खुश रहिए कि बाज़ार को हिंदी से इश्क हो गया है!

Vivek Satya Mitram

लो जी, फ़िर आ गया 14 सितंबर। यही वो तारीख़ है जिस दिन मुझे मेरी हिंदी सबसे बेचारी नज़र आती है। ऐसा लगता है मानो ‘हिंदी दिवस’ हिंदी का उल्लास नहीं हिंदी का मातम मनाने के लिए आता है। सरकारी आयोजनों से लेकर, अख़बारों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों और सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्यक्रमों तक में हिंदी दिवस के मौके पर हिंदी को लेकर इतना विधवा विलाप होता है मानो कुछ ही दिनों में हिंदी विलुप्त हो जाएगी।

अजीब लगता है कि जिस हिंदी की अनदेखी माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियां नहीं कर सकीं उसी हिंदी के साथ अपनी ही ज़मीन पर ‘यतीम’ की तरह बर्ताव किया जाता है। मानो उसकी देखभाल करने वाला कोई बचा ही नहीं। ख़ामख़ा हिंदी को ‘सिंपैथी चाइल्ड’ बना दिया गया है। जिधर देखो उधर ही विधवा विलाप, रोना-गाना, छाती पीटना, अफ़सोस और करूण क्रंदन। लेकिन क्यों? क्या सच में हिंदी की दुर्दशा हो चुकी है?

क्या हम सच में हिंदी को भूल रहे हैं? क्या कुछ ही दिनों में हमारी ज़िंदगी से हिंदी का नामोनिशान मिट जाएगा? तथ्यों, आंकड़ों और ट्रेंड्स की मानें तो बिल्कुल भी नहीं। सच्चाई ये है कि समय के साथ पिछले कुछ सालों में सूचना-तकनीक और इंटरनेट क्रांति की बदौलत हिंदी कहीं ज्यादा मज़बूत और ताक़तवर होकर उभरी है जिसकी अनदेखी ना तो बाज़ार कर सकता है और ना ही उपभोक्ता। आज की तारीख़ में हिंदी बाज़ार की मजबूरी बन चुकी है और दुनिया जानती है कि जिससे बाज़ार को प्यार हो जाए उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

मुझे लगता है ये रोना-गाना, ये विधवा विलाप और ये हाय तौबा मचाना दरअसल हिंदी के ख़िलाफ़ एक सुनियोजित साज़िश है और इसके पीछे निहायत ही व्यक्तिगत हित/ स्वार्थ छिपे हुए हैं वरना जो भाषा तकनीक के साथ तेज़ कदमताल करते हुए आगे बढ़ रही है उसके बारे में कोई ऐसी बातें क्यों करेगा? इस पूरे मामले को समझने के लिए कुछ बातों की तह तक जाना होगा। ये समझना होगा कि उस ‘तथाकथित हिंदी’ की मौत से किसका सबसे ज्यादा नुकसान होगा जिसके लिए हर साल 14 सितंबर को चारों ओर मर्सिया पढ़ा जाता है? ज़ाहिर तौर पर उनका जिन्हें उस ‘तथाकथित हिंदी’ के होने से फ़ायदा है। और वो कौन लोग हैं? किसे सता रहा है हिंदी की अशुद्धता का डर?

कौन हिंदी को अछूत बनाकर रखना चाहता है? किसे लगता है कि हिंदी में दूसरी भाषाओं की मिलावट से हिंदी ख़त्म हो जाएगी? क्या इस देश के वो करोड़ों हिंदी भाषी लोग जिनमें से 90 फ़ीसदी लोगों ने कभी वो परिष्कृत हिंदी साहित्य पढ़ा ही नहीं जिनके सामान्य शब्द भी आज की पीढ़ी के पल्ले ही नहीं पड़ता? कहीं ये डर भारत की सरज़मीं से हज़ारों किलोमीटर दूर रहने वाले एनआरआई को तो नहीं सता रहा जो इतनी दूर जाकर भी हर घड़ी हिंदी को ओढ़ते-बिछाते-गुनगुनाते हैं?

