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आदमखोर विषकन्याएं : साइबर दुनिया में सुंदर प्रोफाइल फोटोज़ की आड़ में भेड़िए शिकार पर, फंसे तो धंसे!

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-डॉ. अशोक कुमार शर्मा

इन फ़ोटोज को देख कर किसी भी भुलावे में आकर कोई गलती मत कीजिएगा। ये इन्टरनेट और मोबाइल की दुनिया के साइबर आदमखोरों के तिलिस्मी मकड़जाल हैं। फंसे तो धंसे!

हकीकत तो यह है कि इन टेलीफोन नंबरों पर अगर कोई भी व्यक्ति टेलीफोन करेगा, तो उसे या तो जवाब नहीं मिलेगा अथवा कोई पुरुष उनका टेलीफोन उठाएगा। यह सभी टेलीफोन किसी भी ऐसी वैसी महिला के हैं ही नहीं। सब इन्टरनेट पर उपलब्ध असली प्रोफाइल्स या विज्ञापनों की दुनिया की असली मॉडल्स के फ़ोटोज़ से चुराए हुए होते हैं। हनी ट्रैप यानी प्यार के जाल में किसी को फंसा कर ब्लैकमेल करने की दुनिया एक खतरनाक रूप अख्तियार कर चुकी है। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों बराबर फंसते रहते हैं।

कैसे बचें? :

डिजिटल धोखाधड़ी की दुनिया में क्या नहीं हो रहा? इसे समझना बहुत आसान है और बहुत दुष्कर भी। आइए इस चक्रव्यूह को समझते हैं।

साजिशों के गिरगिटिया रंग: साइबर भेड़ियों की अंतर्राष्ट्रीय दुनिया में बाकायदा उनके कॉल सेन्टर काम करते हैं हैं। मामूली सी तनखाहों पर काम करने वाले लड़के-लडकियां बधुआ मजदूरों की तरह शिफ्टों पर काम करते हैं। इनकी बेरहम दुनिया को किसी के धर्म, उम्र और अस्तित्व से कोई मतलब नहीं। इन लोगों से मेरा पहला वास्ता 2013 में तब पड़ा। तब मैं सरकार के आदेश पर अपने कार्यों के साथ ही, उत्तर प्रदेश पुलिस के जनसंपर्क कार्यालयों की स्थापना, उनके प्रशिक्षण, दैनिक मार्गदर्शन, पुलिस के फेसबुक और ट्विटर सोशल मीडिया हैंडल का एकल-सञ्चालन तथा अपर पुलिस महानिदेशक (क़ानून व्यवस्था) के निर्देशानुसार विभिन्न कार्रवाईयां कर रहा था। तबी मेरे सीयूजी पर गाज़ीपुर से एक मुस्लिम लड़की का कॉल आया। उसने अपना नाम बताते हुए बताया कि उसको सहारनपुर का एक युवक फेसबुक पर उसके अश्लील फोटो डालने की धमकी दे रहा है।

जब छानबीन की गयी तो वह नंबर कानपुर के एक फोटोस्टेट विक्रेता का निकला। वह सज्जन सचमुच एक बुजुर्ग और शरीफ इंसान थे। उनकी दुकान में फतेहाबाद का एक लड़का ईमेल और वेब-सर्फिंग सुविधा के पाँचों कम्प्यूटरों की देखरेख का काम करता था। उसके पास फोन नहीं था, इसलिए दया करके हाजी जी ने उसे अपना फालतू सिम दे दिया। चार सौ रूपये पानेवाले, उस बारहवीं फेल लड़के ने एक नया धंधा शुरु किया। वह इन्टरनेट से पाकिस्तान और बांग्लादेशी सुन्दर लड़कियों के फोटो ढूंढ कर अपने अलग अलग प्रोफाइल बनाकर खासतौर से बुजुर्गों को फंसाया करता था। ऐसे ही करते करते उसने लड़कियों को फंसाने का धंधा शुरु किया। वह लड़की उसी कुचक्र का शिकार थी। सात भाई बहनों वाले कुनबे में पैदा हुई उस लड़की ने जब देखा कि एक स्वजातीय लड़का उसके प्यार में पागल है, तो उसने वह सब किया जो उस लड़के नए कहा था। इस मामले में मैंने भारत के प्रसिद्ध साइबर क्राइम एक्सपर्ट रक्षित टंडन से भी मदद ली थी। सबक यह कि अपराध की दुनिया में वाकई धर्म की कोई कीमत नहीं। जो मौक़ा पाए वही शिकार को खाए।

