बेमौत तो 4 साल पहले ही मर चुका था ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ अखबार

लगभग ५ साल पहले मथुरा-आगरा में पत्रकारिता जगत में रोशनी बनकर उभरे कल्पतरु समूह के दैनिक अखबार कल्पतरु एक्सप्रेस के बंद होने की ख़बरों में यूँ तो मेरे लिए नया कुछ नहीं है लेकिन फिर भी एक बैचेनी सी है, जिसका कारण और एकमात्र कारण सिर्फ और सिर्फ ये है कि इसका बीजारोपण मेरे हाथों हुआ था और उस समय मथुरा का ये पहला हिंदी दैनिक होने के साथ आगरा का भी मात्र तीसरा हिंदी दैनिक था.ब्रज की पत्रकारिता में जन्म के मात्र एक साल के अन्दर नए मुकाम छूने वाले इस अखबार से पाठकों को ही नहीं, स्थानीय प्रशासन, साहित्यजगत के साथ सामाजिक सरोकारों के लिए संघर्षशील रहने वाले वर्गों को बहुत उम्मीदें थी, अफ़सोस ये हो न सका.

दरअसल मैं ये मानता हूँ कि कल्पतरु एक्सप्रेस की मौत उसी समय हो चुकी थी जब स्थापना के एक साल के अन्दर ही मैंने इस अखबार से ३ अगस्त २०११ को अलग रहने का फैसला कर लिया. उसके बाद अखबार का प्रबंधन हर साल -छह महीने में बदलता रहा इसके पीछे भी कारण वही रहे जो मेरे संस्थान क्विट करने के पीछे रहे थे – विश्वास की कमी, अकर्मण्य और अनुभवहीन लोगों का जबरदस्त काकस जो किसी भी प्रबंधन को टिकने नहीं देना चाहता था, और चमचों का बोलबाला जो किसी भी सही निर्णय को कार्यान्वित नहीं होने देने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ रहते थे और इसके पीछे एक ऐसा मालिक जो दिल का साफ़ है, काले कुत्ते की भी आधी रात मदद करने को एकदम तत्पर, भलामानस है लेकिन अपने धंधे के पीछे छुपी मजबूरियों के चलते उन लोगों को ढोने को मजबूर हैं जो उनकी ही बत्ती लगाने में हर पल तत्पर रहते हैं, बिलकुल घर के उस चिराग की मानिंद जो अपने ही घर में आग लगाने को, महज अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए तैयार रहता है.

मुझे खूब याद है कि कल्पतरु एक्सप्रेस के बाद आगरा से दो और अखबार आये जिनमें एक आगरा के जाने-माने बिल्डर का था और एक जिले के एक जबरदस्त सूदखोर और केबिल टीवी का काम करने वाले का, दोनों अखबार यूँ तो कल्पतरु के बाद ही मैदान में आये और उसके पहले मैदान भी छोड़ गए लेकिन कल्पतरु का इतने लम्बे समय टिक जाना कल्पतरु के मालिक की घर फूंक तमाशा देखने की शैली के चलते ही संभव हो पाया. इसमें मुझे आज भी कोई शक नहीं कि जिस समय कल्पतरु एक्सप्रेस की यात्रा आरम्भ हुई उस समय आगरा का न सिर्फ पाठक वर्ग बल्कि प्रशासन भी एक अच्छे अखबार के इन्तजार में था. शायद यही वजह थी कि कल्पतरु एक्सप्रेस को यूँ हाथोहाथ लिया गया. इसके पीछे उस समय कल्पतरु की ठीकठाक आर्थिक स्थिति भी मजबूत कारण था.

