प्रसार भारती में पत्रकारों के लिए ढेर सारी नौकरियां

प्रसार भारती में 14 पदों के लिए वैकेंसी आई है. इच्छुक उम्मीदवार 2 जून 2017 तक आवेदन कर सकते हैं. चयन लिखित परीक्षा, कौशल परीक्षण और इंटरव्‍यू के जरिए होगा. सभी उम्मीदवारों को 500 रुपए का भुगतान डिमांड ड्राफ्ट द्वारा दिल्ली में देय “डीडीओ, एसटीआई (टी), एआईआर और डीडी” के पक्ष में करना होगा. Continue reading

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NAPM Condemns the Branding of Sandeep Pandey as Naxal and Termination of His Contract from IIT BHU

Dr. Sandeep Pandey – an engineer, distinguished academic, grassroots activist, peace crusader and a highly esteemed member of the contemporary Indian milieu has been unceremoniously sacked from his post as a guest faculty in the Indian Institute of Technology BHU, Uttar Pradesh. People’s Movements from all across India are extremely angry as well as hurt at this conspiratorial manoeuvre in academic institutions that has become common place after BJP led coalition government has come to power. The progressive professor of Chemical and Mechanical Engineering Department has always been active in both classrooms and in the field as a champion of human rights.

The decision to terminate his contract was taken at the Board of Governors meeting and it reeks of the agenda of the NDA government that is keen to silence all voices of opposition from public spaces in India. The VC of BHU, who was made the Chairman of IIT BoG by HRD Ministry, GoI, bypassing the panel of five names recommended by a resolution of BoG, Prof. G.C. Tripathi, and Dean of Faculty Affairs, IIT, BHU, Prof. Dhananjay Pandey, both gentlemen associated with the RSS, primarily forced the decision. The charges against Dr. Pandey is that he is a naxalite, showed a banned documentary on the Nirbhaya case and is involved in anti-national activities.

Dr. Pandey has co-founded a people’s group called Asha for Education in 1991, a non profit organisation dedicated to bring change in India by focusing on basic education in the belief that education is a critical requisite for socio-economic change. In 2002, he received the Ramon Magsaysay Award for Emergent Leadership. In 2005, he led an Indo-Pak peace march from New Delhi to Multan. In the communal torn Uttar Pradesh, he has worked relentlessly to propagate peace and harmony between communities.

He has also been a founding member of National Alliance of People’s Movements (NAPM), been its national convener for nearly a decade and now is Adviser to NAPM Convening Team. In the recent past, he sat on an indefinite fast for implementation of the Right to Education in the City Montessori School and other private schools that refused to extend the benefits of the RTE Act to many underprivileged children.

The decision taken by IIT BHU is not only tragic but also shows the social immaturity of right-wing sympathisers who want to crush dissent at all costs. Even if it means raising a whole new generation of young Indians without the guidance of progressive thinkers and dynamic individuals like Dr. Pandey. After FTII stir, scrapping of Non-Net fellowship, and many others tinkering with educational institutes, this is also in line with their agenda of blatantly obliterating the voices of rational and progressive leaders bringing wider social change in our society.

National Alliance of People’s Movements (NAPM) challenges the decision of IIT-BHU and demands an explanation on the behalf of people of India for this shameful act of removing a highly academically competent individual from an academic post.



My contract at IIT BHU, Varanasi as a visiting faculty has prematurely ended after teaching there for 2.5 years due to a decision of Board of Governors. In a recent Board meeting the Vice Chancellor of BHU, who was made the Chairman of IIT BoG by Minister of HRD, GoI, bypassing the panel of five names recommended by a resolution of BoG, Prof. G.C. Tripathi, and Dean of Faculty Affairs, IIT, BHU, Prof. Dhananjay Pandey, both gentlemen associated with RSS, primarily forced the decision. The charges against me are that I’m a naxalite, showed a banned documentary on Nirbhaya case and am involved in anti-national activities.

I wish to clarify that I’m not a naxalite. The ideology that I would consider myself closest to is Gandhian. But I do identify with the causes taken up by naxalites even though I may not agree with their methods. I also think that it requires a lot of courage and sacrifice to be a naxalite and I certainly don’t have that kind of resolve.

The banned documentary on Nirbhaya made by BBC was to be screened in my Development Studies class during the even semester of academic year 2014-15 but the decision was withdrawn after intervention of Chief Proctor of BHU and S.O. of Lanka Police Station just before the class. However, a discussion on the issue of violence against women in our society was conducted after screening a different documentary.

I don’t believe in the idea of a nation or national boundaries, which I think are responsible for artificial divisions among human beings similar to ones on the basis of caste or religion. Hence I cannot be anti or pro-nation. I am pro-people. I’m not a nationalist but is a Universalist.

I’ve no regrets as the decision to terminate my contract has not been taken based on my academic performance but it is because of my political views and activities. I’ve enjoyed my stay at IIT, BHU and wish the Institute and the University well.

प्रेस रिलीज

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अनिल शर्मा को भास्कर और संजीव रतन सिंह को टीओआई से हटाए जाने की चर्चा

चर्चा है कि दैनिक भास्कर भोपाल के संपादक अनिल शर्मा को पद से हटा दिया गया है. अनिल शर्मा लंबे समय से ऑक्सीजन पर चल रहे थे. उन पर कार्य में लापरवाही के आरोप लगते रहे हैं. भोपाल से ही एक अन्य अपुष्ट जानकारी के मुताबिक टाइम्स आफ इंडिया के संपादक संजीव रतन सिंह को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. संजीव रतन सिंह की कार्यवधि में टीओआई के भोपाल संस्करण से कई कर्मचारियों ने, विशेषकर महिलाओं ने नौकरी छोड़ी और कुछ ने तो इस संबंध में प्रशासन को लिखित में शिकायत भी की थी.

एक नेशनल न्यूज चैनल के भोपाल ब्यूरो चीफ के बारे में चर्चा है कि आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप में चैनल ने उन्हें टर्मिनेट कर दिया है. भड़ास द्वारा जारी की गई मध्य प्रदेश के पत्रकारों द्वारा संचालित की जाने वाली वेबसाइट की सूची और उसके माध्यम से सरकार से की जा रही लाखों की नियमित उगाही की खबर कई पत्रकारों के लिए ताबूत में अंतिम कील साबित हो रही है.

एक बड़े चैनल के भोपाल संवाददाता को हटाए जाने के अलावा कम से कम तीन और वरिष्ठ पत्रकारों की भी अंतिम गिनती चल रही है और कभी भी उनकी बर्खास्तगी की जा सकती है. इस सूची में कुछ तो वाकई सच्चे पत्रकार हैं, लेकिन अधिकांश अपनी पत्नी, भाइयों के नाम पर सरकार से उगाही कर, सरकार की गोद में सालों से बैठे हुए थे. एक मोहतरमा तो चार वेबसाइट चलाकर जबर्दस्त उगाही अभियान में लगी हुईं थीं. इन कथित पत्रकारों पर चुनावों के दौरान भी व्यापक वसूली किए जाने के आरोप लगते रहे हैं, जिनकी मदद से कई मकान, दुकानें चला रहे हैं.

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मध्य प्रदेश दूरदर्शन का समाचार एकांश : जात ही पूछो साधू की…

मध्य प्रदेश दूरदर्शन के समाचार एकांश में जात और अर्थ (धन) को लेकर उठापटक मची हुई है. पुराने लोगों से काम लेना बन्द कर पैसा लेकर नये लोगों से काम लेना शुरु कर दिया गया है. वही जात के आधार पर लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. डेस्क पर काम करने वाले 5 लोगो को तो बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. गौरतलब है कि सत्ता सम्भलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने दूरदर्शन को सशक्त करने की पहल शुरु की थी. अपने विदेश दौर के समय वे सिर्फ दूरदर्शन की टीम को ही साथ लेकर गये थे. इतना ही उन्होनें अपने सरकार के साथियों और अधिकारियों को निर्देश भी दिया था कि कोई भी योजना या खबर पहले दूरदर्शन को दे उसके बाद निजी चेनल को.

इसके पीछे मंशा थी कि लम्बे समय से एक पुराने ढर्रे में चल रहे दूरदर्शन की छवि सुधरे. कुछ प्रदेशों में इसका असर भी दिखा. जिसमें मध्यप्रदेश भी एक था. समाचार एकांश में ऐसे अनुभवी अधिकारियों को भेज गया जिन्होनें रुटिन से हटकर काम किया और ग्राफ में इजाफा किया. लेकिन अधिकारी के बदलते ही जिनके हाथों में शाक्ति आई उन्होनें नया खेल करना शुरु कर दिया. 100 से ज्यादा स्ट्रींगरों में से कुछ को छोडकर अधिकांश पर जात के नाम पर काम लेना बन्द कर दिया गया. वही दूर दराज के स्ट्रींगरों को साफ शब्दों में खबर ना भेजने और अपनी सेवाएं समाप्त माने की दो टूक बात कहाकर उन्हें दरकिनार कर दिया गया.

समाचार एकांश में एक अधिकारी जिनकी नौकरी का समय कुछ माह ही बचे है उन्होनें तो पुराने स्ट्रींगरों के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया है. जो भी स्ट्रींगर उनसे मिलने गया उसे दुत्कार कर भाग दिया और साफ हिदायत दे दी कि आइन्दा यहाँ ना आये. उन्होनें तो प्रदेश में अपने लोगों को समाचार भेजने का आदेश दे कर उन्हें विश्वस्त कर दिया है कि नये इम्पैनल मेंट में आपको ले लिया जायेगा. उज्जैन में तो किसी मनोज पौराणिक का नाम समाने आया है.

वहीं इन्दौर, झाबुआ, धार, जबलपुर, ग्वालियर आदि स्थानों पर भी लोगों को खडा कर दिया गया है. सूत्रों का तो कहना है कि बकायदा एक निश्चित रकम भी नये लोगों से ली जा रही है. वही हाल में ही जूनियर अधिकारी से पदोन्नत होकर डिप्टी डायरेक्टर हुए अधिकारी नये खेल कर रहे है. उन्होनें तो दिल्ली एक पत्र भेजकर अपनी जात और लिंग का हवाला देते हुए फ्री हेन्ड देने की बात कही है.इन अधिकारी का मानना है कि अभी तक जो स्ट्रींगर है उनमें सवर्ण का वर्चस्व है. इसलिए अब उन्हें बाहर कर अपनी जात के लोगों को शामिल करेंगे.

जात और धन के इस खेल में सारे नियमों को ताक में रख दिया गया है. भोपाल की डेक्स में काम करने वाले पांच लोगों को जो सवर्ण वर्ग से उन्हें हटा दिया गया है. वही समाचार बनाने की जिम्मेदारी जिस व्यक्ति पर है उसे भी हटाने की कोशिश की जा रही है. अधिकारियों के इस खेल में समाचार एकांश में समाचार नदारद हो गया है. स्थिति यहाँ है कि बुलेटिन ड्राय चल रही है.

भोपाल से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दैनिक जागरण मुरादाबाद में संपादक का आतंक

दैनिक जागरण मुरादाबाद में इस समय आतंक का माहौल है। बताया जाता है कि इस समय संपादकीय के सारे साथी संपादक के रवैये से परेशान हैं। इसी वजह से एक के बाद एक आदमी यहां से कम होता जा रहा है। जब से संपादक धर्मेंद्र किशोर त्रिपाठी यहां कार्यभार ग्रहण किए हैं तब से आधा दर्जन से अधिक लोग अखबार छोडकर जा चुके हैं। सबसे पहले यहां से सब एडिटर लवलेश पांडे संपादक की गाली गलौज से त्रस्त होकर अखबार छोडे। उसके बाद मणिकांत शर्मा ने हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया। इसके बाद डेस्क से सीनीयर साथी रमेश मिश्रा संपादक के रवैये से त्रस्त होकर अखबार छोड गए। इसके बाद अभिषेक आनंद ने अखबार छोडकर हिंदुस्तान हल्द्वानी ज्वाइन कर लिया।

अब हालत ये हैं कि कई और सीनीयर साथी अखबार छोडने का मन बना रहे हैं। बताया जाता है कि सिटी के एक साथी दूसरे अखबार में जगह तलाश रहे हैं। ये पिछले दिनों एक बड़े अखबार में इंटरव्यू देकर आये थे। इसके बाद संपादक ने सारे ब्यूरो चीफ बदल डाले। सबसे सीनीयर सिटी इंचार्ज संजय रूस्तगी को संभल जैसे छोटे और अविकसित जिले में भेज दिया लेकिन वह नहीं गए। अमरोहा के इंजार्ज अजय यादव को भी हटा दिया जिस पर उन्होंने भी अखबार को विदा कर दिया लेकिन संपादक रामपुर के मजबूत माने जाने वाले मुस्लेमीन को नहीं हटा पाये जो करीब दस सालों से रामपुर में टिके हैं और आजम की जी हुजूरी में ही लगे रहते हैं।

इस समय ये हालत है कि संपादक ने अपना एक चेला पाल रखा है जो उनके निजी टाइप ढेर सारे वैध अवैध काम देखता है। ये चेला कुछ काम नहीं करता बस पूरे न्यूज रूम में शेरोशायरी करता रहता है। जिस दिन संपादक अवकाश पर अपने गृह नगर कानपुर जाते हैं उस दिन वह भी साथ जाता है। इसकी पुष्टि संपादक के अवकाश के दिन और उस जूनियर रिपोर्टर चेले के अवकाश के दिनों को टैली करके किया जा सकता है। दोनों के अवकाश के दिन एक ही होते हैं। संपादक ने इस जूनियर रिपोर्टर की प्रेस मान्यता भी दैनिक जागरण से करा दी है। बताया जाता है कि दीपावली पर उपहारों से भरी तीन गाड़ियां कानपुर की ओर गईं जिन पर चेले सवार थे। न्यूज रूम की हालत ये है कि दोपहर में आने के बाद संपादक सहयोगियों को किसी न किसी बहाने गरियाना शुरू कर देते हैं और बुरी बुरी गालियां देते हैं। यदि यही हाल रहा तो कई साथी अखबार को छोडकर जा सकते हैं। मालिक और अधिकारी इस पर ध्यान दें नहीं तो मुरादाबाद की हालत बहुत बुरी हो जाएगी।

एक पीड़ित पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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‘इंडिया नाऊ’ चैनल ज्वाइन कर सकते हैं अमिताभ अग्निहोत्री

चर्चा है कि अमिताभ अग्निहोत्री नए आने वाले रीजनल न्यूज चैनल ‘इंडिया नाऊ’ के संपादक बन सकते हैं. ‘इंडिया नाऊ’ में पहले अतुल अग्रवाल गए थे लेकिन लांच से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया और न्यूज वर्ल्ड इंडिया के हिस्से बन गए. ‘इंडिया नाऊ’ प्रबंधन पर आरोप है कि इनका पास पर्याप्त फंड नहीं है लेकिन चैनल लाने के नाम पर ढेर सारे पत्रकारों को सपने दिखा रहे हैं और जिलों के पत्रकारों से सेक्युरिटी मनी के नाम पर पैसे वसूल रहे हैं.