जी नहीं, दरअसल ये डर सता रहा है उन मुट्ठी भर लोगों को जो ‘शुद्ध हिंदी’ के नाम पर मलाई काट रहे हैं। सच तो ये है कि उन्हें हिंदी की चिंता नहीं है, कतई नहीं है। उन्हें अगर तक़लीफ़ है तो अपने निजी स्वार्थों की, अपने पहचान की, अपने रसूख की, अपने अस्तित्व की, अपने नाम की और उसके दम पर मिलने वाली सुविधाओं, संसाधनों और आर्थिक लाभ की। वरना उस देश में जहां दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री हिंदी के दम पर साल भर में हज़ारों करोड़ की कमाई करती है, हर मोबाइल फोन में हिंदी की-बोर्ड प्री इंस्टाल्ड आता है, जहां माइक्रोसॉफ्ट से लेकर गूगल-फेसबुक और ट्विटर जैसी सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हिंदीभाषी उपभोक्ताओं की ज़रूरतों के लिए बड़े तकनीकी बदलाव करने में क्षण भर का संकोच नहीं करतीं वहां हिंदी की दुर्दशा पर हर साल मातम मनाना कहां की बुध्दिमता है?

हिंदी की हत्या की आशंका का अनावश्यक माहौल बनाकर पिछले कई दशकों से एक ख़ास वर्ग और मानसिकता के लोगों ने पहले ही हिंदी का बहुत बड़ा नुकसान कर दिया है जिसकी भरपाई नामालूम कभी हो भी पाएगी या नहीं। मैंने अपने बचपन में अपने घर की आलमारियों में हिंदी साहित्य के नाम पर जो किताबें, उपन्यास, कहानियां, कविता संग्रह देखे थे आज तीन दशक बाद भी श्रेष्ठ हिंदी साहित्य के नाम पर वही साहित्य मौजूद है। चाहे आप किसी भी शहर में चले जाइए, किसी भी रेलवे स्टेशन पर झांक लीजिए, किसी भी बुक स्टोर पर खोज लीजिए, किसी भी मॉल में पूछ लीजिए।

आपको हिंदी साहित्य के नाम पर जो भी मिलेगा वो कम से कम चार से छह दशक पुराना है। आज भी वही निराला, वही अज्ञेय, वही प्रेमचंद, वही जयशंकर प्रसाद, वही मुक्तिबोध, वही फणीश्वर नाथ रेणु, वही महादेवी वर्मा किताबों की रैक में अटे पड़े हैं। तक़लीफ़ ये नहीं है कि ये लोग क्यों हैं, मेरी तक़लीफ़ ये है कि क्या पिछले चार दशकों में करोड़ों की आबादी वाले इस देश में क्या दर्जन भर लोग भी पैदा नहीं हुए जो पुरानी पीढ़ी की जगह ले सकें? या कम से कम उनके बराबर बैठने का दर्ज़ा हासिल कर सकें? ऐसा नहीं कि इस दौर में कुछ लिखा नहीं गया, लिखा गया। तभी हम नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, राजेन्द्र यादव, मैत्रेयी पुष्पा जैसे नामों से वाक़िफ़ हैं।

लेकिन हिंदी की शाब्दिक, भाषिक और आत्मिक शुद्धता के नाम पर जो गोलबंदी और प्रपंच पिछले कुछ दशकों से तथाकथित हिंदी साहित्य के रखवालों के मठों में चल रहा है उसने हिंदी का बहुत बड़ा नुकसान किया है। और आलम ये है कि हमारे साहित्य से भारत के एक ख़ास काल-खंड के सामाजिक, सांस्कृतिक बदलावों का कोई साहित्यिक लेखा जोखा कम से कम हिंदी में मौजूद नहीं है जिसे हम साहित्य के माध्यम से संजोकर रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सौंपते हैं। अगर कुछ होगा भी तो हमने हिंदी साहित्य को इस कदर बदलावों से दूर रखा है कि नई पीढ़ी चाहकर भी हिंदी के साथ कोई संवाद स्थापित नहीं कर पाएगी। और सही मायने में हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी। भाषा की शुद्धता के नाम पर हिंदी को उसके अपने करोड़ों लोगों से दूर कर दिया गया है, और हिंदी के साथ इससे बड़ी त्रासदी कुछ और नहीं हो सकती थी। हिंदी के नाम पर अपनी रोटियां सेंकनेवालों ने हिंदी को अपने ही बच्चों के लिए अछूत और अस्वीकार्य बना दिया है और तक़लीफ़ तो ये है कि उन्हें इस बात का इल्म तक नहीं है।

