#metoo में फंसे पत्रकार दिलीप खान ने फेसबुक पर विस्तार से रखा अपना पक्ष

Dilip Khan

फेसबुक पर कई तरह के स्क्रीनशॉट्स, स्टेटस, कमेंट्स लिखे गए और जा रहे हैं. कई लोग लगातर मैंशन कर रहे हैं. कुछ वेबसाइट् में छपे राइट-अप्स के लिंक भेज रहे हैं. मैंने अब तक इस प्रकरण पर कुछ नहीं बोला. कुछ नहीं बोलने के पीछे ‘आरोप स्वीकार करने’ के अलावा भी वजहें होती हैं.

उन वजहों में सबसे बड़ी वजह है दो लोगों के रिश्तों की बारीकियों को सार्वजनिक करना. उन ताक़तों को मसाला मुहैया कराना जो बीते कुछ महीनों से उत्साहित होकर लगातार अभियान चलाए हुए हैं.

कल से अब तक जितने सवाल पूछे गए और जिन-जिन ने पूछे उनमें से कुछ को लगातार पढ़ता, सराहता रहा हूं. कुछ को मैं मौज लेने वाला भयानक गलीच मानता हूं.

1. दो लोगों के बीच के रिश्ते में दोनों एक ही ज़मीन पर खड़ा/खड़ी हो ये ज़रूरी नहीं है.

2. दोनों का एप्रोच बराबर हो ये भी ज़रूरी नहीं है.

3. ये बहुत मुमकिन है कि एक-दूसरे को लेकर प्यार/आकर्षण/शारीरिक लगाव/ की डिग्रियां अलग-अलग हो.

4. ये भी मुमकिन है कि बाद में किसी भी (मतलब किसी भी) संबंध का रिव्यू दो लोग अलग-अलग तरीक़े से करें.

मैं इस मामले का कोई भी डिटेल नहीं लिखूंगा. चालाक, धूर्त, और दिमाग़ से खेलने वाले आरोप में ठोस आरोप क्या है? क्या मैंने बहलाया-फुसलाया? क्या मैंने झूठे वादे किए? क्या मैंने कहा कि मैं प्यार करता हूं और बाद में मुकर गया? कई रिज्वाइंडर भी देखने को मिले. एक ने लिखा कि नौकरी के लिए मुझसे पूछा तो मैंने प्रेस क्लब बुलाया. प्रेस क्लब में दो-तीन लोगों से मिलवाया. मैंने वहां दारू पूछा. घर चलने को पूछा. और फिर कभी नौकरी के बारे में नहीं पूछा.

नई दिल्ली में मिलने/बैठने के लिए मुझे वही जगह आसान लगती है. वहां जाने पर मैं ड्रिंक करता हूं और साथ में कोई हो तो पूछता भी हूं. जिस संस्थान में नौकरी के बारे में पूछताछ की जा रही थी, संयोग से वहां के डायरेक्टर वहीं मौजूद थे. मैंने मिलवाया. रात हो रही थी तो मैंने घर भी चलने को पूछा. सामने वाली ने कहा कि वो अपने घर जा सकती है, तो मैंने दोबारा नहीं पूछा. और ये बात सरासर ग़लत है कि उस दिन के बाद मैंने उनसे कभी नौकरी के बारे नहीं पूछा. उसके बाद भी उनका मैसेज आया.

मैं घर गया हुआ था. वो परेशान थी तो मैंने वहीं से एक वेबसाइट में उनके लिए बात की थी. अब ये वेबसाइट और उनके बीच का मामला है कि बात बनी या नहीं. वो गईं या नहीं. सुबह जब किसी ने स्क्रीनशॉट भेजा को मैंने चैट चेक किया. वेबसाइट की नौकरी के उस ऑफर के बाद मैंने उन्हें फिर नहीं पूछा. और हां, घर आने को पूछने के दौरान मैंने ये नहीं कहा था कि घर पर जॉब की बात करेंगे. आधी बात बताना और किसी ख़ास संदर्भ में ख़ास एजेंडे से बताने का मतलब मेरी समझ से परे हैं.

आप कहेंगे कि सबसे सरल आरोप के जवाब से मैंने शुरू किया. जी किया है क्योंकि कल से अब तक सबसे ज़्यादा थ्येराइज़ करके एक ख़ास तरह के डिजाइन की बात कही जा रही है कि मैं घर बुलाता हूं, मैं शराब पीता-पिलाता हूं ताक़ि मौक़े का फ़ायदा उठाया जा सके.

दो तीन लोगों ने इसी तरह की बातें लिखी हैं. इनमें एक को मैं बहुत पसंद करता हूं. पढ़ता हूं, सीखता हूं, समझता हूं. दूसरी महिला ने इससे पहले भी दो-एक जगह लिखा कि मैंने उन्हें घर बुलाया. ज़रा पूछे उनसे कोई कि कब बुलाया था? तीन साल पहले मेरे जन्मदिन पर मैसेज आया. मैंने वहीं लिखा कि पार्टी है, आइए. उन्होंने तब कोई प्रतिवाद नहीं किया, ये भी नहीं लिखा कि वो असहज हैं. वही हमारी पहली और आख़िरी बातचीत थी. तीन साल पहले. अब उस एक मैसेज को ‘डिजाइन’ और ‘पैटर्न’ के तौर पर पेश किया जा रहा है.

