वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम के पिता रामसागर सिंह का बेगुसराय में निधन

मां-पिता के साथ अजीत अंजुम, बीच में. ये तस्वीर कुछ रोज पहले की है जब अजीत अंजुम बेगुसराय गए हुए थे.

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम के पिता रामसागर सिंह का आज सुबह बिहार के बेगुसराय जिले के पिंक सिटी स्थित आवास पर देहांत हो गया.. उनकी उम्र करीब सत्तर साल की थी. वो जिला जज के पद से रिटायर थे. वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं.

चार बच्चों में अजीत अंजुम सबसे बड़े हैं. वे दो भाई और दो बहन हैं. अजीत अंजुम आज सुबह पिता के निधन की खबर मिलने के बाद बेगुसराय के लिए फ्लाईट से निकल चुके हैं.. अभी कुछ रोज पहले ही अजीत अंजुम बेगुसराय गए हुए थे जहां मां-पिता के साथ की तस्वीरें फेसबुक पर डाली थीं. किसी को तनिक अंदाजा न था कि पिताजी इतनी जल्दी देह छोड़ देंगे.

अजीत अंजुम को जानने वालों और प्रशंसकों ने पिताजी के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है.

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वेस्ट यूपी के प्रतिष्ठित और जुझारू पत्रकार जितेंद्र दीक्षित जी को विकास मिश्र ने यूं दी श्रद्धांजलि

अमर उजाला की मैं तारीफ करूंगा, दीक्षित जी की नौकरी पर कभी आंच नहीं आई… दीक्षित जी चले गए। उनके साथ हम लोगों का एक अभिभावक चला गया। जरूरी नहीं कि जितेंद्र दीक्षित को आप जानते हों। जितेंद्र दीक्षित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित पत्रकार थे, जुझारू शख्सियत थे, अमर उजाला, मेरठ से रिटायर होकर फिलहाल मुजफ्फरनगर में रह रहे थे। दीक्षित जी से मेरा परिचय जनवरी 2000 में हुआ था, जब मैंने अमर उजाला में काम करना शुरू किया था।

स्व. जितेंद्र दीक्षित

दीक्षित जी अमर उजाला मुजफ्फरनगर के ब्यूरो चीफ थे, मैं मुजफ्फरनगर डेस्क पर काम कर रहा था। खबरों पर बातचीत के दौरान ही आत्मीय से रिश्ते बन गए। उसी दौर में दीक्षित जी पर बीमारियों ने हमला कर दिया था। चलने फिरने में दिक्कत होने लगी थी, अमर उजाला ने उनका ट्रांसफर मेरठ कर दिया। दीक्षित जी जब मेरठ आए, तब मैं दैनिक जागरण जा चुका था और वहां सिटी इंचार्ज था। फोन पर बातचीत थी।

एक रोज शाम को उनका फोन आया। बोले-मुजफ्फरनगर के एक परिचित का बेटा एक्सीडेंट में मारा गया है, घर वाले चाहते हैं कि पोस्टमार्टम के बाद बॉडी आज ही मिल जाए। बिना डीएम के दखल के ये होगा नहीं। काम समाजसेवा से जु़ड़ा था। फौरन डीएम को फोन किया, एक्शन हुआ, काम समय से हो गया। इसके बाद से हमारे रिश्ते गहरे होते गए। उनके घर पर आना-जाना शुरू हो गया।

दीक्षित जी उम्र में हम लोगों से बड़े थे, लिहाजा आसपास के सारे पत्रकारों के घोषित गार्जियन हो गए। उस दौर में अमर उजाला और दैनिक जागरण में गलाकाट प्रतियोगिता थी, लेकिन दीक्षित जी का घर इन सभी बातों से ऊपर था। उनका घर हम लोगों के लिए किसी पुण्य भूमि से कम नहीं था। पत्नी को वो माताजी कहकर बुलाते थे। जब भी कोई आया, चाय की फरमाइश, देर रात तक उनके यहां मजलिस जमी रहती। दर्जन भर से ज्यादा परिवारों का एक बड़ा परिवार बन गया था, जिसके मुखिया थे दीक्षित जी।

दीक्षित जी बीमारी से जूझ रहे थे। शरीर लगातार उनका साथ छोड़ रहा था, लेकिन गजब का हौसला था उनका। वॉकर के सहारे रोजाना दफ्तर जाते, पूरे दिन काम करते, किसी भी स्वस्थ इंसान से ज्यादा काम करते। ग्रुप एडिटर शशि शेखर भी उनके मुरीद थे। उनके लेख और संपादकीय दीक्षित जी ही टाइप करते थे।

दीक्षित जी ने पत्रकारिता में जो इज्जत कमाई थी, जो रसूख था उनका, वो किसी का सपना हो सकता है। एक बार मेरठ में उनकी तबीयत बिगड़ी थी। मुजफ्फरनगर से तमाम लोग उन्हें देखने आए थे। इन्हीं लोगों में एक सरदार जी भी थे। दीक्षित जी से मिले, बोले-सर, आप मुझे पहचानते नहीं होंगे, लेकिन मैं आपका कायल हूं। मुजफ्फरनगर का कारोबारी हूं। मैं आपके लिए कुछ करना चाहता हूं। दीक्षित जी बोले-आप आ गए, यही काफी है। सरदार जी आमादा हो गए कि उनकी दोनों बेटियों के नाम बैंक में 4-4 लाख रुपये जमा करवाएंगे। दीक्षित जी ने साफ मना कर दिया। वही नहीं, तमाम लोगों ने समय-समय पर दीक्षित जी की मदद करनी चाही, लेकिन ताउम्र उन्होंने किसी की एक पैसे की भी मदद स्वीकार नहीं की।

दो बेटियां हैं दीक्षित जी की। बड़ी बेटी की शादी मुजफ्फरनगर से हुई थी। शादी में दीक्षित जी, कुर्सी लगाए अपने दर्द को दरकिनार करके मुस्कुरा रहे थे। हम सभी की पत्नियों से कहा-बहूरानियों, तुम्हें शोभा बढ़ाने के लिए बुलाया हूं तो शोभा बढ़ाओ। कुछ साल बाद छोटी बेटी की शादी ढूंढ रहे थे। हमारे ही एक साथी शेषमणि शुक्ल Sheshmani Shukla तब तक अविवाहित थे। मैंने बात चलाई। शेषमणि को दिल्ली बुलाया। पहले तो शेषमणि भड़के, बोले-मैंने इस निगाह से कभी देखा नहीं। मैंने पहले उन्हें समझाया, बाद में दीक्षित जी को। फिर मेरठ में पूरे धूमधाम से ये शादी हुई, हम सपरिवार उसके साक्षी बने।

मेरठ छूटा, लेकिन दीक्षित जी का साथ नहीं छूटा। जब तक वो मेरठ में रहे, हर होली उनके आशीर्वाद के साथ मनाई। जब भी मेरठ जाता, लौटते वक्त आखिरी पड़ाव दीक्षित जी के यहां होता। रात में वो गजब की खिचड़ी बनवाते, अचार के तेल के साथ परोसवाते। वो स्वाद अभी भी जीभ पर ताजा है।

गजब की कमेस्ट्री थी भाभी जी से उनकी। खुद चलने फिरने में दिक्कत थी तो भाभी जी को आंखों की समस्या थी। लेकिन ये दोनों लोग शारीरिक कष्टों को अपनी मानसिक ताकत से जीत लेते थे। दोनों हमेशा हंसते-मुस्कुराते मिलते थे। दीक्षित जी के चेहरे पर कभी किसी ने कष्ट नहीं देखा, माथे पर शिकन नहीं देखी। उनके घर पर पत्रकारों की जुटान होती थी। उनका घर, सबका घर था। बेडरूम से लेकर किचन तक सबकी एंट्री थी। घर में पहुंचे लोगों से कभी उनका मन नहीं भरता था, ऊबते नहीं थे। किसी के आते ऑर्डर चला जाता था-माताजी, देखिए तो कौन आया है, जरा चाय तो पिलवाइए। गजब के किस्सा गो थे दीक्षित जी। देर रात तक तमाम किस्से सुनाते।

अमर उजाला अखबार की मैं तारीफ करूंगा कि दीक्षित जी की नौकरी पर कभी आंच नहीं आई। हालांकि दीक्षित जी खुद इतने स्वाभिमानी थे कि बिना काम किए एक रुपया भी उनके लिए हराम था। बाकायदा वो वहां से रिटायर हुए। आदरणीय शंभूनाथ शुक्ल Shambhunath Shukla जी उनके आखिरी संपादक थे। उन्होंने उन्हें घर से काम करने की आजादी दे दी थी।

रिटायर होने के बाद दीक्षित जी ने मेरठ छोड़ दिया, मुजफ्फरनगर चले गए। शरीर उन्हें लगातार परेशान करता रहा, लेकिन उन्होंने शरीर को कभी बाधा नहीं बनने दिया। फेसबुक पर खूब सक्रिय रहते थे। बेहतरीन आकलन करते थे। फेसबुक के जरिए उनसे लगातार संपर्क बना रहा। हाल ही में उन्होंने अपनी एक वेबसाइट भी ‘असल बात’ के नाम से शुरू की थी। शारीरिक और मानसिक ताकत की इजाजत से वे ज्यादा मेहनत कर रहे थे। दिन रात एक कर दिया था। बुधवार को अचानक सेहत बिगड़ गई। अस्पताल में भर्ती हुए और गुरुवार को दीक्षित जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

मैंने आखिरी वक्त में दीक्षित जी को नहीं देखा। शायद देख भी नहीं पाता। असाध्य बीमारी उनके साथ लगी रही, बीमारी ने उनकी जिंदगी छीन ली, लेकिन उनकी मुस्कान कभी छीन नहीं पाई। कल ही उनके निधन का समाचार मिला था। झटका सा लग गया। दफ्तरी जिम्मेदारियों ने पैरों में बेड़ियां डाल रखी थीं। उनकी अंत्येष्टि में भी शामिल नहीं हो पाया। उनका जाना हम सभी के लिए बहुत तकलीफदेह है, लेकिन जब सोचता हूं कि जीवन के साथ लग गए दर्द से भी उन्हें मुक्ति मिली, तो उनके बिछड़ने का ये दर्द कुछ कम हो जाता है। दीक्षित जी का निधन उनके परिवार, उनके परिजनों के लिए बहुत बड़ा सदमा है। ईश्वर परिवार को ये दुख उठाने की ताकत दे। दीक्षित जी का क्या है, वो तो ईश्वर के पास भी मुस्कुराते हुए ही पहुंचे होंगे।

लेखक विकास मिश्र आजतक न्यूच चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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मुसलमानों के मामले में मीडिया ने अपने सिद्धांत और अक्ल, दोनों बेच खाए हैं!

उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनाव नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ। दस्तूर के मुताबिक सोशल मीडिया से यह वीडियो मेन-स्ट्रीम मीडिया के पास पहुंचा और पिछले कुछ वक्त से जो  हमेशा होता चला आ रहा है, वही हुआ। एक फर्जी वीडियो के सहारे एक विशेष तबके को देश विरोधी बताने की कोशिश हुई। हां, मैं वीडियो को फर्जी कह रहा हूं क्योंकि वह फर्जी ही है। वीडियो के ऑडियो और विजुअल लेवल में जो फर्क है उसे देख कोई बच्चा भी बता देगा कि वीडियो असली नहीं हो सकता। न्यूज पोर्टल Alt News ने तो इसकी पड़ताल भी की और वीडियो के फर्जी होने की तरफ इशारा भी किया। बाकी, फॉरेंसिक जांच में तो सच सामने आ ही जाएगा।

बहरहाल, मैं बात कर रहा था मेन-स्ट्रीम मीडिया की। यह पहली बार नहीं है जब मेन-स्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों, चाहे वह टीवी हो या डिजिटल, ने ऐसी गलती की है। एक गलती एक बार होती है, लेकिन एक ही गलती बार-बार क्यों हो रही है? कन्हैया कुमार का फर्जी वीडियो वाला मामला तो देशभर में मशहूर है। इसकी वजह से तो मीडिया की काफी लानत-मलानत हुई थी। आखिर मामला क्या है? मीडिया ने अक्ल बेच खाई है या सिद्धांत? किसके लिए काम कर रहे हैं ये?  इस वीडियो के मामले में दो लोग गिरफ्तार भी हो गए। अगर फॉरेंसिक जांच में वीडियो फर्जी निकला तब क्या होगा?

