों और उनकी पत्नी सुप्रिया के निमंत्रण पर आए हैं और ज्यादातर लोग इसीलिए आए हैं।

मैं हर साल इस आयोजन में जाता रहा हूं। आलोक और सुप्रिया भाभी से करीबी भी इसकी वजह है पर मुख्य मसला तो पत्रकारिता पर चर्चा है। जो प्रिय है। और इसीलिए हर साल जाने के लिए समय निकाल पाया। नहीं तो किसी की याद में कहां हर साल ऐसे आयोजन होते हैं और कौन हर साल जाता है। फिर भी। कुल मिलाकर, अंत में भड़ास फॉर मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह का कहा ही ठीक लगा कि आंख वालों ने हाथी की व्याख्या अपने-अपने हिसाब से कर दी। पत्रकारिता रूपी हाथी को जो अपने हिसाब से हांक लेता था (आलोक तोमर) वो तो रहा नहीं। 

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कार्यक्रम में किसने क्या कहा…

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य बदल गया है। अब संपादक को पता नहीं होता कि कब कहाँ से फोन आ जाए। संपादकों के पास कभी पीएमओ तो कभी किसी मंत्रालय से सीधे फोन आता है। ये फ़ोन सीधे खबरों को लेकर होते हैं और संपादकों को आदेश दिए जाते हैं। मीडिया पर सरकारों का दबाव पहले भी रहा है, लेकिन पहले एडवाइजरी आया करती थी कि इस खबर को न दिखाया जाए, इससे दंगा या तनाव फैल सकता है। अब सीधे फोन आता है कि इस खबर को हटा लीजिए। खुद मेरे पास प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आते हैं और अधिकारी बाकायदा पूछते हैं कि अमुक खबर कहां से आई?  ये अफसर धड़ल्ले से सूचनाओं और आंकड़ों का स्रोत पूछते हैं। अक्सर सरकार की वेबसाइट पर ही ये आंकड़े होते हैं लेकिन सरकार को ही नहीं पता होता। जब तक संपादक के नाम से चैनलों को लाइसेंस नहीं मिलेंगे,  जब तक पत्रकार को अखबार का मालिक बनाने की अनिवार्यता नहीं होगी, तब तक कॉर्पोरेट का दबाव बना रहेगा। राजनैतिक पार्टियों के काले धंधे में बाबा भी शामिल हैं। बाबा टैक्सफ्री चंदा लेकर नेताओं को पहुंचाते हैं। जल्द ही मैं इसका खुलासा स्क्रीन पर करूंगा।

-टीवी जर्नलिस्ट पुण्य प्रसून बाजपेयी

पत्रकारिता में झूठ की मिलावट बढ गई है। किसी के पास भी सूचना या जानकारी को छानने और परखने की फुरसत नहीं है। गलत जानकारियाँ मीडिया मे खबर बन जाती हैं। इसके लिए कॉर्पोरेट असर और टीआरपी के प्रेशर को दोष देने से पहले पत्रकारों को अपने गिरेबां मे झाँककर देखना चाहिए कि हम कितनी ईमानदारी से सच को लेकर सजग हैं।

-टीवी जर्नलिस्ट राजदीप सरदेसाई

भारत में पठन पाठन प्राचीन से मध्य काल तक कुछ लोगों के हाथों में रहा हैं। पत्रकारिता में सत्यातीत बोध हमारे समाज में लगातार चलता रहा है और आधुनिक काल मे भी चल रहा है। सच्चाई से परे तमाम खबरें आती रहती हैं जो दलितों, पिछड़ों आदिवासियों के खिलाफ होती हैं।

-वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश

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भोपाल की पत्रकार ममता यादव इस फेलोशिप के लिए चुनी गईं

युवा पत्रकार ममता यादव को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता फेलोशिप के लिए चुना गया है। माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल ने पत्रकारिता के परिष्कार और युवा पत्रकारों के प्रोन्नयन के उद्देश्य से फेलोशिप आरंभ की है।

फेलोशिप समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रकान्त नायडू और सप्रे संग्रहालय के संस्थापक-संयोजक विजयदत्त श्रीधर ने फेलोशिप की घोषणा की। उन्होंने बताया कि सुश्री ममता यादव ‘हिन्दी समाचार पत्रों में भाषा का प्रयोग’ पर अध्ययन कर लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत करेंगी। इसके लिए कुल एक वर्ष की समय सीमा तथा 50,000/- रुपये फेलोशिप राशि निर्धारित है।

गंगाप्रसाद ठाकुर राज्य स्तरीय पत्रकारिता फेलोशिप के लिए प्राप्त आवेदनों को योग्य नहीं पाया गया। इसलिए तय किया गया कि नये सिरे से प्रस्ताव आमंत्रित किए जाएँ। फेलोशिप समिति ने यह भी निर्णय लिया कि फेलोशिप के लिए विषय का चयन समिति करेगी। उसी के लिए प्रस्ताव (सिनाप्सिस) आमंत्रित किए जाएँगे। सबसे अच्छे प्रस्ताव का चुनाव फेलोशिप अध्ययन के लिए किया जाएगा।

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प्रतिनिधि टीवी के मीडियाकर्मी बकाया पैसे के लिए भटक रहे, पुलिस में की कंप्लेन

प्रतिनिधि टीवी के मालिक आलोक कुमार ने अपने कर्मचारियों को बड़े बड़े ख़्वाब दिखाए थे. लेकिन अब बकाया पैसे तक नहीं दे पा रहे. आलोक कुमार अब कर्मचारियों से गिड़गिड़ा रहे है. पिछले साल सेलरी के लिए परेशान कर्मचारियों ने आंदोलन किया. बाद में चैनल बंद हो गया.

