बसपा सोशल इंजीनियरिंग छोड़ एम.वाई.डी. के सहारे

माया की दलित एजेंडे पर वापसी

अजय कुमार, लखनऊ

समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने के बाद बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती ने एक बार फिर ‘सियासी गुलाटी’मार दी है. उनकी जुबान और सियासत दोनों ही बदल गई है. ऐसा लगता है ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की विचारधारा को उन्होंने घूंटी पर टांग दिया है. ‘ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी बढ़ता जायेगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है’ ऐसे नारों के बल पर उन्होंने ब्राह्मणों का खूब वोट भी हासिल किया था, लेकिन आज ये नारे उनके लिये बेईमानी हो गये हैं.

वह उसी दौर में पहुंचती जा रही हैं जब बसपाइयों की जुबान पर नारा हुआ करता था, ‘तिलक-तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार.’ कभी मुलायम राज को जंगलराज बता कर उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने वाली बीएसपी सुप्रीमो मायावती के इर्दगिर्द गूंजता नारा, ‘चढ़ गुण्डों की छाती पर,बटन दबाओ हाथी पर’ कौन भूल सकता है.जिसने मायावती को बहुमत के साथ जीत दिलाने का काम किया था. मुलायम ही नहीं गठबंधन से पूर्व अखिलेश राज में व्याप्त गुण्डागर्दी पर भी मायावती के तेवर काफी सख्त हुआ करते थे.

यह वह दौर था जब मायावती अपने सियासी दांवपेंचों से उत्तर प्रदेश की सियासत की दशा और दिशा तय करती थीं. उन्होंने अपनी जरूरत पर किसी से हाथ मिलाने में गुरेज नहीं किया तो मौका निकल जाने पर उसे ठेंगा दिखाने में भी उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता था. समय के साथ उनका टारगेट भी बदलता रहता है. कभी बसपा सुप्रीमों मायावती समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख मुलायम को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती थीं.आज मुलायम की जगह मोदी ने ले ली है और अब सपा की बजाये बीजेपी उनकी नंबर एक दुश्मन बन गई है. यह सब अचानक नहीं हुआ. मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बसपा के दलित वोट बैंक को अपने पाले में खींच कर बसपा को लोकसभा में शून्य पर पहुंचा दिया और यह सिलसिला पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी देखने को मिला तो मायावती के हाथ-पैर फूल गये.

असल में अपर कास्ट के वोट तो मायावती को समय-समय पर ही मिलते थे, वह भी पूरे नहीं,जबकि दलित वोट बीएसपी की थाथी थी. बात चुनावी गणित की कि जाये तो 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का जहां खाता भी नहीं खुला था, वहीं 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को कुल 403 में से सिर्फ 19 सीटों पर ही सफलता मिली थी.उस समय बसपा सुप्रीमो मायावती ने भले ही इस हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ा था, लेकिन सच्चाई वह जानती थीं.उनका दलित वोट बैंक सिमट गया था, दलितों में जाटव के अलावा अनुसूचित जातियों (दलित) कोरी, खटिक, धोबी, मेहतर, कुछबंधिया, पासी और पिछड़े वर्ग की आरख, कहार, केवट, कुम्हार, काछी, कुर्मी, कलार, कचेर जैसी कई जातियां ने राजनीतिक उपेक्षा के चलते बसपा से नाता तोड़ लिया था. इनके द्वारा भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में एकतरफा मतदान करने से ही बसपा की हालत खस्ता हुई थी.

कभी बसपा का गढ़ रहे बुंदेलखंड़ में पार्टी का खाता तक नहीं खुला. भाजपा सभी 19 सीटें जीतने में संफल हुई. इनमें ललितपुर की महरौनी, झांसी की मऊ-रानीपुर, जालौन की उरई सदर, हमीरपुर की राठ और बांदा जिले की नरैनी सुरक्षित सीटों पर कोरी बिरादरी के ही उम्मीदवार चुनाव जीते थे. राजनैतिक पंडितों कहना था इन सीटों पर बसपा मुखिया ने अपनी ही जाटव बिरादरी पर दांव लगाकर बहुत बड़ी राजनीतिक भूल की थी. इसी भूल का असर रहा है कि अप्रत्यक्ष रूप से बने ‘कोरी-ब्राह्मण’ गठजोड़ के अलावा सामान्य और अन्य पिछड़े वर्ग के प्रत्याशी उतारकर भाजपा ने सपा और बसपा के मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया.