देखना है कि अमिताभ अग्निहोत्री कई किस्म के आरोपों से घिरे इस चैनल के हिस्से बनते हैं या नहीं. ज्ञात हो कि समाचार प्लस चैनल के मैनेजिंग एडिटर पद से अमिताभ अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया है. इसके बाद से उनकी नई पारी का लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. हालांकि वे खुद अभी तुरंत कहीं ज्वाइन करने की बात से इनकार कर रहे हैं.

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पिता की तेरहवीं में छुट्टी लेकर गए फोटो जर्नलिस्ट की चार दिन की तनख्वाह काट ली

राजस्थान पत्रिका समूह में उत्पीड़न और प्रताड़ना की ढेर सारी कहानियां सामने आती रही हैं. एक ताजे घटनाक्रम के मुताबिक पत्रिका ग्वालियर के फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पाण्डेय अपने पिता की तरेहवीं में हिस्सा लेने के लिए अवकाश पर गए थे. जब वे लौटकर आए तो पता चला उनका अवकाश मंजूर नहीं किया गया है और उनके वेतन से चार दिन की सेलरी काट ली गई है. इससे आहत पांडेय ने प्रबंधन को पत्र लिखकर न्याय करने की गुहार की है.

सूत्रों के मुताबिक पिता जी की तेरहवीं पर अवकाश पर जाने की नियमानुसार सूचना पत्र के जरिए फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पांडेय ने अपने इंचार्ज नीरज सिरोहिया को और वरिष्ठों को दी थी. इसके बाद वे अवकाश पर चले गए क्योंकि जाना जरूरी था. अवकाश से लौटने के बाद उन्हें 4 दिन की कम सेलरी दी गयी. उन्हें बताया गया कि बिना मंजूरी के अवकाश पर जाने की वजह से सेलरी काटी गयी है. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि किसी के पिता की तेरहवीं हो और वह लिखित में छुट्टी की अप्लीकेशन देकर जाए और वह छुट्टी एसेप्ट न हो. इसी को कहते हैं ताकत के नशे में होने पर आंखों पर घमंड और पाप की पट्टी चढ़ जाती है और सब कुछ उलटा दिखने लगता है.

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महिला कर्मचारी को ब्लैकमेल करने वाले अखबार मालिक पर महिला आयोग ने कसा शिकन्जा

वाराणसी। पत्रकारिता की आड़ में साप्ताहिक समाचार पत्र को हथियार बना अपने महिला कर्मचारी को अनैतिक कार्य करने के लिए विवश करने वाले कथित सम्पादक पर राज्य महिला आयोग ने बुधवार को शिकन्जा कस दिया। आयोग ने सम्पादक और उसके सहकर्मी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश सिगरा थाने को दिया है। साथ ही पूरे प्रकरण की जांच सीओ कोतवाली को सौंपा है।

स्थानीय सर्किट हाउस में उ.प्र. राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष सुमन यादव महिला उत्पीड़न आदि से सम्बन्धित सुनवायी कर रही थी कि इसी बीच वहां भुवनेश्वरी मलिक उर्फ सपना यादव नामक महिला पहुंची और आयोग उपाध्यक्ष से गुहार लगायी कि साप्ताहिक समाचार पत्र ‘फास्ट न्यूज’ के संपादक प्रभाकर द्विवेदी तथा एक अन्य कर्मी नितिन ओझा उसे अनैतिक काम करने के लिए दबाव बना रहे है।

बताया कि इस समाचार पत्र में वह दो-तीन महिने तक कार्यरत रही। इस दौरान प्रभाकर द्विवेदी, जिनके खिलाफ थाना चोलापुर एवं कैण्ट में आपराधिक मुकदमें दर्ज है एवं नितिन ओझा द्वारा उन पर अनैतिक कार्यों के लिये दबाव बनाया गया तथा इससे इन्कार करने पर इन लोगों ने भुवनेश्वरी एवं उनके पति को फर्जी मुकदमें में फसाये जाने की धमकी दी गई। इतना ही नहीं “शातिर चोर’’ के नाम से इन लोगों की फोटो सहित खबर अपने बंद पड़े समाचार पत्र में प्रकाशित किया गया। फर्जी समाचार प्रकाशित करने तथा पूरे प्रकरण की शिकायत थाना सिगरा में किये जाने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं किया गया।

आयोग की उपाध्यक्ष को पीड़िता ने बताया कि प्रकरण की जानकारी उसके द्वारा एसएसपी को दिये जाने पर उन्होंने क्षेत्राधिकारी चेतगंज को जांच कर कार्यवाही किये जाने का निर्देश दिया था। मामले की गम्भीरता को देख उपाध्यक्ष ने सिगरा थाना प्रभारी को सर्किट हाउस में तुरन्त तलब किया। इस दौरान थाना प्रभारी ने ऐसा कोई भी मुकदमा पंजीकृत होने से इनकार किया। इस पर उपाध्यक्ष ने पूरे प्रकरण को गम्भीरता से लिया तथा सिगरा थाना प्रभारी को प्रभाकर द्विवेदी व नितिन ओझा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तथा पुलिस क्षेत्राधिकारी कोतवाली को पूरे प्रकरण की जांच करने का निर्देश दिया।

बनारस से युवा पत्रकार अवनींद्र सिंह अमन की रिपोर्ट.

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भक्तों की सरकार, अफवाहों की सोशल मीडिया, सेल्फी पत्रकार, खबरों का नाश

खबरों के मामले में इन दिनों बड़ी मजेदार स्थिति है। हर तरह की खबर है आप चाहे जो ले लीजिए, जिसपर विश्वास कीजिए या आपको जो मिल जाए। सब संभव है। आप चाहें तो केंद्र सरकार की भक्ति वाली खबरें देख सुन पढ़ सकते हैं, थोड़ी मेहनत करें तो अधिकृत खबर पा सकते हैं, थोड़ा और मेहनत-खर्च करें तो वास्तविक स्थिति जान सकते हैं। कहने का मतलब कि अधिकृत बताई जाने वाली खबर भी आधी-अधूरी, एक पक्षीय या जैसा कल मैंने लिखा था, विचार घुसेड़ी हुई हो सकती है।

उदाहरण के लिए, परसों दिन भर खबर उड़ती रही कि आमिर खान इनक्रेडिबल इंडिया के ब्रांड एम्बैसडर नहीं रहे। उन्हें हटा दिया गया, उनका कार्यकाल पूरा हो गया, इस संबंध में ठेका किसी और कंपनी से था उन्हें सरकार ने रखा ही नहीं था, हटाया इसलिए गया कि उन्होंने देश में बढ़ती असहिष्णुता की बात की थी। संचार क्रांति के कारण अब एक ही समय भिन्न स्रोतों से सूचनाएं उपलब्ध हो सकती हैं और सूचना देने-लेने का कोई अधिकृत कायदा या तो है नहीं, या उसका पालन नहीं किया जा रहा है या जान बूझकर ऐसी स्थिति बना दी गई है कि खबरें अब मनोरंजन का रूप लेती जा रही हैं।

आमीर खान का मामला काफी पुराना हो चुका है लेकिन करीब आज करीब 12:50 बजे मुझे गूगल ने इन शीर्षकों वाली खबरें दीं। पहली दो आईबीएन लाइव और इंडियन एक्सप्रेस की – परस्पर विरोधी है। जबकि इन्हें पोस्ट किए जाने का समय लगभग एक बताया जा रहा है। सात मिनट पहले पोस्ट की गई खबर ज्यादा नई लग रही है। यह सब इसलिए कि ब्रेकिंग न्यूज में खबरें जल्दी और पहले पेश करने के लिए भारी मारा-मारी और अंधेरगर्दी चल रही है। 

इन दो खबरों को पढ़ने का बाद मैं आपको एक और जानकारी देता हूं जो शायद आपको ना हो और मैंने थोड़ा समय व श्रम लगाकर प्राप्त किया है। अंग्रेजी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारतीय जनता पार्टी के लिए आईटी, वेबसाइट और सोशल मीडिया मैनेजमेंट सेल देखने वाले अमित मालवीय ने ट्वीट किया, “Aamir Khan removed as brand ambassador of Incredible # India.” ट्वीटर की अलग दुनिया है पर इस गलत खबर को (क्योंकि एक जिम्मेदार व्यक्ति ने दी थी) सेल्फी पत्रकारों ने बिना जांचे-परखे परोस दिया। चूंकि अमित मालवीय खबर के अधिकृत स्रोत नहीं हैं, इसलिए अखबारों और चैनलों को (जो साइट पर और वैसे खबरें दे रहे थे) बताना चाहिए था कि खबर अधिकृत नहीं है और कायदे से अधिकृत स्रोत से इसकी पुष्टि की जानी चाहिए थी।

यह सब नहीं किया गया क्योंकि अब खबरें अधिकृत तौर पर जारी भी नहीं की जाती हैं। इसी तरह ‘छोड़’ दी जाती हैं। भक्त लपक लेते हैं, अपनी सरकार की बहादुरी मान लेते हैं। सरकार थोड़ी देर में खंडन-मंडन करके स्थिति ऐसी बना देती है कि दोनों खबरें बनी रहती हैं। सरकार ने तो कुछ किया ही नहीं। हमने तो स्पष्टीकरण जारी किया था आदि। और काम भी हो गया। एक उपभोक्ता के रूप में आप पैसे देकर ऐसी ही खबरें खरीद रहे हैं। जो सूचना तो नहीं ही है, दिमाग भी खराब करती है।

कायदे से आज यह खबर होनी चाहिए थी कि आमिर मामले में विवाद की शुरुआत कैसे शुरू हुई, क्यों हुई, कौन सेल्फी पत्रकार भाजपा के झांसे में फंसे और सरकार ने कब क्या कहा। पर अब ऐसी पत्रकारिता नहीं होती। दोष पाठकों का भी है। उन्हें जो परोस दिया जाए वही पसंद आता है।


Aamir Khan still the brand ambassador of Incredible India: Government
Posted on: 07:52 AM IST Jan 07, 2016, IANS
New Delhi: Bollywood superstar Aamir Khan is still the brand ambassador of Incredible India, the government said on Wednesday.
The tourism ministry issued the clarification following reports in a section of the media that Aamir had been removed as the ambassador of the campaign aimed at promoting tourism in the country.


Incredible India campaign: Contract over, govt did not remove Aamir Khan, says Mahesh Sharma
The Ministry of Tourism denied reports that Aamir Khan was removed as the brand ambassador for its Incredible India campaign.
By: Express News Service   
New Delhi
Updated: Jan 7, 2016, 7:43
A controversy surrounding actor Aamir Khan erupted on Wednesday after a section of media reported that the Centre had removed him as the brand ambassador of the Incredible India campaign under Tourism Ministry.
Comments on Twitter were fueled by speculation that the move was in response to the actor’s remarks on “growing intolerance” during the Ramnath Goenka Excellence in Journalism Award function last November.
However, clarifying his ministry’s stand, MoS, Tourism, Mahesh Sharma told The Indian Express that it was purely a contractual matter with advertising agency McCann Worldgroup. The Rs 2.96-crore contract with the agency, which featured Khan in a film for the ministry, recently ended.
“Our agreement was with a media agency namely McCann. That was for a particular work. That work they have delivered to us. They have completed that project. Hence, that contract is now over,” Sharma said.


लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं. उनसे संपर्कanuvaadmail@gmail.comके जरिए किया जा सकता है.

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विज्ञापन घोटाला : क्या सिर्फ वेबसाईट संचालक ही घोटालेबाज हैं, दूसरी तरफ नजर टेढ़ी क्यों नहीं?

मध्यप्रदेश में मचे विज्ञापन घोटाले के हंगामे के बीच निशाने पर सिर्फ और सिर्फ वेब मीडिया यानी समाचार वेबसाईट्स हैं। वेबसाईट्स को दिये गये विज्ञापनों को लेकर एक हद तक काफी चीजें सही भी हैं जो बताती हैं कि गड़बड़ तो हुई है लेकिन सवाल ये है कि क्या गड़बड़ सिर्फ वेबसाईट्स को लेकर ही है? सुना है किसी मीडिया सन्घ के पदाधिकारी द्वारा कोर्ट में विज्ञापन घोटाले को लेकर सीबीआई जांच की मांग की गई है इस पूरे मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि एकतरफा खेल खेला जा रहा है हर तरफ सिर्फ वेबसाइट्स की चर्चा है। जताया ऐसा जा रहा है कि सबसे बड़े घोटालेबाज सिर्फ और वेबसाईट संचालक पत्रकार ही हैं। वेबसाईट संचालक पत्रकारों पर सबकी टेढ़ी नजर है मगर क्यों?