किराये का आफिस और किराये का लाइसेंस. बस यही पूंजी रह गयी. पहले तो कर्मचारियों को धमकाया गया. जब गुस्साए कर्मचारियों के तेवर उग्रतम होते गए तो इज़्ज़त बचाने के लिए आलोक कुमार ने नवंबर 2017 के दिन सभी लोगो को 15 फरवरी का चेक दिया. तब से अब तक 3 डेट बदले जा चुके हैं. चेक क्लियर नहीं हुआ.

हर बार वो मेल और कॉल के जरिये चेक डालने के एक दिन पहले गिड़गिड़ाने लगते हैं. अब उन्होंने चौथी बार फिर ऐसा ही किया. लेकिन कर्मचारियों ने तय किया है कि पुलिस में कंप्लेन किया जाए. साथ ही आलोक कुमार के खिलाफ उनके आफिस, दिल्ली आवास और झारखंड स्थित पुश्तैनी आवास के इलाके में पोस्टर चिपकाने का निर्णय लिया गया है.

इस चैनल में एमडी रविंद्र मिश्रा थे. चैनल की सीईओ आलोक की बहन अल्का थीं. परेशान मीडियाकर्मियों ने बकाया न मिलने पर जल्द ही इन दोनों के खिलाफ भी मोर्चा खोलने का ऐलान किया है.

(प्रतिनिधि टीवी के एक पीड़ित पूर्व कर्मचारी की कलम से.)

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योगी सरकार के करोड़ों के इस विज्ञापन में कार्यक्रम स्थल का नाम ही नहीं है

सिस्टम को टीबी का सुबूत… जगाने का काम करने वाले सोते हुए कर रहे हैं काम… करोड़ों के बजट वाले इस विज्ञापन में पूरी रामकथा है। लेकिन रामकथा में राम जी का ही नाम नहीं है। कार्यक्रम की पूरी जानकारी है पर ये लिखना भूल गये कि कहां है कार्यक्रम।

उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के सभी बड़े अखबारों में आज ये फुल पेज विज्ञापन छपा है। इस विज्ञापन में सरकार ने करोड़ों रूपये खर्च किये हैं।  खैर जब सिस्टम को ही टीबी हो गयी है तो टीबी को खत्म करने की जागरूकता भी टीबी का शिकार हो जाये तो ताज्जुब की बात नहीं।

लखनऊ के पत्रकार नवेद शिकोह की एफबी वॉल से.

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यूपी के सुपर ‘सीएम’ सुनील बंसल के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पूर्व आईएएस का गनर वापस!

पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह

Surya Pratap Singh  : जान ले लो उसकी….. जो भी विरोध करे! उ. प्र. के ‘सुपर CM’ …. सुनील बंसल, भाजपा के महाभ्रष्ट संगठन मंत्री की बदले की कार्यवाही… मेरी सुरक्षा वापिस करायी ….. आज का ‘गायत्री प्रजापति’, सुनील बंसल अब मेरी जान लेने पर उतारू! ‘माल काटो-मौज करो’ और जो विरोध करे उसकी जान ले लो…… ये हैं आज की राजनीति का मूल मंत्र……चाहे कोई भी दल हो।

मित्रों! आपको ज्ञात ही है कि भाजपा शासन काल में ही मेरे घर पर गुंडों द्वारा दो बार अटैक कर मेरी जान लेने की कोशिश की थी …. जिसपर मैंने दो FIRs गोमतीनगर थाने में दर्ज करायी थी जिन पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। इन हमलों के बाद सरकार ने एक सिपाही मेरी सुरक्षा में लगाया था, जिसे सरकार ने सुनील बंसल के दबाव में आज वापिस ले लिया।

आज सुबह एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी ने यह मुझे बताया कि सुनील बंसल के भ्रष्टाचार को मेरे द्वारा उजागर किए जाने के कारण वे नाराज़ हो गए हैं और उन्होंने फ़ोन कर मेरी सुरक्षा तुरंत वापिस लेने के आदेश दिए हैं…… ज्ञात हो कि भ्रष्ट सुनील बंसल व उ.प्र. के दो मंत्री मिलकर एक यूनिवर्सिटी/मेडिकल कॉलेज खोल रहे हैं और मैं इस घोटाले की उजागर करने वाला हूँ इसीलिए सुनील बंसल बोखलाए हुए हैं।

मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता …. हाँ, यदि अब कोई हमला मेरे या मेरे परिवार पर हुआ तो उसके लिए ४० चोरों के सरदार अलीबाबा, दुश्चरित्र सुनील बंसल ही इसके लिए जिम्मेदार होंगे …. और मैं उन्हीं के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराऊँगा…… भ्रष्ट दुष्टों का अंत समय अवश्य आता है …. थोड़ी देर ज़रूर होती है….. ईमानदार योगी जी के बावजूद, उत्तर प्रदेश में सुनील बंसल जैसे गिद्धों का भ्रष्टाचार व अनाचार ही भाजपा को ले डूबेगा….. देखते रहिए।

पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

सुनील बंसल को लेकर लिखी गई कुछ पोस्ट्स पढ़ें…

Surya Pratap Singh : सुपर-CM की नोट-गिनने की मशीन भी नहीं रोक पा रही लखनऊ में नौनिहालों का यौन-शोषण ! उत्तर प्रदेश के ‘सुपर-CM’ और भाजपा के प्यारे गायत्री प्रजापति, श्री सुनील बंसल जी को दिखाई नहीं देता कि जिस शहर, लखनऊ में उन्होंने नोट गिनने की मशीन लगाई हुई है, वहाँ ३ बच्चों का यौनशोषण-जघन्य अपराध रोज़ होता है …… २०१६ में लखनऊ ने बच्चों पर होने वाले अपराधों में पूर्व वर्षों के सारे रिकोर्ड तोड़ दिए- ८४४ बच्चों का अपहरण…. २८६ बच्चियों सम्मलित हैं। … सुपर-CM बंसल, सर जी ! कुछ करिए ना….. आपसे निवेदन है कि बच्चों को तो छोड़ दो, बड़े साहब …. या फिर योगी जी को Freely मुक्तभाव से काम करने दो …. लेकिन, हुकुमशा, Encounter से आप भी बच के रहना ….. आज कल ‘मौसम’ कुछ ऐसा ही चल रहा है। और हाँ, बंसल जी, वैसे तो आपकी फ़िल्म ऐक्टर ‘दिलीप कुमार’ वाली Hair-Style तक की तारीफ़ उ.प्र. के भाजपा वाले करते हैं और मज़ाक़ भी बनाते हैं…… लेकिन याद रखना, ये ‘साले’ यू.पी. वाले जो आप पर आज ‘नोट’ वर्षा रहे हैं, आपके पद से हटने के बाद, चाय तक के लिए भी नहीं पूछेंगे और आपकी जाँच की माँग तो होने ही वाली है …. यह बात लिखकर रख लेना। कहीं, आपके ‘साले’ यू. पी. वाले आपकी “ऐसी-वैसी” वाली ‘सीडी’ बनाने व जेल भिजवाले की तैयारी तो नहीं कर चुके हैं ….. बच के रहना !!!!

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उत्तर प्रदेश में नए मुख्यमंत्री की तलाश में ……. ४० चोरों के सरदार, ‘अलीबाबा’……. सुनील बंसल जी ! उत्तर प्रदेश में ‘माल दो-काम कराओ’ के फ़ॉर्म्युला के आविष्कारक भाजपा के ‘महाविनाशक’ मंत्री श्री सुनील बंसल ने CM योगी के एक वर्ष के कार्यकाल पूर्ण करने पर उन्हें ‘बधाई’ नहीं दी, क्यों कि ‘सुपर-CM’ को ईमानदार CM योगी का काम पसंद नहीं आ रहा है ….. कारण क्या है? शायद अपनी ईमानदारी के कारण CM योगी आज के इस ‘गायत्री प्रजापति’ की कमाई के धंधे में व्यवधान डाल रहे हैं। अब ये भाजपा प्रवक्ता, ‘दुर्लोक कुवस्थी’ जैसे ४० चोरों के सरदार अलीबाबा (सुनील बंसल) ईमानदार CM योगी को हटवाकर अपनी पसंद का बेबस ग़ुलाम ‘कारिंदा-CM’ लाना चाहते हैं ….. ज्ञात हो कि अलीबाबा, बंसल जी के भ्रष्टाचार में व्यवधान डालने वाले RSS के देवतुल्य क्षेत्र प्रचारक (अवध क्षेत्र) श्री शिवनारायण जी का ट्रान्स्फ़र भी करा चुके हैं…… अब उनकी कुदृष्टि इसी क्षेत्र के एक अन्य RSS के उच्च पदाधिकारी पर है क्योंकि ये भी Facebook पर अप्रत्यक्ष रूप से सुनील बंसल की कार्य क्षमता पर टीका टिप्पणी करते रहते हैं….. उन्होंने सुनील बंसल के दुश्चरित्र/कदाचार के विषय में संघ में ऊपर तक बता चुके हैं। सोशल मीडिया पर भाजपा के ‘गायत्री प्रजापति’ बंसल जी के दुष्कर्मों के चर्चे आम हैं …..!!

