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छुटभैया चैनलों में ज्वाइन करने से बचें, इनके संचालक सेलरी नहीं देते, अभद्रता रोज करते हैं

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यशवंत सिंह-

भड़ास के पास इन दिनों ढेर सारी मेल सेलरी न मिलने को लेकर आ रही है. नोएडा के सेक्टर 63 में कई ऐसे नए चैनल चलाए जा रहे हैं या चलाए जाने की प्रक्रिया में हैं जहां काम करने वालों के साथ अभद्रता की जाती है, उन्हें धमकाया जाता है, छोटी छोटी गल्तियों पर नौकरी से निकाल दिया जाता है, बकाया सेलरी मांगने पर बुरी तरह से धमकाया जाता है.

पीड़ित मीडियाकर्मी भड़ास पर खबर छापने का अनुरोध करते हैं. पर वे अपने नाम पहचान के साथ सामने नहीं आना चाहते. मतलब क्रांति तो हो लेकिन कोई दूसरा करे, खुद नहीं करेंगे. खुद वो शोषण कराएंगे, बिना सेलरी काम करेंगे, पर वे अपनी लड़ाई खुद नहीं लडेंगे, उनकी लड़ाई कोई दूसरा आकर लड़ दे, उनकी परम इच्छा ये रहती है.

भड़ास आमतौर पर घटिया और छुटभैये चैनलों की खबरें छापने से इग्नोर करता है. वजह ये कि जब ये चैनल पत्रकारिता करने के लिए खुल ही नहीं रहे हैं तो इनका नोटिस क्या लेना… इनके बारे में खबरें छाप कर भड़ास इनकी ब्रांड वैल्यू बढ़ा देता है और मीडिया इंडस्ट्री को ये बता देता है कि इस नाम का कोई चैनल भी है. यही कारण है कि छुटभैये चैनल और इनके लायजनर संचालकों को लेकर भड़ास पर खबरें न के बराबर आती हैं.

अगर ऐसे चैनलों में कोई मीडियाकर्मी पीड़ित है और वह अपना नाम पहचान के साथ सामने आकर खुलकर सारी बात लिखता है तो उसका हम स्वागत करते हैं और उनकी भड़ास को भड़ास4मीडिया पर जगह देते हैं.

युवा मीडियाकर्मियों से अपील है कि वे छुटभैये चैनलों में कतई न ज्वाइन करें. यहां पत्रकारिता नहीं बल्कि उगाहीकारिता की जाती है. इनके संचालक पढ़े लिखे होते भी नहीं. ये बस अभद्रता करना और बात बात पर नौकरी से निकालने की धमकी देना ही जानते हैं… युवा मीडियाकर्मी अगर ठीकठाक चैनल में जाब न पा सकें तो फिर कोई दूसरा धंधा करें, मीडिया लाइन छोड़कर कुछ और ट्राई करें. मीडिया इंडस्ट्री में अब शोषण चरम पर है. यहां टैलेंट की कम, उगाही करने वालों की ज्यादा कदर की जाती है, खासकर छुटभैये चैनलों में.

नीचे नमूने के बतौर दो मेल देखें जिन्हें पीड़ित मीडियाकर्मियों ने भेजा है … चिरकुट टाइप छुटभैये चैनलों का नाम हटा दिया गया है ताकि इनकी ब्रांडिग (बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा, वाली कहावत याद रखें) न हो सके…

मेल नंबर एक-

विषय- सैलरी न देने के संबंध में

मामला नोएडा के सेक्टर 63 का है जहां एक निजी न्यूज़ चैनल ….. चल रहा है जो कि इम्प्लॉइज को सैलरी नहीं दे रहे हैं… इम्प्लाइज जब भी सैलरी मांगने जाते हैं तो कल जाऔ परसों आओ या अगले हफ्ते आओ करके एक साल का वक्त निकाल दिया पर अभी तक सैलरी नहीं दी। बीच में एक बार 3000 दिए गए जिसके बाद कहा गया कि अगले सप्ताह हो जाएगा। ऐसे करते करते महीनों लग जाते हैं और सैलरी भी नहीं दी जाती है। मुझे बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कमरे का किराया 2 महीने का और दोस्तों के भी कुछ पैसे देने हैं। मैने उन्हें ये बात भी बताई पर उन्होंने कभी मेरी नहीं सुनी। अब कभी फोन करो तो कहते हैं कि अकाउंट मैं नहीं सम्भाल रहा हूं। जबकि चैनल में सिर्फ 4 लोग ही काम करते हैं। जब भी सैलरी लेने जाओ तो बड़ी-बड़ी बातें करके बोलते हैं कि सब हो जाएगा टैंशन मत लो। अब मैं बहुत परेशान हूं। मेरी मदद करें। लगभग 20,000 अभी बाकी हैं पर देने का नाम नहीं ले रहे। कहते हैं कि जो काम कर रहा है उसे पहले पे करेंगे। कोरोना के समय में हर समय जब ये काम के लिए बुलाया करते थे तो मैं अपना काम छोड़कर भी आफिस चला जाता था और आज मेरे साथ इतना बड़ा धोखा कर रहे हैं। मदद करें ।