मेन-स्ट्रीम मीडिया का काम क्या है? यह उसके मालिक और मठाधीश अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से तय करते रहें। लेकिन सबसे खतरनाक बात है कि इस काम की आड़ में मीडिया के एक बुनियादी सिद्धांत की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बुनियादी सिद्धांत यानी सच!

ज़ी टीवी 2000 रुपये के नोट में  नैनो जीपीएस चिप लगे होने का दावा कर देता है! इंडिया न्यूज कन्हैया कुमार के फर्जी वीडियो चला देता है। इनके सूत्र क्या हैं? क्या ये सब असली गलतियां लगती हैं? क्या इसके पीछे कोई गलत मंशा नहीं? क्या ये सच में इतने मासूम हैं? हाल इतना बुरा है कि गलत खबर चलाने के बाद माफीनामा भी नहीं दिया जाता। मेन-स्ट्रीम मीडिया के ज्यादातर संस्थान किसके हित में काम कर रहे हैं? यह आप सब बखूबी जानते हैं।

इसी बीच फर्जीवाड़े की आड़ में एक और खतरनाक काम, वक्त-बेवक्त, जाने-अनजाने, मुसलमानों पर निशाना साधने का होता है। अररिया लोकसभा सीट से राजद उम्मीदवार सरफराज आलम की जीत पर “माननीय” गिरिराज सिंह कहते हैं कि अररिया अब आतंकवाद का गढ़ बन जाएगा। सिंह से पहले उपचुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के “प्रदेश अध्यक्ष”, ध्यान से पढ़िएगा- “प्रदेश अध्यक्ष” नित्यानंद राय ने सरफराज आलम के जीतने पर अररिया को ISI के लिए सुरक्षित स्थान बन जाने की बात कही थी। ऐसे बयान देकर यह कहना क्या चाहते हैं?

विवादित बयानों के माहौल के बीच एक वीडियो वायरल हो जाता है। टीवी के सामने बैठे दर्शक को परोसा जाता है कि अररिया के इस वीडियो में “पाकिस्तान जिंदाबाद” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगाए गए। वीडियो में नारे न तो ठीक से सुनाई ही देते हैं, न ही दिखाई देते हैं। इसके बावजूद आजतक और टाइम्स नाउ जैसे प्रमुख टीवी न्यूज चैनल इसका प्रसारण करते हैं। प्रसारण करने से पहले वे एक बार भी इसके सोर्स की पुष्टि करना जरूरी नहीं समझते। उन्हें वीडियो के ऑडियो-विजुअल लेवल्स में फर्क देखकर भी शक नहीं होता! ऐसे ही कासगंज का मामला पुराना नहीं है। यहां 26 जनवरी के मौके पर मुस्लिम बहुल इलाके में लोग तिरंगा फहरा रहे थे। बेवजह एक गुट तिरंगे के साथ भगवा झंडा लेकर पहुंच जाता है। फसाद होता है और एक नौजवान चंदन गुप्ता की मौत हो जाती है।

इस मामले की आजतक पर रोहित सरदाना इस तरह कवरेज करते हैं मानो मुस्लिम बहुल इलाके में तिरंगा नहीं, पाकिस्तान का झंडा फहराया जा रहा था। ऐसा करके वह एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय के लोगों के दिलों में कितनी नफरत भर रहे हैं, क्या इस बात का अंदाजा उन्हें नहीं है? ऐसे ही कई और मामले हैं जिनकी सूची बनने लगे तो शायद ही कभी खत्म हो पाए। मीडिया को यह हक नहीं कि वह एक कौम को जलील करता रहे। एक धर्म विशेष के लोगों पर बार-बार निशाना साधना गलत है। प्राथमिकताओं के लिए मीडिया को “एथिक्स” बेचने हैं तो बेचे, लेकिन मुसलमानों को देश का दुश्मन दिखाना बंद होना चाहिए।

नदीम अनवर
पत्रकार
nadeem.anwar7861@gmail.com

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‘अच्छे दिनों’ में जीने वाले युवाओं के दुख-दर्द को सामने ले आए पत्रकारिता के ये दो छात्र, देखें वीडियो

न्यूज 24 चैनल के मीडिया इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाले दो छात्रों ने बेरोजगार युवाओं के दर्द को बयान किया है. अमोला ने एंकरिंग संभाली और मयंक ने फील्ड में जाकर बेरोजगार युवाओं के दर्द को रिकार्ड किया. भड़ास इन छात्रों की कोशिश को मंच प्रदान कर रहा है ताकि इनके इस सरोकारी रिपोर्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके. मोदी सरकार ने हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी लेकिन हो रहा है उल्टा.

रोजगार के मौके घट रहे हैं. जो रोजगार है, उसे पाने में युवाओं की पूरी जवानी निकल जा रही है. रोजगार पाने की प्रक्रिया में उलझे युवा हताश और परेशान हैं. एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने नौकरी सीरिज के जरिए युवाओं के सामने की त्रासद स्थितियों को देश के सामने रखा.

अब पत्रकारिता के इन दो युवा छात्र-छात्राओं ने बेरोजगारी के दर्द और दंश को सामने लाकर रखा है. पत्रकारिता की छात्रा अमोला ने न्यूज 24 चैनल के मीडिया इंस्टीट्यूट वाले स्टूडियो को एंकरिंग के लिए इस्तेमाल किया जबकि पत्रकारिता के छात्र मयंक ने अपने मोबाइल फोन से फील्ड में जाकर युवाओं की दिक्कतों-दर्द को कवर किया.

कह सकते हैं, अगर कुछ करने का ज़िंद और जूनून हो तो संसाधन आड़े नहीं आते. इन दोनों छात्रों को बधाई… वो कहते हैं न, पूत के पांव पालने में दिखते हैं… उम्मीद करते हैं ये दोनों होनहार आगे चलकर टीवी पत्रकारिता की दशा-दिशा बदल कर इसे सरोकार से लैस कर पाने में समर्थ होंगे… वीडियो देख कर आप इन छात्रों के इस शुरुआती प्रयास को सराहें ताकि ये आगे चलकर ऐसी ही कुछ अन्य बड़ी खबरें कवर कर सकें… देखें वीडियो….

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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जवाब देने में देश के सबसे बड़े चोर बिल्डर अनिल शर्मा की जुबान लड़खड़ाई, देखें वीडियो

वर्षों से अपने बिल में छुपे रहे चोर बिल्डर अनिल शर्मा जब एक रोज जनता के सामने आया तो लुटे निवेशकों में से एक ने उसके मुंह पर पैसे लेने के बावजूद काम बंद करने का आरोप लगा दिया. इस महिला के आरोप सुनने के बाद जब अनिल शर्मा जवाब देने को तत्पर हुआ तो उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी.

ध्यान से ये वीडियो देखिए और आम्रपाली वाले इस सबसे बड़े चोर बिल्डर को शेम शेम कहिए.

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कार्पोरेट-परस्त आर्थिक नीतियों पर चुप्पी साधकर फासीवाद से नहीं लड़ा जा सकता

वाराणसीः ‘फासीवादी उभार और हमारे कार्यभार’ नामक विषय पर रविवार को भाकपा-माले की तरफ से वरुणा पुल, नेपाली कोठी स्थित प्रेरणा कला मंच में संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।  अखिल भारतीय किसान सभा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष जय प्रकाश नारायण ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि उदार आर्थिक नीतियों पर सत्तापक्ष और सत्ताधारी विपक्ष के बीच सर्वानुमति के चलते ही आरएसएस जैसे फासीवादी संगठन को उर्वर जमीन मिल रही है। इसके चलते वे भारत को खुलेआम हिंदू राष्ट्र बनाने का ऐलान करने लगे हैं।

आजादी के आंदोलन के दौरान भी एक तरफ धर्म-आधारित पाकिस्तान बन रहा था तब भी भारत लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ने का संकल्प ले रहा था। उन्होंने कहा कि आज समाज को पीछे ले जाने वाली ताकतें जिस तरह से मनमानी करने पर उतारू हैं उससे लोकतंत्र को बचाने का सवाल प्रमुख सवाल बन गया है। ऐसे में आज सामाजिक न्याय व वामपंथी ताकतों को एकता के अनगिनत रास्ते तलाशते हुए सामाजित-आर्थिक व राजनीतिक मुद्दों पर आगे बढ़ना चाहिए, परिस्थिति की यह मांग है।

अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा के नेता अमरनाथ राजभर ने कहा कि हिंदुत्ववाद की राजनीति करने वाली सवर्ण-सामंती ताकतों के निशाने पर सिर्फ मुसलमान ही नहीं दलित भी हैं, और खतरनाक तरीके से इनको इनको आपस में लड़ाने की भी कोशिश है। ऐसे में दलितो-मुसलमानों की एकता व उनके अधिकारों की लड़ाई आज संविधान व लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई के साथ गहरे जुड़ी हुई है। इसलिए इस मसले पर फासीवाद से लड़ने वाली ताकतों को गंभीरता से काम शुरू कर देना चाहिए।

युवा नेता फजर्लुरहमान ने कहा कि सत्ताधारी विपक्ष के इस रवैए का भी जनता के बीच पर्दाफाश किया जाना चाहिए कि वह भाजपा-आरएसएस के खिलाफ चुनावी समीकरण तो बनाते हैं पर दलितों-मुसलमानों पर सड़कों पर हमले होते हैं तो चुप्पी साथ लेते हैं।  इस मौके पर मुन्नी देवी, अमरनाथ राजभर, आबिद शेख, फजलुर्रहमान, श्याम बहादुर, साजिद, राहुल राजभर, बजले रहीम अंसारी, जुबैर अंसारी, अफसर अली, राजकुमार गुप्ता, अनिल मौर्या, अनिल सागर, कमलेश, श्रवण, महेंद्र, नंदलाल, देवीलाल, कामता प्रसाद मौजूद थे।

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एमपी में तीन सौ करोड़ का विज्ञापन घोटाला, सीएम के सचिव समेत कइयों के खिलाफ मुकदमा लिखने के आदेश

भोपाल से विनोद मिश्रा की रिपोर्ट

भोपाल : न्यायाधीश सतीश चंद्र मालवीय मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी भोपाल ने थाना प्रभारी आर्थिक अपराध भोपाल को 05 मार्च 2018 को विनय डेविड के द्वारा प्रस्तुत परिवाद में वर्णित तथ्यों की सम्यक रूप से अनुसंधान करके पूर्ण जाँच को 23 मार्च 2018 को न्यायालय में पेश करने के आदेश दिये। जनसम्पर्क विभाग में 300 करोड़ रुपयों का खुलेआम विज्ञापन घोटाला किया गया है।

जनसम्पर्क विभाग द्वारा एक ही परिवार के कई सदस्यों को करोड़ो रुपये देकर शासन को आर्थिक हानि पहुंचाने पर शिवराज सिंह मुख्यमंत्री के सेकेट्री एवं प्रमुख सचिव एस. के. मिश्रा, तात्कालिक जनसंपर्क आयुक्त अनुपम राजन, जनसंपर्क संचालक अनिल माथुर, अपर संचालक मंगला प्रसाद मिश्रा और पूर्व संचालक जनसम्पर्क लाजपत आहूजा के खिलाफ धारा 420, 467, 468, 120बी की एफआईआर दर्ज करने का परिवाद सीजेएम कोर्ट में एडवोकेट यावर खान ने विनय जी डेविड की ओर से पेश किया था. कोर्ट ने बयान के बाद लगातार पेशी चल रही थी. इसी मामले मे न्यायालय ने अनुसंधान करके पूर्ण जाँच को 23 मार्च 2018 को न्यायालय में पेश करने के आदेश दिये।

ज्ञात हो मध्यप्रदेश का जनसम्पर्क विभाग पत्रकारिता के नाम पर भाई-भतीजावाद, कमीशन आधारित विज्ञापनवाद, चहेतों को आर्थिक लाभ पहुंचाने तथा एक ही परिवार के कई सदस्यों को मीडिया अथवा पत्रकारिता के नाम पर विज्ञापन देने का कार्य कर रहा था।

पहले भी लोकायुक्त और आर्थिक अपराध इकाई ने कई प्रकरणों में जांच भी की परंतु इस मामले में कभी भी दोषियों को सजा नहीं हुई. इस मामले में आवाज उठाने पर बेखौफ निर्भीक एवं सजग स्वच्छ पत्रकारिता करने वालों को दबाने का प्रयास किया गया. कई पत्रकार संगठनों ने समय-समय पर आंदोलन भी किए. परंतु ऐसे संगठनों में फूट डालकर आंदोलनों को उनके रास्ते से दूर करने की कोशिश भी की जाती रही है.

