पत्रकार दिलीप खान ने सो रही लड़की के कपड़े के भीतर हाथ डाला!

Kashyap Kishor Mishra : इस मुल्क का हर इंसान बलात्कार का सह अभियुक्त है। एक पत्रकार है, दिलिप खान। जितना सरसरी तौर से देखा यह खुद को प्रगतिशील दिखाने की कवायद में रहता है। एक लड़की है हिमांशी जोशी। वामपंथ से प्रभावित है और विद्यार्थी है। यह लड़की 29 मई को एक खुलासा करती है कि दिलीप खान नाम का यह राज्यसभा टीवी का पत्रकार, उसके साथ आई एक लड़की के, जब कि वह सो रही थी, कपड़े के भीतर हाथ डाला और हिमांशी ने यह खुद देखा।

लड़की के इस खुलासे में अजीत साहनी का संदर्भ आता है, चंद्रिका का संदर्भ आता है और किसी किर्ति का सन्दर्भ है। आश्चर्य है, कि किसी ने एक लड़की के इन आरोप पर शायद ही संज्ञान लिया। दिलिप खान के किसी मित्र, वैचारिक सहयोगी या परिचित ने इस पर कोई पहल की या प्रतिक्रिया दी यह एकदम नजर नहीं आता।

दिलीप खान : गभीर आरोप के घेरे में

मेरी नजर में, यह बात आई और मैंने दिलिप खान से इस स्क्रीन शाट की बाबत पूछा। बजाय कोई जबाब देने के, उसने खामोशी से मुझे ब्लॉक कर दिया। उसके और मेरे खूब सारे पारस्परिक मित्र हैं, जो स्त्री सुरक्षा बलात्कार और स्त्री अस्मिता का शोर मचाते रहते हैं, पर दिलिप खान से सवाल करने की बजाय खामोश रहना उनको उपयुक्त लगता है।

एक शिक्षक है, ईश मिश्र! दिल्ली में रहता है, यह एक युवा और समझदार बेटी का पिता है। इस व्यक्ति का नाम एक ऐसी सूची में आता है जो कालिज की लड़कियों के अनुभव के आधार पर यौन उत्पीड़न के आरोपियों की पहचान करती थी। इस आदमी से इस बाबत मैंने सवाल पूछा। इसने इसकी उपेक्षा कर दी। मैंने इस आदमी को टैग किया और सवाल फिर पूछा। इसने खामोशी से मुझे अमित्र कर दिया।

मैंने अपने सवाल को इसके और अपने पारस्परिक मित्रों को भेजना शुरू किया। इस बात की खबर पर इसने सवाल का जवाब देने की बजाय इस आरोप से खुद को बेहद विचलित महसूस करता बताते हुए कहा कि वह खुद को एक बलत्कृत स्त्री सा टूटा हुआ महसूस कर रहा है और कुछ मानसिक रूप से सबल होने पर जवाब देने की मोहलत मांगी। जिसका जवाब उसने कभी नहीं दिया।

जवाब कभी नहीं दिया, क्योंकि जो उसके परिचित थे उनमें ज्यादातर खामोश रहे या उन्होने खामोशी से मुझे अमित्र कर दिया। एक पत्रकार महोदय जिनका नाम स्वतंत्र मिश्रा है, उन्होने ऊल्टा मुझसे सवाल किया कि यह उन्हे क्यों भेजा ? मैंने जब बताया कि वो जनाब उनके मित्र हैं और एक सवाल तो बनता ही है तो स्वतंत्र साहब ने कहा वह इस तरह के कीचड़ से दूर रहते हैं। मैंने जब उनसे पत्रकारिता और नागरिक सरोकार की बात की तो मुझे ब्लॉक कर गए।

ऐसे लोग हमारे परिवेश में चारो तरफ हैं। पर हमारे सवाल पहले चेहरा देखते हैं, फिर संबंध और फिर अपना हानि लाभ और फिर हम कूटनीतिक सवाल तैयार करते हैं जो हमेशा सापेक्ष होते हैं। और हम ढ़ोग निरपेक्षता का करते हैं। अपने दिल पर हाथ रखिए और खुद से सवाल करिये आप स्वयं एक बलात्कारी को कितना सहयोग करते हैं। आप कितनी बार, जानते बूझते खामोश रह जाते हैं। आपकी मेरी हम सबकी खामोशी हमारे परिवेश में बलात्कारियों को पालती पोसती है और फिर हम ही बढ़ते जा रहे यौन अपराध पर खूब शोर भी करते हैं। हम सबने बलात्कारियों को पाला है, पोसा है। हम सब, सब के सब अपने परिवेश में हो रहे यौन उत्पीड़न के सह अभियुक्त हैं।