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सत्ता की खींचतान में देखते हैं कौन बाज़ी मारता है? उ.प्र. में भ्रष्ट ‘बंसल-मौर्य’ गठजोड़ या फिर ईमानदार योगी …..सत्ता की मौज लूट रहे सुनील बंसल उर्फ़ दूसरे ‘गायत्री प्रजापति’ के सामने एक लाचार योगी! सत्ता में पॉवर के लिए एक दूसरे को पटकनी देना या फिर ज़ोर आज़माइश कोई नई बात नहीं ….. उ.प्र. भाजपा के भ्रष्ट महामंत्री संगठन सुनील बंसल ने योगी जी को एक वर्ष पूर्ण होने पर बधाई नहीं दिया ….. और जब राज्यसभा के लिए ९ सीट जीतीं तब भी ‘लड्डू खाओ’ जश्न में भी सम्मिलित नहीं हुए….. कारण योगी जी द्वारा बंसल जी की ‘खाओ-कमाओ’ नीति का विरोध करना …. अहंकारी सुनील बंसल के मधुर वाक्य जो सोशल मीडिया पर वाइरल हैं…… ‘साला पागल कर रखा है, यूपी वालों ने…….उत्तर प्रदेश के बच्चे भिखारी हैं’….. महाभ्रष्ट बंसल व उसके गैंग के कुछ भ्रष्ट मंत्रियों के कारण आज उत्तर प्रदेश में भाजपा कभी ख़ुशी कभी ग़म के दौर से गुज़र रहा है ….भाजपा का अहंकार चरम पर है और लोकप्रियता का ग्राफ़ तेज़ी से गिरता जा रहा है…

गोरखपुर-फूलपुर की हार का दर्द भूलाने के लिए कल राज्यसभा चुनाव में जोड़तोड़ से हुई जीत की ख़ुशी में ख़ूब लड्डू बटे और आज की मायावती की प्रेस कॉन्फ़्रेन्स से उपजी चिंता ने भाजपा की हवाइयाँ उड़ा दी हैं…कभी ख़ुशी-कभी ग़म के दौर से गुज़र रही है उ.प्र. की भाजपा और ऊपर से सुनील बंसल जैसे लोगों के भ्रष्टाचार का दंश … समझ नहीं आ रहा कि कौन सा मंत्र निकाला जाए जिससे सपा-बसपा-कोंग्रेस गठबंधन से पर पाया जा सके.. ….कोई ‘गुजरात फोर्मूला’ ही शायद काम आ जाए।

बसपा के प्रत्याशी को जोड़तोड़ से हराकर ‘बंसलवा’ जैसे लोग सोच रहे थे कि शायद सपा-बसपा के भावी गठबंधन में दरार पड़ जाए लेकिन मायावती ने आज सारा माजरा साफ़ कर उ.प्र. भाजपा की नींद उड़ा दी है …..सपा-बसपा-कोंग्रेस के संयुक्त वोट बैंक को पटकनी देना आसान नहीं होगा … गोरखपुर व फूलपुर में इसका ट्रेलर दिख चुका है।

भाजपा दो मुद्दों पर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर क़ाबिज़ हुई थी …. गुंडाराज व भ्रष्टाचार …. लेकिन दोनों मुद्दों पर उपेक्षानुरूप परिणाम नहीं आए, बंसल और उसके गैंग के प्रदेश को लूट कर रख दिया …. बढ़ती बेरोज़गारी व महँगाई, किसानों/दिहाड़ी मज़दूरों की ख़स्ता हालात… भ्रष्ट नौकरशाहों व मंत्रियों से आज भी CM योगी घिरे हैं ….. ‘काम करो कम-जमकर झूँठे गीत गाओ’ के सिद्धांत से लोग ऊबने लगे हैं ….. प्रदेश में भाजपा का ग्राफ़ तेज़ी से गिर रहा है, लेकिन सच्चाई को कोई स्वीकारने को तैयार नहीं है …साम, दाम, दंड, भेद से जनता को हर बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है …. गोरखपुर व फूलपुर की हार के बाद भी यह बात भाजपा के समझ में नहीं आ रही।

बाबरी मस्जिद गिरने बाद हुए सपा-बसपा के गठबंधन ने भाजपा को १४ वर्ष के वनवास पर भेज दिया था …..अभी भी समय है कि भाजपा को अहंकार त्याग कर …. भ्रष्ट नौकरशाहों व मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाए….नौटंकी बाज़ी का सहारा न लेकर बेरोज़गार युवाओं को रोज़गार देने , किसानों की आय दोग़ुनी करने जैसे वादों पर गम्भीरता से काम किया जाए ……सुनील बंसल जैसे भ्रष्ट, अहंकारी लोगों व चमचों को संगठन से बाहर कर टूटते मनोबल से पीड़ित भाजपा के ज़मीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का सम्मान किया जाए ….तो शायद कुछ काम बने।

लोग कहने लगे हैं कि CM योगी की ऐसी ईमानदारी का क्या फ़ायदा यदि आज भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है …… आमजन का तहसील/थानों में आज भी बिना पैसे के काम नहीं हो रहा…… बालू-मौरंग जैसी बस्तुओं के दाम भी नियंत्रित नहीं हो पा रहे….. अस्पतालों की आज भी हालत पहले जैसे ही हैं…. किसानों को बिजली का और अधिक मूल्य देना पड़ रहा है …..स्कूलों में आज भी पढ़ाई नहीं होती…प्राइवेट स्कूलों की अनियंत्रित फ़ीस अल्प/मध्य आय वर्ग के लिए जी का जंजाल बना है…. RTE ऐक्ट के तहत आज भी २५% बच्चों के निःशुल्क दाख़िला नहीं हो रहे। भाजपा को कभी ख़ुशी कभी ग़म के दौर से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है….. काम अधिक करें और बातें कम !!!!