भोपाल के पत्रकार विनय डेविड ने इस मामले में तथ्यों के साथ पूरे तीन सौ करोड़ रुपए के घोटाले के विरुद्ध सीजेएम भोपाल न्यायालय में एक इस्तगासा दायर किया था. एडवोकेट यावर खान तथा विनय डेविड के मुताबिक दायर इस्तगासे में प्रमुख सचिव एस. के. मिश्रा, तात्कालिक आयुक्त जनसम्पर्क अनुपम राजन के जनसंपर्क संचालक अनिल माथुर, अपर संचालक मंगला प्रसाद मिश्रा और पूर्व संचालक जनसम्पर्क लाजपत आहूजा के विरुद्ध 420, 467, 468, 120 बी की एफआईआर दर्ज करने के लिए निवेदन किया गया था.

सीजेएम भोपाल इस इस्तगासे में 02 मार्च 2016 को सभी के कथन लिए गये थे. अब इस मामले मे न्यायालय ने अनुसंधान करके पूर्ण जाँच को 23 मार्च 2018 को न्यायालय में पेश करने के आदेश दिये। न्यायलय के इस आदेश से पत्रकार जगत में खुशी की लहर है. 300 करोड़ के इस घोटाले में लिप्त सभी आरोपियो के खिलाफ जल्द कार्यवाही हो, ऐसी कामना सभी ने की है.

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राकेश मालवीय को एक्‍सीलेंस रिपोर्टिंग मीडि‍या अवार्ड

भोपाल। मध्यप्रदेश के पत्रकार और ब्लॉगर राकेश मालवीय की रिपोर्ट को वर्ष 2017 के लिए रीच मीडि‍या अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन रिपोर्टिंग ऑन टीबी  दिया गया है। नई दिल्ली के होटल ताज में रीच लिली मीडिया आर्गनाइजेशन की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में यह अवार्ड  दि‍या गया है।  टीबी के मुद्दे पर एनडीटीवी पर प्रकाशित ग्राउंड रिपोर्ट को देश भर से आई चालीस एंटीज में से चुना गया।

चयन समि‍ति में देश के वरि‍ष्‍ठ पत्रकार पी साईनाथ सहि‍त अन्‍य वरि‍ष्‍ठ पत्रकार शामि‍ल थे।  इसके तहत उन्हें तीस हजार रुपए व प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया है। राकेश मालवीय खबर एनडीटीवी डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं और मीडिया एडवोकेसी और शोध संस्था विकास संवाद के साथ जुड़कर जमीनी मुद्दों पर काम कर रहे हैं। मालवीय के साथ ही देश के अन्य पांच पत्रकारों को भी एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

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इंडिया न्यूज वाले प्रकाश तिवारी ने थामा सूर्या समाचार का दामन

रायपुर से खबर आ रही है कि इंडिया न्यूज के सीनियर correspondent प्रकाश तिवारी ने सूर्या समाचार का दामन थाम लिया है। काफी समय से इस बात की अटकलें तेज़ थी कि जल्द ही वह किसी राष्ट्रीय चैनल के state ब्यूरो बनेंगे। कयासों पर मुहर लग गई है।

प्रकाश तिवारी ने इंडिया न्यूज को बाय बाय कहकर प्रिया गोल्ड समूह के नए नेशनल चैनल सूर्या समाचार के लिए छत्तीसगढ़ की कमान संभाल ली है। प्रकाश तिवारी की पहचान छत्तीसगढ़ के तेज तर्रार पत्रकार के तौर पर की जाती है।

वह कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे है। उन्होंने राज्य सरकार के खिलाफ कई मामलों को उजागर करने वाली रिपोर्ट्स पर काम किया है।

धीरेन्द्र गिरि गोस्वामी
रायपुर

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इस बार अजय जोशी, संदीप गुसाईं, योगेश भट्ट को मिलेगा उमेश डोभाल स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार

पौड़ी (उत्तराखंड)। जुझारू पत्रकार, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता उमेश डोभाल की स्मृति में दिए जाने वाले युवा पत्रकारिता पुरस्कार इस बार अजय जोशी, संदीप गुसाईं, योगेश भट्ट को दिए जाएंगे। उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट की पौड़ी में आयोजित प्रेस वार्ता में इसकी जानकारी दी गयी।

ट्रस्ट के महासचिव ललित मोहन कोठियाल ने बताया कि प्रिंट मीडिया में हिंदुस्तान रुद्रपुर में कार्यरत अजय जोशी, इलै. मीडिया में देहरादून के संदीप गुसाईं और सोशल मीडिया में बेहतर पत्रकारिता के लिए देहरादून के ही योगेश भट्ट को पुरस्कार 25 मार्च को रानीखेत में आयोजित सम्मान समारोह में दिए जाएंगे। कोठियाल के मुताबिक राजेंद्र रावत राजू जनसरोकार सम्मान बृजेश चंद्र बिष्ट, गिरीश तिवारी गिर्दा जनकवि सम्मान महेश पुनेठा को दिया जाएगा। इसके अलावा प्रख्यात चित्रकार बी. मोहन नेगी को मरणोपरांत समारोह में सम्मानित किया जाएगा। प्रेस वार्ता में महासचिव त्रिभुवन उनियाल और ट्रस्टी रवि रावत भी थे।

मालूम हो कि 25 मार्च 1988 को पौड़ी में पत्रकार उमेश डोभाल की शराब माफिया ने हत्या कर दी थी। उनकी याद में जनसरोकारों से जुड़े पत्रकारों इत्यादि को सम्मानित/पुरस्कृत किया जाता है। इसके लिए हर वर्ष राज्य के किसी एक नगर में बड़ा समारोह आयोजित किया जाता है जिसमें कला, संस्कृति, समाजसेवा, पत्रकारिता, लेखन, चिकित्सा, शिक्षा इत्यादि से जुड़े जनसरोकारी लोग प्रतिभाग करते हैं। इस बार यह समारोह 25 मार्च को अल्मोड़ा जिले के जाने-माने शहर रानीखेत में होगा। 24 मार्च की संध्या को लोग जुटेंगे।

AP Bharati
Patrakar
Rudrapur
9897791822

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लाल सलाम के नारों के बीच मास्टर प्रताप सिंह को दी गई अंतिम विदाई

दिनेशपुर (ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड)। फैज अहमद फैज, गिरीश तिवारी गिर्दा इत्यादि के गीत गाते हुए लाल सलाम के नारों के साथ प्रताप सिंह को अंतिम विदाई दी गयी। जुझारू आंदोलनकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक और पत्रकार प्रताप सिंह (जिन्हें कोई दो दशक से मास्टर प्रताप सिंह के नाम से भी जाना जाता है।) का कैंसर की बीमारी के चलते 18 मार्च की सुबह निधन हो गया।

हिंदी मासिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के संपादक प्रताप सिंह आजीवन शोषितों, वंचितों, सत्य और न्याय के लिए लड़ते रहे। वे करीब एक साल से भी अधिक समय से कैंसर से पीड़ित थे। प्रताप सिंह 1980 के दशक में सरस्वती शिशु मंदिर में प्रधानाचार्य थे। बाद में उन्होंने अति पिछड़े क्षेत्र दिनेशपुर में काफी संघर्ष कर अपना विद्यालय समाजोत्थान विद्या मंदिर स्थापित किया। जनपक्षीय मुद्दों पर धारदार लेखन उन्होंने गदरपुर में शिशु मंदिर में प्रधानाचार्य रहते हुए ही प्रेरणा अंशु पत्रिका के माध्यम से प्रारंभ कर दिया था।

बाद में कुछ अपरिहार्य वजहों से उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र देकर निकटवर्ती कस्बे दिनेशपुर से जनता के पक्ष में संघर्ष शुरु किया। उनका पहला बड़ा संघर्ष इलाके के दबंग अमरीक सिंह के साथ हुआ जिसमें वे विजयी रहे। बाद में प्रताप सिंह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के जिला प्रभारी रहे। क्षेत्र और राज्य के मजदूर और जनआंदोलनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर सतत भागीदारी की। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के वे संस्थापक सदस्यों में रहे। मानवता की विजय में अटूट भरोसा रखने वाले मास्टर प्रताप सिंह उत्तराखंड के जन आंदोलनकारियों में प्रमुख स्थान रखते हैं। उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड सहित दिल्ली-एनसीआर में भी श्रमिक, जनांदोलनों में उन्होंने भागीदारी की। उन्होंने पत्रकारिता-लेखन के माध्यम से जनजागरूकता बढ़ाई।

उनके निधन का समाचार सुनते ही दूर-दराज से उनके चाहने वाले दिनेशपुर पहुंचे। परंपराओं को कुछ हद तक दरकिनार करते हुए उनकी बड़ी पुत्रवधु बबीता ने उनकी अर्थी को कंधा दिया। वहीं क्षेत्र की महिला सामाजिक कार्यकर्ता हीरा जंगपांगी ने भी कंधा दिया। शवयात्रा और श्मशान में दर्जनों महिलाएं भी मौजूद रहीं। उनकी शवयात्रा में मास्टर प्रताप सिंह अमर रहें, मास्टर प्रताप सिंह को लाल सलाम इत्यादि नारे लगाए जाते रहे। स्थानीय श्मशान में मुखाग्नि प्रताप सिंह के बड़े बेटे वीरेश ने दी। यहां वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता बहादुर सिंह जंगी, सूफी गायक सर्वजीत टम्टा और अन्य लोगों ने फैज अहमद फैज का गीत, ‘हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे’ और गिरीश तिवारी गिर्दा का कुमाऊंनी गीत ‘ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक, जैंता एक दिना तो आलो उ दिन यो दुनि में’ सहित कई अन्य जन गीत गाए।

अंतिम संस्कार में महेश गंगवार, संजय रावत, सलीम मलिक, मुनीश अग्रवाल, चंद्रशेखर जोशी, अजीत साहनी, नीलकांत, प्रीति गंगवार, प्रो, भूपेश कुमार सिंह, ललित सती, हेम पंत, डीएन भट्ट, सुनील पंत, अमर सिंह, विजय आर्या, भास्कर उप्रेती, जरनैल सिंह काली, नरेश कुमार, गोपाल गौतम, गोपाल भारती, राजेश नारंग, अमित नारंग, सरताज आलम, ऊषा टम्टा, प्रेरणा, विकास राय, भरत शाह, काजल राय, भोला शर्मा, ओमप्रकाश सहदेव, हिमांशु सरकार, बिशंभर मिगलानी, हर्षवर्धन वर्मा, मनिंद्र मंडल, गौतम सरकार, महेंद्र राणा, कुंदन कोरंगा, रीना कोरंगा, तारा रावत, गुरविंदर गिल, पलाश विश्वास, पद्दोलोचन विश्वास, राघवेंद्र गंगवार, डा. जीएल खुराना, वीरेंद्र हालदार, रवि सरकार, पीसी तिवारी, जसपाल डोगरा, प्रदीप मार्कुस, रेनू जोशी, पान सिंह, खीम सिंह, सुशील गाबा, परमपाल सुखीजा, दीप पाठक, अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ सहित अन्य सैकड़ों लोग, प्रताप सिंह के अनुज धर्मवीर, पुत्र रूपेश कुमार सिंह, अनुज कुमार सिंह अन्य परिजन और संबंधी शामिल हुए।

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चिटफंड घोटाला : ‘मैत्रेय’ कंपनी बनाकर वर्षा सत्पालकर ने अवैध रूप से करोड़ों रुपए जमा किया

निवेशकों को पैसे का इंतजार,  सरकार बनी तमाशबीन

दबंग दुनिया : उन्मेष गुजराथी

मुंबई : हजारों निवेशकों को सस्ते दर पर भूखंड देने के नाम पर ‘मैत्रेय’ के सर्वेसर्वा वर्षा मधुसुधन सत्पालकर ने अवैध रूप से करोड़ों रुपए की माया जमा किया। उसके खिलाफ ठाणे पुलिस ने लुक आउट नोटिस भी जारी किया, लेकिन वह आज भी फरार है। आरोप है कि सरकार, पुलिस और आरोपी के बीच सांठगांठ होने से उसको पकड़ना नामुमकिन हो रहा है।