जारी की गई सूची को या तो कोई पूरा देख नहीं रहा या देखना नहीं चाहता। अगर वेबसाइटों की ही बात करें तो असली फर्जीवाड़े पर बात हो ही नहीं रही लोग सिर्फ इस बात पर पगलाये हुये हैं कि उसे इतना मिला, इसे इतना मिला। लगातार यह बात कही जा रही है कि बन्द वेबसाइटों को भी विज्ञापन जारी हुए। इस पूरी सूची में जो तमाम तरह की सोसायटीज हैं उनकी कोई बात नहीं कर रहा सवाल इस पर भी उठने चाहिए कि 257 वेबसाइट्स को 12 करोड़ और एक-एक चेनल को 11-12 करोड़?

सवाल यह भी उठे कि मांगे जाने पर चाहे जिसने भी जानकारी मांगी हो तमाम तरह के चार पन्नों के अखबार, पत्र—पत्रिकाओं को क्यों बख्श दिया गया? बाला बच्चन ने भी यह सवाल क्यों नहीं उठाया? यहां बता दूं कि मुझे शुरू से ही सूची देखने में रुचि नहीें थी मगर बार—बार कुछ ऐसी बातें की गईं जिससे मैंने रुचि ली और सबसे बड़ी बात जिन पत्रकारों को सबसे ज्यादा सूची देखने की खुजली मची हुई थी अब सारे एपीसोड में खामोशी अख्तियार किए हुये हैं।

मैं किसी गलत के साथ नहीं हूँ चाहे वेबसाईट्स हों या कोई और मगर मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है कि सवाल वेबसाइट्स पर ही क्यों? बेशक सबकुछ ठीक नहीं है मगर बहुत कुछ छुपा हुआ ऐसा भी है जो बताता है कि बहुत ज्यादा बहुत कुछ ठीक नहीं है। सुना है कुछ वेबसाइट चला रहे पत्रकारों को संस्थानों ने नौकरी से हटा दिया है अगर उक्त बातें साफ हों तो कितने लोग कमा खा पायेंगे? जो बाकी लोग दूध के धुले बनकर न्यूज वेबसाइट वालों को टेढ़ी नजर से देख रहे हैं अगर उनके प्रकाशनों को मिले विज्ञापनों का ब्यौरा बाहर आ जाए तो…?

बता दूं कि मुझे किसी ने उकसाया नहीं है न ही मैं किसी का टूल बन रही हूं मगर ये वो सवाल हैं जो हर वेबसाईट संचालक को पूछने चाहिए? पर उससे पहले मेरा सवाल क्यों छुपाया गया कि वेबसाईट भी चलाई जा रही हैं? क्यों एक सीधे रास्ते को चोर रास्ता बना दिया गया? क्यों एक लाईन से सब घोटालेबाजों में शामिल कर दिये गये? इस पूरे खेल में गलती चाहे जिसकी भी हो पिसेंगे छोटे ही। खबरनेशन और बाला बच्चन से मेरा यह सवाल तब तक जारी रहेगा जब तक यह स्पष्ट नहीं कर दिया जाता कि असली घोटालेबाज कौन और विशुद्ध पत्रकार कौन? या सिर्फ थोड़ी देर की पब्लिसिटी और वाहवाही पाने के लिये यह किया गया? खबरनेशन बताये ​क्या उसने पत्रकारिता के सारे मापदंड पूरे किये? क्यों नहीं सारी बातें स्पष्ट की गईं? बसाईट्स को लेकर सवाल हर बार उठते हैं मगर जवाब क्यों नहीं दिये गये? यहां बता दूं कि मुझे किसी ने उकसाया नहीं है लेकिन ये बातें भी तो साफ हों? कहीं ऐसा न हो कि पत्रकार एक दूसरे की टांग—खिचाई में घर फूंक तमाशा देखते रहें। एक साथ दो काम करना गुनाह तो नहीं है?

लेखिका ममता यादव मल्हार मीडिया वेब न्यूज पोर्टल की संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क 7566376866 या 9826042868 के जरिए किया जा सकता है.

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अंतत: अरेस्ट हो गए चिटफंड कंपनियों पीएसीएल और पर्ल्स ग्रुप के दिग्गज निर्मल सिंह भंगू, सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह और सुब्रत भट्टाचार्य

सीबीआई ने 45 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में पीएसीएल व पर्ल्स ग्रुप के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू तथा इनके तीन सहयोगी एमडी सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह, सुब्रत भट्टाचार्य को गिरफ्तार कर लिया है। इन्हें पोंजी स्कीम केस के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। बताया जा रहा है कि ये लोग लगातार बयान बदल रहे थे और जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे। सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार भंगू के साथ पीएसीएल के प्रमोटर-डायरेक्टर तथा एमडी सुखदेव सिंह, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (फाइनेंस) गुरमीत सिंह तथा ईडी सुब्रत भट्टाचार्य से शुक्रवार को एजेंसी के मुख्यालय में विस्तृत पूछताछ की गई।

इसके बाद सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप है कि इन लोगों ने कृषि भूमि के विकास तथा बिक्री के नाम पर देश भर के 5.5 करोड़ निवेशकों से 45 हजार करोड़ रुपये एकत्रित किए थे। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच दिया गया था। जांच में पता चला है कि आरोपियों ने पीड़ितों को फर्जी भूमि आवंटन पत्र दिए थे। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक छानबीन में भारत तथा विदेश में करोड़ों रुपये की बेनामी संपत्ति के भी दस्तावेज मिले हैं। यह भी पता चला है कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जब पर्ल्स गोल्डेन फॉरेस्ट लिमिटेड (पीजीएफ) को स्कीम बंद करने तथा निवेशकों का रुपया वापस करने का आदेश दिया तो पर्ल्स एग्रोटेक कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) के नाम से वैसी ही दूसरी फर्जी योजना चला दी गई।

इसका ऑफिस नई दिल्ली के बाराखंभा में खोला गया और पीएसीएल से मिले रुपये पीजीएफ के निवेशकों को लौटाने में इस्तेमाल किए गए। लोगों से पैसा ऐंठने के लिए पूरे देश में लाखों कमीशन एजेंट का जाल बिछाया गया था। इन एजेंटों को मोटा कमीशन दिया जाता था। पीएसीएल और इसके प्रमोटर रहे निर्मल सिंह भंगू के खिलाफ ईडी और सीबीआई का शिकंजा लगातार कसता जा रहा था. पिछले महीने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश के कई शहरों में पीएसीएल के दफ्तरों पर छापे मारे थे.

मनी लांड्रिंग रोकथाम कानून के तहत दिल्ली, मुंबई, मोहाली, चंडीगढ़ और जयपुर में छापे मारे गए थे. सन् 2015 में सीबीआई की एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने पीएसीएल के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज किया था. इसके बाद जांच शुरू कर दी थी. पीएसीएल ने रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट के नाम पर बिना पूंजी बाजार नियामक की मंजूरी लिए सामूहिक निवेश योजनाएं यानी पोंजी स्कीम चलाई. इसके जरिए निवेशकों से करीब 45 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए, जिसे वसूलने का आदेश दिया गया था.

सीबीआई जांच से पता चला कि इन्होंने पांच करोड़ निवेशकों को लूटा. कुल 45 हजार करोड़ रुपये निवेशकों से इकठ्ठा किए. बटोरी गई बेहिसाब दौलत को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल किया. इस दौलत का बड़ा हिस्सा विदेश ले गए. ऑस्ट्रेलिया में कारोबार शुरू किया. यूपी में ठगे गए 1.30 करोड़ निवेशक. महाराष्ट्र में लुटे 61 लाख निवेशक. तमिलनाडु में लुटे 51 लाख लुटे निवेशक. राजस्थान में लुटे 45 लाख निवेशक. हरियाणा में लुटे 25 लाख निवेशक.

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खुद को और बरखा दत्त को सोशल मीडिया पर गाली देने वाले को रवीश कुमार ने अपनी कलम के जरिए दिखाया आइना

आपकी गाली और मेरा वो असहाय अंग

कुछ ही तो वाक्य हैं बाज़ार में
जिन्हें तल कर
जिनसे छन कर
वही बात हर बार निकलती है
बालकनी के बाहर लगी रस्सी पर
जहाँ सूखता है पजामा और तकिये का खोल
वहीं कहीं बीच में वही बात लटकती है
जिन्हें तल कर
जिनसे छनकर
वही बात हर बार निकलती है
बातों से घेर कर मारने के लिए
बातों की सेना बनाई गई है
बात के सामने बात खड़ी है
बात के समर्थक हैं और बात के विरोधी
हर बात को उसी बात पर लाने के लिए
कुछ ही तो वाक्य हैं बाज़ार में
जिन्हें तल कर
जिनसे छनकर
वही बात हर बात निकलती है
लोग कम हैं और बातें भी कम हैं
कहे को ही कहा जा रहा है
सुने को ही सुनाया जा रहा है
एक ही बात को बार बार खटाया जा रहा है
रगड़ खाते खाते बात अब बात के बल पड़ने लगे हैं
शोर का सन्नाटा है, तमाचे को तमंचा बताने लगे है
अंदाज़ के नाम पर नज़रअंदाज़ हो रहे हैं हम सब
कुछ ही तो वाक्य है बाज़ार में
जिन्हें तल कर
जिनसे छनकर
वही बात हर बार निकलती है ।
बात हमारे बेहूदा होने के प्रमाण हैं
वात रोग से ग्रस्त है, बाबासीर हो गया है बातों को
बकैती अब ठाकुरों की नई लठैती है
कथा से दंतकथा में बदलने की किटकिटाहट है
चुप रहिए, फिर से उसी बात के आने की आहट है।

अब भाषण सुनिये मित्रों, मैं इन दिनों लंबी छुट्टी पर हूँ । लेकिन उन्हें छुट्टी नहीं मिली जो सोशल मीडिया पर इस न्यूज उस न्यूज के बहाने हमारी अग्निपरीक्षा लेने के लिए आतुर रहते हैं । मुझे खुशी है कि जो लोग वर्षों तमाम चैनलों पर भूत प्रेत से लेकर वहशीपना फैला गए वो आज समादरित हैं । उनसे पत्रकारिता की शान है । वैसे तब भी वही समादरित रहे और आगे भी वही रहेंगे । लोग उन्हीं को देख रहे हैं । वो कब किसी खबर के गुमनाम पहलू को छूकर सोना बन जाते हैं, यह चमत्कार मुझे प्रेरित करने लगा है।

हमें गाली देने वालों को जो तृप्ति मिलती है उससे मुझे खुशी होती है । कम से कम मैं उनके किसी कम तो आता हूँ । अगर किसी को गाली देना संस्कार है तो इसकी प्रतिष्ठा के लिए मैं लड़ने के लिए तैयार हूँ । इसीलिए गाली का एक नमूना लगा दिया । कविता पहले लिखी जा चुकी थी । वर्ना  ये किसी भदेस गाली के सम्मान में लिखी गई कविता हो सकती थी । पहली है या नहीं, पता नहीं । फिर भी मैंने गाली को कविता से पहले रखा है । गाली को साहित्यिक सम्मान भी मैं ही दिलाऊँगा।

जो मित्र मेरे एक खास अंग को तोड़ कर पीओके भेजना चाहते हैं कम से कम अख़बार तो पढ़ लेते । पीओके से जो आ जाते हैं उन्हें तो मारने में चार दिन लग जाते हैं, लिहाज़ा हमारे अंगों को क्षति पहुँचाकर पीओके भेजने वाले मित्र अगर नवाज़ भाई जान से इजाज़त ले ले तो अच्छा रहेगा । कहीं क्षतिग्रस्त अंगों को लेकर सीमा पर इंतज़ार न करना पड़ जाए और उनसे मल न टपकने लगे !  टूटे अंग को डायपर में ले जाइयेगा।

अरे बंधु इतनी घृणा क्यों करते हैं । आपसे गाली देने के अलावा कुछ और नहीं हो पा रहा है तो नवीन कार्यों के चयन में भी मदद कर सकता हूँ । मैं स्वयं और उस अंग की तरफ से भी माफी माँगता हूँ जिसे आप तोड़ देना चाहते हैं । हालाँकि मेरे बाकी अंग स्वार्थी साबित हुए । वे ख़ुश हैं कि बच गए । मैं आपके सामने शीश झुका निवेदन करना चाहता हूँ । आप उस अंग को न सिर्फ मेरे शरीर से, जो सिर्फ भारत को प्यार करता है, अलग करना चाहते हैं  बल्कि मेरी मातृभूमि से भी जुदा करना चाहते हैं । प्लीज डोंट डू दिस टू माई… । आप तो एक सहनशील  मज़हब से आते हैं । वही मेरा धर्म है । इसलिए आप तोड़े जाने के बाद मेरे उस अंग को उस अधिकृत क्षेत्र में न भेजें जो अखंड भारत के अधिकृत नहीं है।

अब तो मुस्कुरा दो यार। गाली और धमकी आपने दी और माफी मैं मांग रहा हूँ । इसलिए कि कोई आपके मेरे धर्म पर असहिष्णुता के आरोप न लगा दे । ट्वीटर पर आपकी इस धमकी भरी गाली ने मुझे कितना साहित्यिक बना दिया । अगर मैं आपके ग़ुस्से का कारण बना हूँ तो अफ़सोस हो रहा है । आशा है आप माफ कर देंगे और वो नहीं तोड़ेंगे जो तोड़ना चाहते हैं।

जाने माने टीवी जर्नलिस्ट और एंकर रवीश कुमार के ब्लाग से साभार.

