यह फ़िल्म जितनी दिखती है, उससे कहीं अधिक गहरी है!

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आराधना मुक्ति-

‘डार्लिंग्स’ के बहाने घरेलू हिंसा के कारणों पर एक टिप्पणी… अगर आप पितृसत्तात्मक समाज के पदसोपानीय ढाँचे और शोषण की महीन परतों के बारे में नहीं जानते तो आपको ‘डार्लिंग्स’ एक औसत फ़िल्म लगेगी। जबकि यह फ़िल्म जितनी दिखती है, उससे कहीं अधिक गहरी है। यह सिर्फ हिंसा का जवाब हिंसा या बदले की भावना को लेकर रची गयी कहानी नहीं है, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली फ़िल्म है।

आप देखिए कि हमारे समाज में किसी स्त्री का अपने पार्टनर के हाथों पिटना कितना सहज बना दिया गया है कि अड़ोसी-पड़ोसी सब जानते हुए भी इस पर कुछ नहीं बोलते। बदरू की माँ कम से कम इतनी मज़बूत है कि उससे तलाक़ लेने को कहती है, लेकिन दामाद को बहुत कुछ नहीं कह पाती। लड़की हर दूसरे-तीसरे दिन पिटती है और इसे घरेलू मामला मानकर इग्नोर कर दिया जाता है। फ़िल्म में पुलिस की भूमिका ज़रूर सकारात्मक दिखायी गयी है, जबकि आमतौर पर ऐसा कम होता है।

बदरू के मन में अपने पति का इतना खौफ़ है कि कोई ग़लती होते ही वह पिटने के डर से काँपने लगती है। बाकी समय में वह ख़ुश दिखती है। उसे दिखना पड़ता है क्योंकि समाज के अन्य लोगों को उसकी परेशानी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि सब यह मानते हैं कि “मारता तो इसीलिए है कि प्यार करता है” बदरू की सोशल कंडीशनिंग भी ऐसी है। वह इस बात पर विश्वास करती है कि हिंसा के बावजूद उसका आदमी उससे प्यार करता है।

एक अन्य बात नोट करने वाली है। बदरू बुर्क़ा नहीं पहनती। उसका रहन-सहन हमारे आसपास की निम्नमध्यवर्गीय स्त्रियों की तरह दिखाया गया है। उसकी माँ भी वैसे ही रहती है, लेकिन एक जगह पर हमज़ा उसे इस बात का ताना देता है कि वह उसे बाहर जाने देता है और बुरक़ा पहनने के लिए नहीं करता, फिर भी बदरू को पता नहीं क्या चाहिए?

यह इसी तरह का ताना है कि “भई, हम तो अपनी लड़कियों को पूरी छूट देते हैं।” यह जो “देते हैं” है न, यही सारी समस्या की जड़ है।

क्या सच में कोई मर्द पत्नी को प्यार करता है इसलिए मारता है? नहीं, वह इसलिए मारता है कि वह समझता है वह मालिक है और बीवी की ड्यूटी है उसकी सेवा करने की। वह इसलिए मारता है कि उसके घरवालों, दोस्तों, सहकर्मियों से लेकर आस-पड़ोस वालों ने उसे कभी अपनी पत्नी को मारने से नहीं रोका। कभी सार्वजनिक रूप से उसका बहिष्कार नहीं किया।

और फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी दिखाया गया है कि अंततः स्त्री को ही हिंसा के इस दुष्चक्र से बचने के लिए आगे आकर क़दम बढ़ाना पड़ता है। लेकिन याद रखिए, घरेलू हिंसा सिर्फ़ इसलिए नहीं होती कि स्त्रियाँ होने देती हैं, जैसा कि पुलिस ऑफिसर ने शमसू से कहा था। न सिर्फ़ ऐसा है कि शराब उसकी वजह है और उसे छोड़ देने से समस्या ख़त्म हो जाएगी। घरेलू हिंसा के लिए मूकदर्शक बना पूरा समाज ज़िम्मेदार है। इसकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था उत्तरदायी है जिसके अनुसार घर का पुरुष ख़ुद को स्त्रियों से ऊँचा समझता है, उसे अपनी संपत्ति समझता है, जिसके साथ वह जैसा चाहे व्यवहार कर सकता है।

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