यूँ मैंने जब कल्पतरु ग्रुप का पब्लिकेशन हाउस ज्वाइन किया तो मेरा दायित्व सिर्फ उस समय ग्रुप से निकलने वाली ३ मंथली और त्रैमासिक पत्रिकाओं तक वास्ता सीमित था. संस्थान दैनिक अखबार निकालने के मूड में जरुर था और उसके लिए शीर्षक भी निकलवा चुका था. मुझे उस समय भारी हैरानी हुई जब मुझे पता चला कि लम्बे -चौड़े मासिक बजट में निकल रही ग्रुप की ३ पत्रिकाओं के सिर्फ शीर्षक ही हासिल किये गए थे और ३ साल तक निकलते रहने के बाद भी तत्कालीन प्रबंधन आरएनआई नम्बर तक हासिल नहीं कर पाया था. मुझे उस समय और बड़ी हैरानी हुई जब मुझे पता चला कि कल्पतरु एक्सप्रेस निकालने की जिम्मेदारी संभाल चुके एक साहिबान सालभर के बजट के लिए इसके मालिकान को १५ करोड़ का पर्चा पकड़ा चुके थे जिसमें न तो अखबार की कोई अपनी प्रेस थी न कोई और उपकरण. वो बजटीय पर्चा आज भी मेरे पास सुरक्षित है जिसमें अखबार निकालने के लिए साधनों के बजाय ऐयाशी पर जोर दिया गया था जिसका अंदाजा महज इस बात से लगाया जा सकता है कि संस्थान के सम्पादक से लेकर प्रबंधन तक के लिए ४ इनोवाओं और ४ इंडिकाओं सहित कुल १० गाड़ियों और वो भी नयी गाडियों का प्रावधान था. अखबार की व्यवस्थाओं के नाम पर दिल्ली में बहादुर शाह जफ़र मार्ग पर प्रताप भवन में बड़ी हद एक २५० फुट के कमरे और मथुरा -आगरा में १०० -१०० फुट के दो ब्यूरो आफिस सहित चंद कम्प्यूटर थे. खैर लम्बी बैठकों के बाद मालिकान से मैंने अखबार निकालने का जिम्मा लिया और उन साहिबान को किनारे कर दिया. हालाँकि मुझे बाद में पता चला कि उन्हें किनारे करना मेरी गलतफहमी थी और बैकडोर से वो अखबार प्रबंधन के कान भरते रहे थे.

मुझे याद है कि मुझे एक के सिवाय अपनी टीम से भरपूर सहयोग मिला और जो अखबार ३ साल से केवल कागजों पर रेंग रहा था वह मात्र ४ महीने के अन्दर मय मशीन आदि के मात्र दो -करोड़ के बजट में मैदान में था. अखबार को हाथोहाथ लिया गया और जिस समय अगस्त ३ २०११ में मैंने तात्कालिक परिस्थितियों के कारण इससे अलग होने का फैसला किया उस समय इसका प्रसार ५० हजार को छू रहा था, हाथरस और इटावा -औरैया जैसी कुछ जगहों पर कल्पतरु एक्सप्रेस का झन्डा स्थापित दोनों दिग्गज अखबारों के प्रसार और व्यवसाय को खुली चुनौती दे रहा था. “सच के साथ हमेशा”, और “सुबह की चाय हमारे संग”  जैसे स्लोगन के साथ कल्पतरु ब्रज के लोगों की दैनिक जिन्दगी का हिस्सा बनता जा रहा था लेकिन नियति और चाटुकारों को ये मंजूर नहीं था और समय के साथ कल्पतरु एक्सप्रेस का वो झंडा जो बुलंदियों को छूने चला था झुकने लगा था और आज पूरी तरह ध्वस्त हो गया. यूँ कल्पतरु एक्सप्रेस के बंद होने के कारणों के पीछे चिटफंड कम्पनी से लेकर अन्यान्य और भी कडवी सच्चाईयां है जिनके बारे में विस्तृत कारणों पर फिर कभी प्रकाश डालूँगा.

हरिमोहन विश्वकर्मा

पूर्व सीईओ
कल्पतरु एक्सप्रेस 



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Comments on “बेमौत तो 4 साल पहले ही मर चुका था ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ अखबार

  • नीरज says:

    समय बलवान तो घदा पहलवान
    प्रशासन में विचित्र प्राणियो का गोचर चल रहा है
    सुचारू कार्य निर्वहन ना हो पाने की वजह पूर्व प्रशासन के चाटुकारको का संस्थान में बने रहना है

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