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सहारा मीडिया के सीईओ और एडिटर इन चीफ उपेंद्र राय की माताजी का गाजीपुर में निधन

यूपी के गाजीपुर जिले से सूचना मिली है कि सहारा मीडिया के सीईओ और एडिटर इन चीफ उपेंद्र राय की माता जी का निधन हो गया है. गाजीपुर के शेरपुर कलां स्थित गांव में माताजी ने आज दिन में दो बजे अंतिम सांस ली. उनकी उम्र 74 साल की थी. वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गई हैं. उनकी दो बेटियां और पांच पुत्र हैं. गांव में कल दिन में बारह बजे अंतिम संस्कार किया जाएगा. उपेंद्र राय की माता जी के निधन से सहारा मीडिया से जुड़े कर्मियों समेत मीडिया जगत के कई लोगों ने शोक संवेदना व्यक्त की और माताजी को श्रद्धांजलि दी.

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मैनेजिंग एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री ने ‘समाचार प्लस’ चैनल से इस्तीफा दिया

यूपी उत्तराखंड केंद्रित रीजनल न्यूज चैनल समाचार प्लस को बड़ा झटका तब लगा जब इसके मैनेजिंग एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया. चैनल की लांचिंग से ही अमिताभ इसके साथ जुड़े हुए थे और चैनल के जाने माने चेहरे बन चुके थे. अमिताभ अग्निहोत्री का प्राइम टाइम डिबेट प्रोग्राम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में काफी पसंद किया जाता था. उनकी नेताओं और सिस्टम पर धारधार टिप्पणियां आम दर्शकों के मन में जगह बना चुकी थीं जिसके कारण अमिताभ अग्निहोत्री की अच्छी खासी फालोइंग हो गई है. माना जा रहा है कि अमिताभ के जाने से समाचार प्लस चैनल के दर्शक वर्ग पर असर पड़ेगा.

अमिताभ अग्निहोत्री चैनल से चार साल बाद गए तो कयास का दौर शुरू हो गया. कुछ लोगों का कहना है कि चैनल के मालिकों में से एक उमेश कुमार यूपी सरकार और वहां के चर्चित मीडिया मैनेजर नवनीत सहगल के इशारे पर चैनल का सरकार विरोधी टोन डाउन करने में लगे हुए थे. इसके पीछे कारण उमेश कुमार द्वारा यूपी सरकार से सुरक्षा समेत ढेर सारी सुविधाओं लाभों को हासिल किया जाना है जिसके वह किसी हालत में छोड़ना नहीं चाहते थे. इसी कारण सत्ताधारी नेताओं व अफसरों के लगातार दबाव के कारण उन्होंने अमिताभ अग्निहोत्री को यूपी सरकार के खिलाफ टिप्पणियां न करने का अघोषित निर्देश दे रखा था, जिसे लेकर अमिताभ नाराज बताए जाते हैं. इन्हीं तमाम किस्म के दबावों व तनावों के मद्देनजर अमिताभ अग्निहोत्री ने चैनल को नमस्ते करना उचित समझा.

इस बारे में जब भड़ास4मीडिया ने अमिताभ अग्निहोत्री से संपर्क किया तो उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफा देने की बात स्वीकार किया और कहा कि चार साल किसी एक चैनल के साथ लंबा वक्त होता है. वहां उन्होंने बहुत कुछ सीखा और बहुत कुछ पाया. वह चैनल से मिले प्यार और सपोर्ट के लिए आभारी हैं. अमिताभ ने बताया कि वह कुछ समय आराम करने के बाद फिर से नई पारी की शुरुआत करेंगे.

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News World India in panic mode; staff salary cut by 10% without advance information

Yashwant Ji, You can be already informed by NewsWorld India staff that Jindal has cut salary of employee without advance information.  Our salary was coming on last day of month and due on Dec 31 for period of 1 to 31 december. but salary got delayed. we got mail that salary of decemebr will come by january 7. but today we shocked to hear that salary of december has been given to us with 10% reduction. on asking it is rumour that salary cut has been direction of Naveen Jindal himself for all staff who get monthly salary of above 25000 rupee.

This illegal action has been done without informing employee in advance and done 6 days after salary was due. if they inform in advance, employees can prepare for expenses of month but they cheat us 200 employee of NewsWorld India. Top management of channel says that all Naveen Jindal companies have faced same salary cut of 10% without advance information due to losses made by JSPL.

In NewsWorld only saving of 20-25 lakh can be made by 10% salary cut. this much naveen jindal spend in each trip of his private jet. even his expense to maintain horses is more than 25 lakh a month. But he never bother how honest and loyal employee will buy ration for home and pay school fee for children in hand to mouth situation. NewsWorld employee are not rich like JSPL employee who get high salary and 10% cut cannot harm their monthly house expense. NewsWorld employee are also media and journalists who can raise objection and not be scared like JSPL employee.

Please expose this illegal act of reduction of salary without advance information as it flout labour laws in India. Naveen Jindal cannot treat media like this. If he has no money left he can shut the channel like he shut Focus Haryana. but cheating media people or any employee like his way is bad and shows double standard.  For cost cutting he can take normal flight or train to save crores. He can sell his horses of crores. He can reduce his lavish expenses for personal likes. how 25 lakh saving by reduction of employee salary help him. They are also firing good employees.

All chanel staff is shocked and angry with this act of JSPL. if they did not have money then why they relaunch NewsWorld India. Naveen Jindal should have closed Focus news like focus haryana and ne. please tell media world through bhadas to get careful with joining naveen jindal channel.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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बलिया के तहसील बेल्थरा रोड के एसडीएम प्रवरशील बरनवाल पर वकीलों ने किया हमला (देखें वीडियो)

बलिया के तहसील बेल्थरा रोड के एसडीएम प्रवरशील बरनवाल पर वकीलों ने हमला कर दिया. बेल्थरा रोड तहसील के वकीलों का एसडीएम पर आरोप है कि एसडीएम साहब बिना पैसा लिए कोई काम नहीं करते. वकीलों का आरोप यह भी था कि हर केस पर एसडीएम साहब पैसा लेने के लिए एजेंट रखे हुए हैं. इस सबको लेकर आज वकील काफ़ी गुस्से में थे.

इन लोगों ने आजमगढ़ अधिवक्ता हत्या कांड को लेकर कार्य का बहिष्कार कर रखा था. फिर भी एस डी एम साहब सुनवाईं में लगे थे. इससे नाराज होकर अधिवक्ताओं की टीम ने एस डी एम कोर्ट में आकर तोड़फोड़ की. जब अधिवक्ता संघ अध्यक्ष दुर्गेश से पूछा गया तो उन्होंने कहाँ कि यह तोड़फोड़ खुद एसडीएम ने करवाया है. 

वकीलों के हमले से एक बहादुर होमगार्ड ने एसडीएम की जान बचाई. जब अधिवक्ता एसडीएम साहब के पास आये तब ये होमगार्ड अपने मालिक का डण्डा लेकर अधिवक्ताओं को पीछे धकेलने लगा और उन्हें बचा लिया. फिर भी एक पत्थर एसडीएम के सिर पर लग गया. उधर, एसडीएम की मानें तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश हैं कि कोई भी न्यायिक सुनवायी नहीं रोक सकता. जो अधिवक्ताओं ने किया है वह गलत किया है.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

sdm attack one

sdm attack two

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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संदीप पाण्डेय को हटाया जाना बीएचयू का साम्प्रदायिक संस्थानीकरण का उदाहरण

: शिक्षण संस्थानों के भगवाकरण का ही अभियान है संदीप पांडे का बीएचयू से निकाला जाना : मैग्सेसे पुरस्कार विजेता गांधीवादी नेता संदीप पांडे काे बनारस हिंदू विश्वविद्‍यालय से बतौर गेस्ट फैकल्टी के बर्खास्त किए जाने के पीछे असल कारण नक्सली होना या राष्ट्र विरोधी होना नहीं है जैसा कि आरोप लगाया गया है बल्कि देश के शिक्षण संस्थानों के भगवाकरण अभियान का हिस्सा है।

देश की साम्प्रदायिक और फासीवादी विचारधारा ने राष्ट्रवाद के मुखौटे में (जो सदा से उसका हथियार रहा है) स्पष्ट रेखा खींच दी है जिसके अनुसार देश के नीच जाति के कहे जाने वाले वर्ग के गरीबों और मज़लूमों के साथ कारपोरेट जगत एंव राज्य की क्रूरता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले उनके रास्ते के सबसे बड़े कांटा हैं और वह उन्हें किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।

संदीप पांडे ने राज्य के भय अभियान की परवाह किए बिना हर तरह का जोखिम उठाते हुए आतंकवाद और माओवाद के नाम पर निर्दोशों के ऊपर किए जाने वाले अत्याचारों के खिलाफ मज़बूती से आवाज़ उठाई है। अपनी सादगी के लिए विख्यात संदीप पांडे ने उस समय आज़मगढ़ का दौरा किया था जब पूरा मीडिया इस जनपद को ‘आतंकवाद की नर्सरी’ बताने के लिए अपनी ऊर्जा लगा रहा था। अंधविश्वास और गैर वैज्ञानिक सोच के खिलाफ उनकी सक्रियता ने साम्प्रदायिक एंव फासीवादी शक्तियों का दुश्मन बना दिया था।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस मानवतावादी को गेस्ट फैकल्टी के बतौर काम करने से रोक कर उसके जनपक्षधर अभियान को कमज़ोर करने का सपना पालने वाले अपने मकसद में कभी कामयाब नहीं हो पाएंगे। हकीकत तो यह है कि इस बर्खास्तगी से उनको अपने मानवतावादी अभियान को गति देने और वैज्ञानिक चेतना के प्रकाश को फैलाने का पहले से ज्यादा समय मिलेगा।

संदीप पांडे लिंगभेद के खिलाफ सशक्त आवाज़ हैं। उन्होंने नारी को देवी कहने का ढोंग भले ही नहीं किया लेकिन जब भी देश की निर्भयाओं का उत्पीड़न हुआ तो वह उसके प्रतिरोध में मैदान में नज़र आए। बीएचयू प्रशासन को मालूम होना चाहिए कि जिसकी तस्वीरों से तुम्हें डर लगता है संदीप पांडे उसके लिए मैदान में लड़ता है।

Masihuddin Sanjari
Rihai Manch

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बलिया में सिपाही ने की अवैध वसूली की शिकायत तो एसपी ने किया सस्पेंड, आहत सिपाही ने दिया इस्तीफा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नरही थाने के पिकेट पर हो रही अवैध वसूली की शिकायत करना एक सिपाही को महंगा पड़ गया. एसपी ने शिकायत करने वाले सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. इससे आहत निलम्बित सिपाही ने पुलिस हेड क्वार्टर इलाहाबाद को अपना त्याग पत्र भेज दिया है. उसने जान-माल की सुरक्षा की गुहार भी की है.

नरही थाने पर चंद दिनों पहले तैनात हुए सिपाही संतोष कुमार वर्मा का कहना है कि 03 जनवरी की रात 09 बजे से भरौली चेक पोस्ट पर उनकी ड्यूटी लगी थी. वे जब ड्यूटी पर पहुंचे तो वहां एक व्यक्ति द्वारा अवैध गाड़िया चेक पोस्ट से पार करायी जा रही थी. इसका विरोध करते हुए सिपाही संतोष कुमार ने उक्त व्यक्ति को पकड़कर थाने के एसएचओ को सूचित किया. एसएचओ मौके पर पहुंचे और उक्त व्यक्ति को आजाद करते हुए सिपाही संतोष को ही जबरिया थाने लेकर चले आये.

जब इसकी शिकायत सिपाही ने एसपी से की तो एसएचओ रामरतन सिंह भड़क गये. सिपाही का आरोप है कि एसएचओ ने उसे न सिर्फ गालियों से नवाजा, बल्कि उसके मुंह पर जबरदस्ती शराब गिराकर पीएचसी के चिकित्सक से मेडिकल भी करवाया. हद तो तब हो गयी जब एसपी अनीस अहमद अंसारी ने सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. सिपाही पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा है. विभाग से मिले इस प्रतिदान से आहत और निलम्बित सिपाही ने अपना त्याग पत्र पुलिस हेड क्वार्टर को भेज दिया. सिपाही ने कहा कि वह रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल लूँगा लेकिन पुलिस की नौकरी नही करूँगा क्योकि यहाँ सच्चाई की कोई कीमत नहीं.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

sipahi ne diya estifa one

sipahi ne diya estifa two

sipahi ne diya estifa three

sipahi ne diya estifa four

sipahi ne diya estifa five

sipahi ne diya estifa six

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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IBF urges Centre to grant Infrastucture Status to Broadcasting Industry

January 6, 2016 New Delhi: The Indian Broadcasting Foundation (IBF) today urged the Union Government to grant “Infrastructure Status” to the Broadcasting Industry, including DTH and Cable sectors, to push the digitisation agenda. At a pre-Budget consultation meeting, chaired by Union Finance Minister Shri Arun Jaitley, IBF stressed that the expected investment in STBs (set-top boxes) and optical fibre network alone would be to the tune of Rs 25,000 to Rs 30,000 crores.

