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क्या दिलीप मंडल बहुजनवादी चरमपंथी राजनीति के प्रारंभिक बुद्धिजीवी कहलाएँगे?

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शशिभूषण

दिलीप मंडल : इतिहास में लटके पाँव… मैं दिलीप मंडल जी को सन 2009 से पढ़ता आ रहा हूँ । लगातार । मैंने उनके स्टेटस, पोस्ट्स पढ़ी हैं । लेख पढ़ें हैं। किताबें पढ़ी हैं। मैंने उनके भाषण सुने हैं । मैंने उनके विषय में भी काफ़ी पढ़ा-सुना है । और समय-समय पर उनकी दिल से तारीफ़ भी की है । कुल मिलाकर मैंने दिलीप मंडल को भली-भांति पढ़ा-सुना है । सीखा-जाना और उनसे प्रभावित रहा हूँ ।

Dilip mandal

इतने सालों के पाठकीय अनुभव और नागरिक हक़ से अपने ही व्यक्तिगत प्रभावों से निकलकर मैं दिलीप मंडल जी के विषय में पाँच बिंदुओं में कुछ बातें कहता हूँ । इस निवेदन के साथ कि मेरे मन में उनके दक्षिणपंथी धार्मिक राजनीति से टकराते रहने की प्रवृत्ति के लिए सदैव ऊँचा स्थान रहेगा ।