Anushakti Singh : जवाब दीजिये Dilip. कुछ पूछ रही है Nishi. मुझे इंतज़ार है उस पहली महिला का जो दिलीप ख़ान पर पोस्ट लिखकर जवाब मांगेगी। मैं तो उसे बोलने का मौका दे रही हूँ। मैंने कहाँ उसे शन किया है? बोले तो वो। मेरी पोस्ट पर मेंशन मत कीजिए। उसने पहला पोस्ट करने के एक घंटे के भीतर मुझे ब्लॉक कर दिया था। आपका ‘भाई’ यहाँ जवाब नहीं देगा। क्षितिज पर बोलना आसान था शायद आपके लिए। प्यारे दोस्त, प्यारे भाई पर आवाज़ ही नहीं निकल रही कंठ से। किसी ने कल कहा कि मोदी है क्या वो? अमित शाह है? अंबानी है? देश का सबसे ताक़तवर व्यक्ति है? आख़िर है कौन वो जो लोग सवाल तक न कर पा रहे?
मैं भी पूछती हूँ, सज्जनों। आख़िर है कौन वो?

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इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता, कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ … मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी का यह शेर मुझे आज बेहद मौजूं नज़र आ रहा है. मुद्दा #metoo का हो या कुछ और, जब विक्टिम कोई नाम वाली होती है तो पूरा फ़ेसबुक रंग जाता है. स्त्री-स्वर इतना प्रखर होता है कि लगता है, बस क्रांति आज ही हो जायेगी या फिर उस बुलंद आवाज़ को इन्हीं आवाज़ों की ज़रूरत थी. हर किसी को कुछ न कुछ कहना होता है. कंगना, तनुश्री, स्वरा और ऐसी ही तमाम सामर्थ्यवान महिलाओं के सुर में सुर मिलाना होता है, मगर बात जब पड़ोस की किसी स्त्री के पक्ष में आवाज़ उठाने की होती है तो तमाम सुर कुंद पड़ जाते हैं. ये सुर तब और मद्धिम पड़ जाते हैं जब आरोपी अब तक सवाल कर रहे लोगों के बीच का ही होता है.

वे ही लोग जो अब तक तमाम नारे लगा रहे थे. क्रांति की नयी मिसालों को गढ़ने की बात कर रहे थे, अचानक से यूँ गायब हो जाते हैं, जैसे वे पहले कभी थे ही नहीं. न जाने यह अनियत बहरापन (occasional deafness) हमारे आस-पास के लोग कहाँ से लाते हैं? हैरत की बात यह है कि इनमें से अधिकाँश लोग इस बात पर तंज करते नज़र आते हैं कि “भारतीय समाज भगत सिंह हमेशा पड़ोसी के घर में चाहता है.” वक़्त आने पर वे प्रखर व्यंग्यकार स्वयं वह बन जाते हैं, जिन पर उनका तंज का व्यापार चलता है.

ताज़ा मसला Nishi Sharma का है. निशि के कुछ बेहद कटु अनुभव हुए हैं. वह इस मसले पर उस शख्स से बात करना चाहती है, जिसके साथ उसके अनुभव बेहद बुरे रहे हैं. आरोपी निशि को ब्लाक कर चुके हैं और उनके साथ के तमाम लोग यूँ चुप्पी साध कर बैठे हैं जैसे उनके कानों तक कुछ पहुँच ही नहीं रहा. कुछ तो बोलिए साहिबान और मोहतरमाओं… इस ख़ातिर ही बोलिए कि लोगों को लगे कि आपके लिए तराजू के दोनों पलड़े बराबर हैं. Dilip Khan आपको भी टैग किया है. आपकी जवाबदारी बनती है.

कश्यप किशोर मिश्रा और अनुष्कति सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इसे पढ़ें….

पत्रकार दिलीप खान #MeToo कैंपेन की चपेट में आए, पढ़ें निशि शर्मा ने क्या लिखा है…

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