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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमनिष्ट विष्णुगुप्त की पुस्तक धमाल मचा रही है। विष्णुगुप्त की पुस्तक का नाम 'अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार' है। इस पुस्तक में अखिलेश यादव की सरकार के पांच वर्ष का लेखा-जोखा है वह भी भ्रष्टाचार की कहानी और वंशवाद के विस्तृत विवरण के साथ में है। पुस्तक लखनउ के साथ ही साथ वाराणसी, इलाहाबाद, झांसी, कानपुर, मेरठ सहित सभी जगहों पर उपलब्ध है और तेजी से आम जन तक पहुंच रही है।

अखिलेश यादव और सपा विरोधी राजनीतिक कार्यकर्ता पुस्तक के प्रति काफी सक्रियता दिखा रहे हैं और पुस्तक की उपलब्धता आम जनता तक सुनिश्चित कर रहे हैं, ताकि आम जनता यह जान सके कि अखिलेश यादव की सरकार किस तरह जन विरोधी थी। एक पर एक भ्रष्टाचार की कहानियां किस प्रकार से लिखी गयी थी। भ्रष्टाचार से आम जनता के हितों को किस प्रकार से नुकसान पहुंचाया गया। अराजकता और अपराध का बोल बाला किस प्रकार से रहा है। ईमानदार अधिकारियों का किस प्रकार से उत्पीड़न हुआ। ईमानदार अधिकारियों को किस प्रकार से इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया। बेईमान अधिकारियों को प्रोन्नति पर प्रोन्नति मिलती चली गयी। वंशवाद ने लोकतंत्र को जख्मी किस प्रकार से किया है।

लेखक विष्णुगुप्त का मत है कि उत्तर प्रदेश में भ्रष्ट, अराजक, जातिवादी और वंशवादी राजनीति की विदाई होनी चाहिए और ऐसी राजनीतिक धारा बहनी चाहिए जिसमे वंशवाद की कोई उम्मीद नहीं होनी चाहिए ताकि भ्रष्टचार और प्रशासनिक अराजकता दूर किया जा सके। साथ ही अपराध पर नियंत्रण रहे और विकास की राशि आम जन तक पहुंच सके।

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि विष्णुगुप्त की पुस्तक अखिलेश यादव की राजनीतिक छवि को कितना दागदार कर पायेगी और समाजवादी पार्टी को कितना नुकसान पहुंचा पायेगी? क्या विष्णुगुप्त की पुस्तक का कोई राजनीतिक उदे्दश्य है? कोई निजी विचार-महत्वाकांक्षा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है? एक ऐसा लेखक जो हमेशा आर्थिक फटेहाली में न सिर्फ सकिय रहता है, आर्थिक फटेहाली में भी अपने विचारों से समझौता नहीं करता बल्कि देशद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाता है। साथ ही कारपोरेट लुटेरों पर अपनी स्याही सुखाता है। ऐसा लेखक अगर पिछड़ी जाति के पुनर्जागरण के नाम पर सत्ता में आयी अखिलेश सरकार को चाकचौबंद ढंग से घेरे में लेता है तो फिर पुस्तक की बातों और तथ्यों पर गौर करना ही पडेगा।

लेखक यह भी जानते-समझते हैं कि वे किस छत्ते में हाथ डाले हैं, किस राजनीतिक घराने की अपसंस्कृति के खिलाफ लिख रहे हैं, किस राजनीतिक घराने के अपराध और कुनबेबाजी के खिलाफ लिख रहे हैं और इसके खतरे क्या है? ऐसे भी विष्णु गुप्त, खतरों के खिलाडी हैं, खतरे ये मोल लेते रहे हैं, अपनी जान जोखिम में डालकर पत्रकारिता और लेखन कार्य करते रहे हैं, इस सच्चाई को हर विचारवान पत्रकार और आम जन समझते हैं।

अब थोडी चर्चा विषय वस्तु और तथ्यों के चाकचौबंद पर। विष्णुगुप्त ने पुस्तक के विषय वस्तु निर्धारण करने में राजनीतिक दूरदर्शिता दिखायी है। पुस्तक का पहला चैप्टर वंशवाद को लेकर है। पहले चैप्टर का शीर्षक है 'वंशवाद का नंग्न तांडव, अखिलेश का पत्नी प्रेम'। इस शीर्षक से लेखक ने न केवल मुलायम की बल्कि अखिलेश की वंशवादी राजनीति पर गंभीर चोट की है। लेखक ने साफ तौर पर कहा है कि राम मनोहर लोहिया के सिद्धांत का अनुयायी कहने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र अखिलेश यादव ने वंशवाद की राजनीति में जवाहर लाल नेहरू को भी मात दी दी है।