सरकर पर संदेह व्यक्त : वर्षा सत्पालकर कंपनी की मैनेजिंग डाइरेक्टर है। वर्षा सहित कुल छह लोगो के खिलाफ मामला दर्ज है। ठाणे आर्थिक अपराध शाखा ने इस मामले में विजय तावरे और लक्ष्मीकांत नार्वेकर को गिरफ्तार किया था जिसके बाद दोनों ठाणे जेल में बंद हैं। पुलिस ने वर्षा को कोंकण परिसर के विभिन्न संभावित स्थानों पर खोजबीन की लेकिन कोई सुराग नहीं लगा है। आखिर गत वर्ष पुणे पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बावजूद जमानत क्यों दिया गया। इस को लेकर अब सरकर पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है।

न्यायलय के आदेश को किया दरकिनार : मैत्रेय कंपनी द्वारा किए गए ठगी के खिलाफ नाशिक में नागरिको ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद न्यायलय के सामने वर्षा सत्पालकर की तरफ से सभी निवेशको का पैसा वापस करने का एफिडेविट दिया गया था, लेकिन कंपनी की तरफ से निवेशको को दिया गया चेक बाउंस हो गया। इसके बाद वापस निवेशकों ने राज्य सरकार और पुलिस से शिकायत किया, लेकिन कोई हल नहीं निकला। निवेशक अभी भी पैसा वापस आने के इंतजार में हैं।

शुरू किया था मीडिया हाउस  : 13 लाख निवेशकों को करोड़ों रुपए का चूना लगाने वाला महेश मोतेवार आज जेल की हवा खा रहा है। उसने अपने काले धंधे को बढ़ने में और सरकारी अधिकारियों पर दबाव डालने के लिए मी मराठी, लाइव इंडिया नाम से मीडिया हाउस चलाए थे। इसके संपादकीय बोर्ड पर पूर्व सांसद भारत कुमार राउत, पत्रकार निखिल वागले, कुमार केतकर शामिल थे जो कि मोतेवार की काली करतूतों को बढ़ावा देते थे और सरकार दरबारी उसके लिए लाइजनिंग करते थे।

अनदेखा कर राज्यसभा भेज दिया : जैसे ही मोतीवार जेल गया उसके बाद से सभी उसके चमचे पत्रकार आज भी बेरोजगार घूम रहे है। कांग्रेस ने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दर किनार करते हुए काली करतूत वाले केतकर को उसके कुकर्म को अनदेखा कर राज्यसभा भेज दियो यदि लोकशाही प्रभावी होती तो तीनो कुख्यात पत्रकार आज मोतेवार के साथ जेल गए होते।

‘पद्मश्री’ की खैरात में शामिल : लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि जिंदगी भर संघ परिवार को गाली देकर निगेटिव पब्लिसिटी पाने वाले केतकर को बाजपेयी की भाजपा सरकार ने पद्मश्री की खैरात में शामिल किया था।  केतकर तो स्वार्थी थे उन्होंने पुरस्कार स्वीकार कर लिया, लेकिन कट्टर संघ कार्यकर्ता आज भी भाजपा की इसी नीती से नाराज है।

कुख्यात पत्रकारों को भी भेजे जेल : मोतेवार ने लाखों जरुरतमंद निवेशकों को करोड़ों का चूना लगाया है। इस मामले में महाराष्ट्र प्रोटेक्शन आॅफ डेपोसिटर्स एक्ट (एमपीआईडी) लागू करना चाहिए। इतना ही नही बल्कि लाखों निवेशको के मेहनत की कमाई को लूटकर मोतेवार ने तीनो कुख्यात पत्रकारों को काम पर रखा थो इसलिए उनके खाते से निवेशकों का लूटा हुआ पैसा जप्त किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता 120 (बी) के अनुसार साजिश रचने वाला और उसे सहयोग करने वाला भी उतना ही दोषी होता हैे। जिस तरह मोतेवार जेल की हवा खा रहा हैे ठीक उसी तरह इन तीनो कुख्यात पत्रकारों को भी जेल भेजना चाहिए। इसके साथ ही इनकी कथित अवैध संपत्ति की भी सीबीआई जांच होनी चाहिए।

पुलिस और विपक्षी दलों पर संदेह : महेश मोतेवार जैसे चिटफंड वाले आज जेल में है लेकिन उसकी पूर्ण संपत्ति अभी तक जप्त नही हुई है। लाखों निवेशक आज भी पैसा वापसी के इंतजार में है। सरकार, विरोधी दल, सरकारी अधिकारी सहित सेबी को भी सब कुछ चुपचाप तमाशा देखने का पैसा मिल रहा है। इसलिए निवेशको का आज भी पैसा वापस नही मिल सका है।

पेण बैंक घोटाला, नहीं मिला पैसा : रायगढ़ जिले की लाइफलाइन समझे जाने वाली पेण अर्बन बैंक में 23 सितंबर 2010 को 700 करोड़ का घोटाला हुआ था। इस घटना को करीब आठ साल बीत गए, लेकिन फिर भी सरकार और विपक्षी दल मौन धारण किए है। इस मामले को लेकर सरकार द्वारा कई बैठक भी की गई जिसमे कई दिखावे के निर्णय लिए गए लेकिन लोगों को फिर भी उनका पैसा वापस नहीं मिला।

आरोपी घूम रहे खुलेआम, सो रही सरकार : सत्पालकर का साथ देने वाले तांडेल, इंगले, शिंदे और उसका भाई यह सब आज भी खुलेआम घूम रहे है, लेकिन पुलिस और सरकार अनदेखी के कारण इन सभी के खिलाफ अभी तक कार्यवाई नही शुरू की गई है। आखिरकार कुम्भकर्णी नींद सो रही सरकार इन सब मामलों पर कब ध्यान देगी।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट दिलीप इनकर कहते हैं-  ”इसी तरह का एक चोर नीरव मोदी भी था जो कि सरकार की मदद से देश छोड़कर फरार हो गया। इसके बाद सरकार ने दिखावे की कार्रवाई करते हुए उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया, लेकिन देश की जनता ने जो मेहनत की कमाई चौकीदार के भरोसे सुरक्षित समझी थी वो तो वापस नहीं मिल सकी। महाराष्ट्र में सत्पालकर को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में बेल मिलने के बाद से फरार हो गई। इस तरह से कई ऐसे मामले है जिसमे सरकार और सरकारी लोगों की मिलीभगत से कई लोग देश की आर्थिक स्थिति को खराब करने में लगे हुए हैं, लेकिन सरकार सहित विपक्ष फिर भी चुप है, क्योंकि असली खलनायक तो आखिर वही हैं।”

लेखक उन्मेष गुजराथी दबंग दुनिया अखबार के मुंबई एडिशन के स्थानीय संपादक हैं. उनसे संपर्क unmeshgujarathi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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Senior sports journalist Don Monteiro no more

Dear Members,

Senior sports journalist and Press Club member for several years, Don Monteiro, passed away on Sunday morning after a brief illness. He was 56. He is survived by father, mother and two married sisters.

Mr Monteiro was in journalism for almost three decades with Free Press, Afternoon and other media groups. The final rites and burial of Don Monteiro will take place at 4 pm on today (Monday March 19) at Sewri cemetery. The Mumbai Press Club deeply condoles his death. May his soul rest in peace.

Regards,

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

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औरेया के पत्रकारों ने कायम की मिसाल, स्वर्गीय विनोद मिश्रा की पत्नी को 68 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी

औरैया : जिला प्रेस क्लब औरैया ने दैनिक हिंदुस्तान गाजीपुर के दिवंगत ब्यूरो चीफ विनोद मिश्रा जी की पत्नी और बच्चों की आर्थिक मदद कर मानवता के धर्म का निर्वहन किया। भड़ास 4 मीडिया द्वारा स्वर्गीय विनोद जी के परिजनों की आर्थिक तंगी की खबर पाते ही जिला प्रेस क्लब ने उनकी मदद की पहल शुरू की।

जिले भर के पत्रकारों ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद इस अभियान में अत्यंत उत्साह दिखाते हुए कुल 68 हजार 105 रुपये इकट्ठा कर 16 मार्च 2018 को जिलाधिकारी औरैया के माध्यम से उनकी पत्नी श्रीमती निधि मिश्रा जी के खाते में उक्त धनराशि भेज दी है। जिला प्रेस क्लब औरैया ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी औरैया श्रीकांत मिश्रा को सौंपकर शासन से 20 लाख रुपये की आर्थिक मदद की भी मांग की है।

सेवा में,
मा. मुख्यमंत्री महोदय,
उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ।

द्वारा- श्रीमान जिलाधिकारी महोदय,
जनपद- औरैया।

विषय- कैंसर से स्वर्गवासी हुए दैनिक हिंदुस्तान के गाजीपुर ब्यूरोचीफ विनोद मिश्र के परिवार की आर्थिक सहायता करने के संबंध में।

महोदय,

सादर निवेदन के साथ अवगत कराना है कि जनपद गाजीपुर के दैनिक हिंदुस्तान समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ विनोद मिश्रा का कैंसर से निधन हो चुका है। परिजनों ने सारी जमा पूंजी उनकी गंभीर बीमारी के इलाज में खर्च कर दी फिर भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी-बच्चों पर आफत का पहाड़ टूट पड़ा है। इन्हें अभी तक किसी किस्म की कोई मदद नहीं मिल पाई है। फिलहाल विनोद जी की पत्नी श्रीमती निधि मिश्रा अपने तीनों बच्चे के साथ कानपुर से गाजीपुर पहुंच गई हैं और किराए के मकान में रह रही हैं। इसकी एक बड़ी वजह बच्चों की पढ़ाई है। बच्चों का अभी परीक्षा वगैरह होना बाकी है। कलम के एक सिपाही की मौत के बाद उनकी पत्नी और तीन मासूम बच्चों के सामने अंधेरा छाया हुआ है। उनकी इस दशा को देखकर मानवता हमें झकझोरती है। हमारा आपसे निवेदन है कि आप श्री विनोद मिश्र जी की विधवा पत्नी श्रीमती निधि मिश्रा को अपना और अपने बच्चों का जीवन यापन करने के लिए उनकी योग्यतानुसार कोई सरकारी नौकरी देने के साथ साथ बच्चों की शिक्षा के लिए कम से कम 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता करने की कृपा करें।

जिला प्रेस क्लब औरैया के साथी पत्रकारों ने अपने सीमित संसाधनों से करीब अरसठ हजार रुपये जुटाकर श्रीमती निधि मिश्रा जी को भेज रहे हैं। हमें उम्मीद है कि पति की मौत के बाद संकटों से घिरी उनकी पत्नी और बच्चों की वेदना को समझते हुए आप सरकार की ओर से हमारी मांगों पर कृपापूर्ण निर्णय लेकर हम पत्रकारों को कृतार्थ करेंगे। महोदय, हम आपके आभारी रहेंगे।

सादर।

भवदीय
सुरेश मिश्र
(अध्यक्ष)

सुनील गुप्ता
(महामंत्री)

जिला प्रेस क्लब औरैया

सहायता राशि भेजने वाले पत्रकारों की सूची भी नीचे संलग्न है…

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ऐसे संपादकों से भगवान बचायें जो करवा रहे हैं ‘लाश की हत्या’

देश में क्राइम रिपोर्टिंग में 27 साल से जमे वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौहान की खोजी पत्रकारिता की एक और बानगी पेश करती हुई एक स्टोरी ‘पड़ताल’ कॉलम के तहत हिंदी बेवसाइट ‘First Post’ में प्रमुखता से प्रकाशित की गयी है. वेबसाइट के संपादक/उप-संपादक जी, जिन्होंने ‘पड़ताल’ के संपादन के लिए कलम उठाई, जाने-अनजाने ही हेडिंग बदलकर ‘पड़ताल’ की ऐसी-तैसी कर दी है.

संपादन करने वाले इस नौसिखिये या यूं कहें कि, किसी कथित संपादक जी ने अपनी काबिलियत बघारने के फेर में और अति-उत्साही संपादन के दौरान…हैडिंग दे डाला…”जब थाने पर लटके पुतले से खुला महिला की लावारिस लाश की हत्या का राज”…

अब जरा आप ही सोचिये अगर आप पत्रकारिता से जुड़े हैं कि, भला कहीं कभी आपने ‘लाश की हत्या’ या फिर ‘लाश की हत्या का राज’ भी खुलते देखा सुना है. हत्या तो जिंदा इंसान की ही हो सकती है. यह तो ‘फर्स्ट पोस्ट’ वेबसाइट के ही इन कथित संपादक जी की काबिलियत का कमाल हो सकता है, जिन्होंने ‘लाश की हत्या’ कराने का कमाल करके हिंदी पत्रकारिता में कम-अक्ली का नमूना पेश कर संपादन का एक मजाकिया इतिहास लिख डाला.