  1. दिलीप मंडल पत्रकार-लेखक-बुद्धिजीवी से अधिक राजनीतिक प्रचारक हैं । वे बहुजनवाद प्रचारक बुद्धिजीवियों में पहले मीडिया फिर अम्बेडकर से सीखने वाले प्रतिभाशाली एक्टिविस्ट हैं । उन्होने अम्बेडकर को सोद्देश्य सेलेक्टिव बारीकी से पढ़ा है । और मीडिया की युक्तियों को प्रभाव छोड़ने के लिए अपनाया है । दिलीप मंडल अम्बेडकर की ड्राफ्टिंग सामर्थ्य और मीडिया के त्वरित एजेंडा प्रक्षेपण को न केवल समझते हैं बल्कि उनसे सर्वाधिक अनुकूलित हैं । दिलीप मंडल की तर्क प्रवणता में खण्डनवादी अम्बेडकर वैसे ही मिलेंगे जैसे अम्बेडकर की मानवतावादी चेतना निर्मिति में बुद्ध । लेकिन दिलीप मंडल ने बुद्ध को पढ़ा-जाना है ऐसे बौद्धिक निशान उनकी सक्रियता में नहीं मिलते । हाँ, दिलीप मंडल जी को अंग्रेज़ी आती है । वे प्रिंट और डिजिटल माध्यम में अत्यंत पारंगत बुद्धिजीवी हैं ।
  2. एक समय ऐसा भी था जब दिलीप मंडल की भाषा इंटरनेट पर ऊपर नीचे खिसकने वाले पेज के लिए बस्ट भाषा थी । सूचना, मेधा, बहस, आरोपण, तर्क, निंदा को वहन करने वाली अचूक समकालीन भाषा थी । इस भाषा में चुभने वाली विनय, चौंकाने वाले संदर्भ, खींचने वाली चमक और निरुत्तर करने वाली सरोकारी विदग्धता होती थी । लेकिन धीरे-धीरे इस भाषा में राजनीतिक घाघपन, अवसरवादी इंतज़ार, करियर प्रौढ़ता, आत्म सुरक्षा वाली सावधानी, नियंत्रित वाचालता, दंभ, आत्म प्रचार, आत्म स्थापन, सामुदायिक उकसावा, चरित्र हनन, दूसरों को पछाड़ना और सोशल मीडिया फॉलोवर्स के बीच सतत रहने का बौद्धिक रोब चढ़ता गया । और आज हालात यह हैं कि ख़ुद ट्रोल्स से कभी विचलित न होने वाले दिलीप मंडल जी छोटी – मोटी गाली – गलौज, अलगाववादी बयान और बहुसंख्यकवादी भाषा हिंसा तक कर लेते हैं । जिसके पीछे पड़ते हैं उसके कमर के नीचे यानी जाति तक प्रहार कर लेते है । उसे सामुदायिक वैमनस्य के छोर तक रगेदते हैं । आजकल हालात यह हैं कि जबरन किसी की जाति बताना, जातिवादी कहकर ख़ारिज़ करना, अविश्वसनीय बनाना तो उनका शौक़, लत, जुनून, सरोकार, कौशल सभी हैं । जातिवाद को दिलीप मंडल जी ने अपना ऐसा अखाड़ा बना लिया है जिस पर वे किसी को खींचकर पटकने-लथेड़ने का उपक्रम कर सकते हैं । करते रह सकते हैं ।
  3. अध्ययन, शोध, संवाद, शिक्षण जो दिलीप मंडल जी में कभी भरपूर झलकते थे उनके और हमारे लिए आगे भी श्रेष्ठ हो सकते थे । मगर कालांतर में उन्होंने ख़ुद को समसामयिक चुनावी सक्रियता, मौक़ापरस्त डेटा विश्लेषण, मनमाने सर्वेक्षण, प्रश्नावली निर्माण और औसत नेताओं के प्रचार में स्वयं को लगभग झोंक दिया । इसका परिणाम यह हुआ कि उनके फ़ैन फॉलोवर तो ख़ूब बढ़े लेकिन उनका वैसा लेखकीय विकास देखने को नहीं मिला जैसा एक बुद्धिजीवी का उत्तरोत्तर होता है या कि होना चाहिए । जैसे बुद्धिजीवी के विषय में अम्बेडकर कहते हैं कि अंततः बुद्धिजीवी ही समाज – देश की दिशा-दशा यानी सब कुछ तय करता है । टेबल पर ही किसी देश का भविष्य तय होता है । बुद्धिजीवी की वृहत्तर धारिता होने के बावजूद दिलीप मंडल जी ने ख़ुद को प्रोपेगेंडा लेखन में होम लिया । उनके पास आज केवल आरक्षण, जातिवाद, निंदा ही सदा जाग्रत मसले हैं जिन से वे जूझते रहते हैं । ख़ुद को बारंबार बेशुमार दोहराते रहते हैं । और कभी परवाह नहीं करते कि उनका सम्मान करने वाले लोग उनसे क्या पूछ रहे हैं । यह जूझना, दोहराना, परवाह न करना भी ऐसा और इसलिए है कि चुनाव आदि के समय थोड़ा दवाब बनता रहे । संयोग से कभी-कभार बारगेनिंग दवाब बन भी जाता है जिससे मैत्रीपूर्ण दृष्टियों जिनमें मैं भी शामिल हूँ को लगता है दिलीप मंडल जनमत प्रभावित कर रहे हैं । दिलीप मंडल जनमत प्रभावित कर सकते हैं ।
  4. केवल प्रति साल पाँच पोस्ट या पाँच लेख या पाँच भाषण के हिसाब से दिलीप मंडल जी के विषय में निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उन्होंने साल दर साल अपनी लकीर पीटी है । वे भूल-से गए कि लिखने-बोलने वाले को शुरुआत से फॉलो करने वाले लोग भी होते हैं । दिलीप मंडल की एक जानी-मानी लकीर है, जातिव्यवस्था । इसे जहाँ ज़रूरी हो वहां तथ्य-तर्क रखकर तोड़ते दिखना । जहाँ गुंजाइश हो वहां जातिवाद के शिकार लोगों को उकसाकर उनका अहम जगाकर तोड़ते मिलना । भले इसके लिए किसी की भी निंदा और किसी के भी समर्थन में उतरना पड़े । इसके लिए भले भरम रचना पड़े कि जातिवाद के मुद्दे पर संघ कमज़ोर पड़ता है । आरक्षण के मुद्दे पर संघ कमज़ोर पड़ता है । ताज्जुब यह होता है कि इस निजी किस्म के जाति तोड़ो कार्यक्रम में दिलीप मंडल यह सोचना तक भूल जाते हैं कि अगर जाति ही संघ की कमज़ोर नस है तो वह कैसे दलित-पिछड़ों के लिए सबसे फ़ायदे का प्लेटफॉर्म बनता जा रहा है ? आज संघ को छोड़ दें तो कौन संगठन है जो दलित पिछड़ों को इतने राजनीतिक अवसर-पद उपलब्ध करवा पा रहा है ? फिर केवल संघ विरोध करने के चलते दिलीप मंडल की बौद्धिक संकीर्णताओं से कैसे मुँह फेरकर रहा जा सकता है ? वैमनस्य तो वैमनस्य होता है चाहे जिससे फैले ।
  5. दिलीप मंडल जी इतने सालों में तत्काल राजनीति में अपनी बौद्धिक ऊर्जा लगभग खत्म कर चुके हैं । यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके बुद्धिजीवी की मृत्यु हो चुकी है । उनके पुनर्जीवन के लिए मेरे ख़याल से अब यही बचा है कि अध्ययन-शोध की अपनी असल दुनिया में सचमुच लौटें और फ़ैन फॉलोवर्स के बीच तुरंत बेस्ट सेलर हो जाने वाली अच्छी किंतु चट-पट किताबों से अलग सचमुच की किताबें लेकर आएँ । व्यक्तिगत रूप से मैं दिलीप मंडल जी को शानदार बुद्धिजीवी, जुझारू नागरिक, सहनशील और सम्प्रेषण कुशल शिक्षक मानता हूँ । मुझे उनके लिए दुःख होता है । किसी दौर के विभिन्न माध्यमों में हवा बदल देने लायक ऐसे पढ़े लिखे सक्रिय बुद्धिजीवी कितने कम होते हैं । फिर उनका अध्ययन, निर्भीकता और भाषा । अपने बल पर उन्होंने जितना हासिल किया और जितने लोगों को काम करना सिखाया वह बेजोड़ है । लेकिन अफ़सोस उन्होंने अपने आप को समसामयिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में क़ैद कर लिया । एक ऐसा महत्वाकांक्षी कार्यकर्ता जिसके सामने सचमुच की तारीफ़ के लायक कोई जीवित नेता नहीं । कोई ठोस रणनीति, रूपरेखा नहीं है । इसलिए सिर्फ़ दूसरों को ख़ारिज़ करने की अपरिहार्य विवशता ही विवशता बचती दिखती है ।