“In the present era of convergence, distinction between Telecom, IT and Broadcasting sectors is getting blurred. Telecom is already treated as an ‘infrastructure service’. Broadcasters and distribution platforms will be aided with better and affordable financing options in the present capital-intensive growth  phase if Broadcasting sector is accorded infrastructure status. This will also provide a level playing field to the broadcasting sector with telecom and ISP industry,” IBF Secretary General Girish Srivastava said at the high level meeting.

The Foundation also urged the Government to reduce customs duty on set-top boxes to 5% from the present 10%. “The Finance Act, 2013 had increased customs duty on STBs to 10% from earlier 5%. In order to push digitisation, customs duty on STBs should be reduced to the earlier level of 5% if not entirely removed,” Srivastava said.

On the direct tax front, IBF urged the Finance Ministry to allow carry forward of losses in case of amalgamation/merger. “Currently all industrial undertakings in manufacturing, software, electricity and telecom sectors are allowed carry forward of losses in case of merger/amalgamation. Media and Entertainment industry should be granted a similar status by amending Section 72(A)(7)(aa) of the Income Tax Act,” IBF said in its presentation.

Another proposal presented by IBF related to tax withholding on transponder charges. Finance Act, 2012 retrospectively included payment of transponder hire and other charges as royalty. However, these are not regarded as royalty under DTAA definition of royalty. IBF requested the Ministry of Finance that the definition of royalty under the Indian Income Tax Act and Treaty (DTAA) be aligned so that the credit of withholding tax is available to the foreign satellite serice providers.

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नेशनल बुक ट्रस्ट का चेयरमैन बनने के बाद भी बलदेव भाई शर्मा नहीं छोड पा रहे हैं अखबार के सम्पादक पद का मोह

नोएडा । नेशनल दुनिया के वरिष्ठ स्थानीय सम्पादक बलदेव भाई शर्मा की कारगुजारियों के कारण इस समय अखबार की स्थिति पहले से ज्यादा खराब हो गयी है। इसके पीछे सबसे बडा कारण यह माना जा रहा है कि बलदेव भाई शर्मा जबसे नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बने हैं, वह अखबार को बिल्कुल भी समय नहीं दे रहे हैं। अखबार के सम्पादक पद का मोह भी उन्हें इस पद को नहीं छोडने दे रहा है। अखबार के नाम पर उन्हें टीवी पर होने वाली डिबेट के लिए शेखी बघारने और भाजपा सरकार की बटरिंग करने का मौका मिल जाता है।

सूत्रों की मानें तो बलदेव भाई और उनके चाटुकारों ने अखबार के मालिक को राज्यसभा सदस्य बनवाने का लालच दिया हुआ है, जिसके कारण अखबार के मालिक ने बलदेव भाई की कारगुजारियों के प्रति अपनी आंखे फेर ली हैं। जिस समय बलदेव नेशनल दुनिया में धोती की लांग टांग कर आये थे, उस समय इस अखबार में इनकी हैसियत एक साधारण कर्मी की थी। धीरे-धीरे इन्होंने अखबार के मालिक शैलेंद्र भदौरिया की महत्वाकांक्षा का आकलन किया। इसके बाद बलदेव भाई ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिर तो देखते ही देखते नेशनल दुनिया के सम्पादकीय विभाग के सभी योद्धाओं को बर्फ में लगा दिया और अखबार के वरिष्ठ स्थानीय सम्पादक के पद पर विराजमान हो गये।

नेशनल दुनिया में नम्बर वन की पोजीशन लेने के बाद इन महाशय को टीवी वाले भी डिबेट आदि में बुलाने लगे। टीवी पर इन्होंने भाजपा और सरकार का इतना गुणगान किया कि मोदी सरकार ने इन्हें नेशनल बुक ट्रस्ट का चेयरमैन बना दिया। जबसे इस पद पर बलदेव भाई तैनात हुए हैं, नेशनल दुनिया के नोएडा कार्यालय में इनकी उपस्थिति न के बराबर है। इस कारण अखबार की हालत पहले से ज्यादा खराब हो गयी। अखबार का सम्पादकीय भी कोई और लिखता है। शेखी बघारने के लिए बलदेव अक्सर कहते हैं कि मैं तो सम्पादक पद से मुक्त होना चाहता हूं, लेकिन भदौरिया का प्यार उन्हें इस अखबार को नहीं छोड़ने देता। बलदेव भाई इस समय दो पदों के उत्तरदायित्तव को निभा रहे हैं, लेकिन किसी भी पद पर अभी खरे नहीं उतरे हैं। बलदेव भाई एक समय लोकसभा के सीईओ व संपादक पद का इंटरव्यू भी दे चुके हैं जिसमें वे सफल नहीं हो पाए थे।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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डीएनए इंडिया की एक खबर का पोस्टमार्टम : खबरों में विचार घुसेड़ने की पत्रकारिता कहां सिखाई जाती है…

खबर और विचार बिल्कुल अलग चीजें हैं। पत्रकारिता की पहली सीख होती है, खबर में विचारों का घालमेल ना हो। उसपर कोई राय भी ना दी जाए। संपादित खबरों को यथासंभव जस का तस प्रस्तुत कर दिया जाए। निर्णय लेने या विचार बनाने का काम पाठकों पर छोड़ दिया जाए। पत्रकारिता के ह्रास के साथ साथ खबरों और विचारों का अंतर भी खत्म होता जा रहा है। पत्रकारिता में विचारों की बेईमानी वैसे ही मिलाई जा रही है जैसे दूध में मिलाया गया पानी मिनरल वाटर है। आज इस शीर्षक पर नजर गई तो लगा कि यह कौन सी पत्रकारिता है और क्या यह आम पाठक के लिए की जा रही है। खबर का शीर्षक ही – एक उद्देश्य की पूर्ति करता लगता है।

उद्देश्य क्या है – सब समझते हैं। फिर भी यह बेशर्मी हो रही है तो क्या मुफ्त में। कायदे-सिद्धांतों, नीति-नियमों की बलि मुफ्त में क्यों चढ़ाई जा रही है। कहीं उद्देश्य और लक्ष्य बड़े तो नहीं है। इसपर कौन ध्यान देगा। स्टेकधारकों को ही परवाह नहीं है तो दूसरे क्यों चिन्ता करें। आइए इस खबर पर नजर डालते हैं। माफ कीजिएगा, मैंने अंग्रेजी की खबर ली है। हिन्दी की भी ले सकता था। पर वहां हालत और बुरी है। सुधार की उम्मीद और संभावनाएं बिल्कुल अलग हैं। इसलिए मैं हिन्दी की बात करना ही नहीं चाहता। यह मेरा निजी पूर्वग्रह भी हो सकता है। पर जिस ढंग से अंग्रेजी की अनूदित खबरें हिन्दी में उपयोग होती है या हिन्दी अखबारों में नौकरी की पहली शर्त अनुवाद की योग्यता होती है – इसलिए, मुझे लगता है कि अंग्रेजी की खबर की चर्चा करना अनुचित या व्यर्थ नहीं है।

यह खबर डीएनए इंडिया की है पर पीटीआई की बताई जा रही है। नीचे लिंक दिया है। कृपया नोट करें कि खबरें संपादित की जाती रहती हैं और बाद में बदल सकती हैं। मैंने जो खबर ली है वह यहां कॉपी पेस्ट है। मेरे ख्याल से शीर्षक में Odd-Even Effect: Rajiv Chowk picture was fake but, का प्रयोग एक उद्देश्य के लिए है और यह खबर का भाग नहीं है। खबर दरअसल यह है कि ऑड ईवन प्रयोग शुरू होने से दिल्ली मेट्रो में यात्रियों की संख्या बढ़ गई है और शीर्षक “Delhi metro got additional 2 lakh commuters” पर्याप्त था। चाहते तो ऑड ईवन की चर्चा भी की जा सकती थी पर फर्जी फोटो से जोड़ना उसकी ‘जरूरत’ बताने की कोशिश लगता है।

Odd-Even Effect: Rajiv Chowk picture was fake, but Delhi metro got additional 2 lakh commuters

Date published: Tuesday, 5 January 2016 – 7:05pm IST | Place: New Delhi | Agency: PTI

On Monday, a picture showing a jam packed Rajiv Chowk metro station went viral on social media prompting Delhi Metro Rail Corporation Chief Mangu Singh to clarify that it was an old image.

Delhi Metro’s ridership went up by two lakh on Monday, the first full-fledged working day since the odd-even scheme for movement of vehicles came into force in the national capital, even as DMRC officials said the train service has previously witnessed larger riderships.

खबर का पहला पैराग्राफ तो शीर्षक की पुष्टि करता है लेकिन आगे जो जानकारी है वह शीर्षक को बेमतलब बना देती है। आड ईवन से जोड़ कर जो साबित करना था वह तो हो ही नहीं रहा है। तथ्य यह है कि दिल्ली मेट्रो में इतनी राइडरशिप ऑड ईवन के बिना भी रही है। तो कायदे से खबर यही होनी थी। जो खबर दी गई है वह तो खबर है ही नहीं। राइडर शिप तो ऑड ईवन के बिना भी घटती बढ़ती रही है। दिल्ली में दरअसल इन दिनों छुट्टियां रहती हैं और काफी लोग शहर से बाहर हैं। इसलिए सोमवार यानी चार जानवरी को भले ऑड ईवन पॉलिसी का पहला दिन माना गया हो पर वह असल में था नहीं। सड़क पर गाड़ियां तो इसके असर से कम रहीं पर कार पूल और अन्य कारणों से (मेट्रो में भी यात्री बढ़े ही) और खबर अगर किसी लक्ष्य से नहीं की जाती तो आगे की जो खबर है उतनी ही होनी चाहिए थी। यही प्रमुख बात है, यही सूचना है और यही पाठकों की दिलचस्पी की चीज है। पर जबरन पाठक की दिलचस्पी अपनी दिलचस्पी के अनुसार मान ली गई है।  

Although at 28,19,657 on Monday, the figure was a good two lakh above the average daily ridership of 26 lakh, metro officials say it was nothing unusual as every first working day of the week sees such large passenger volume. As per official data, three of the last five working Mondays saw more passengers travelling on the network than yesterday. On December 21, ridership had touched 28,88,128.

On Blue Line (Line 3/4), considered as one of the most busiest corridors, four of the five Mondays had saw more ridership. On December 21, it was 10,61,814 as opposed to yesterday’s 10,09,105

देखिए यह सूचना कितनी दिलचस्प, नई या अनूठी है। पर दब गई या दबा दी गई। आगे पता चलेगा कि यह खबर दिल्ली मेट्रो के बयान पर आधारित है। बचाव यह हो सकता है कि मेट्रो ने ऐसी ही खबर दी थी। 

“Delhi Metro was successful in handling the expected huge rush on all its lines, on the first working Monday of the year. All necessary measures were already planned in advance and were in place to manage any additional rush of passengers. All lines and stations were thoroughly monitored throughout the day,” DMRC said in a statement.

During the 15-day odd-even trial, DMRC has planned to run 70 additional trips daily, taking the total figure to 3,192 to handle passenger rush.

यह बयान है। दिल्ली मेट्रो अपनी सफलता बता रहा है – पाठक को इससे क्या मतलब। यह तो मीडिया वालों की सूचना के लिए है। जिसने धक्के खाए या नहीं खाए या तस्वीर देख ली उसके लिए यह सब पढ़ने की नहीं, अनुभव करने की चीज है। फिर भी।

डीएनए की खबर का लिंक नीचे है>


लेखक संजय कुमार सिंह मीडिया विश्लेषक हैं. आप जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. अनुवादक के बतौर लंबे समय से आत्मनिर्भर पत्रकार हैं. सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता के जरिए मीडिया व राजनीति के विभिन्न उलझे सुलझे पहलुओं पर अपने नजरिए से लिखते पढ़ते रहते हैं.

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आज है कमलेश्वर का जन्मदिन : तेरह साल पहले मोहम्मद जाकिर हुसैन ने जो इंटरव्यू लिया था, उसे आज फिर पढ़ें

12 जनवरी 2003 को प्रख्यात कथाकार कमलेश्वर भिलाई गए थे। तब पत्रकार मोहम्मद जाकिर हुसैन ने उनका एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू लिया था। वह तब ”हरिभूमि” में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था। आज 6 जनवरी को स्व. कमलेश्वर जी का जन्मदिन है। पूरा इंटरव्यू आज की परिस्थिति में भी बेहद प्रासंगिक है। जो पढ़ चुके हैं वो दुबारा पढ़ें और जो नए हैं वो जरूर पढ़ें।

इंदिरा गांधी नहीं गायत्री देवी पर केंद्रित थी मेरी ‘आंधी ‘

प्रख्यात कथाकार व पत्रकार कमलेश्वर से एक्सक्लुसिव इंटरव्यू

मोहम्मद जाकिर हुसैन

भिलाई, 12 जनवरी 2003 । प्रख्यात साहित्यकार व पत्रकार कमलेश्वर का मानना है कि साहित्य कोई क्रांति नहीं ला सकता बल्कि क्रांति लाने वालों का मार्गदर्शन भर कर सकता है। बहुचर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ के बेस्ट सेलर बनने से उन्हें अपने उद्देश्यों की पूर्ति का संतोष है। इंदिरा गांधी पर केंद्रित माने जाते रहे बहुचर्चित उपन्यास ‘काली आंधी’ के संबंध में कमलेश्वर का कहना है कि उन्होंने यह उपन्यास इंदिरा गांधी से प्रभावित होकर नहीं बल्कि जयपुर की महारानी गायत्री देवी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लिखा था। इन दिनों इंदिरा गांधी पर ही महत्वाकांक्षी फिल्म का लेखन कर रहे कमलेश्वर मानते हैं कि सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और सीमांत गांधी पर भी फिल्म बननी चाहिए। कमलेश्वर के मुताबिक छत्तीसगढ़ में श्रेष्ठ साहित्य लिखा जा रहा है क्योंकि यहां के लोग बाजारवाद से दूर हैं। छत्तीसगढ़ी बोली में भाषा बनने की उन्हें पूरी संभावनाएं नजर आती है। इन दिन गुजरात त्रासदी पर केंद्रित उपन्यास लिख रहे कमलेश्वर से उनके भिलाई प्रवास के दौरान विशेष चर्चा हुई।


0 दो वर्ष पूर्व लिखा गया आपका उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ आज भी बेस्ट सेलर है। जिन उद्देश्यों को लेकर आपने उपन्यास लिखा, क्या आप उसमें सफल रहे?