जब मैंने इस तरह के मामलों में दिलचस्पी लेनी शुरू की तो रक्षित टंडन मेरे काफी निकट आये और तत्कालीन सूचना सचिव अमृत अभिजात आईएस की पहल पर हमने पत्रकारों को साइबर अपराधियों के बारे में बताने के लिए मुख्यमंत्री सचिवालय एनेक्सी में एक दिवसीय वर्कशॉप भी कराई। लेकिन पत्रकारिता की दुनिया में अभी तक साइबर अपराधियों के खिलाफ जनजागरूकता को मजबूत बनाने में उतनी दिलचस्पी नहीं ली गयी।

मैं रात में अपनी किताबें और अखबारों के लिए आलेख लिखने का काम, 1983 से कर रहा हूँ। इन्टरनेट से पहले पोर्टेबल टाइप राइटर पर काम करता था। कभी कोई खलल नहीं पड़ा। लेकिन कुछ साल पहले, जब मैं रात के ढाई बजे किताबों की एक श्रंखला पर काम कर रहा था, तब अचानक मेरे फेसबुक मेसेंजर पर पॉपअप आया। कोई ब्राह्मण लड़की ऑनलाइन थी और उसने मुझसे दोस्ती की इच्छा जताई। मैंने कहा कि मैं एक रिटायर्ड अफसर हूँ और तुमको अपनी उम्र वाले इंसान से दोस्ती करनी चाहिए। उसे मैंने अपनी बहन के अविवाहित पुत्र का फेसबुक प्रोफाइल एड्रेस भी बताया। लेकिन उसने जब मुझे फंसाने कोशिश जारी रखी। तो मैंने उसके मोबाइल नंबर को ट्रेक किया, तो पता चला कि वह नंबर बरेली के एक बेरोजगार लड़के का है, जो उससे पहले वहीं कार्यरत एक रेलवे उच्चाधिकारी के पति को जाल में फंसाने की कोशिश कर चुका है। उस लड़के की मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं थी और वह अपना इलाज भी करा रहा था। पुरुष होने के बावजूद उनकी यौनिक इच्छाएं पुरुषों से जुडी थीं। याद रखिये, साइबर अपराधी इतने शातिर होते हैं कि खुद को क़ानून से बचने के लिए पहले से ही अपनी मानसिक स्थिति खराब होने का रिकार्ड बना कर रखते हैं क्योंकि इससे उन्हें क़ानून की लम्बी लड़ाई हारने पर सज़ा में राहत मिलने की पक्की उम्मीद रहती है।

बचाव आसान है: साइबर अपराध की इस दुनिया का उसूल है जिस शिकार में जरा गोश्त नज़र आये, उसे फंसाओ और फाड़ खाओ। इसमें आपकी जात, धर्म और उम्र का कोई महत्त्व नहीं। एक बात तय है कि इनसे बचने में पुलिस और क़ानून आपकी मदद इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि अपराध जब तक घटित ना हो, कोई कार्रवाई हो नहीं सकती। जिन मामलों में शिकार फंस जाता है वह बलात्कारित स्त्री की तरह ज़्यादातर मुंह सिल लेता है। तब कुछ हो नहीं पाता। सबसे पहला सवाल यह है कि ये लोग शिकार कैसे चुनते हैं और उससे कैसे बचा जाए?