लावारिस लाश के बारे में तो लिखा-पढ़ा-देखा सुना जाता रहा है लेकिन ‘लाश की हत्या’ होने पर हंसी आ रही है. ऐसे घटिया संपादक जी और उनकी संपादन-क्षमता पर कोफ्त होना लाजिमी है.

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टोटल टीवी से एंकर हेड गीता शर्मा ने दिया इस्तीफा, अब यहां बनीं सीएओ

दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा केंद्रित न्यूज़ चैनल ‘टोटल टीवी’ से खबर है कि एंकर हेड गीता शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। गीता शर्मा एंकर हेड के साथ ही आउटपुट की अहम स्तंभ थीं। उनकी निगरानी में ही तमाम स्पेशल प्रोग्राम शेड्यूल किये जाते थे।

चाहे पॉलिटिक्स हो, क्राइम हो, या फिर एंटरटेनमेंट, सभी विषयों पर उनकी जबरदस्त पकड़ की वजह से उनको ये जिम्मेदारी दी गई थी। गीता शर्मा अपनी नई पारी की शुरुआत MS BROADCAST से कर रही हैं, जहां उन्हें चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर (CAO) की जिम्मेदारी दी गई है। टोटल टीवी में 22 मार्च उनका आखरी दिन होगा।

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संजीव शर्मा ‘हिमाचल अभी अभी’ परिवार से जुडे

हिमाचल की पहली मल्टी मीडिया कंपनी ‘हिमाचल अभी अभी’ से बडी खबर आ रही है. वरिष्ठ पत्रकार संजीव शर्मा ने बतौर पालिटिकल एडीटर ज्वाइन किया है। संजीव शर्मा ‘हिमाचल अभी अभी’ के लिए शिमला में कार्यरत होंगे।

इलेक्ट्रानिक मीडिया में करीब 22 साल का अनुभव रखने वाले संजीव की पत्रकारिता के हर क्षेत्र में अच्छी पकड़ मानी जाती है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर का अधिकतर समय शिमला में ही गुजारा है।

‘हिमाचल अभी अभी’ परिवार से जुडकर संजीव स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि वास्तव में ‘हिमाचल अभी अभी’ पहाड़ की पत्रकारिता में एक अनूठा प्रयास है। उन्होंने बताया कि वह सोमवार से अपनी नई पारी खेलना शुरू करेंगे।

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‘गांव कनेक्शन’ अखबार की दुकान बंद, बड़े पैमाने पर छंटनी

लखनऊ से प्रकाशित होने वाले गांव कनेक्शन अखबार से जुड़ी बड़ी खबर सामने आ रही है. इस अखबार ने अपना कामकाज समेटते हुए अपने यहां से बड़े पैमाने पर लोगों को निकाला है. पत्रकार, गीतकार और रेडियो पर कहानी सुनाकर लोकप्रिय हुए नीलेश मिश्रा ने छह साल पहले धूम-धड़ाके के साथ इस अखबार को शुरू किया था. तब यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी. सपा सरकार के सहयोग से यह अखबार खूब फूला-फला.

नीलेश मिसरा ने अखबार को अपना फैमिली बिजनेस बना दिया. इस अखबार के प्रधान संपादक के रूप में उन्होंने अपने पिता शिव बालक मिश्रा (जिनका पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था) को प्रधान संपादक बनाया. अपने चेचेर भाई मनीष मिश्रा को एसोसिएट एडीटर. रिश्तेदार अरविंद शुक्ला को डीएनई बनाया. इस अखबार के मैनेजमेंट का सर्वेसर्वा नीलेश मिसरा ने अपनी पत्नी यामिनी त्रिपाठी को बनाया.

सपा सरकार में इनका साम्राज्य फैला. कॉलेज से निकले नए लड़के-लड़कियों को बड़ा सा ख्वाब दिलाकर मामूली तन्खावहों ने नीलेश मिसरा ने गांव कनेक्शन में काम कराना शुरू किया. देश की कई सारी मल्टीनेशनल कंपनियों से भी इन्होंने ग्रामीण पत्रकारित के नाम पर फंड लिए. इसी बीच गांव फउंडेशन नाम से अपनी पत्नी यामिनी के नेतृत्व में एक एनजीओ भी खड़ा कर लिया. देखते ही देखते इनका गोमती नगर में करोड़ों का बंगला तैयार हो गया और गांव में खेती योग्य जमीने भी खरीद ली.

समय ने करवट बदला. एक साल पहले उत्तर प्रदेश से सपा सरकार की विदाई के बाद इनके बुरे दिन शुरू हो गए. एक महीने के अंदर इस इस अखबार से दर्जन भर से ज्यादा लोग निकाल दिए गए. अब गांव कनेक्शन डिजिटल को प्रमोट किया जा रहा है. बेरोजगार हुए लोग परेशान घूम रहे हैं.

‘गांव कनेक्शन’ से बेरोजगार हुए एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सुप्रिय प्रसाद मीडिया इंडस्ट्री के सर्वश्रेष्ठ बॉसेज में से एक हैं!

Yashwant Singh : संपादक को अपने व्यवहार और दिमाग से कैसा होना चाहिए… मैं जो समझ पाता हूं वो ये कि उसे नितांत डेमोक्रेटिक होना चाहिए. सबकी सुने…सबको मौका दे.. सरल-सहज रहे ताकि उससे कोई भी मिल जुल कह बता सके… नकारात्मकता न हो… कोई बुरा कहे तो जज्ब कर ले… कोई अच्छा करे तो उसे वाहवाही दे दे… आज के दौर के युवा संपादकों की बात करें तो कुछ ही हैं जो इस पैमाने पर खरे उतरते हैं… सुप्रिय प्रसाद को उनमें से एक मानता हूं…

सुप्रिय प्रसाद

सुप्रिय टीवी टुडे ग्रुप के सभी न्यूज चैनलों के मैनेजिंग एडिटर हैं…. जाहिर है, आजतक चैनल उनकी टाप प्रियारिटी में रहता है… सुप्रिय ने हिंदी टीवी पत्रकारिता के जनक एसपी सिंह के साथ लंबे समय तक काम किया.. आईआईएमसी से पढ़े सुप्रिय ने टेलीविजन की तकनीक और इसकी विशिष्टता को पकड़ा-समझा… और यूं कंटेंट-विजुवल के मास्टर बने…

वे सुबह आंख खुलने और रात सोने से पहले तक लगातार कई न्यूज चैनलों को मानीटर करते रहते हैं… चाहें वे घर रहें या आफिस… उनके इर्द गिर्द कई स्क्रीन पर कई हिंदी अंग्रेजी चैनल म्यूट मोड में लगातार चलते रहते हैं…

उन्हें ठीक ठीक पता रहता है कि कब क्या चलना चाहिए आजतक पर… हां, हम आप उनके प्रयोगों की आलोचना कर सकते हैं, वैचारिक आधार पर… लेकिन ये सच है कि उन्होंने आजतक न्यूज चैनल को कंटेंट से लेकर टीआरपी तक में हमेशा नंबर वन बनाए रखा…

ये भी सच है कि नंबर वन हो जाना बड़ी बात नहीं होती… नंबर वन हो जाने के बाद इस नंबर वन की कुर्सी पर बने रहना मुश्किल काम होता है… आजतक नबर वन न्यूज चैनल है और जमाने से नंबर वन है… इसकी काट तलाशने की बहुत कोशिश हुई लेकिन कोई कामयाब न हो पाया…

संपादकीय गुणवत्ता, दर्शनीयता, टीआरपी, देश और समाज के हितों के साथ कदम-ताल करते हुए फैसले लेने पड़ते हैं… बहुत कुछ होता है जिसके आधार पर खबर / विजुअल को लेकर फाइनल डिसीजन की ओर बढ़ना पड़ता है… लेकिन सुप्रिय उलझते नहीं… वे तुरंत फैसले करते हैं… टेलीविजन में देरी-सुस्ती चलती भी नहीं… सुप्रिय की टीवी की समझ और फैसले लेने की तेजी उन्हें सबसे अलग बनाती है.. यही वजह है कि सुप्रिय बरसों से आजतक के संपादक हैं… और, अब तो पूरे ग्रुप के सभी चैनलों के मैनेजिंग एडिटर हैं…

सुप्रिय के बारे में ये मेरा निजी आकलन है… जरूरी नहीं कि आपका नजरिया इससे मेल खाए… ये भी सच है कि मैंने उनके साथ कभी काम नहीं किया.. इसलिए आफिस के अंदर के उनके व्यवहार-रवैये के बारे में नहीं जानता… लेकिन उनके साथ काम कर चुके और करने वाले कई लोगों को अक्सर ये कहते सुना हूं- ”सुप्रिय मीडिया इंडस्ट्री के सर्वश्रेष्ठ बॉसेज में से एक हैं”.

सुप्रिय के खिलाफ, आजतक चैनल के खिलाफ और इस समूह के मालिकों के खिलाफ भड़ास पर कई दफे खबरें छपी…. लेकिन सुप्रिय ने कभी बुरा नहीं माना… वो जानते हैं कि भड़ास होने का क्या मतलब है.. उनका व्यवहार न बदला… मैं कई बार सोचता हूं कि उनकी जगह मैं खुद होता तो क्या ऐसा व्यवहार अगले के साथ कर पाता… मैंने दशक भर में कई संपादक देखे हैं जो अच्छा छपने पर तो खुश रहते हैं लेकिन जहां कोई एक खबर उनके या उनके संस्थान के खिलाफ छपी, एकदम से गदा लेकर हनुमान बन जाते हैं… गदर काटने पर तुल जाते रहे हैं… खैर, यह सब हमेशा होता है, जो खबर के कामकाज से ताल्लुक रखते हैं, उन्हें अच्छे से पता होता है…

सुप्रिय की चर्चा यहां यूं कर रहा था कि उनका एक इंटरव्यू मैंने वर्ष दो हजार दस में लिया था. तब वो इंटरव्यू मैंने लिखकर भड़ास पर प्रकाशित किया था. टेक्स्ट फारमेट में. उसी दरम्यान यूं ही, बातचीत के कुछ वीडियो क्लिप्स भी तैयार कर लिया था… कल एक हार्ड ड्राइव चेक करते हुए संयोग से वो वीडियो क्लिप्स मुझे मिल गए… अब जबकि मैं वीडियो एडिटिंग भी सीख रहा हूं तो फौरन उन वीडियो क्लिप्स को जोड़कर यूट्यूब पर अपलोड कर दिया… सुप्रिय को सुनिए… ये आठ साल पहले वाले सुप्रिय हैं… जब उनको मैंने ये वीडियो लिंक भेजा तो बोले- अब तो नया इंटरव्यू लेने का वक्त आ गया है… मैंने जवाब दिया- आपने मेरे मुंह की बात छीन ली…

सुप्रिय के पुराने वीडियो इंटरव्यू को देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=Kniys9qyXyQ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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स्टीवन हॉकिंग के बहाने ‘विकलांग’ बनाम ‘दिव्यांग’ पर ओम थानवी की चर्चा, जानिए सही क्या है….