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‘गरुड़’ पर सवार एक ‘विवश’ मुख्यमंत्री! CM योगी, भ्रष्ट मंत्रियों व नौकरशाहों के ‘पिंजड़े’ में क़ैद …… ईमानदारी की कुल्हाड़ी कंधे पर ताने एक ‘लाचार’ लक्कड़हारे के रूप में दिखते है! भाजपा हाईकमांड ने CM योगी को उत्तर प्रदेश में ‘बँटाईदार-मुख्यमंत्री’ (Sharecropper CM) बना के रखा दिया है …. दो उपमुख्यमंत्री- दिनेश शर्मा और केशव मौर्य और ऊपर से एक ‘सुपर-सीएम’ सुनील बंसल …….. दो मंत्रीगण तो ऐसे हैं जो दिल्ली से आए सीधे हाईकमांड के ‘चाकर’ हैं और उनके विभागों की हालत बहुत ख़स्ता है और वे लखनऊ से ज़्यादा दिल्ली में रहते हैं….अर्थात कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में एक ‘Split -Leadership’ (विभाजित नेतृत्व ) है….. और CM योगी को पूर्ण-निर्णय लेने का अधिकार नहीं है….. नौकरशाही भी कन्फ़्यूज़ है कि किसकी सुने और किसकी नहीं….. असली मुख्यमंत्री कौन है ? अर्थात CM योगी एक Caged CM (पिंजरे में क़ैद मुख्यमंत्री) के रूप में विराजमान हैं।

किसी उच्च अधिकारी की पोस्टिंग करने का अधिकार भी दिल्ली व सुनील बंसल को है, CM योगी तो ख़ाली मौहर लगाते हैं….. कुछ प्रमुख सचिवों/आईएएस अधिकारियों को दिल्ली से premature repatriation कर लाया गया है ….. सीधे दिल्ली से ‘क्या करना और क्या नहीं’ बताकर भेजा गया है, वे CM योगी की नहीं अपितु ‘दिल्ली’ की ज़्यादा सुनते हैं और CM योगी की खुफियागिरी भी करते हैं….. ये IAS अधिकारी सचिवालय में ‘दिल्ली-वाले’ अधिकारियों के रूप में जाने जाते हैं। यदि कोई निर्णय CM योगी द्वारा अपने स्तर पर ले भी लिए जाते हैं, ‘दिल्ली-वाले’ ये IAS अधिकारी सारी बातों को अपना रंग देकर दिल्ली में जुगलख़ोरी कर देते हैं।

पंचमतल (CM office) में RSS व संगठन से लाकर कुछ ओएसडी बैठाए गए हैं …. जो केवल खुफियागिरी करते हैं और इन सबने CM योगी के नाक में दम कर रखा हैं….. एक OSD केवल बालू/मौरंग के ठेकों का काम के लिए जिलाधिकारियों को फ़ोन करते रहते हैं , उनके आका ‘सुनील बंसल’ जी स्वमँ जो ठहरे…. उनके call details निकलवा कर देखे जा सकते हैं….. ज़रा इन OSDs का कार्यविभाजन देखा लिया जाए तो पता चलेगा कि ये महानुभाव CM office में वास्तव में करते क्या हैं?

प्रदेश में कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप हैं …. खनन, ट्रान्स्पोर्ट, पीडबल्यूडी, शराब, पंजीरी,गन्ना, पंचायती राज आदि विभागों में भ्रष्टाचार रुक नहीं पा रहा है ….. थानों व तहसील स्तर पर बिना पैसे के काम नहीं हो रहे हैं और CM योगी विवशतावश कुछ नहीं कर पा रहे हैं। अन्य दलों से भाजपा में आए लोग दलाली कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ भाजपा के ईमानदार/निष्ठावान कार्यकर्ताओं के सही काम भी नहीं हो रहे हैं….. वैसे तो प्रदेश में कई जहाज़ व हेलिकॉप्टर हैं जो अक्सर आसमान में उड़ते देखे जा सकते हैं, लेकिन कितना सुखद है कि उत्तर प्रदेश में CM के मुख्य हवाई जहाज़ का नाम ‘गरुड़’ है …. जो भगवान विष्णु का भी वाहन है।