बसपा के बड़े नेता भले ही इस भूल को न स्वीकार करें लेकिन बसपा कैडर से जुड़े जमीनी कार्यकर्ता इसे ही हार की असली वजह मानते हैं. हाल फिलहाल में सपा से गठबंधन के बा माया ने दलितों के पक्ष में जिस तरह से यू-टर्न लिया है उससे सियासत के जानकार आश्वस्त हैं कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले सूबे की भाजपा सरकार में बसपा से अलग हुई दलित और पिछड़े वर्ग की जातियों के खिलाफ होने वाली जुल्म-ज्यादतियां उन्हें पुनः बसपा में वापसी के लिए मजबूर करेंगी. इसी सोच के तहत मायावती कभी एससी/एसटी एक्ट में बदलाव का शिगुफा छोड़कर तो कभी मोदी सरकार पर आरक्षण खत्म करने का आरोप लगा कर अपनी सियासी रोटियां सेंकने में जुटी हुई हैं.अब वह ऊंची जातियों के गरीबों के लिये अलग से दस प्रतिशत आरक्षण की बात नहीं करती है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद बहुजन समाज पार्टी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग के नारे ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ को बदलते हुए नया नारा ‘ब्राह्मण उत्पात मचाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ का नया नारा गढ़ा है। दलित एजेंडा को धार देने की वजह से ही सत्ता में रहते एससी/एसटी एक्ट में जो बदलाव मायावती ने किये, वही बदलाव जब सुप्रीम कोर्ट ने किये तो माया उसकी मुखालफत करने में जुट गई हैं.

सुप्रीम कोर्ट के बहाने मोदी सरकार को घेर रही हैं, लेकिन उनके पास इस बात का कोई जबाव नहीं है कि सत्ता में रहते प्रोन्नति में आरक्षण का विरोध करने वाली अखिलेश सरकार पदस्त होते ही अपनी सोच से पलट कैसे सकती है. बसपा सुप्रीमों अगर इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सफाई ही मांग लेती तो काफी कुछ साफ हो जाता. यह वह मुद्दे हैं जो बीएसपी-एसी की दोस्ती पर सवाल खड़ा करने के लिये लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी के द्वारा भी उठाये जायेंगे. वैसे भी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा के उप-चुनाव में मिली करारी हार और विपक्ष के दलितों के बहाने मोदी सरकार को बदनाम करने की कोशिशों के बाद बीजेपी फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रही है. मोदी सरकार ने दलितों के लिये क्या किया इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है.

बीजेपी जानती है कि सपा-बसपा गठबंधन 14 प्रतिशत मुस्लिम (एम) और 22 प्रतिशत दलितों (डी) के साथ-साथ पिछड़ा वर्ग के 04 प्रतिशत यादवों (वाई) के सहारे अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहती हैं. इसी लिये मोदी सरकार दलितों को छिटकने नहीं देना चाहती हैं और इसमें यूपी सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण रहना तय है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार स्वयं भी बताया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उनसे दलित, किसान और गरीब को टॉप एजेंडा में रखने के लिए कहा था.प्रदेश में सहारनपुर के दंगों को छोड़कर दलितों के साथ कोई बड़ी घटना तो नहीं घटी है, लेकिन फिर भी योगी सरकार दलितों के मुद्दे पर बैकफुट पर नजर आ रही है तो इसकी बड़ी वजह दलितों को लेकर विपक्ष का प्रोपोगंडा तो है ही बीजेपी के दलित सांसदों ने भी पार्टी के खिलाफ माहौल बनाया है.

बात दलितों के मुद्दे पर योगी सरकार के प्रयासों की कि जाये एक अप्रैल से यूपी के सभी सरकारी दफ्तरों में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की तस्वीर लगाना अनिवार्य कर दिया था.तो इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए सरकार द्वारा सभी सरकारी दस्तावेजों में डॉ. आंबेडकर का सही नाम लिखने का निर्देश भी जारी किया जा चुका है. अब दस्तावेजों में उनका नाम डॉ भीमराव अम्बेडकर की जगह डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर लिखा जाएगा.हवा बदलने के लिये ही सपा-बसपा के कई दलित नेताओं को बीजेपी ने गले लगाया है. ग्राम स्वराज अभियान के तहत सौभाग्य योजना में प्रदेश भर के एससी/एसटी बाहुल्य 3387 गांवों में विद्युत कनेक्शन दिये जा रहे हैं.

दलितों पर सियासी घमासान से निपटने के लिये भाजपा अनुसूचित मोर्चे का गठन किया गया है. यह काम करीब डेढ़ वर्षो से टल रहा था. दलितों को बीजेपी के पक्ष में लामबंद करने के लिये 14 अप्रैल से 05 मई 2018 तक ग्राम स्वराज अभियान चलाने का फैसला भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है. बीजेपी की इस मुहिम में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है. लल्बोलुआब यह है कि दलित सियासत के नाम पर हो-हल्ला तो खूब हो रहा है, लेकिन दलितों के असल मुद्दे नेपथ्य में जा रहे हैं जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है.

लेखक अजय कुमार वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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