जवाहर लाल नेहरू ने सिर्फ अपनी बेटी इन्दिरा गांधी को ही राजनीति में स्थापित किया था जबकि मुलायम सिंह यादव ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में स्थापित कर दिया। मुलायम सिंह यादव ने वंशवाद स्थापित कर राममनोहर लोहिया की कब्र खोदी है। लेखक ने उन लोगों को आईना दिखाया है जो अखिलेश यादव को वंशवाद प्रेमी नहीं कहते है। लेखक ने बुलंदी के साथ अखिलेश को मुलायम से बड़ा वंशवादी कहा। मुलायम ने अपनी पत्नी को राजनीति में स्थापित नहीं किया था पर अखिलेश ने अपनी पत्नी को राजनीति में स्थापित कर दिया।

सबसे बड़ी बात यादव सिंह के भ्रष्टाचार की कहानी का है। 'यादव सिंह का संरक्षणकर्ता अखिलेश' शीर्षक से प्रश्न किया है कि जो लोग अखिलेश को ईमानदार मानते हैं, स्वच्छ मानते हैं, सत्य हरिशचन्द्र का प्रतीक मानते हैं वे सभी यादव सिंह के भ्रष्टचार से जुडे तथ्य देख लें, समझ लें। यादव सिंह के खिलाफ सीबीआई जांच को रोकवाने के लिए कई संवैधानिक और गैर संवैधानिक हथकंडे अपनाये थे। अखिलेश सरकार की जांच में यादव सिंह को क्लीन चिट क्यों और किस मकसद से दिया गया था। कोर्ट अगर बहादुरी नहीं दिखायी होती तो फिर यादव सिंह को जेल जाना और यादव सिंह का भ्रष्टचार सामने आना मुश्किल होता। अगर जांच संपूर्णता में हो तो फिर यादव सिंह को संरक्षण देने के आरोप में अखिलेश यादव भी जेल के अंदर जा सकते हैं।

अखिलेश यादव का सबसे ड्रीम प्रोजेक्ट लखनउ-आगरा एक्सप्रेसवे की भी पुस्तक में पोल खोली गयी है। लेखक ने दावा किया है कि लखनउ-आगरा एक्सप्रेसवे अभी बन कर पूरी तरह से तैयार नहीं हुआ है, अधूरा है फिर भी उस एक्सप्रेस वे का  लोकार्पण कर दिया गया। यह एक्सप्रेसवे अनुपयोगी है और किसानों की आजीविका को कब्र बना कर बनाया गया है। किसानों से जबरदस्ती जमीन छीनी गयी है। अभी तक किसानों को पूरा मुआवजा भी नहीं मिला है। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए यूपी के सबसे बदनाम और भ्रष्ट अधिकारी नवनीत सहगल को जिम्मेदारी दी गयी। नवनीत सहगल ने इस योजना को पूरी करने में करोड़ों का घोटाला किया है।

सैफई महोत्सव को लेकर भी इस किताब में काफी कुछ है। लेखक ने 'मौज-मस्ती का सैफई महोत्सव' शीर्षक से दावा किया है कि हर साल तीन सौ करोउ रूपये सैफई महोत्सव पर फूके जाते हैं। अमर सिंह के एक बयान को आधार बना कर यह दावा किया गया है। लेखक ने प्रश्न खडा किया है कि अखिलेश और मुलायम राज में कभी काशी, अयोध्या और प्रयाग महोत्सव का आयोजन नहीं किया गया पर सैफई महोत्सव का आयोजन हर साल सिर्फ मौज मस्ती के लिए किया जाता है और अपसंस्कृति फैलायी जाती है।

पुस्तक में कई अन्य रोचक और तथ्यपूर्ण विषय है जैसे अमर सिंह से क्यों डरते हैं अखिलेश-मुलायम, ईमानदार अधिकारियों जैसे अमिताभ ठाकुर, दुर्गा शक्ति नागपाल आदि का उत्पीडन और बेईमान अधिकारियों को संरक्षण, अखिलेश-मुलायम का विक्टोरिया बग्धी प्रेम, समाजवादी दंगों मे अखिलेश, मूलायम आजम खान का हाथ और अखलाक कांड आदि पर भी विचारोतेक पठनीय सामग्री है।

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