वाहन तो गरुड़ है लेकिन इस पर सवार मुख्यमंत्री दिल्ली के ‘पिंजड़े’ में क़ैद है ….. इसी लिए स्वमँ ईमानदार होने के बावजूद भी CM योगी भ्रष्ट मंत्रियों व सुनील बंसल के संरक्षण प्राप्त भ्रष्ट उच्च अधिकारियों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं …. इस लिए CM योगी को गरुड़ पर सवार ….. और हाईकमांड के ‘पिंजड़े-में-क़ैद’ एक मुख्यमंत्री कहा जा रहा है….. कुछ लोग उपचुनावों में हुई हार का ठीकरा CM योगी के सर पर फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और अफ़वाह फैलाईं जा रही है कि CM योगी को २०१९ से पूर्व हटा दिया जाएगा …….. यदि ऐसा हुआ तो प्रदेश में एक ऐसा विद्रोह होगा कि भाजपा को सम्भालना मुश्किल हो जाएगा और २०१९ में भाजपा का बँटाढार होना कोई रोक नहीं पाएगा। CM योगी की प्रदेश में रहकर काम नहीं करने दिया जा रहा है…… आधे समय प्रदेश से बाहर ही रहते हैं। यदि CM योगी को स्वच्छंद होकर काम नहीं करने दिया गया तो गोरखपुर व फूलपुर की तरह २०१९ में भी भाजपा का कहीं यही हश्र फिर न हो जाए !!!

सूर्य प्रताप सिंह का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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एबीपी न्यूज़ वाले क्या-क्या वाहियात चीज़ें देते रहते हैं…

Om Thanvi : एबीपी न्यूज़ ने बीच में साहस का इज़हार किया। मेरे मित्र पुण्यप्रसून वाजपेयी को साथ लेकर उसी जज़्बे की पुष्टि की। लेकिन ये क्या? कल मैंने उनका ऐप डाउनलोड किया था। आज उठते ही किसी ख़बर की जगह फ़ोन पर उनकी ओर से यह इबारत नुमायाँ थी – “आज का राशिफल, २५ मार्च रविवार। आज जन्मदिन है तो जान लें कैसी रहेगी आपकी सेहत।”

थोड़ी देर बाद फिर ख़बरों के संसार से मेरे फ़ोन की स्क्रीन पर यह सूचना – “मकर राशि वाले आज न करें कोई शुभ कार्य” …

क्या-क्या वाहियात चीज़ें देते रहते हैं। राशिफल से बेईमानी भरा कोई काम पत्रकारिता में नहीं। लोगों की कमज़ोर भावनाओं से खिलवाड़ का यह एक हथकंडा मात्र है। टीवी ने इसे प्राइम या और क़ीमती चीज़ बना डाला है। मैंने जनसत्ता में राशिफल छापना बंद कर दिया था। कभी दुबारा सम्पादक हुआ (हालाँकि इसकी कोई संभावना नहीं, जनसत्ता के बाद और क्या बचता है!) तो राशिफल को कूड़े में फेंकने का पुण्य कार्य देख लीजिएगा फिर करूँगा!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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एचटी के लिए ‘मालकिन का सम्मान’ बड़ी खबर है, अपने महिला मीडियाकर्मी की पिटाई नहीं

Sanjaya Kumar Singh : हिन्दुस्तान टाइम्स की महिला फोटोग्राफर की पिटाई… यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर तो नहीं है… पत्रकारिता की भाषा में यह भी सम्मान है… पुलिस करती रहती है… छोटे शहरों में ज्यादा होता है… दिल्ली में मौका कम मिलता है… पर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के जमाने में यह खबर महिला मालकिन के हिन्दुस्तान टाइम्स में नहीं है… पर कोलकाता के अखबार दि टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर छापी है…

यहां तक तो कोई खास बात नहीं है… पर दूसरी फोटो हिन्दुस्तान टाइम्स की मालकिन या चेयरपर्सन शोभना भरतीया के सम्मान की है… अब यह कितना महत्वपूर्ण या बड़ा है, आप तय कीजिए… केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने उन्हें यह सम्मान दिया और उनके अपने अखबार में खबर छपी है…

जब अखबार के चेयरपर्सन की फोटो छापनी हो तो फोटोग्राफर पिटे या मरे – प्राथमिकता तो तय है… यही है आज की पत्रकारिता… इसे सिखाने के लिए लोग पैसे लेते हैं और लोग सीखने में जीवन लगा देते हैं… संयोग से आज ही जनसत्ता के साथी, मशहूर पत्रकार आलोक तोमर की याद में एक सेमिनार है… विषय रखा गया है – “सत्यातीत पत्रकारिता : भारतीय संदर्भ”… पत्रकारिता कोई पढ़ाए-सिखाए… लेकिन ये भारतीय संदर्भ वाकई दिलचस्प है…

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इन्हें भी देखें-पढ़ें…

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साथी फोटोग्राफर की पिटाई से दुखी फोटो जर्नलिस्ट्स ने कैमरे दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने रख दिए

Badal Saroj : हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्टर अनुश्री कल ज़मीन पर गिरे एक लड़के को पीट रहे पुलिसवालों की तस्वीर ले रही थीं। पास खड़े एक अफ़सर ने कहा, “इसका कैमरा तोड़ दो।” फिर अनुश्री का कैमरा छीन लिया गया। एक दूसरी पत्रकार को एक पुलिसवाले ने धक्का दिया और ऐसा करते हुए उसकी छाती दबाई।