एक ऐसे दौर में जब हिंदी ने बाज़ार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। जब समाचार से लेकर मनोरंजन, इन्फोटेनमेंट (मालूम नहीं हिंदी में इसे क्या कहेंगे) और खेल जैसे चैनलों में हिंदी का ही डंका बज रहा है (वरना स्टार इंडिया को स्टार स्पोर्ट्स के दो चैनल हिंदी में नहीं लांच करने पड़ते)। जब गूगल हिंदी की वेबसाइट और ब्लॉग पर गूगल एडवर्ड के ज़रिए कमाई करने का विकल्प मुहैया करा रहा है। जब अंग्रेज़ीभाषियों से अटी पड़ी देश और दुनिया की तमाम विख्यात एड एजेंसियां भारत में अपने उत्पादों के लिए हिंदी में विज्ञापन बनाने को तरज़ीह देने लगी हैं, जब दुनिया भर की तकनीकी कंपनियां भारत में कारोबार करने के लिए हिंदी के इर्द गिर्द अपनी नीतियां बनाने को मजबूर हैं, और जब दुनिया के कोने-कोने से आने वाले अभिनेता-कलाकार भारतीय मनोरंजन जगत में कामयाबी हासिल करने के लिए रातोंरात फर्राटेदार हिंदी बोलने की कोशिश में तल्लीन हो रहे हैं, जब अलग-अलग देशों-भाषाओं की फिल्मों, कार्यक्रमों और यहां तक कि कार्टून श्रृंखलाओं को बगैर हिंदी में डबिंग के बाज़ार में नहीं उतारा जाता। जब हिंदी के शब्दों को अंग्रेज़ी के शब्दकोष में ससम्मान जगह दिया जा रहा हो। उस दौर में अगर हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी की दुर्दशा की बात करते हैं, टेसुएं गिराते हैं, रोना रोते हैं और छाती पीटते हैं तो मेरा मन करता है पूछने का कि ‘तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर?’

मुझे सच में नहीं समझ में आता कि हम किस हिंदी के लिए दुखी हैं, कौन सी हिंदी है जिसके लिए हम चिंतित हुए जा रहे हैं, कौन सी हिंदी है जिसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है? क्या वो हिंदी जो हम अपने घरों में अपनों से बतियाते हुए, उनका हालचाल पूछते हुए, खाने की मेज़ पर चर्चा करते हुए, फोन पर बात करते हुए, डायरी लिखते हुए, व्हाट्सएप करते हुए या फेसबुक पर अपने मन की बात करते हुए लिखते हैं, बोलते हैं, समझते हैं? अगर नहीं, तो फ़िर ये समझना होगा कि हम हिंदी के लिए नहीं, अपने लिए चिंतित हैं क्योंकि हिंदी तो ऐसी भाषा है जो सबको ख़ुद में समाहित कर लेती है, उसके लिए कोई अपना पराया नहीं है, उसके लिए ना किसी से परहेज़ है और ना ही किसी से कोई विशेष प्रेम। वो इंग्लिश से मिलकर हिंग्लिश बन जाती है और उर्दू से मिलकर हिंदुस्तानी, पर वो हर हिंदी भाषी को समझ में आती है, हर किसी के दिल तक जाती है और यही वो बात है जिसने हिंदी को आज दुनिया की भाषा बना दिया है, तकनीक की भाषा बना दिया है, बाज़ार की भाषा बना दिया है। और मीठा या कड़वा सच यही है कि जो बाज़ार की ज़रूरत नहीं, ख़तरा दरअसल उस पर है। खुश रहिए, बाज़ार को हिंदी से इश्क हो गया है और वो उसे कतई मरने नहीं देगा।

लेखक विवेक सत्य मित्रम टीवी पत्रकार और उद्यमी हैं.

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