Om Thanvi : स्टीवन हॉकिंग चले गए। आइंस्टाइन के बाद सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिक थे। उनके अंग विकल थे। लेकिन उन्हें मीडिया विकलांग नहीं, दिव्यांग कहेगा। क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री ने यह शब्द दिया है। क्या प्रधानमंत्री भाषाविज्ञानी हैं? बिलकुल नहीं। न वे मीडिया के भाषा सलाहकार हैं। फिर भी जैसे सरकार में उनका हुक्म चलता है (जो स्वाभाविक है), वैसे ही आजकल मीडिया में भी चल जाता है (जो नितांत अस्वाभाविक है)।

विकलांग कहीं से आपत्तिजनक शब्द नहीं है। अंगरेज़ी का डिसेबल (अक्षम या ग़ैर-क़ाबिल) ज़रूर ग़लत रहा होगा। पर वह अंगरेज़ी की समस्या थी, हिंदी की नहीं। जिसके अंग या अंगों में विकार हो, उसे हिंदी में अक्षम कभी नहीं कहा या समझा गया। लेकिन अंगरेज़ी वालों ने disable की जगह differently/specially able/challenged आदि कर अपनी भूल क्या सुधारी, अंगरेज़ीदाँ नौकरशाहों ने हिंदी में भी ‘विकलांग’ प्रयोग को बदलने की क़वायद कर डाली। फिर मोदीजी ने भी वही कोशिश की।

दिव्यांग प्रयोग किसी विकलांग व्यक्ति का मज़ाक़ उड़ाने से कम नहीं है। दिव्यता का दर्शन और दिव्य-पुरुष, दिव्य-चक्षु, दिव्य-दृष्टि या दिव्य-मूर्ति जैसे प्रयोग एक धर्मसंस्कृति का बोध देते हैं। जबकि विकलांगता का किसी धर्म या समुदाय से कोई लेना-देना नहीं है।फिर उन्हें उन लोगों पर क्यों थोपा जाय, जो अपनी आंगिक चुनौतियों के बावजूद संघर्षरत हैं, सक्रिय हैं?

दिव्यांग कहकर उन्हें सहानुभूति का पात्र बनाया जाता है। जैसे उनमें बेचारगी हो जिसे नाम-परिवर्तन से दूर कर दिया जाएगा। एक अर्थ में यह उस समुदाय का मज़ाक़ उड़ाना भी है। जैसे ग़रीब को सहानुभूति (!) में सम्पन्न लोग करोड़ीमल या अम्बानी कहने लगें! यह हक़ उन्हें न भाषाशास्त्र देता है, न राजनीति, न शासन। इसलिए न कहें कि हॉकिंग दिव्यांग थे। उनके अंग-प्रत्यंग विकल ज़रूर थे, इसके बावजूद उन्होंने अपने तप और ज्ञान से उन लोगों के दिमाग़ के जाले साफ़ किए जो संसार की वास्तविकता को कभी सही परिप्रेक्ष्य में समझ ही नहीं पाए।

वरिष्ठ पत्रकार और राजस्थान पत्रिका के संपादकीय सलाहकार ओम थानवी की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Devendra Surjan पूरे चार साल लगा दिए आपने विकलांग दिव्यांग का भेद करने में . काश कि यह भेद तभी सामने आ जाता जब एक चाय वाले ने अपनी हैसियत का फायदा उठाते अर्थ का अनर्थ कर डाला था . भला हो स्टीवन हॉकिंग का जिनके दिवंगत होने से आप इन दो शब्दों का सही सही भावार्थ व्यक्त कर पाये . इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक समय में विकलांग शब्द के शब्दशः जीवंत उदाहरण स्टीवन हॉकिंग ही थे.

Ravishanker Acharya क्षमा चाहुंगा सर, आपके तथ्य पूर्णतः उचित ही है, परन्तु मैंने अनेक विकलांगों को अद्भुत और असाधारण विशेष योग्यताओं के साथ देखा है।साधारण मनुष्य चाहकर भी वो योग्यता हासिल नहीं कर पाता।ऐसे व्यक्तित्व वाले लोगों के लिए दिव्यांग शब्द भी उचित ही लगता है। दिव्य अगर विशेष धर्म का बोध कराता लगता है तो divine को कैसे महसूस करे।

Anurag Dubey असाधारण योग्यता होने का शारीरिक विकलांगता होने अथवा न होने से कोई समवाय संबंध नहीं है। मायने ये कि प्रत्येक विकलाँग के पास असाधारण योग्यता हो यह ज़रूरी नहीं। हाँ लेकिन प्रत्येक विकलाँग के पास एक अंग विशेष (जो विकल हो) का होना अवश्य ही ज़रूरी है और जब आप दिव्यांग कह रहे होते हैं तो असल में आप उस अंग विशेष को दिव्य अंग की उपमा देकर खिल्ली उड़ाने का काम कर रहे होते हैं। यह सब ठीक वैसा ही हो रहा है जैसे अतिरिक्त अंग वाले नंदी को बैलगाड़ी टैंपो में सजाधजाकर पुजवाते हुए धन इकट्ठा किया जाता है!

Musafir Baitha जिस विकलांग हिन्दू धार्मिक मानसिक समझ का नमूना ‘दिव्यांग’ है उसी का उदाहरण गांधी का ‘हरिजन’ भी है।

Om Thanvi कालखंड में देखना होगा। गांधी और मोदी में ईमानदार सरोकार का फ़ासला एक सदी का है।

Musafir Baitha शब्द को समझने की तमीज़ दोनों की एक ही है सर, बाकी गांधी और मोदी में कोई तुलना नहीं।

Mukesh Kumar जाने-अनजाने में गांधी जी ने कभी अछूतों को हरिजन कहकर भी यही ग़लती की थी।

Om Thanvi नीयत ठीक थी, इसलिए अपने दौर में चल गया था। जिन संबोधनों के काट के लिए इसे सोचा होगा, वे समुदाय को गाली की तरह प्रयोग होते थे।

Bhagwan Singh अंधे को प्रज्ञाचक्षु या सूरचक्षु (सूर/सूरा/ सूरदास) कहने के पीछे जो भाव था वह एक विकलांगता तक सिमट कर रह गया. व्यापक आशय वाले एक शब्द की जरूरत थी. नया है इसलिए खटकता मुझे भी है पर प्रयोग अच्छा है.

Om Thanvi पहले सूरदास का प्रयोग भी अनुकंपा में गढ़ा गया होगा जो मज़ाक़-सा साबित हुआ। ग़नीमत है किसी प्रधानमंत्री ने उसकी अनुशंसा नहीं की, वरना सरकारी कामकाज में जैसे दिव्यांगों लिखा जाता है, वैसे ही बाबू लोग ‘सूरदासों के लिए योजना’ लिखते और वंचित समुदाय का मज़ाक़ बनाते।

Urmilesh Urmil दिव्यांग शब्द सर्वथा अनुपयुक्त है! मैं इसका कभी प्रयोग नहीं करता।

Mohan Lal Mishra पूर्णतः सहमत. दिव्यांग कहना एक प्रकार से चिढ़ाना ही होता है विकलांग को.  एक तो बेचारा विकलांग होता है विशेष अंग कमजोर होता है ऊपर से उन अंगों को दिव्य कहना. ये दिव्यांग शब्द मतिहीन मोदीजी का दिया हुआ है.

Ramprakash Kushwaha अनन्यांग या अन्यांग कैसा रहेगा !

Om Thanvi ‘प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो’ …

Anurag Dubey नौकर होने के चलते मैं चाहकर भी इस पोस्ट को शेयर नहीं कर पा रहा हूँ… इससे बड़ी भी विकलांगता कोई होगी भला!

Narendra Tomar विकलांग को दिव्यांग कह कर असल मैं उसे भगवान जैसी चीज से जोड़ा जाता है जिसका अर्थ है की उसे ऐसा उपरवाले ने बनाया है उसके ‘पापों’ की सजा देने के लिए.

Jai Singh Lochab ईश्वर को भी हॉकिंग ने यह कहकर नकार दिया था कि यह यह ब्रह्माण्ड किसी अद्रश्य शक्ति के कारण नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण हुआ जिसे “big bang” ( a blast) हुआ ब्लेक होल में और ये धरती और लाखों गृह बने!

Mohan Lodwal Kunjela थानवी जी, स्टीफन हॉकिंग या स्टीवन हॉकिंग (Stephen Hawking), कृपया सही शब्द उच्चारण का उल्लेख करें।

Mahendra Kumar Misra Stephen का सही उच्चारण स्टीवेन ही है। स्टीवेन या स्टीवन दोनों ही प्रचलित हैं।

Mohan Lodwal Kunjela हमारा शक इसलिए गहरा गया है कि आज सभी राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में ‘स्टीफन’ ही लिखा है।

Mahendra Kumar Misra हिन्दीभाषी स्टीफन या स्टीफेन ही बोलते और लिखते हैं अधिकतर। उसमें कुछ बुराई नहीं है।

Adarsh Prakash बहुत महत्वपूर्ण चिंतन थानवी जी। राजनीति के बहाव में बह रहा है मीडिया, वह भी वर्तमान सत्ता के। मुझे तो हँसी आती है जब इन राजनेताओं को चित्र प्रदर्शनी या साहित्यिक समारोहों में बुलाकर हम गौर्वान्वित महसूस करते हैं जिन्हें इन विषयों का क ख ग तक नहीं मालूम। लेकिन विचार प्रकट करने से यह चूकते नहीं, मानों विश्व का सारा ज्ञान इन्हीं के भेजे में आ सिमटा है। फिर मोदी जी तो मोदी जी ठहरे।

Khursheed Ansari सच मे सर कल जावेद आबिदी और स्टीफ़ेन हाकिंग से जुड़ी हुई कुछ यादों को लिखने की कोशिश कर रहा था और एक अनजान से भय विकलांग लिखने और न लिखने के बीच मुझे परेशान कर गया कि कहीं विकलांग लिख देना क्या किसी कानूनी दांव पेंच में तो नही फंसा देगा और या कि मीडिया बहादुर…

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सफल पत्रकार बनने के लिए बहुआयामी होना जरूरी : ब्रजेश कुमार सिंह

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, नोएडा परिसर में आयोजित “प्रतिभा उत्सव 2018” के उदघाटन सत्र में पत्रकारिता के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए “जी हिंदुस्तान’ के संपादक श्री ब्रजेश सिंह ने कहा कि पत्रकारिता के छात्रों को अपने व्यक्तित्व विकास के लिए बहुआयामी होना चाहिए, जबकि आजकल गूगल हिंदी टाइपिंग वाले छात्र ज्यादा आ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश-विदेश में हो रही हर घटना से रूबरू होना चाहिए।

श्री ब्रजेश ने कहा कि जो ज्ञान किताबों से मिलेगा वो गूगल पर नहीं मिल सकता अध्ययन का अभ्यास अभीसे करें साथ ही अखबार पूरा और एक से अधिक पढ़े साथ ही अपनी अभिरुचि में दक्ष बने फिर सफलता दूर नहीं।

राष्ट्रहित की पत्रकारिता सर्वोपरी – सईद अंसारी

उक्त आयोजन में आजतक के वरिष्ठ एंकर श्री सईद अंसारी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि बिना मिशन की पत्रकारिता करना समाज हित में नहीं उन्होंने कहा कि पत्रकार को किसी दुर्भावना के साथ पत्रकारिता नहीं बल्कि देशहित में करनी चाहिए। एक पत्रकार को समाज से जुड़ी हर छोटी बड़ी खबर की जानकारी रखनी चाहिए| श्री अंसारी ने छात्रों को बताया कि सफल पत्रकार बनने के लिए हर क्षेत्र में पारंगत होना आवश्यक है, इसीलिए हमें खुद को स्वस्थ रखने के लिए प्रतिभा में हो रहे खेल-कूद एवं सांस्कृतिक तथा बौद्धिक प्रतियोगिताओं में बढ़चढ़ कर  हिस्सा लेना चाहिए।

उदघाटन सत्र में रंगोली, कार्टून एवं फोटोग्राफी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें छात्रों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। आने वाले पांच दिनों में इस प्रतिभा उत्सव में अलग-अलग प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा जिसमें छात्र अपनी कला का हुनर दिखाएंगे। इस अवसर पर प्रो.बीएस निगम, श्रीमती रजनी नागपाल, श्री सूर्यप्रकाश, श्रीमती मीता उज्जैन, श्री लालबहादुर ओझा, डॉ.सौरभ मालवीय, श्री राकेश योगी उपस्थित रहे।

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इंडिया टीवी की बल्ले-बल्ले, अंबानी के चैनल के अच्छे दिन आए, एबीपी न्यूज भयंकर लुढ़का, आजतक को तगड़ा झटका

अंबानी जी का न्यूज चैनल हो और उसके अच्छे दिन न आएं, वो भी योगी राज में, हो ही नहीं सकता. अंबानी का चैनल News18 India टीआरपी में कुल 5.2 की उछाल के साथ नंबर तीन पर आ गया है. इंडिया टीवी भी अच्छी खासी टीआरपी गेन करके नंबर दो पर पहुंच गया है.