बाद में पुलिस ने सफ़ाई दी कि उस पुलिसवाले ने महिला पत्रकार को छात्रा समझ लिया था। अब सवाल यह है कि क्या छात्रा का स्तन दबाना अपराध नहीं है। अगर नहीं है तो सरकार इसकी घोषणा कर दे। पुलिस मैनुअल में इसे शामिल तो नहीं कर दिया गया है? फ़र्स्टपोस्ट के पत्रकार प्रवीण सिंह को हाथ में गहरी चोट लगी। दूसरे पत्रकारों के साथ भी बहुत कुछ हुआ।

ये कैमरे फ़ोटोजर्नलिस्टों ने पुलिस मुख्यालय के सामने रखे हैं। विरोध जताते हुए। कुछ तस्वीरें बहुत बड़ी कहानी कह देती हैं। यह उन्हीं तस्वीरों में से एक है।

पोलिटिकल एक्टिविस्ट बादल सरोज की एफबी वॉल से.

इसे भी देखें-पढ़ें…

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एचटी की फोटो जर्नलिस्ट अनुश्री के साथ दिल्ली पुलिस ने कैसा किया सुलूक, देखें वीडियो

Shweta R Rashmi :  दिल्ली पुलिस या गुंडागर्दी… ये वीडियो देखिए… कैसे पुलिस मीडिया के साथ वर्ताव कर रही है… आखिर इतनी बेशर्मी कहां से लाते हैं… अनुश्री फोटो जर्नलिस्ट हैं HT में…  किस तरह पुलिस की वर्दी में तैनात ये महिलाएं अनुश्री को पीट रही हैं… देखिए जरा…

क्या अपना दायित्व निभाने के लिए मीडियाकर्मी को फील्ड में जाना हो तो वह साथ-साथ अपनी सुरक्षा का डर भी ले के जाये… क्या अब भी कहेंगे कि मीडिया को काम करने की आज़ादी है… मैं इस घटना की निंदा करती हूं और उचित कार्रवाई की मांग भी… साथ ही पत्रकार सुरक्षा कानून बनाए जाने की मांग करती हूं… इसे आगे बढ़ाइये और इस पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए अपनी आवाज दीजिये… देखें वीडियो….

महिला पत्रकार श्वेता आर. रश्मि की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें…

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सरकारी विज्ञापन वितरण प्रणाली पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई नाराजी, 17 विभागों को नोटिस जारी

उन्मेष गुजराथी, दबंग दुनिया

मुंबई: अभिव्यक्ति के साधनों में से एक विज्ञापन को आधार बनाकर विभिन्न संस्थाएं, व्यक्ति अपने कार्यो को जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं। समाचार पत्रों, चैनलों, सोशल मिडिया, रेडियो, मोबाइल के संदेशों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति दी जा सकती है। विज्ञापन देने वाली कंपनियां किसे विज्ञापन दें, यह तो विज्ञापन देने वाली कंपनी के अधिकार क्षेत्र में रहता है, लेकिन कई बार यह देखने को मिलना है कि अच्छा सर्कुलेशन होने के बवाजूद विज्ञापन देने में दोहरी नीति अपनायी जाती है, जो लोग ऊंची पहुंच वाले हैं, वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कोई गुरेज नहीं करते।

दरअसल समाचार पत्रों में विज्ञापन देने वाले विभाग भी अपनी जेब भरने की फिराक में रहते हैं। दरअसल, इसके पीछे भी दबाव तंत्र काम करता है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में ख्यात समाचार पत्रों में विज्ञापन को लेकर जिस तरह की कमीशनखोरी जारी है, उससे यह सिद्ध होता है कि मिडिया क्षेत्र में भी दबावतंत्र हावी है और कुछ बड़े समाचार पत्रों को सभी नियमों को तोड़ते हुए भरपूर विज्ञापन दिए जाते हैं और कुछ समाचार पत्र ऐसे हैं, जिन्हें जानबूझ कर विज्ञापन से वंचित रखा जाता है।

राज्य सरकार के सूचना व जनसंपर्क महानिदेशालय तथा अन्य विभागों की ओर से वितरित किए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों में बड़ी मात्रा पर स्वेच्छाधिकार के बूते पर सरकारी नियमों को ताक पर रखते हुए कुछ चुने हुए समाचार पत्रों को ही विज्ञापन दिया जाता है। इस संबध में एडिटर्स फोरम ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई  मा. न्यायमूर्ति शंतनु केमकर और न्यायमूर्ति एम.एस. कर्णिक की खंडपीठ के सामने हुई। इस पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजी जताई हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने महानिदेशक (सूचना और जनसंपर्क), आयुक्त मुंबई महानगर पालिका, प्रबंध निदेशक और उपाध्यक्ष सिडको, मुख्याधिकारी एमआईडीसी समेत कुल 17 विभागों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।

