एयरसेल मैक्सिस केस में सुनवाई ‘साइन-डाई’

जब 70 और 80 के दशक में हमारी पीढ़ी के लोग पढ़ते थे या उससे पहले भी ऐसा होता था कि छात्र आंदोलन अक्सर इतना उग्र रूप धारण कर लेता था कि इंटर कालेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया जाता था और अख़बारों में सुर्खियां छपती थी कि ‘इलाहबाद विश्वविद्यालय साइन डाई’। यहां आप इलाहाबाद की जगह किसी और का नाम भी देकर समझ सकते हैं। लेकिन इधर एक बार फिर साइन डाई शब्द पढ़ने को मिल रहा है लेकिन किसी शिक्षण संस्थान के लिए नहीं बल्कि देश के एक बहुचर्चित घोटाले एयर मैक्सिम के मुकदमें से संबंधित सुनवाई के मामले में। दिल्ली के पटियाला हॉउस कोर्ट के विशेष जज ने पूर्व मंत्री पी चिदंबरम और उनके पुत्र कार्ति चिदंबरम के मामले में केस को साइन डाई घोषित कर दिया है यानी सुनवाई अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी है, क्योंकि जाँच अभी भी पूरी नहीं हुई है या यह भी कहा जा सकता है की पुख्ता सबूत अभी नहीं मिले हैं।

एयरसेल मैक्सिस केस में सुनवाई कर रही दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने बिना कोई अगली तारीख दिए मामले की सुनवाई अनिश्चित काल के लिए टाल दी है। इस मामले की चार्जशीट पर संज्ञान को लेकर शुक्रवार को बहस होनी थी। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने कोर्ट से मामले के सुनवाई के लिए अक्टूबर के पहले सप्ताह में लिस्ट करने की अपील की, जिस पर कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष तारीख पर तारीख मांग कर रहा है। कोर्ट ने जांच एजेंसी से कहा कि जब जांच पूरी हो जाए और विभिन्न देशों में लेटर्स रोजेटरी मिल जाए तब कोर्ट से संपर्क करें। स्पेशल कोर्ट ने ईडी और सीबीआई के मामले में पी. चिदंबरम और कार्ति चिदंबरम को अग्रिम जमानत दे दी है।

मामले में आरोपपत्र का संज्ञान लेने पर जिरह के लिए इसे सूचीबद्ध किया गया था। सीबीआई और ईडी की ओर से पेश हुए क्रमश: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और विशेष लोक अभियोजक नितेश राणा ने इस आधार पर स्थगन मांगा कि ‘लेटर्स रोगेटरी’ पर जवाब का इंतजार है। एजेंसियों ने अदालत से इस मामले को अक्टूबर में पहले सप्ताह तक स्थगित करने का अनुरोध किया था।अदालत ने कहाकि अभियोजन पक्ष तारीख पर तारीख मांग रहा है। मामले को अनिश्चितकाल तक स्थगित किया जाता है। जब भी जांच पूरी हो जाए और उन्हें विभिन्न देशों से लेटर्स रोगेटरी प्राप्त हो जाएं तो अभियोजन पक्ष अदालत का रुख कर सकता है।

विशेष जज ओपी सैनी ने ईडी से कहा था कि 2018 में केस दर्ज करने के बाद आपने जांच के लिए कई बार तारीखें बढ़वाई। जांच में वैसे ही काफी देरी हो चुकी है और शुरुआत से ही सभी दस्तावेज आपके पास हैं। इसकी कोई संभावना नहीं है कि चिदंबरम ने ऐसा कोई अपराध किया है, जबकि वे सरकार में किसी पद पर नहीं हैं। उन पर 1.13 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप गंभीर नहीं हैं। जबकि दयानिधि मारन के खिलाफ रिश्वत का आरोप है, लेकिन उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया।विशेष जज ओ. पी. सैनी ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि यह एजेन्सी एक ही मामले में अलग-अलग अभियुक्तों के साथ अलग-अलग व्यवहार करती है। यह भेदभावपूर्ण व्यवहार है। इस तरह का भेदभावपूर्ण व्यवहार संविधान का उल्लंघन है।

विशेष जज ओपी सैनी ने खा कि किसी जाँच एजेन्सी को एक समान दो अभियुक्तों के बीच भेदभाव नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह नियम के ख़िलाफ़ है। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एक समान मामले मे दो अभियुक्तों के बीच भेदभाव करना संविधान की बुनियादी अवधारणा के ख़िलाफ़ है। संविधान में कहा गया है कि राज्य की एजेन्सियों को हमेशा न्यायपूर्ण, उचित और सही तरीक से काम करना चाहिए।

विशेष अदालत ने एक-एक लाख रु के निजी मुचलके पर अग्रिम जमानत दी है। कोर्ट ने कार्ति और पी. चिदबंरम को ईडी और सीबीआई जांच में सहयोग करने को कहा है। दरअसल, इस अग्रिम जमानत का ईडी और सीबीआई विरोध कर चुकी थीं। ईडी और सीबीआई का कहना था कि जांच को आगे बढ़ाने के लिए आरोपियों से पूछताछ करने के लिए हिरासत चाहिए। ऐसे में आरोपियों की गिरफ्तारी पर लगी रोक हटाई जाए।

एयरसेल-मैक्सिस केस भी एफआईपीबी से जुड़ा है। आरोप है कि किसी बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के लिए पी चिदंबरम को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति से मंजूरी लेनी जरूरी थी। इसके बावजूद, एयरसेल-मैक्सिस एफडीआई मामले में चिदंबरम ने वित्त मंत्री रहते हुए कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स की मंजूरी के बिना परमिशन दे दी। एयरसेल-मैक्सिस डील केस 3500 करोड़ की एफडीआई की मंजूरी का है।

गौरतलब है कि चिदंबरम को एयरसेल-मैक्सिस मामले में आरोपी बनाए जाने से पहले एक विशेष अदालत ने दो फरवरी 2017 को द्रमुक नेता एवं पूर्व संचार मंत्री दयानिनिधि मारन, उनके भाई कलानिधि मारन और अन्य को सीबीआई तथा ईडी के मामलों में बरी कर दिया था। बाद में, दोनों एजेंसियों ने घोटाले में चिदंबरम पिता-पुत्र का नाम लेते हुए पूरक आरोपपत्र दायर किया था।

लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और काननी मामलों के जानकार हैं.

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