सबसे ज्यादा नुकसान एबीपी न्यूज का हुआ है जो भयंकर रूप से गोता लगाते हुए चौथे नंबर पर टिकने को मजबूर हुआ है. आजतक की टीआरपी भी अच्छी खासी गिरी है, बावजूद इसके वह नंबर वन पर बना हुआ है. इंडिया न्यूज और न्यूज नेशन की टीआरपी में भी अच्छी खासी वृद्धि हुई है. 

देखें आंकड़े….

Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:CS15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 10

Aaj Tak 16.5 dn 4.7
India TV 13.8 up 3.1
News18 India 12.9 up 5.2
ABP News 12.3 dn 8.7
Zee News 11.8 dn 0.6
News Nation 10.5 up 1.1
India News 8.9 up 3.2
News 24 6.8 up 0.7
Tez 2.8 same 
NDTV India 1.9 up 0.1
DD News 1.8 up 0.6

TG: CSAB Male 22+
Aaj Tak 16.3 dn 4.6
India TV 14.3 up 2.6
News18 India 14.2 up 4.8
Zee News 13.5 up 0.5
ABP News 11.0 dn 6.9
News Nation 9.1 up 0.7
India News 8.0 up 2.2
News 24 6.6 up 0.6
Tez 3.1 dn 0.2
NDTV India 2.5 up 0.1
DD News 1.3 up 0.3

इसके पहले वाले हफ्ते का हाल जानें…

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अमर उजाला बरेली में है कुछ गड़बड़झाला, तीन महीने में छह इस्तीफे, तीन का तबादला, एक बर्खास्त

वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय श्री वीरेन डंगवाल की कर्मभूमि रहे अमर उजाला बरेली में कुछ तो लोचा है। अलीगढ़, गाजियाबाद के बाद मुरादाबाद होते हुए बरेली आए संपादक विनीत सक्सेना के आने के बाद यहां अजीब सा माहौल है। दरअसल विनीत बरेली के ही रहने वाले हैं। वो यहां पहले दैनिक जागरण में क्राइम देखते थे। उसके बाद वो अमर उजाला में आए तो पवन सक्सेना पर कुर्सी उठाने के कारण काफी दिन साइड लाइन रहे।  डाक में तैनाती के दौरान उनका विवाद डाक प्रभारी लक्ष्मण सिंह भंडारी से भी हुआ था।

अब जब से वो बरेली आए हैं हर कोई उनके व्यवहार को लेकर सहमा हुआ है।  15 साल से अधिक समय से बरेली में तैनात सीनियर सब एडिटर डा. पवन चंद्रा तो विनीत के व्यहार से सहम कर वीकली मीटिंग में ही रो पड़े थे।  वहीं गौरव मिश्रा इतने सदमें में चले गए कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। विनीत के व्यवहार से नाराज होकर तीन महीने में राजीव शर्मा, संदीप मिश्रा, अमलेंदु त्रिपाठी, गौरव मिश्रा, सर्वेश कुमार, गजेंद्र सिंह जहां अमर उजाला से इस्तीफा दे चुके हैं वहीं डीएनई नीति्श मिश्रा ने अपना तबादला इलहाबाद करा लिया। मोहसिन पाशा गाजियाबाद तो मोहम्मद सिद्दीकी मुरादाबाद चले गए।

लक्ष्मण सिंह भंडारी से खुन्नस निकालने को विनीत ने उनकी बेटी रश्मि भंडारी को बर्खास्त ही कर दिया जबकि उसके काम से पुराने संपादक दिनेश जुआल और डेस्क इंचार्ज संतुष्ट थे। वीकली मीटिंग में गाली बकने और धमकाने वाले यह शायद अमर उजाला के अकेले संपादक होंगे। इतना ही नहीं विनीत ने छुट्टी लेकर उमरा करने गई सब एडीटर सबा जैदी का एक माह का वेतन भी रोक दिया। हालात यह हैं कि बरेली अमर उजाला में दो ही लोगों की खबरें छपती हैं। पहले ही विनीत के सजातीय होम्योपैथिक डाक्टर विकास वर्मा और दूसरे हैं 35 मुकदमें वाले हिस्ट्रीशीटर भाजपा विधायक पप्पू भरतौल। भाजपा में ही नहीं जिले में जो भी पप्पू भरतौल का विरोध करता है, अमर उजाला उसे टारगेट करके खबरें छापने लगता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दैनिक भास्कर भागलपुर से फिर कई गए, नहीं मिल रहे भास्कर को रिपोर्टर

दैनिक भास्कर भागलपुर संस्करण से रिपोर्टरों का जाना लगा हुआ है। सैटेलाइट एडिशन में 18 लोगों की टीम में महज 8 लोग ही बचे हुए हैं। इससे अखबार को समय पर निकालना और क्वालिटी मेंटेन करना दोनों मुश्किल हो गया है। अब ऋतुराज , पंकज और राधे कृष्णा ने भास्कर को छोड़ दिया है। इससे भास्कर में डेस्क पर लोगों की संख्या बहुत कम हो गई है।

अधिकांश लोग सैटेलाइट एडिटर सुनील शुक्ला के व्यवहार से परेशान होकर गए हैं। एक तो उनका अमर्यादित व्यवहार और दूसरा सैलरी में अपने मर्जी से सब के साथ दो-दो तीन-तीन हजार की कमी किए जाने से नाराजगी चरम पर है।  वैकल्पिक व्यवस्था के तहत सैटेलाइट एडिटर ने ब्यूरो से दो दो लोगों को बुलाकर डेस्क पर बिठाया है ताकि किसी तरह से एडिशन निकल सके।

उधर सैटेलाइट एडिटर को बिहार में डेस्क कर्मी या रिपोर्टर नहीं मिल रहे हैं। वह वैकल्पिक व्यवस्था के तहत मध्य प्रदेश,  उत्तर प्रदेश और दूर-दूर जगह से डेस्क पर लोग रख रहे हैं लेकिन वह भी सफल नहीं हो पा रहा है। इधर ऐसी सूचना है कि दो-तीन दिन में भास्कर से कम से कम और तीन लोग छोड़कर दूसरे संस्थान जा सकते हैं।  भास्कर में अंदरूनी राजनीति अपने चरम पर है।

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भाजपा का ये विधायक तो महिलाओं को खुलेआम पीटता है, देखें तस्वीरें

मीडिया ने ढंग से नंगा कर दिया रुद्रपुर भाजपा विधायक ठुकराल को… रुद्रपुर। उत्तराखंड में रुद्रपुर के भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल ने दलितों के साथ मार-पीट और अभद्र भाषा का प्रयोग किया है। इसकी जानकारी सोशल, प्रिंट और इलैक्ट्राॅनिक मीडिया में सार्वजनिक हो गयी है। यह पहली बार है जब विधायक की गुंडई व्यापक रूप से आम हुई है। 11 मार्च के अमर उजाला और दैनिक जागरण ने इसे मुख्य पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

इससे पहले रुद्रपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक न्यूज प्रिंट ही इस प्रकरण की खबर प्रकाशित करने का साहस कर पाया। अन्य सांध्य दैनिक खबर पचा गये। हालांकि व्हाट्सअप पर घटना का वीडियो खूब वायरल हुआ और कुछ समाचार वेबसाइटों ने भी प्रकरण की खबर प्रकाशित की। 11 मार्च के हिंदुस्तान ने भी अंदर के पृष्ठ पर औपचारिकता पूरी करने के लिए थाने में पीड़ित द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर छोटी सी खबर छापी है। आमतौर पर ठुकराल की बदतमीजियों की खबर मीडिया प्रकाशित नहीं करता। अमर उजाला ने अभी पत्रकारिता का शानदार उदाहरण पेश करते हुए ठुकराल की कुछ पुरानी बदतमीजियों का भी संक्षिप्त जिक्र किया है। यहां पेश है दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अंश —-

पीड़ित पक्ष ने इस मामले में विधायक के खिलाफ तहरीर दे दी है। मामला ट्रांजिट कैंप के शिवनगर से जुड़ा है। यहां रहने वाले एक व्यक्ति की 15 वर्षीय पुत्री बीते दिनों इंदिरा कालोनी के रामकिशोर उर्फ श्याम के नाबालिग पुत्र के साथ फरार हो गई थी। इस मामले में लड़की के परिवार वालों ने पुलिस को तहरीर भी दी थी, साथ ही किशोर के पिता, मां और बहनों पर भी उसका साथ देने का आरोप लगाया था। पुलिस ने इन सभी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया था। दोनों की तलाश भी शुरू कर दी गई थी। किशोर के पिता रामकिशोर उर्फ श्याम ने जैसे-तैसे दोनों को शुक्रवार दोपहर घर बुला लिया था। इसके बाद वे पंचायत के लिए विधायक राजकुमार ठुकराल के घर चले गए। वहां सहमति न होने पर दोनों पक्षों के बीच विवाद हो गया।

रामकिशोर का आरोप है कि पंचायत में ठुकराल समेत भाजपा के कुछ नेताओं ने उनके नाबालिग पुत्र से मारपीट की। जब बीच-बचाव को उनकी पत्नी माला देवी, सोनम और आरती गईं तो उनसे भी ठुकराल ने गाली-गलौज कर मारपीट की। इससे उसकी पत्नी और पुत्रियां घायल हो गईं। साथ में आए रिश्तेदारों से भी मारपीट की गई। इसके बाद वह उनके नाबालिग पुत्र को वाहन में बैठाकर ट्रांजिट कैंप थाना ले गए। शनिवार को पुलिस ने किशोरी का मेडिकल कराकर परिजनों के सुपुर्द कर दिया जबकि किशोर को बाल सुधार गृह भेज दिया था।

शनिवार को विधायक राजकुमार ठुकराल की किशोर के बहनों और परिजनों से मारपीट का वीडियो रुद्रपुर में वायरल हो गया। वीडियो वायरल होते ही शहर में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। विपक्षी दल सक्रिय हो गए और फोन घनघनाने लगे। सूत्रों की मानें तो मामला मुख्यमंत्री तक पहुंच चुका है और उन्होंने पूरे मामले ही एसएसपी यूएसनगर डॉ. सदानंद दाते से रिपोर्ट मांगी है। मामला सोशल मीडिया के जरिये उन तक पहुंचा है। पीड़ित पक्ष की ओर से मिली तहरीर पर पुलिस जांच करेगी और उसके बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

सूत्रों की मानें तो मामला मुख्यमंत्री तक पहुंच चुका है और उन्होंने पूरे मामले ही एसएसपी यूएसनगर डॉ. सदानंद दाते से रिपोर्ट मांगी है। वीडियो में ठुकराल हाथापाई करते नजर आ रहे हैं। इसके अलावा इस संबंध में पीड़ित पक्ष की ओर से पुलिस को तहरीर भी सौंपी गयी है। इसके बावजूद भाजपा जिलाध्यक्ष शिव अरोरा और पुलिस अधीक्षक सदानंद दाते की ओर से ठंडी प्रतिक्रिया आई है। मालूम हो कि पुलिस ठुकराल को पहले भी बचाती रही है। पिछले साल पुलिस दफ्तर में ही एक व्यक्ति की पिटाई कर दी थी।

पुलिस ने हल्की धारा में मामला दर्ज कर ठंडे बस्ते में डाल दिया। इससे पहले विधायक 2 अक्टूबर 2011 के दंगों में आरोपी थे। करीब चार महीने पुलिस उन्हें फरार बताती और तलाश करने का ड्रामा करती रही। ठुकराल भेष बदलकर विधान सभा में होकर चले गये। पुलिस के अनुसार उसे जानकारी बाद में हुई। जो ठुकराल को जानते हैं उन्हें पता है कि वे बहुत गुस्सैल हैं, जल्दी आपा खो बैठते हैं और प्रायः गाली-गलौज करते रहे हैं।

अब देखें कुछ तस्वीरें और इस घटना की कवरेज के स्क्रीनशाट…

AP Bharati
Writer-Journlist
Editor- PEOPLES FRIEND (Hindi Weekly)
Rudrapur (Uttarakhand)
9897791822
ap.bharati@yahoo.com

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छह अप्रैल को रिलीज हो रही ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह’ एक बहादुर सिपाही की गाथा है