‘घर बुलाने’ पर इसलिए मैं सबसे ज़्यादा ज़ोर दे रहा हूं, क्योंकि जिस संदर्भ में पूरी बातचीत चल रही है, उस बुलाए जाने को लोग उसी बैकड्रॉप में देख रहे हैं. एंप्लिफाई कर रहे हैं. भीड़ की तरह सोच रहे हैं. भीड़ के सोचने-समझने की दिशा सामूहिकता के साथ जुड़ जाती है. यही सामूहिकता तय करती है कि वह व्यक्ति किस तरह सोचेगा, महसूस करेगा और किसी ख़ास परिस्थिति में किस तरह की प्रतिक्रिया देगा/देगी.

किसी संवेदनशील मसले पर भीड़ की तरह नहीं सोचा जा सकता. फैक्ट्स देखना-समझना ज़रूरी होता है. इंडिपेंडेंट परख ज़रूरी होती है.

दो महीने पहले जो पोस्ट वायरल हुई और जिसके बाद ये सारी बातें उसी आइने में लिखी जाने लगीं, उनमें से किसी को नहीं बताया गया कि वो कथित घटना है कब की? घटना के नई या पुरानी हो जाने से उसी इंटैंसिटी कम नहीं होती, लेकिन हक़ीक़त यही है अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद मेरी लिखी गई एक पोस्ट से आहत एक समूह ने उसे वायरल किया.

उसमें जो आरोप हैं उनके बारे में घटनास्थल पर मौजूद लोगों को भी कई दिनों बाद पता चला. असल में जिस लड़की के बारे में वो बात लिखी गई उसने बहुत बाद में आरोप लगाने वाली लड़की के बार-बार दोहराए जाने के बाद ये कहा कि उसे याद नहीं है, लेकिन हुआ होगा. उसमें दो आरोप लगाए गए थे. पहले आरोप और दूसरे आरोप को कोई क्लब करके देखें तो कई सवाल उठेंगे.

फ़ेसबुक पर क्या सारा डिटेल लिखा जाए? पर्सनल आरोप-प्रत्यारोपों मैंने इस मंच पर कभी बहुत ज़्यादा रुचि नहीं ली. सामान्य समझदारी ये कहती है कि एसॉल्टर कभी दस लोगों की मौजूदगी में ऐसा नहीं करता. एसॉल्टर किसी को दिखाकर ऐसा कभी नहीं करेगा.

कई लोगों ने कहा कि पूरा लिखो. डिटेल में ब्यौरा दो. सबकुछ लिख दो. झूठ है तो साबित कर दो कि झूठ है. प्रिविलेज लोकेशन पर मौजूद होने पर आपको सारे आरोप सुनने-सहने होंगे. महिलाओं, दलितों, मुस्लिमों के किसी आरोप को उस आइडेंटिटी पर सवाल करके जवाब नहीं दिया जा सकता. मैं यही नहीं करना चाहता.

किसी व्यक्ति की यौनिकता कैसी है, ये एक नैतिक सवाल है, आपराधिक तभी होगी जब उस यौनिकता के क्रम में अपराध किए जाएं. अ, ब, द, स का/की अगर चार पार्टनर हो या चार सौ, ये ज और झ के लिए सिर्फ़ नैतिक मामला हो सकता है.

मैं फिर भी उन सब लोगों से माफी मांगना चाहूंगा जिन्हें मेरे चलते ठेस पहुंची, दुख हुआ, ग्लानि हुई और मेरे पे ग़ुस्सा आया.

दरिंदा, हैवान, शैतान जैसे एंटिटि के तौर पर दो दिनों से देखने वाले लोगों से भी माफी.

और उन सबसे भी, जिन्हें मैंने 8 बजे के बाद मिलने बाहर या घर पर बुलाया.

पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

उपरोक्त पक्ष पर आरोप लगाने वाली लड़कियों में से एक ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ यूं दी है…

मूल पोस्ट ये हैं…

 

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One comment on “#metoo में फंसे पत्रकार दिलीप खान ने फेसबुक पर विस्तार से रखा अपना पक्ष”

  • हिमांशी says:

    दिलीप खान ने अपनी पोस्ट में यह स्वीकार तो किया ही है कि लड़कियों को देर शाम अपने घर पर बुलाना, वहां रात बिताने के लिए उकसाना, उन्हें दारू ऑफ़र करना और उनकी सहमति से उनके साथ सेक्स करना उसकी सहज आदत है।

    लेकिन यही वो बिंदु है जो उसे कटघरे में खड़ा करता है क्योंकि दवाओं के असर के दौरान, शराब के नशे में और नींद में सहमति कोई मायने नहीं रखती।

    साफ है कि यह धूर्त न केवल अपनी छवि और लोकप्रियता के प्रभाव से नई-नई लड़कियों को अपने जाल में फँसाता है बल्कि जब वे अपनी व्यथा दुनिया को बताती हैं तो यह एक बार फिर अपनी मित्रमंडली के प्रभाव से उन्हें चुप करवा देने का प्रयास करता है और अपनी करनी से मुकरता है।

    अब उन लोगों को यह तय करना है, जो इसके सपोर्ट में अंधे हुए जा रहे हैं कि क्या अपने घर की बच्चियों को वे दिलीप खान जैसे चरित्र के लोगों के साथ सुरक्षित समझते हैं या नहीं?

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