00 इस उपन्यास को जितना विशाल व विराट पाठक समुदाय मिला, उससे निश्चित ही संतोष हुआ। हिंदी में इसके 9 संस्करण निकल चुके हैं और मराठी, उर्दू, बांग्ला व उडिय़ा में इसका अनुवाद हुआ। कई जगह यह किताब ‘ब्लैक’ में साइक्लोस्टाइल स्वरूप में भी बिकी। मेरा संदेश ज्यादा लोगों तक पहुंचा। इससे लगता है कि मैं अपने उद्देश्य में सफल रहा।

0 आपने (काली ) आंधी जैसी संवेदनशील फिल्म लिखी तो मिस्टर नटवरलाल और राम-बलराम जैसी मसाला फिल्म भी. क्या मसाला फिल्म लिखते हुए कहीं आपको अपने स्तर से समझौता करना पड़ा?

00 कोई समझौता नहीं। अगर मैं व्यावसायिक तरीके से ‘मिस्टर नटवरलाल’ या ‘राम-बलराम’ लिख रहा हूं तो मेरा मकसद अपनी फिल्म को सफल बनाना है। अब इसका मतलब यह नहीं कि मैं गलत करूंगा।

0 आपकी ‘काली आंधी’ में इंदिरा गांधी की छवि दिखती है?

00 ऐसा नहीं है, यह लोगों की गलतफहमी है कि ‘आंधी’ मैंनें इंदिरा गांधी को केंद्र में रख कर लिखी। दरअसल उन दिनों जयपुर में महारानी गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ रही थी। मैं जयपुर गया था चुनाव की रिपोर्टिंग करने। वहां देखा तो गायत्री देवी एक हाथ में नंगी तलवार और सिर पर कलश लिए पूजा के लिए मंदिर जा रही हैं। उनके पीछे हजारों की भीड़ है। उस वक्त मेरे ध्यान में आया कि ऐसी महिलाएं ही राजनीति में आनी चाहिए और इसके बाद मैनें ‘काली आंधी’ लिखना शुरू किया।

0 लेकिन इस पर बनीं फिल्म तो इंदिरा गांधी के जीवन के काफी करीब लगती है?

00 दरअसल जब गुलजार ने ‘आंधी’ बनाने सुचित्रा सेन को चुना तो उसके सामने कोई मॉडल नहीं था। हमनें इंदिरा गांधी, तारकेश्वरी सिन्हा और नंदिनी सत्पथी के चेहरे सामने रखे। जिसमें कहानी के अनुसार सुचित्रा सेन को इंदिरा गांधी की भाव-भंगिमा पसंद आई। इसके बाद सुचित्रा का गेटअप ठीक इंदिरा गांधी की तरह रखा गया, इसलिए लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है।

0 इन दिनों आप इंदिरा गांधी पर केंद्रित महत्वाकांक्षी फिल्म का लेखन कर रहे हैं। क्या आप उसमें इंदिरा के संपूर्ण व्यक्तित्व से न्याय कर पाएंगे?

00 जिस तरह रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ थी उसी तरह यह फिल्म होगी। यकीन मानिए, इसमें इमरजेंसी के हालात, आपरेशन ब्ल्यू स्टार सहित तमाम वह बातें भी होंगी जो इंदिरा के व्यक्तित्व के दूसरे पहलू से भी रूबरू कराती है।

0 क्या मनीषा कोईराला को दर्शक इंदिरा गांधी के रूप में स्वीकार कर पाएगा, जबकि वह ‘छोटी सी लव स्टोरी’ से विवादित हो गई हैं?

00 जिस वक्त कलाकार का चयन करना था हम लोगों ने तब्बू, नंदिता दास सेल लेकर दक्षिण व बांग्ला की कई अभिनेत्रियों के चेहरे व भाव-भंगिमा का अध्यन किया। लेकिन, कंप्यूटर पर मनीषा का चेहरा इंदिरा के काफी करीब लगा। इसलिए उसे चुना गया। जहां तक ‘लव स्टोरी’ वाली बात है तो मैं उस विवाद में पडऩा नहीं चाहता। आखिरकार मनीषा एक कलाकार भी है और विभिन्न किरदारों को निभाना उसका पेशा है।

0 इंदिरा गांधी के अलावा राजनीति में आपको कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं लगता जिस पर आप फिल्म लिखें और वह चले भी?

00क्यों नहीं सुभाषचंद्र बोस हैं, जवाहरलाल नेहरू हैं और फिर सीमांत गांधी भी हैं। इन सब पर फिल्म बननी चाहिए।

0 इन दिनों सैटेलाइट चैनलों पर जो सीरियल आ रहे हैं उनका समाज में कैसा प्रभाव महसूस करते हैं?

00 माफ कीजिएगा, इन सीरियलों से मेरे अपने घर की महिलाएं ‘डि-वैल्यूड’ होती दिखती है। सीरियलों में और खूबसूरत होती सास या बहू को देख कर मुझे लगता है कि इतनी सुंदर तो मेरे घर की महिलाएं भी नहीं है।

0हिंदी की पहली कहानी माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ में ही लिखी थी। लेकिन, आज भी साहित्य के नक्शे में छत्तीसगढ़ का विशेष स्थान नहीं बन पाया?

00 साहित्य में छत्तीसगढ़ का महत्व तो पहले से ही रेखांकित हो चुका है। फिर मैनें पहले ही कहा कि छत्तीसगढ़ के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी और सप्रे जी के बिना हिंदी साहित्य का इतिहास ही लंगड़ा है।

0 फिलहाल छत्तीसगढ़ में जो साहित्य लिखा जा रहा है उस पर आपकी टिप्पणी?

00 यहां छत्तीसगढ़ में तो बहुत अच्छा लिखा जा रहा है। परदेशी राम की कहानियां बहुत अच्छी है। कनक तिवारी, सतीश जायसवाल भी लिख रहे हैं। कबीर पर जितना अच्छा अंक महावीर अग्रवाल ने ‘सापेक्ष’ का निकाला है, मेरी नजर में पूरे भारत में इसकी मिसाल नहीं है। दरअसल छत्तीसगढ़ में इतना अच्छा इसलिए लिखा जा रहा है क्योंकि यहां के लोग बाजारवाद से दूर हैं।

0 यहां मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने का संकल्प व्यक्त किया है। आपकी नजर में छत्तीसगढ़ी बोली के भाषा में तब्दील होने की क्या संभावनाएं हैं?

00 बहुत संभावनाएं हैं। छत्तीसगढ़ी में कोई कमी नहीं है। दरअसल जब तक तमाम क्षेत्रीय सहयात्री भाषाएं पुष्ट होकर सामने नहीं आएंगी तब तक हिंदी समृद्ध नहीं होगी।

0 यहां छत्तीसगढ़ में साहित्य के क्षेत्र में दो लाख रुपए का पुरस्कार विवादित हो गया है। आरोप है कि राज्य के सांस्कृतिक सलाहकार अशोक बाजपेयी के खेमे  से कथित रूप से जुड़े लोगों (विनोद कुमार शुक्ल और कृष्ण बलदेव वैद्य) को ही इस पुरस्कार से नवाजा गया। आपकी क्या राय है?

00अगर साहित्यकारों को सम्मान मिल रहा है तो ये अच्छी बात है। बाकी बेवजह की बातों में कुछ रखा नहीं है।

0आज साहित्य में क्रांति जैसी बातें सुनाई नहीं देती?

00 दरअसल साहित्य से क्रांति नहीं होती है बल्कि जो लोग क्रांति कर सकते हैं साहित्य उनके काम आता है।

0 साहित्य में किसी वाद या एजेंडे का लेखन क्या मायने रखता है?

00 एजेंडे का लेखन गलत है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श यह सब क्या है? यह सब ज्यादा दूर तक नहीं चल सकता।

0 प्रारंभिक दिनों में आपने पेंटर का काम भी किया और आपका हस्तलेखन बहुत ही कलात्मक है। क्या आज भी पेंटिंग के शौक से रचनात्मक स्तर पर जुड़े हैं?

00 नहीं पेंटिंग तो अब नहीं करता। क्योंकि एमएफ हुसैन पेंटिंग को जिस ऊंचाई तक ले गए हैं उसके बाद मुझे लगा कि यह मेरे काम की चीज नहीं है। वैसे मेरा मानना है कि क्रिएटिव ग्रेटनेस किसी भी काम को निरंतर करने से कायम रहती है।

0 आपके समकालीन और पूर्ववर्ती में ऐसे कौन से व्यक्तित्व हैं, जिन्हे देख कर आपको लगता है कि ऐसा नहीं बन सका?

00 ऐसा तो कोई भी नहीं। क्योंकि मुझे अपने आप पर भरोसा था। हां, प्रभावित जरूर रहा हूं। गणेश शंकर विद्यार्थी से, प्रेमचंद से और निराला के 3 उपन्यासों से।

0 प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने गोवा चिंतन में जो हिंदूत्व की परिभाषा दी है उससे आप कितना इत्तेफाक रखते हैं?

00 यह तो उनके लिए बड़ी सुविधाजनक चीज है। आप बताईए आखिर हिंदुत्व है क्या चीज? उनके अडवाणी, तोगडिय़ा, सिंघल, मोदी और ठाकरे सब का हिंदुत्व अलग-अलग है। पहले बाजपेयी ने अमरीका में खुद को संघ का सच्चा स्वयंसेवक कह दिया फिर भारत आकर संघ का मतलब भारत संघ बता दिया। अब गोवा चिंतन आया है तो यह सब उनकी सुविधा के हिसाब से है। कम शब्दों में कहूं तो एक मित्र ने कहा है-‘बाजपेयी जी आपने घुटने तो बदलवा लिए लेकिन देश के घुटने तोड़ दिए।’ गुजरात को लेकर अमरीका में बाजपेयी और इंग्लैंड में अडवाणी ने जब शर्मिंदगी का इजहार किया तो फिर गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी में कैसे चले गए? अभी प्रवासी दिवस मनाया गया। इसमें उन्हीं लोगों को बुलाया गया जो थ्री पीस के नीचे भगवा पहनते हैं। पहले उनके लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। अब अप्रवासी भारतीयों के साथ इसे अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवाद का नाम दिया जा रहा है। यह भी हिंसक हिंदुत्व का दूसरा रूप है।

0 तो आखिर हिंदुत्व है क्या?

00 दरअसल हिंदुत्व तो सावरकर की किताब से पैदा होता है। जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। तो फिर इसे वही लोग ‘डिफाइन’ करें।

0 प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश से क्या खतरा देखते हैं?

00 खतरा तो अंग्रेजी पत्रकारिता को होगा, हिंदी पत्रकारिता को नहीं। हां, इससे भाषाई भगवाकरण का खतरा जरूर बढ़ रहा है।

0 इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?

00 एक उपन्यास लिख रहा हूं। गुजरात में जो मानवीय त्रासदी हुई, यह उसी पर आधारित है।


कमलेश्वर (पूरा नाम-कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना) का जन्म 6 जनवरी 1932 को मैनपुरी उत्तरप्रदेश में हुआ। लेकिन, वे अपनी उम्र के साथ भारत की पिछले पांच हजार वर्षों की सांस्कृतिक उम्र को जोडऩा कभी नहीं भूलते। अपनी स्कूली पढ़ाई के बाद कमलेश्वर ने इलाहाबाद से इंटर-बीए और फिर हिंदी में एमए की पढ़ाई पूरी की। उनका पहला उपन्यास ‘एक सडक़ सत्तावन गलियां’ पहले ‘हंस’ में और फिर ‘बदनाम गली’ शीर्षक से भी छपा। उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद जीविका के लिए कुछ ऐसे कार्य भी किए जो अब बेहद अविश्वसनीय लग सकते हैं। मसलन किताबों एवं लघु पत्र-पत्रिकाओं के लिए प्रूफ रीडिंग, कागज के डिब्बों पर डिजाइन और ड्राइंग बनाने का काम,ट्यूशन पढ़ाना, पुस्तकों की सप्लाई से लेकर चाय के गोदाम में रात की पाली   में चौकीदारी तक शामिल है। सन 1948 में पहली कहानी ‘कॉमरेड’ से लेकर अब तक इनकी साहित्यिक यात्रा में ढेरों कहानियां, उपन्यास, यात्रा संस्मरण, नाटक व आलोचनाएं प्रकाशित हो चुके हैं। पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक (1967-78)के रूप में उन्होंने हिंदी कहानी के समानांतर आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके कई उपन्यास छपने से पहले पत्रिकाओं में छप कर चर्चित हुए हैं साथ ही फिल्मों के लिए भी उन्होंने खूब लिखा। उनके उपन्यास ‘काली आंधी’ पर गुलकाार ने ‘आंधीझ् नाम से बेहद सशक्त फिल्म बनाई। इसके अलावा उन्होंने मौसम, अमानुष, फि र भी, सारा आकाश जैसी कलात्मक फिल्मों से लेकर ‘मि. नटवरलाल’,’सौतन’,’द बर्निंग ट्रेन’ और ‘राम-बलराम’ जैसी मसाला फिल्मों सहित उन्होंने कुल 99 फिल्मों के लिए लेखन किया। इन दिनों वे इंदिरा गांधी पर बनने वाली महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए लेखन कार्य में जुटे हुए हैं। दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक (1980-82) रहने के अलावा उन्होंने मीडिया के समस्त क्षेत्रों में काम किया है। दूरदर्शन के लिए अछूते विषयों और सवालों से पूरे देश को झकझोर देने वाले ‘परिक्रमा’ कार्यक्रम (जिसे यूनेस्को ने दुनिया के 10 सर्वश्रेष्ठ टेलीविजन कार्यक्रम माना था) में कमलेश्वर ने ज्वलंत मुद्दों पर खुली और गंभीर बहस करने की दिशा में साहसिक पहल की थी। बीसवीं सदी अवसान की बेला में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ आज भी बेस्ट सेलर है। अपने आखिरी दिनों तक उन्होंने राष्ट्रीय दैनिक में संपादन के अलावा स्वतंत्र लेखन के साथ निजी टीवी चैनल को वे सेवाएं दीं।  27 जनवरी 2007 को फरीदाबाद में देहावसान हो गया।

पत्रकार और लेखक Mohd. Zakir Hussain से संपर्क 09425558442 के जरिए किया जा सकता है. मोहम्मद जाकिर हुसैन का अपना ब्लाग www.BhilaiSe.blogspot.in भी है.