छोटे अखबारों के साथ पक्षपात : मध्यम और छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन वितरित करते समय काफी पक्षपात किया जाता है। इस संदर्भ में एडिटर्स फोरम ने समय-समय पर सरकार और प्रशासन को इस सबंध में अवगत भी कराया गया था। लेकिन इस पर अभी तक किसी प्रकार को दखल सरकार ने नहीं ली, इस कारण  एडिटर्स फोरम ने इस के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कुछ समाचार पत्र तो अपने समाचार पत्र के प्रकाशन की संख्या बहुत ज्यादा बताकर बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित करके का षडयंत्र रचते हैं। छोड़े बड़े समाचार पत्रों का भेद बताकर लाखों रूपए कमाने का धंधा भी इस क्षेत्र में खूब फल फूल रहा है। विज्ञापन के रूप में चल रहे काले कारनामों पर अंकुश लगाना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि उनके साथ बड़े समाचार पत्र का सहयोग प्राप्त है। जब पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है तो फिर छोटे, मध्यम तथा बड़े का भेद क्यों किया जाता है।

सूची में नाम नहीं होने पर भी मिलता विज्ञापन : वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तलेकर ने बताया कि जब यह याचिका कोर्ट में प्रलंबित होने पर भी 18 फरवरी को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों नई मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे का भूमि पूजन और मैग्नेटिक महाराष्ट्र  यानि बदलते  महाराष्ट्र और समृद्धि परिवर्तन की कहानियों पर राज्य सरकार की ओर से करोड़ रुपए के विज्ञापन विशेष समाचार पत्रों में दिया गया था। विशेष रूप से जिस समाचार पत्र का नाम सरकार के विज्ञापन सूची में नहीं हैं, उन्हें भी फुल पेज विज्ञापन सरकार की ओर से दिया गया है। यह जानकारी एडिटर्स फोरम ने शॉर्ट एफेडेवीट सी.एच.एस.डब्ल्यू.एस.टी.122/2018 दाखिल करते हुए, इस मामले को बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने रखी गई है।

करोड़ों रुपए का विज्ञापन कैसे? : वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तलेकर के अनुसार विज्ञापन देने के दौरान मध्यम और छोटे अखबारों पर अन्याय हो रहा है। नियमों को ताक पर रखते हुए जिन विशेष अखबारों और जिनका नाम सरकारी विज्ञापन सूची में नहीं हैं, ऐसे समाचार पत्रों को करोडों रुपए के विज्ञापन कैसे दिया जाता है? साथ ही कहा है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की फुल पेज फोटो की जरूरत न होने के बावजूद  विज्ञापनों में फोटो लगाकर करोड़ों रुपए सरकार क्यों खर्च कर रही है? राजनीतिक पार्टियां सरकारी विज्ञापन के जरिए आगामी चुनाव प्रचार कर रही है, ऐसा सवाल भी बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने उपस्थित किया है। जिस पर न्यायाधीश केमकर और न्या.कर्णिक इस मामले को गंभीर बताते हुए। 17 विभागों को फौरन नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं।

सरकार विभागों के अधिकारी और नेताओं के मिली भगत के चलते अपने हित में समाचार प्रकाशित करवाने के लिए अखबारों को करोडों रुपए का विज्ञापन दिया जाता है। बहुत से समाचार पत्रों का सरकारी विज्ञापन सूची में नाम भी नहीं हैं, बावजूद इसके  मिली भगत के कारण लाखों रुपए के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। इसके चलते छोटे समाचार पत्रों से साथ अन्याय हो रहा हैं। सरकार के इस रवैए से ऐसा लग रहा है कि सरकार लोकतंत्र का गला घोट रही है।

-सतीश तलेकर, वरिष्ठ अधिवक्ता

नोटिस पाने वाले 17 विभागों के नाम : 1) मुख्य सचिव 2) सचिव सामान्य प्रशासन (मावज) 3) सचिव राजस्व व वन 4) सचिव ग्रामीण विकास 5) सचिव समाज कल्याण 6) बस्ट प्रशासन 7) सचिव शहरी विकास 8) महानिदेशक सूचना और जनसंपर्क 9) आयुक्त समाज कल्याण 10) सभी निदेशक, उप निदेशक, जिला सूचना अधिकारी, (सूचना और जनसंपर्क) 11) आयुक्त ( राजस्व ) 12) आयुक्त मुंबई मनपा 13) आयुक्त नागपुर मनपा 14) आयुक्त बिक्री कर विभाग 15) जिला सूचना अधिकारी वर्धा 16) प्रबंध निदेशक तथा उपाध्यक्ष सिडको 17) मुख्य कार्यकारी अधिकारी एमआईडीसी इन विभागों को नोटिस जारी करने के आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी है।

सरकार और राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप की वजह से विशेष समाचार पत्रों को विज्ञापन देने का काम किया जा रहा है। साथ ही नियमों का भी उल्लंघन करके लाखों रुपए के विज्ञापन अपने हितचिंतक समाचार पत्रों के दिए जा रहा हैं, जिससे लोकतंत्र खतरे में आ गया है। एडिटर्स फोरम ने कई बार राज्य सरकार और संबंधित विभागों को इस बारे में अवगत भी किया था, लेकिन सरकार ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, इसके चलते बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 विभागों को फौरन नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं।

-सतीश तलेकर, वरिष्ठ अधिवक्ता

लेखक Unmesh Gujarathi दबंग दुनिया, मुंबई संस्करण के स्थानीय संपादक हैं. उनसे संपर्क 9322755098 के जरिए किया जा सकता है.

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