मेल नंबर दो-

विषय- 15 दिनों में 15 पत्रकारों की छंटनी, सैलरी के नाम पर मिल रही गाली

यशवंत सर आपको बताते हुए बहुत दुख हो रहा है कि नोएडा सेक्टर-63 से नए लॉन्च होने वाला चैनल न्यूज़ पत्रकारों के शोषण का एक नया अड्डा बन गया है। पहली बात तो यहां पत्रकार कम चाटूकार ज्यादा जमा हो गए हैं। जो अपनी सैलरी मांगते हैं, उन्हें निकाल दिया जाता है। जो लोग थोड़ी बहुत अपनी बात रख पाते हैं उन्हें धमकी दी जाती है कि जो करना है कर लो, भड़ास को लिखना हो, लिख लो, कुछ नहीं होगा। पिछले 15 दिनों में 15 पत्रकारों को निकाल दिया गया लेकिन अभी तक एक पत्रकार की भी सैलरी नहीं मिली है और सैलरी मांगने वालों को गाली और धमकी दी जाती है। चैनल लॉन्चिंग के पहले ही 3 इनपुट हेड, 1 एंकर हेड, 2 CTO, 2 सोशल मीडिया हेड और 2 वीडियो एडिटिंग हेड बदले जा चुके हैं। चैनल मालिक के आस-पास 2-3 चाटुकार जमा हो गए हैं जिनकी बातों में आकर चैनल मालिक पत्रकारों की छंटनी कर रहे हैं।

छंटनी वाली लिस्ट बनाने वालों में आउटपुट हेड भी हैं जो खुद किसी तरह मुश्किल से अपनी नौकरी खोज पाए हैं। अब वो बंद हुए चैनल के लोगों को यहां लाने की कोशिश में पुराने लोगों की छंटनी कर रहे हैं। इसी कड़ी मे पुराने एंकर हेड, पुराने सोशल मीडिया हेड और पुराने इनपुट हेड की छंटनी कर दी गई है। चैनल में हल्ला है कि चैनल लांच करने के लिए जो कोलकाता का इन्वेस्टर था वह इनकी हरकतों से 1 महीना पहले ही इन्हें छोड़ चुका है। जिसकी वजह से चैनल लांच होने की भी संभावना न के बराबर है। रोज नए लोगों को लाकर चैनल दिखाया जाता है और उन्हें फंसाने की कोशिश की जाती है। लेकिन अभी तक कोई पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं हुआ है।

चैनल की HR जो हैं वो कभी HR का काम न्यूज़ चैनलों में की नहीं है वो इसे फैक्टरी बना देना चाहती है। मसलन चैनल के गेट पर ताला लगाना, चाय-नाश्ता आदि करने जाने वालों के लिए गेट पर रजिस्टर रखवाना, अपने मन से किसी की भी सैलरी काट लेना, चैनल में सुपरवाइजर नियुक्त करना आदि-आदि। अपने मन से चैनल छोड़ने वालों से 45 दिन का नोटिस पीरियड करवाना जबकि निकालने वालों को एक झटके में ग्रुप से निकाल देना बिना 1 मिनट समय दिए और वह पत्रकारों को कंपनी का नियम समझाती है जबकि कंपनी ने 2-4 लोगों को छोड़कर किसी को भी ना तो ऑफर लेटर दिया है ना ही आई-कार्ड दिया है। मीडिया में हर किसी की उम्मीद की आखिरी किरण भड़ास ही होती है। इसलिए आप हमारे दुख को सामने लाकर इंसाफ दिलाएं और अन्य पत्रकारों का यहां आकर अपना समय बर्बाद होने से सचेत करें।

REPLY-

-क्या आपमें से कोई अपने नाम के साथ सामने आएगा?

REPLY-

-सर चैनल के मालिक के तरफ से धमकी दी गई है कि भडास पे कोई कुछ नहीं भेजेगा…

REPLY-

-आपमें से कोई अपने नाम पहचान के साथ सामने आकर पूरे हालात के बारे में भेजे. बाकी ऐसे चिरकुट चैनल हजारों हैं जिनके बारे में खबरें भड़ास पर छापने का मतलब भड़ास की तौहीन है. अगर ऐसे चैनल में किसी को कष्ट है तो वह अपने नाम पहचान के साथ विस्तार से लिखकर भेजे. हम लोग केवल मंच देते हैं. पब्लिश करने के लिए पीड़ित व्यक्ति को नाम पहचान के साथ खुद आगे आना पड़ेगा.