      साइबर अपराध विशेषज्ञ इस बारे में बहुत सीधी और सपाट राय देते हैं। अपराधियों का मकसद वक्त बर्बाद किये बिना कम से कम समय में ज़्यादा से ज्यादा रुपया कमाना होता है। इसलिए वे जहाँ कोई लाभ नहीं दिखता वहां हाथ भी नहीं डालते। 

अब जरा सोचिये, उनको पता कैसे चलता है कि सोने का अंडा देनेवाली मुर्गियां कहाँ कहाँ पर हैं? जवाब आसान है। आपके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर आपकी गतिविधियों के चित्र इसमें सबसे ज्यादा मददगार होते हैं। उन्हीं से पता चलता है कि आप कहाँ पार्टी करते हैं? किस तरह के घर में रहते हैं? कहाँ घूमने जा रहे हैं या घूम आये है? आपके पास कपडे कैसे हैं? आपकी अभिलाषाएं क्या हैं? आपकी पसंद और आपकी जन्मतिथि क्या है? आप अपने पति-पत्नी से किस लिए खुश या खफा हैं? आपकी राजनीतिक, व्यवसायिक और धार्मिक सोच क्या है? साइबर अपराधी सब।से पहले इसी जानकारी का पता चलते हैं। फिर दूसरा कदम दोस्ती!

इन्टरनेट के ज़माने में दोस्ती की स्पीड अकल्पनीय है। लोग सुबह दोस्त बनते हैं और शाम तक मोबाइल पर व्हाट्सएप मेसेजिंग पर पहुँच जाते हैं। किसी पर दो नंबर हैं तो दोनों बाँट देता है। यह आपको फंसाने में कामयाबी के एक और कदम पास है। आपके दो सिम हों या एक, उनसे यह मालूम करना बेहद आसान है कि किस नंबर को बैंक खाते, पेटीएम, गूगल पे, जिओ-मनी या अन्य किसी पेमेंट प्लेटफोर्म से संबद्ध किया गया है। इसके बाद तीसरा चरण: ये कई तरह से पूरा किया जाता है। पहला तो आपसे बहुत छोटी सी रकम ऑनलाइन ट्रांस्फाएर कर्नाए के बाद, कुछ दिन बाद उसे लौटने के लिए आपसे आपका भुगतान का जरिया मालूम कर लेना। इसके बाद किसी तरीके से आपसे आपके आधार कार्ड, पैन कार्ड या ड्राइविंग लायसेंस की डीटेल्स लेना। उनका इस्तेमाल करके आपके बैक वाले मोबाइल का डुप्लीकेट सिम जारी कराना। कई मामलों में आपको धमकाने और परेशान करनेवाले सन्देश भेज कर सीधे बैंक या पेटीएम से रुपया निकालना। इसका ध्यान रखेंगे तो साइबर अपराधियों से काफी हद तक बच जायेंगे।     

क्या करें और क्या नहीं करें?

किसी भी स्थिति में बैक, आधार, पैन कार्ड तथा किसी भी पेमेंट गेट वे से सम्बद्ध अपने मोबाइल को सोशल मीडिया की किसी भी गतिविधि के लिए इत्सेमाल मत कीजिये। अंधाधुंध फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकारना बंद कीजिये। यदि आप ऐसा कर चुके हैं तो एक नया सिम खरीदिये या दुसरे किसी सिम से आर्थिक कार्य कीजिये। वह सिम वीआईपी नंबरों का मत लीजिये। अपने जीवन के उन अपडेट को सोशल मीडिया पर मत डालिए, जो आपकी वित्तीय स्थिति को उजागर करते हों।