परमवीर चक्र विजेता सूबेदार जोगिंदर सिंह एक सच्‍चे और बहादुर सिपाही की गाथा है, जिन्‍होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी।सूबेदार जोगिंदर सिंह सन 62 की चीन के साथ लड़ाई में अपनी वीरता और शौर्य दुश्‍मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उनकी इस बहादुरी का किस्‍सा आज देश के लोगों को प्रेरित करेगी। ऐसा कहना है फिल्‍म सूबेदार जोगिंदर सिंह के निर्देशक सिमरजीत सिंह का। वे कहते हैं कि सूबेदार जोगिंदर सिंह की बायोपिक अब 6 अप्रैल से देशभर के सिनेमाघरों में तीन भाषाओं; हिंदी, तमिल और तेलगु में रिलीज़ होगी।

सिमरजीत सिंह ने कहा कि आज कल युवाओं का रुझान काल्पनिक सिनेमा की तरफ अधिक है। हमारे देश में  चारों तरफ समृद्ध संस्कृति, विरासत, ऐतिहासिक घटनाएं और किस्से हैं। उस नज़रिये से देखें तो हमारे पास दर्शकों को दिखाने और उन्हें देने के लिए बहुत कुछ है। वर्तमान परिदृश्य में व्यावसायिक फिल्में बनाने का चलन है। इसके बीच लीक से हटकर एक फिल्म बनाई गई है – ‘सूबेदार जोगिन्दर सिंह’। यह एक वीर सैनिक की जिंदगी और घटनाओं पर आधारित है, जो अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए जुनून और दृढ़ संकल्प से प्रेरित था।

फिल्‍म की कास्टिंग के बारे में उन्‍होंने कहा कि इस फिल्‍म में ‘सूबेदार जोगिन्दर सिंह’ की भूमिका में पंजाब के सुपर स्‍टार गिप्‍पी ग्रेवाल सूबेदार जोगिंदर सिंह की भूमिका में हैं, जिन्‍होंने इस फिल्‍म के लिए काफी मेहनत किया। हमने फिल्‍म को कारगिल और द्रास, राजस्थान एवं असम के कई दुर्गम और कठिन लोकेसंस पर शू‍ट किया है। हमने भारत-चीन की लड़ाई को इस फिल्‍म में 14000 फ़ीट की ऊंचाई पर फिल्‍माया गया है, इस दौरान पहाड़ की दुर्गम चोटियों शूटिंग दौरान पहाड़ पर फिसलने से अभिनेमा गिप्‍पी ग्रेवाल घायल भी हो गये थे।

इसके अलावा भी इस फिल्‍म में उन्‍होंने ज़्यादातर स्टंट्स खुद ही किये। गिप्पी ग्रेवाल, गुग्गु गिल, कुलविंदर बिल्ला, अदिति शर्मा, राजवीर जवंदा, रोशन प्रिंस,करमजीत अनमोल, सरदार सोही, लवलीन कौर सैसन, जॉर्डन संधू मुख्‍य भूमिका में हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता राशीद रंगरेज़ द्वारा लिखित और सुमीत सिंह द्वारा तैयार की गई फिल्म ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह’ का ट्रेलर सागा म्यूज़िक एव म्यूनिसिस इन्फो सोल्युशंस के साथ सैवन कलर्स मोशन पिक्चर्स ने जारी किया है।

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राज चेंगप्पा, प्रसून शुक्ला समेत दर्जन भर से ज्यादा पत्रकार दिल्ली विवि के कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी में आये, देखें सूची

दिल्ली विवि के 28 कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी में आये पत्रकारों की सूची जारी कर दी गई है. हर कॉलेज में 5 मेंबर (किसी किसी में 6) दिल्ली सरकार की तरफ से नामित किये जाते हैं और 5 सदस्य दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ से. इस सूची को फाइनल करने के बाद दिल्ली सरकार सहित सभी पक्षों ने अपनी मंजूरी दे दी है. इनमें कई नामी पत्रकारों के अलावा जजों, वकीलों, शिक्षाविदों और रचनात्मक क्षेत्र में उल्लेखनीय नामों को शामिल किया जाता रहा है.  

दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ से इंडिया टुडे के संपादक राज चेंगप्पा को शहीद राजगुरु कॉलेज और महाराजा अग्रसेन कॉलेज, न्यूज़ ट्रैक के सलाहकार संपादक और निजी कॉलेज में बोर्ड ऑफ स्टडीज मेंबर प्रसून शुक्ला को राजधानी कॉलेज, टाइम्स ऑफ इंडिया के तापाश सेन को आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज, न्यूज़ 24 के एक्जी. एडिटर डॉ अनिल सिंह को शहीद सुखदेव कॉलेज, पत्रकार रश्मि सिंह दास को कालिंदी कॉलेज और खेल पत्रकार विमल मोहन को भीम राव अंबेडकर कॉलेज से गवर्निंग बॉडी का मेंबर नियुक्त किया गया है.

वहीं दिल्ली सरकार या कहें आम आदमी पार्टी की तरफ से पैनल में रखे गये पत्रकार और विश्लेषक अभय कुमार दुबे को दिल्ली कॉलेज आफ आर्ट एंड कामर्स, संडे गर्जियन के पत्रकार पंकज वोहरा को शहीद सुखदेव कॉलेज, अमर उजाला के पत्रकार संजय मिश्रा और उत्पल (मेंबर,एनबीटी) को श्री अरबिंदो कॉलेज, सहारा में पत्रकार रहे सैय्यद फैजल अली को गार्गी कालेज, हिंदुस्तान हिंदी से पत्रकार निर्मल यादव को महर्षि वाल्मिकी कॉलेज, दैनिक जागरण में पत्रकार सर्वेश कुमार को लक्ष्मी बाई कॉलेज, एबीपी न्यूज़ से पत्रकार अनिल दूबे को महाराजा अग्रसेन कॉलेज, पत्रकार आशीष श्रीवास्तव को सत्यवती कॉलेज, पत्रकार मिताली ऋषि को शहीद भगत सिंह, डीडी न्यूज़ से पत्रकार अरविंद चतुर्वेदी और पत्रकार प्रवीन को विवेकानंद कॉलेज से गवर्निंग बॉडी का मेंबर नियुक्त किया गया है.

इन नामों के अलावा इस सूची में पूर्व राजदूत जी पार्थसारथि, शिक्षाविद् एस डी मुनि, शिक्षाविद् पुष्पेश पंत सहित दिल्ली हाई कोर्ट के कई जजों को भी इस सूची में जगह मिली है.

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बीजपी लोकसभा में अल्पमत में आ गयी

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डॉ राकेश पाठक
प्रधान संपादक, कर्मवीर

लगातार उपचुनाव हार रही है, अब सहयोगी दल भी छिटक रहे हैं, अगला आम चुनाव आसान नहीं… उत्तर प्रदेश और बिहार की तीन लोकसभा सीटें बीजपी हार गई है। इनमें से दो उसके पास थीं और एक राजद के पास। खास ख़बर ये है कि इन सीटों को गंवाते ही भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम लोकसभा में सामान्य बहुमत खो बैठी है। गठबंधन के रूप में उसके पास बहुमत फिलहाल बना हुआ है लेकिन सहयोगियों के छिटकना जारी है। ऐसे में अगले साल होने वाले आम चुनाव बीजपी के लिए टेढ़ी खीर साबित होते लग रहे हैं।

बीजपी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें हार चुकी है। बिहार की अररिया सीट भी वो राजद से छीन नहीं सकी। ये नतीजे सिर्फ इतना भर नहीं हैं। आंकड़े इसके भीतर छुपे संदेश का खुलासा करते हैं जो कि बीजपी के माथे पर चिंता की लकीरें उभारने वाला है। संख्या का खेल बता रहा है कि 2014 में प्रचंड बहुमत से जीती बीजपी अब अकेले के दम पर लोकसभा में बहुमत खो चुकी है। गठबंधन के दम पर बहुमत बचा हुआ है।

गौरतलब है कि मोदी लहर पर सवार बीजपी को बीते चुनाव में अकेले ही 282 सीटें मिली थीं। लोकसभा में बहुमत के लिए 272 का आंकड़ा चाहिए होता है। तब पार्टी ने अकेले बहुमत होते हुए भी सभी सहयोगी दलों को सरकार में शामिल किया था। एनडीए गठबंधन को कुल 335 सीटें मिली थीं।

सन 2014 के तुरंत बाद हुए दो उपचुनाव बीड और बड़ोदरा बीजपी ने जीते थे। उसके बाद शहडोल और लखीमपुर में जीत दर्ज की। लेकिन बाक़ी अपने कब्जे वाली सीटों पर पार्टी लगातार हार रही है। गुरुदासपुर, अजमेर, अलवर, झाबुआ और आज गोरखपुर और फूलपुर जैसे अपने गढ़ भी नहीं बचा पाई। आज के नतीजों से पहले अकेले बीजपी के सांसदों की संख्या 273 बची थी और आज 271 रह गयी है। अकेले अपने दम पर तो पार्टी अल्पमत में आ गयी है लेकिन सहयोगी दलों की टेक से सरकार को कोई खतरा नहीं है।

उपचुनाव में लगातार हार के अलावा गिनती में कमी गोंदिया भंडारा सीट के सांसद नाना भाऊ महोड़ के संसद से इस्तीफा देने से आई थी। नाना भाऊ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रवैये की आलोचना कर पार्टी भी छोड़ गए थे। गुजरात चुनाव के दौरान वे कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। एनडीए में शामिल सहयोगी दलों को साथ रखने में भी बीजपी को मुश्किल हो रही है। कुछ महीनों शिवसेना कह चुकी है कि वह अगला चुनाव बीजपी से अलग होकर लड़ेगी। और अब हाल ही में तेलगु देशम पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। उसके मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफे भी दे दिए हैं।

फिलहाल लोकसभा में शिवसेना के 18 और तेलगू देशम के 16 सदस्य हैं। अन्य छोटी छोटी कई पार्टीयों का समर्थन भी बीजपी को हासिल है। ऐसे में बीजपी के लिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव आसान नहीं लग रहे।

लेखक डॉ राकेश पाठक ‘कर्मवीर’ के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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असम के पत्रकारों पर बर्बर लाठीचार्ज, एनएजे ने की कड़ी निंदा

The National Alliance of Journalists (NAJ) expresses its shock and anger at the brutal lathicharge of Assam journalists, including women journalists, while covering student protests at the Mizoram-Assam border on March 10. The journalists have provided photographic and video evidence of the serious injuries they suffered.

The Mizoram Journalists Association has said that the police deliberately targeted Mizo journalists even after they showed them their press cards. Among the injured were Zohmingmawia, joint editor of Aizawl Post, who is also the Asst. Secretary of the MJA and R Lalnunmawia, joint editor of Duhlai newspaper from Kolasib district. Emmy C. Lawbei, a woman reporter for News18, was badly thrashed and had deep bruises on her arm, shoulder and back. The journalists had to be taken to the district hospital for treatment of their wounds. Many students were also injured in the border dispute.

The National Alliance of Journalists demands that the government of Assam apologise to the journalists who were attacked by the police while discharging their professional duties. We also demand that the policemen responsible for the violence be given exemplary punishment so that in future the police do not obstruct journalists who are doing their jobs.

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ज्ञानवर्धन मिश्र को रामजी मिश्र मनोहर मीडिया फाउंडेशन का सचिव चुना गया

पटना I पत्रकारिता एवं जनसंचार गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा पत्रकारिता सन्दर्भ पुस्तकालय को समृद्ध करने के उद्देश्य से स्थापित रामजी मिश्र मनोहर मीडिया फाउंडेशन का पुनर्गठन किया गया है I अगले दो वर्षों के लिए प्रदीप जैन अध्यक्ष, रमेश चन्द्र गुप्ता उपाध्यक्ष, ज्ञानवर्धन मिश्र सचिव, प्रकाश कुमार अग्रवाल संयुक्त सचिव एवं अमर कुमार अग्रवाल कोषाध्यक्ष चुने गये हैं I

इक्कीस सदस्यीय न्यासी मण्डल में पीके अग्रवाल, ओम प्रकाश शाह, प्रभु दयाल भरतिया, आनंद प्रकाश हरलालका, सुमन रस्तोगी, डॉ लक्ष्मी सिंह, लव कुमार मिश्र, सुरेश रुंगटा, कमलनयन श्रीवास्तव, सुरेश कुमार अरोडा, मुकेश कुमार जैन, मुनेश्वर प्रसाद जैन, रत्नाकर मणि, कुमार उत्तम, नवीन कुमार मिश्र तथा पंकज वत्सल शामिल हैं I यह जानकारी फाउंडेशन द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में सचिव ज्ञानवर्धन मिश्र द्वारा दी गयी I

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