REPLY-

-उपर लिखी बाते मेरे साथ-साथ दर्जनों लोगों के साथ हो चुकी है लेकिन मैनेजमेंट के डर से कोई कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है। छंटनी के नाम पर निकालने वाले लोगों को साफ-साफ कह दिया गया है कि किसी को कोई सैलरी नहीं मिलेगी। किसी की 1 महीने की तो किसी की 2 महीने की सैलरी बाकी है। लेकिन बार-बार फोन करने के वावजूद भी एचआर की तरफ से कोई जबाब नहीं आता है। वो ना ही किसी के मैसेज का रिप्लाई करती है और ना ही किसी का फोन उठाती है। अगर किसी का फोन उठा भी लेती है तो उसे सैलरी के बदले धमकी मिलती है। लगभग 2 दर्जन लोगों को अब तक निकाला जा चुका है। लेकिन निकाले जाने वाले एक भी पत्रकार को अभी तक सैलरी नहीं मिली है। आलम यहां तक है कि चैनल संचालक कहते हैं कि जो चैनल से निकाले जा चुके हैं वो गद्दार है और चैनल में काम कर रहा कोई भी आदमी निकाले जाने वाले व्यक्ति से बात करेगा तो वो भी गद्दार है। इस तरह की भाषा है चैनल के मालिक की। चैनल में काम कर रहा एक-एक आदमी घूंट-घूंट कर काम कर रहा है। कुछ लोगों को निकाला गया जिनमें से दबाब के बाद 2 या 3 लोगों को वापस भी बुला लिया गया है। लेकिन उन लोगों से कोई बात भी नहीं करता है ऐसे में वो केवल नौकरी के चक्कर में किसी पुतले की तरह आते हैं और 9 घंटे पुरा करके घर वापस चले जाते हैं। जिसे पत्रकारिता की एबीसीडी भी नहीं आताी है वैसे लोगों को पूरे चैनल के सभी डिपार्टमेंट को सुपरविजन करने को कहा गया है। ऐसे में अंदाज लगाया जा सकता है कि चैनल में चाटुकारिता किस कदर हावी है। बाकी आपसे केवल यही आग्रह है कि जिन लोगों को सैलरी नहीं मिली है। उनलोगों को सैलरी दिलवाने का प्रयास करेे और किसी और की जिंदगी बर्बाद होने से बचा लें। तुगलकी फरमान के कुछ स्क्रीनशॉट आपको भेज रहा हूं। सर नाम और पहचान उजागर ना करें ताकि मैनेजमेंट मुझे निशाना ना बनाए।

आखिरी REPLY-

-भाई सब बात तो ठीक है पर नाम पहचान उजागर किए बिना कैसे न्यूज छपेगी. आपको मैनेजमेंट से डर भी लगता है और क्रांति भी करना चाहते हैं, ये कैसे चलेगा. आप अपने नाम पहचान के साथ आर्टकिल भेजिए तो सारा पब्लिश कर दिया जाएगा. बाकी ऐसे चिरकुट चैनलों की खबरें छापने का अपन का कोई शौक नहीं है. ऐसे हजारों चैनल चलते रहते हैं जिसमें पत्रकारिता की जगह उगाहीकारिता होती है और सारे चिरकुट टाइप लोग इन चैनलों के मैनेजमेंट में होते हैं. सेकेंड, ऐसे चैनलों में जाब करने से बचना चाहिए. इसकी बजाय कोई दूसरा धंधा कर लीजिए. जब सब लोग जानते हैं कि ये सब चिरकुट चैनल हैं तो नौकरी करने क्यों जाते हैं… अगर सेलरी अप्वायंटमेंट लेटर आदि नहीं मिलता तो पुलिस थाने और श्रम विभाग में शिकायती पत्र क्यों नहीं भेजते… गांडू लोग हैं सब… अपनी मराएंगे और चाहेंगे कि दूसरे आकर उनकी मदद करें… शोषण करने वाला से ज्यादा दोषी शोषण कराने वाला होता है.. जिस दिन नाम पहचान के साथ सामने आकर छपवाने की हिम्मत हो जाए उस दिन बताइएगा… बाकी इन चूतिया चैनलों की खबरें छापने के लिए भड़ास नहीं खोला गया है… हम लोगों का भी एक स्तर है…

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  • आप अपना उद्देश्य क्यों भूल रहे हैं, कहाँ गए वो वादे कि 'भड़ास तक अपनी बात पहुंचाए, पहचान गुप्त रखी जायेगी'. इन छोटे छुटभैया चैनल्स के बलबूते ही तुम्हारी पहचान बनी है ठाकुर यशवंत. छोटे चैनल के कर्मचारियों को गरियाने की ज़रूरत नहीं है. सब लोगों को सीधे बड़े चैनल में नौकरी नहीं मिलती है. ये छुटभैये चैनल दिल्ली में टिकने भर का जुगाड़ होते हैं. उन हज़ारों छुटभैये चैनेल कर्मियों को मत भूलो जिन्होंने भड़ास को भड़ास बनाया है. ये अलख जो जगाई है इसे भूलने मत दो. तुम लोगों की प्रैक्टिकल मजबूरी समझो, अनजान न बनो.

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