ब्लैकमेलिंग करनेवालों के पास बहुत ज्यादा वक्त नहीं होता, वे आपको ज्यादा परेशान तब तक नहीं कर सकते जब तक कि आप अपने कोई शर्मनाक पल उनके साथ ना बाँटें। यदि यह गलती हो गयी हो, तब इससे पहले कि आप परेशान हों और आपको ऐसा कुछ करना पड़े, जो आपके लिए ठीक ना हो, तो गैरों से पहले अपनों से सलाह लें। किसी भी स्थिति में ब्लैकमेल करनेवाले से फोन पर हरगिज़ बात ना करें। कॉल बैक ना करें। अनजान और अपरिचित स्त्री या पुरुष की वीडियो कॉल तो हरगिज़ ना लें। शत प्रतिशत यही होगा कि वह खुद को अश्लील मुद्रा में कैमरे के सामने रख कर आपके साथ जरा सी बात का भी स्क्रीन शॉट ले ले। यदि आपको सेक्स की ऑफ़र मिले तब तो पक्का मान लीजिये यह कोई खतरनाक ट्रैप का आरम्भ है। प्रोफाइल फोटो में मासूम से लगनेवाले अज्ञात स्त्री-पुरुषों के सवालों और संदेशों का भी जवाब मत दीजिये, चाहे कितनी भी आकर्षक और रसूखदार ब्यौरे के साथ फोटो क्यों ना लगी हो। यदि आप किसी कुचक्र में फंस ही चुके हैं तो झल्ला कर ब्लेकमेलर को फोन पर धमकी या जवाबी चुनौती मत दीजिये। ज्यादा से ज्याद आप अपना सिम डी-एक्टिवेट करा लीजिये या इस्तेमाल मत कीजिये। साइबर अपराधी जानते हैं कि उनकी पहचान खुली तो उनका खानदान बदनाम होगा, गिरफ्तारी होगी, जेल यात्रा चालू होगी, और धंधा बंद! 

साइबर अपराधी भी पुलिस से उतना ही डरते हैं, जितना आम अपराधी। वे आपको नुक्सान पहुंचाने के लिए खुल्लमखुल्ला सामने नहीं आयेंगे। केवाईसी और अन्य तरह के फ्रॉड कॉल्स आपको जिस नंबर से आयें उन्हें सबसे पहले ब्लॉक कीजिये। जितनी बार ऐसे फोन आयें हर बार ब्लॉक कीजिये। ऐसे सभी फोन को ब्लाक करने के साथ ही हनी ट्रैप 1, 2 और 3 आदि या सोशल मीडिया ब्लैकमेलर 1, 2 और 3 आदि लिखकर एक साथ सेव करते जाइए। इससे उस अपराधी का नंबर ट्रू कॉलर भी इसी तारक की लिस्टिंग में ले आयेगा।

ज़रूरी सावधानियां?

रक्षित टंडन

सबसे पहली बात यह कि अपने आधार कार्ड, पैन, पासपोर्ट, ड्राइविंग लायसेंस और वोटर पहचान पत्र से सम्बंधित जानकारी मांगनेवाली किसी भी तरह की वेरिफिकेशन कॉल को महत्व न दें। इस काम के लिए नौकरशाही किसी भी तरह से व्हाट्सएप या साफ़ तौर पर निजी लगनेवाली ईमेल का उपयोग नहीं करती। हर विभाग का सारा काम उसी विभाग की अधिकृत वेब साईट पर ऑनलाइन भी हो जाता है।

भारत के विख्यात और भरोसेमंद साइबर अपराध विशेषज्ञ रक्षित टंडन को सोशल मीडिया पर फॉलो करके कोई भी शिकायत अथवा समस्या होने पर सीधे इनबॉक्स करें। रक्षित केंद्र और अधिकाँश राज्यों के पुलिस, ख़ुफ़िया तथा अन्य वैधानिक संगठनों से भी जुड़े हैं।

अंत में : सौ बातों की एक बात, सावधानी हटी दुर्घटना घटी। अपनी जेब और प्रतिष्ठा में सेंध लगाने का मौक़ा किसी को मत दीजिये।

लेखक डॉ. अशोक कुमार शर्मा अनेक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त जाने-माने लेखक हैं। पुलिस-प्रशासन, पैरा मिलेट्री तथा अन्य केन्द्रीय विभागों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों के फैकल्टी, अनेक विश्वविद्यालयों के अतिथि प्रवक्ता तथा परीक्षक हैं। उन्होंने यह आलेख निरपराध और अबोध लोगों को साइबर दुनिया के खतरों से आगाह करने के लिए निजी अनुभवों से लिखा है। इसका उद्देश्य हरगिज़ किसी की मानहानि करना नहीं है।

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