उपर्युक्त पाँच बिंदुओं में कुछ बातें कहने के बाद आगे रास्ता क्या है ? का जवाब यही सूझता है कि दिलीप मंडल जी अगर इसी राह पर इसी वेग से चलते रहे तो सम्भव है आज के हिंदूवाद की लकीर पर ही बहुजनवाद की भावी सत्ता दुनिया में वे शुरुआती प्रस्तावक हिंदी बुद्धिजीवी कहलाएं । मगर तभी यह भी सोचा जाएगा कि लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद की राजनीति क्या सचमुच मानव को उसकी गरिमा और मानवाधिकारों की गारंटी दे पाती है ? क्या किसी संस्कृति बहुल देश में हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता का स्थानापन्न बहुजन-सवर्ण साम्प्रदायिकता होती है ? होनी चाहिए ?

निष्कर्षतः दिलीप मंडल के बौद्धिक प्रयासों से सम्भव होती बहुजन-दलित मुक्ति हिन्दू महासभा और जनसंघ के बौद्धिक प्रयत्नों से सम्भव हुई हिन्दू मुक्ति से अलग नहीं दिखती है । यदि दिलीप मंडल जी ने मौजूदा अतिवादी रास्ते से कुछ हासिल किया तो वह बहुजनवादी चरम पंथी राजनीति के प्रारंभिक बुद्धिजीवी से बेहतर नहीं दर्ज़ होंगे ।


दिलीप मंडल की प्रतिक्रिया-

“मुझे अपने बारे में इतना नहीं मालूम। मैं तो चुपचाप अपनी नौकरी करता हूँ और मेहनत का खाता हूँ। सिनेमा देखता हूँ। गाना सुनता हूँ। ख़ूब पैदल चलता हूँ। साइकिल भी चलाता हूँ। खाने में हरी सब्ज़ियाँ और पीने में चाय पसंद हैं। मुझे इतनी बड़ी-बड़ी बातें समझ में नहीं आती जी। आप लिख रहे हैं तो ठीक ही लिख रहे होंगे।”

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