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एमपी पुलिस का शर्मनाक चेहरा : तीन पत्रकारों से इस कदर बदतमीज़ी और बेइज़्ज़ती…

सिवनी (मध्य प्रदेश) : नया साल इस तरह से पुलिस के नये चेहरे को लेकर आयेगा इसका भान सपने में भी नहीं था। पुलिस के द्वारा 31 दिसंबर और 01 जनवरी की दर्म्यानी रात में दो जिम्मेदार संपादकों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया है उसको पाठकों के समक्ष रखा जा रहा है अब पाठक ही फैसला करें और अपना निर्णय दें।

0 वर्ष 2015 की आखिरी रात में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक लिमटी खरे, दैनिक हिन्द गजट के संपादक शरद खरे एवं एक अन्य कर्मचारी सादिक खान रोज़ की तरह ही लगभग साढ़े ग्यारह पौने बारह बजे सिवनी जिला मुख्यालय में सर्किट हाउस चौराहे के बारापत्थर स्थित अपने कार्यालय से घर को रवाना हुये।

0 सर्किट हाउस चौराहे पर खाकी वर्दी वाले सिपाहियों के द्वारा दोनों के दो पहिया वाहनों को रोका गया। इसके बाद यातायात प्रभारी जगोतनी मसराम के द्वारा दोनों को नये साल की बधाईयां दी गयीं। इसी बीच नगर पुलिस अधीक्षक राजेश तिवारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने भी बाकायदा गर्मजोशी के साथ नये साल की बधाईयां लीं और दीं। राजेश तिवारी के द्वारा पूछा गया कि क्या हो गया कैसे रूके हैं? इसके जवाब में हमने बताया कि पुलिस ने गाड़ी रोकी है, रूटीन चैकिंग है, अभी कागज़ वगैरह दिखाकर चले जायेंगे।

0 राजेश तिवारी के द्वारा मौके पर तैनात पुलिस को निर्देश दिये जाते हैं। इसके बाद हमने राजेश तिवारी को बताया कि ये वे ही अधिकारी (रघुराज चौधरी) हैं जिन्होंने 25 दिसंबर को भी हमारी गाड़ी रोककर जमकर हुज़्ज़त की थी। पांच सौ रूपये का चालान काटा जा रहा था। हमने पांच सौ दिये पर चालान नहीं काटा गया। हमने बताया कि उस दिन भी इनके (रघुराज चौधरी) के द्वारा बदतमीज़ी की गयी थी।

0 इसी बीच दैनिक हिन्द गजट के संपादक शरद खरे ने सीएसपी का ध्यान आकर्षित कराया कि रघुराज चौधरी इस समय भी लोगों से बदतमीज़ी से बात कर रहे हैं। इस पर सीएसपी ने पूछा कि आप कौन हैं। हमने बताया कि ये दैनिक हिन्द गजट के संपादक हैं। फिर क्या था, अमूमन शांत चित्त और धीर गंभीर रहने वाले सीएसपी राजेश तिवारी हत्थे से उखड़ गये और उन्होंने यातायात प्रभारी को निर्देश दिये कि इन दोनों (जबकि मौके पर हम तीन लोग थे) का मुलाहजा कराओ।

0 सर्किट हाउस चौराहे पर सीएसपी राजेश तिवारी इस कदर चीख रहे थे मानो वे आम जुआरी, सटोरिये या जरायमपेशा व्यक्ति से बात कर रहे हों। इसके बाद शातिर बदमाशों की तरह पुलिस ने दोनों संपादकों को यातायात पुलिस के वाहन में बैठाया और लेकर कोतवाली चले गये। कोतवाली में दोनों जिम्मेदार संपादकों को इस तरह बैठाया गया मानो वे शातिर चोर या अपराधी हों।

0 इसके बाद सीएसपी कोतवाली पहुंचे और उन्होंने यातायात प्रभारी को फिर डांट पिलायी कि दोनों के साथ क्या बातें कर रहीं हैं। जाकर मुलाहजा करवाओ और अगर कोई बात हो तो धारा 353 का मामला कायम कर दो। दोनों संपादक पुलिस के इस बर्ताव से बेहद आश्चर्य में थे।

0 जब दोनों को लेकर पुलिस अस्पताल पहुंची तब वहां मौजूद चिकित्सक के द्वारा मुलाहज़ा फार्म पढ़ा ही जा रहा था कि अचानक ही एक सिपाही प्रकट हुए और उन्होंने चिकित्सक को मोबाईल देते हुये कहा कि टीआई साहब से बात कर लें। चिकित्सक ने नगर कोतवाल से बात की और बिना किसी परीक्षण के ही मुलाहज़ा फार्म भर दिया गया। दोनों संपादकों के द्वारा बार बार आग्रह किया जाता रहा कि उनका रक्त परीक्षण कराया जाये ताकि पता लग सके कि हकीकत क्या है? इसके जवाब में चिकित्सक ने कहा कि साहब से बात हो गई है, हमारे यहां रक्त परीक्षण नहीं होता है। चिकित्सक के द्वारा महज़ दो लाईन में लिख दिया गया कि कंज्यूम्ड अल्कोहल बट नॉट एंटॉक्सीकेटेड अर्थात अल्कोहल का सेवन किया है पर नशे में नहीं हैं।

0 इसके बाद दोनों को फिर शातिर बदमाशों की तरह यातायात पुलिस के वाहन में कोतवाली ले जाया गया। कोतवाली में पुलिस अधीक्षक के सामने चर्चा हुयी। सुलझी सोच के धनी पुलिस अधीक्षक ए.के. पाण्डेय के द्वारा मामले की जानकारी ली गयी। उन्होंने 25 दिसंबर और 31 दिसंबर के वीडियो फुटेज़ मांगे। इसके बाद रात लगभग ढाई बजे दोनों को बिना किसी अपराध की कायमी के छोड़ दिया गया।

0 इस पूरे मामले को क्या माना जाये। इस तरह की हरकतों से सुलझी सोच के धनी शांत चित्त सीएसपी राजेश तिवारी आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं?

0 समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के कैमरापर्सन का कैमरा पांच अक्टूबर को छुड़ा लिया गया था। इसकी शिकायत पुलिस में दर्ज़ है। रात डेढ़ बजे कैमरा पर्सन को एसडीओपी के द्वारा थाने बुलाया जाता है, हम भी साथ जाते हैं। रात को जबरन ही परेशान किया जाता है। इसके बाद सीएसपी राजेश तिवारी ने हमें फोन कर बताया कि कैमरा मिल गया है और कैमरा पर्सन को वापस कर दिया गया है, जब तहकीकात हुयी तो बात गलत निकली।

0 इसके बाद दैनिक हिन्द गजट कार्यालय पर 14 फरवरी को बम पटकने के आरोपी हिन्द गजट आते हैं, वाद विवाद करते हैं। इसकी सूचना नगर कोतवाल को दी जाती है। रात एक बजे फिर शांत चित्त एसडीओपी राजेश तिवारी का फोन आता है। उन्हें कहा जाता है कि हम नींद में हैं। हमने इसकी सूचना आई.जी. जबलपुर को उसी समय दी कि हमें जबरन ही देर रात फोन करके परेशान किया जाता है।

0 हमने 33 साल के पत्रकारिता जीवन में नई दिल्ली, रायपुर, भोपाल, रीवा, जबलपुर, नागपुर आदि अनेक प्रदेशों के ख्यातिलब्ध अखबारों में काम किया है। इस दौरान जिन भी जिलों में रहे हैं वहां की पुलिस थानों के रिकॉर्ड से इस बात को तस्दीक किया जा सकता है कि हमारा चाल चलन कैसा है? क्या हम आदतन आपराधिक प्रवृत्ति के हैं? क्या हम सरकारी काम में बाधा डालने के आदी हैं?

0 यह है पूरा घटनाक्रम, आप पाठक ही फैसला करें कि सिवनी में अमन चैन कायम है या फिर कुछ और। अगर आपको लगता है कि पुलिस की कार्यवाही सही है तो आपका फैसला सिर आँखों पर।

लेखक लिमटी खरे वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क limtykhare@gmail.com या फिर 9425011234 के जरिए किया जा सकता है.

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भाजपा और कांग्रेस दोनों अपराधी पार्टियां : जस्टिस काटजू

Markandey Katju : Criminal Organizations… I regard the Congress and the BJP as criminal organizations. In 1984 that criminal gangster Indira Gandhi, who imposed a fake ‘ Emergency’ in 1975 in India in order to hold on to power after she had been declared guilty of corrupt election practices by the Allahabad High Court, an ‘ Emergency in which even the right to life was suspended, and lacs of Indians were falsely imprisoned, was assassinated.

As a reaction, the Congress Party led by Rajiv Gandhi organized a slaughter of thousands of innocent Sikhs, many of whom were burnt alive by pouring petrol or kerosene on them and setting them on fire. When there were protests against this horrendous crime, Rajiv Gandhi said ‘ jab bada ped girta hai, dharti hil jaati hai’ (when a big tree falls, the earth shakes). It is believed that he gave oral instructions to the police not to interfere with the massacres for 3 days (see my blog ‘The 1984 Sikh riots’).

Soon after these horrible massacres, elections to the Lok Sabha was declared, and Congress swept the polls on this emotional wave winning a record 404seats in the 532 seat Lok Sabha, while BJP won only 2 seats.

In 2002 the massacre of Muslims was organized in Gujarat by BJP led by our friend, and the result was that BJP has been regularly winning the Gujarat elections ever since, and has even won the Lok Sabha elections in 2014.

So the message which has been sent is loud and clear : organize massacre of some minority in India, and you will sweep the polls. Never mind how much misery you cause to many people.

Are not the Congress and BJP, and even many smaller political parties, which are responsible for horrible deeds and for systematically looting the country of a huge amount of money for decades, and for causing such terrible sufferings and misery to the people, criminal organizations, most of whose members deserve the gallows?

देश के शीर्षस्थ चर्चित न्यायाधीश रहे और अपनी बेबाक बयानी व बेबाक लेखनी के लिए विख्यात जस्टिस मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

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Great Injustice to Urdu in India


भारत में क्रांति के लिए माहौल तैयार… वजह गिना रहे हैं जस्टिस काटजू

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रीता बहुगुणा को परेशान करने के लिए फेसबुक पर कट्टरपंथी हिंदूदवादी ग्रुप ने किया कारनामा, मुकदमा दर्ज

कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता व विधायक रीता बहुगुणा जोशी ने फेसबुक और कुछ अन्य सोशल मीडिया पर अपने खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री डाले जाने के आरोप में शुक्रवार को अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। रीता ने यहां संवाददाताओं को बताया कि कुछ शरारती और कट्टरपंथी तत्वों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत उनकी फोटो सहित झूठा बयान फेसबुक और कुछ अन्य सोशल नेटवर्किंग साइटों पर पोस्ट किया गया है। इसमें अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए उनका निजी मोबाइल नंबर डाला गया है और लोगों से अपील की गई है कि वे इस पोस्ट को शेयर करें और रीता जोशी को फोन करके परेशान करें।

रीता ने बताया कि इसके खिलाफ उन्होंने हजरतगंज कोतवाली के साइबर अपराध प्रकोष्ठ में मुकदमा दर्ज कराया है। रीता ने कहा कि जो बयान उनके नाम से पोस्ट किया गया है, वह पूर्णतया भ्रामक और झूठा है। यह उनकी छवि बिगाड़ने और हिंदू विरोधी करार देते हुए लोगों को उनके विरुद्ध उकसाने का भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घिनौना प्रयास है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश के विभिन्न चुनावों में मात खाने के बाद भगवा दल अपने प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बना रहा है और वह उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर धार्मिक उन्माद फैलाकर राजनीतिक लाभ उठाना चाहता है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष राज्यसभा सदस्य पीएल पूनिया ने रीता के आरोपों को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि झूठे प्रचार के जरिए कांग्रेस की प्रवक्ता के साथ-साथ पार्टी की छवि बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है।

