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क्या दैनिक भास्कर की हवा खिसक गई?

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Rishikesh Rajoria-

दैनिक भास्कर समूह पर आयकर विभाग की कार्रवाई पता नहीं, यह लिखने तक खत्म हुई है या नहीं, लेकिन उसके मालिकों का भीगी बिल्ली जैसा आचरण सबकी समझ में आ गया। अखबार में उनके ही ग्रुप के खिलाफ इतनी बड़ी कार्रवाई होने के बावजूद ढंग की खबर या संपादकीय तक नहीं दिखा। दैनिक भास्कर के खिलाफ छापे की खबरों से बना माहौल चौबीस घंटे में चाय की प्याली में उठा तूफान साबित हुआ। दैनिक भास्कर की ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को आधार बनाकर संसद तक में मामला उठाया गया, लेकिन जमीन पर ढाक के तीन पात दिखे। विश्व के किसी भी अखबार समूह में इतना डरपोकपना शायद ही कभी देखा गया हो।

गौरतलब है कि दैनिक भास्कर पर आयकर विभाग का छापा उस समय डाला गया, जब पैगासस स्पाईवेयर मामले ने भूकंप ला दिया था। मोदी सरकार घिर रही थी। दैनिक भास्कर ने भी फोन टैपिंग मामले की खबर प्रमुखता से छापी थी। इससे पहले कोविड मैनेजमेंट से जुड़ी खबरें तो थी हीं, जिनसे सरकार की काफी छीछालेदर हो रही थी। कुछ लोगों का कहना है कि पैगासस मामले को ठंडा करने के लिए दैनिक भास्कर को निशाना बना लिया गया और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सहित कई नेता उसके समर्थन में आ गए थे। यह दैनिक भास्कर के मालिकों के पास अपने पाप धोने का अच्छा मौका था, जो उन्होंने गंवा दिया। वे बुरी तरह फसर गए।

आयकर विभाग के छापों के बाद उसके परिणाम कभी सामने नहीं आएंगे। हो सकता है दैनिक भास्कर के एक-दो और नए संस्करण शुरू हो जाएं। यह दैनिक भास्कर के मालिकों की हिंदी पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता है, जिसे उन्होंने पर्चेबाजी में तब्दील कर दिया है। दैनिक भास्कर के खिलाफ छापों की खबर सभी अखबारों में पहले पेज पर छपी। अंग्रेजी अखबारों में संपादकीय लिखे गए। मोदी सरकार की तानाशाही के खिलाफ विरोध का वातावरण बना, लेकिन धन्य हैं रद्दी छापने वाले अखबार के मालिक, जिनकी जिंदगी में सिर्फ प्रोपर्टी और टर्नओवर के अलावा और कुछ नहीं है। उन्हें अपनी प्रतिष्ठा की भी परवाह नहीं है। उन्होंने मोदी सरकार को विरोधियों पर हंसने का एक और मौका दे दिया।

समझा जा सकता है कि हिंदी पत्रकारिता की विश्वसनीयता खत्म करने का काम कौन कर रहा है? इस अखबार में जो ढंग की खबरें छपती हैं, वे बेचारे उन युवा पत्रकारों की मेहनत का परिणाम होती हैं, जो पत्रकारिता में करियर बनाना चाहते हैं। इस अखबार में जो पत्रकार अच्छा काम करते हैं, उन्हें मालिक की रीति-नीति पूरी तरह समझ में नहीं आने के कारण कुछ ही वर्षों में रवाना कर दिया जाता है। इस अखबार में पत्रकारिता नहीं होती और यह खबरें छापने के लिए है भी नहीं। यह सिर्फ विज्ञापन छापने के लिए है। खबरें तो सिर्फ समाचार पत्र का भ्रम पैदा करने के लिए छापी जाती हैं, जो समाचार एजेंसियों से और पुलिस थानों से खूब मिलती हैं।

दैनिक भास्कर पर छापों के विरोध में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग करने वाले लोग अब क्या कर सकते हैं? जो अखबार अपने पर हो रहे प्रहार की प्रतिक्रिया स्वरूप संपादकीय स्तर पर ढंग की कुछ लाइनें भी नहीं छाप सकता, उसके सहारे कहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जा सकती है। अगर दैनिक भास्कर में आयकर छापों के खिलाफ या सफाई में या उसे सरकार की राजनीति बताते हुए कुछ छाप दिया जाता तो ज्यादा से ज्यादा क्या होता? दैनिक भास्कर के मालिकों को कुछ आर्थिक नुकसान हो जाता, लेकिन इतिहास में उनका नाम दर्ज होता। अब इतिहास में यही लिखा जाएगा कि कैसे एक बड़ा अखबार सरकार की ताकत के आगे फसर गया।

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