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राम रहीम की मिमिक्री करने पर जीटीवी चैनल और उसके प्रोड्यूसर व कलाकारों पर दर्ज हुआ केस

कैथल (हरियाणा) : डेरा सच्चा सौदा प्रेमियों की शिकायत पर थाना सिविल लाइन पुलिस ने जीटीवी, इस चैनल पर प्रसारित एक कार्यक्रम के कलाकारों और प्रोड्यूसर पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप में केस दर्ज किया है। डेरा सच्चा सौदा समर्थक गांव ग्योंग निवासी दलशेर सिंह और गांव नौच निवासी उदय सिंह ने पुलिस को दी शिकायत में बताया कि 27 दिसंबर को जीटीवी पर प्रसारित जश्ने उम्मीद कार्यक्रम में बाबा राम रहीम की छवि को खराब करने का प्रयास किया गया। इससे डेरे से जुड़ी संगत की भावनाओं को ठेस पहुंची है।

उनका आरोप है कि प्रसारित कार्यक्रम में एमएसजी फिल्म फिल्म की तरह बाबा राम रहीम की पोशाक पहनकर मोटरसाइकिल पर कलाकार आया। उसने लड़कियों के साथ नाच और शराब का प्रदर्शन किया। जबकि बाबा राम रहीम 112 कार्य ऐसे कर रहे हैं, जो मानवता की भलाई के लिए हैं। मामले में जांच अधिकारी एसआई ईश्वर सिंह ने बताया कि पुलिस ने शिकायत के आधार पर टीवी चैनल सहित कलाकार कीकू शारदा, गौरव गेरा, अगर अली, राजीव ठाकुर, पूजा बनर्जी, मुन्ना राय, गौतम गुलाटी, शाना खान और प्रोड्यूसर समेत कई कलाकारों के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में केस दर्ज किया है। एसपी कृष्ण मुरारी ने बताया कि पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

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दैनिक जागरण नोएडा मीडियाकर्मी आंदोलन : जिला प्रशासन मध्यस्थता को आगे आया

नोएडा। दैनिक जागरण अख़बार में तीन महीने से चल रहे कर्मचारियों के आंदोलन को कुचलने के लिए जागरण संस्थान द्वारा उठाये जा रहे श्रम विरोधी कदमों को गौतम बुद्ध नगर जिला प्रशासन ने भी गंभीरता से लिया है। प्रशासन ने उप श्रमायुक्त के यहाँ चल रही वार्ता को अब अपनी निगरानी में ले लिया है। सिटी मजिस्ट्रेट श्री बच्चू सिंह अब खुद प्रबंधन और जागरण कर्मचारियों के बीच होने वाली वार्ता को संभालेंगे। एडीएम श्री के पी सिंह और पुलिस के अधिकारी भी इस दौरान मौजूद रहेंगे।

जिला प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि जागरण प्रबंधन नियमों को ताक पे रखकर जाँच नहीं करेंगे। कर्मचारियों का उत्पीड़न सहन नहीं किया जायेगा। इस मसले पर जिला प्रशासन के कहने पर उपश्रमायुक्त ने जागरण प्रबंधन से भी फ़ोन पर बात की। वार्ता में हिसार, लुधियाना, जालंधर और धर्मशाला के कर्मचारियों के भी कर्मचारियों की भी बात हुई।

दरअसल, रविवार को जागरण के करीब 200 निलंबित व बर्खास्त कर्मचारी डीएम आवास पे धरना देने पहुंचे थे। छुट्टी का दिन होने के बावजूद सुबह से ही पूरे प्रशासन में इस बात से हड़कंप मचा हुआ था। ऐहतियातन वज्र वाहन समेत वह सभी मुक्कमल इंतजामात डीएम आवास के बाहर किये गए थे जो आमतौर पर किसी धरने या प्रदर्शन से निपटने के लिए किये जाते हैं।

डीएम श्री एन पी सिंह ने सुबह से ही इस मामले में मोर्चा संभाल लिया था। ए डी एम के पी सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट बच्चू सिंह के साथ ही उपश्रमायुक्त बी के रॉय के अलावा स्थानीय पुलिस स्टेशन सेक्टर 20 इंचार्ज अमरनाथ यादव भी जागरण कर्मचारियों के साथ उनकी बात सुनने को मौजूद थे। इस अवसर पर जागरण कर्मचारियों ने अपनी मांगों से सम्बन्धित ज्ञापन भी जिला प्रशासन को सौंपा। जिस पर जिला प्रशासन ने आगामी 6 जनवरी को होने वाली वार्ता में इसके समाधान का भरोसा दिया। अब 6 जनवरी को देखते हैं कि समस्या का क्या समाधान निकलता है।

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मध्य प्रदेश विज्ञापन घोटाले के बहाने उघड़ती असलियत को कोई दिन के उजाले में भी नहीं देखना चाहता

एक घोटाला मध्यप्रदेश का जिसे विज्ञापन घोटाला कहा जा रहा है। बहरहाल इस घोटाले के बहाने कई और भी परतें उधड़ रही हैं और कुछ असलियतें सामने आ रही हैं जिनकी तरफ कोई दिन के उजाले में भी देखने को तैयार नहीं है।  इस मामले की लिखी गई खबर में वेबसाईटस की संख्या लिखी 235 जबकि सूची में वेबसाईटस हैं 259 । गिनती फिर से करिये। दे कॉपी पेस्ट दे कॉपी पेस्ट किये जा रहे हैं। सूची के अनुसार जितना पूरी वेबसाई्टस को विज्ञापन को नहीं दिये गये उससे कहीं ज्यादा तो सिर्फ एक चैनल को पकड़ा दिये गये। बाजी मार गईं तमाम तरह की सोसयटीज और क्षेत्रीय प्रचार कंपनियां इनमें कई करोड़पतिये हैं।

कुछ ऐसे भी महारथी हैं जो नौकरियां भी कर रहे हैं वेबसाईट्स भी चला रहे हैं और सोसायटीज में भी कमा ले गये। जमीनों और सरकारी बंगलों की सूची की तो अभी बात ही नहीं हो रही, जिसमें सोसयटीज बनाकर लाखों की जमीन औने—पौने दामों में दे दी गई। और भी दिलचस्प बात ये कि कई रिटायर्ड जनसंपर्क अधिकारी पत्रकार बनकर इन सोसायटीज में तो घुसपैठ कर ही गये वेबसाईट्स बनाकर पत्रकार भी बन गये। यही रिटायर्ड अधिकारीगण पत्रकारों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते घूम रहे हैं पत्रकारों को चार वेबसाईट नहीं चलानी चाहिये।

क्यों साहब आप जनसंपर्क अधिकारी रहते तबादलों से कमाई कर सकते हैं,सरकारी बंगलों में रह सकते हैं और कहीं से सूंघ लिया तो पत्रकार बनकर जमीन पर भी कब्जा कर सकते हैं और पत्रकार के असली काम पर ही सवाल? कमाल की नैतिकता है। वेबसाईट्स को लेकर सरकारों की नीति में भी विरोधाभास है। सरकार को वेबसाईट्स को विज्ञापन देने से गुरेज नहीं है मगर जनसंपर्क की संवाददाता सूची में वेबसाइट पत्रकारों का नाम शामिल करने से परहेज है। और भी कई नियम हैं जो प्रिंट—इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये तो हैं मगर वेबमीडिया के लिये नहीं। बीमारी के नाम पर खैरात ऐसी बंटती है कि भिखारी भी शरमा जायें मगर वेबसाईट्स को विज्ञापन देने में ही लोहे के चने चबवा दिये जाते हैं। सबसे बड़ा खेल स्मारिकाओं में फोटोकॉपी करो कवर बदलो और लो विज्ञापन।

ई—गर्वनेंस में सफलता के आयामों की तरफ बढ़ती सरकारों को समाचार वेबसाइट्स के बारे में फिर से नीति बनाने की जरूरत है। सूत्रों के अनुसार अभी—भी जो घोटाला सामने आया है उसमें भी कई खास तथ्यों की तरफ ध्यान देने के बजाय नीति यह बनाई जा रही है कि हिट्स से विज्ञापन तय होंगे तो नया क्या है पहले भी यही था। उनका तो फिर भी कुछ नहीं बिगड़ना जो अंगद के पैरों की तरह जमे हुये हैं।   

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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स्व. मोहन सिंह की सम्पत्ति के बंटवारे को लेकर उनकी दो पुत्रियों के बीच छिड़ी जंग

देवरिया । जिस नेता के नाम पर समाजवादी पार्टी के लोग कसमें खाते है तथा पार्टी का उन्हें सच्चा समाजवादी नेता बताते हुए नहीं थकते हैं आज उन्ही नेता की सम्पति के बंटवारे को लेकर उनके दो पुत्रियों के बीच जंग छिड़ गई है। समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद स्व0 मोहन सिंह की पुत्रियों के बीच उनकी चल अचल सम्पति के बंटवारे का मामला अब गाजियाबाद और देवरिया जिले के कोर्ट में पहुंच चुका है। यही नहीं, स्व0 मोहन सिंह की द्वितीय पुत्री श्रीमती रीता सिंह तथा उनके एकमात्र पुत्र प्रतीक सिंह ने पुलिस अधीक्षक देवरिया को प्रार्थना पत्र देकर समाजवादी पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं पर धमकी देने का आरोप लगाते हुए अपने जान माल की रक्षा की गुहार लगाई है।

इस दौरान पूर्व सांसद की पत्नी उर्मिला सिंह ने भी छोटी बेटी का साथ देते हुए बड़ी पुत्री कनक लता सिंह जो वर्तमान समय में राज्य सभा सदस्य हैं, के ऊपर बेईमानी किए जाने का आरोप लगाया है। उन्होंने इस मामले में शीघ्र ही पार्टी मुखिया मुलायम सिंह व प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सम्पर्क कर वस्तु स्थिति से अवगत कराने का निर्णय लिया है। रविवार को देवरिया जिला मुख्यालय पर भुजौली कालोनी स्थित भूखण्ड (जो कभी स्व0 मोहन सिंह का पार्टी कार्यालय हुआ करता था) पर आयोजित एक प्रेस वार्ता में समाजवादी पार्टी के पूर्व सचेतक मोहन सिंह की पत्नी उर्मिला सिंह एवं उनकी द्वितीय पुत्री रीता सिंह ने अत्यन्त रूंधे गले से बताया कि स्व0 मोहन सिंह की मौत के बाद से कनक लता सिंह पर बेईमानी करने का बुखार चढ़ गया है और उन्होने राज्य सभा सदस्य बनने के बावजूद भी छोटी छोटी सम्पतियों और स्वार्थों के लिए लड़ाई करना शुरू कर दिया।

हालात अब इस कदर खराब हो गए हैं कि मामले को पुलिस एवं न्यायालय की दहलीज तक पहुंचाना पड़ रहा है।  श्रीमती रीता सिंह ने आरोप लगाया है जिले के कुछ समाजवादी पार्टी के नेता राज्य सभा सदस्य कनक लता सिंह के प्रभाव में आकर जान माल की घुड़की धमकी भी दे रहे है।  प्रेस वार्ता के दौरान श्रीमती रीता सिंह के एक मात्र पुत्र प्रतीक सिंह ने बताया कि उन्होने पुलिस अधीक्षक देवरिया को दो दिन पूर्व प्रथम सूचना रिर्पोट दर्ज किए जाने हेतु प्रार्थना पत्र दिया था। लेकिन पुलिस एफ आई आर लिखने की बजाय जांच करने के नाम पर टाल मटोल कर रही है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

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साईं प्रसाद के मालिक शशांक भापकर भी गिरफ्तार, कोर्ट ने भेजा पुलिस हिरासत में

मुबंई से सूचना है कि मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने साईं प्रसाद ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के तीसरे मालिक की भी गिरफ्तारी कर ली है. कंपनी के चेयरमैन बालासाहेब भापकर के बेटे शशांक भापकर को परसों गोवा के मडगांव के एक बंगले से गिरफ्तार किया गया. बताया जा रहा है कि शशांक भापकर गोवा में नए साल का जश्न मनाने के लिए पहुंचे थे. उन पर आर्थिक अपराध शाखा की पैनी नज़र थी.

जैसे ही शशांक के गोवा होने की सूचना मिली, आर्थिक अपराध शाखा की टीम ने गोवा में जाल बिछाया और शशांक को मडगांव के एक बंगले से गिरफ्तार कर लिया. शशांक भापकर को आर्थिक अपराध शाखा ने कोर्ट मे पेश किया जहां कोर्ट ने 4 जनवरी तक पुलिस हिरासत में भेज दिया.  इससे पहले शशांक को मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ़्तार किया गया था लेकिन सहार पुलिस थाने के परिसर से ही शशांक इमीग्रेशन ऑफीसर को चकमा देकर हिरासत से फ़रार हो गये थे.

मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने साईं प्रसाद ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक बालासाहेब भापकर को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है. छत्तीसगढ़ पुलिस कंपनी की मालकिन वंदना भापकर को गिरफ्तार कर चुकी है. इस तरह पति-पत्नी और पुत्र तीनों को गिरफ्तार किया जा चुका है. आर्थिक अपराध शाखा के डीसीपी प्रवीण पटवाल ने कहा कि फिलहाल हम शशांक भापकर से पूछताछ कर रहे हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि निवेशकों के पैसे कहां हैं और कौन-कौन से लोग इस धंधे में शामिल हैं. ज्ञात हो कि साईं प्रसाद की तरफ से न्यूज एक्सप्रेस नाम से न्यूज चैनल और हमवतन नाम से अखबार संचालित किया जाता था जो अब बंद हो चुका है.

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