पत्रकारिता पस्त, मीडिया घराने मस्त

आजादी और उससे पूर्व जो पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी, उसने आजादी के बाद बहुत तेजी से अपना चाल-चरित्र और चेहरा बदला है। तकनीकी रूप से जहां मीडिया जगत उन्नत हुआ है, वहीं समाचारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रह गया है। पत्रकारिता के मापदंडों को तिलांजलि दे दी गई है। अब किसी पत्रकार को यह पढ़ाया-बताया नहीं जाता है कि उसे किस तरह से पत्रकारिता की कसौटी पर खरा उतरना होगा। यह सब इस लिये हो रहा है क्योंकि आधुननिक दौर की पत्रकारिता कलम के पुजारियों के हाथों से निकलकर पूंजीपतियों के साथ गलबहियां कर रही है। 21वीं सदी में पहुंचते-पहुंचते पत्रकार की पहचान गौंण हो चुकी है। कलमकारों के लिये यह परेशानी का सबब है तो सब कुछ देखते-समझते हुए भी पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट होते देखने के अलावा उसके पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है। चुप बैठे रहना उसकी मजबूरी बन गई है।

एक समय था पत्रकार की पहचान कंधे पर लम्बा सा थैला लटकाये, बेतरतीब वस्त्र धारण किये, बढ़ी दाड़ी वाले शख्स के रूप में हुआ करती थी। यह दौर आजादी के बाद करीब दो दशक तक चला, इसके बाद सब कुछ तेजी से बदल गया। तब का मासूम सा दिखने वाला पत्रकार अपनी लेखनी से बड़ी-बड़ी सरकारों की चूले हिला देने की हैसियत रखता था। इस बात के कई प्रमाण मिल जायेंगे। इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मुखालफत करके इस बात का अहसास मीडिया बखूबी करा भी चुकी थी। इसके बाद इमरजेंसी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में हवा भरने, मंडल-कमंडल की राजनीति के समय या फिर अयोध्या में विवादित ढांचा गिराये जाने के वक्त मीडिया ने काफी बढ़-चढ़कर अपने दायित्वों का निर्वाहन किया था। संकट के समय मीडिया सरकार और देश के साथ कंधें से कंधा मिलाकर खड़ा रहता था।

कलमकार की दौलत उसकी लेखनी के अलावा अखबारों की ढेरों कतरने और लेख हुआ करते थे। सरकार और समाज में घटने वाली छोटी-बड़ी सभी घटनाओं पर उसकी पैनी नजर रहती थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि जो खुशी एक साहूकार को अपनी भरी हुई तिजोरी देख कर मिलती है, वैसा ही सुकून एक सच्चे पत्रकार को अपने लेखन से मिलता है। भले ही इस लेखन से उसे दो जून की रोटी का जुगाड़ करना भी आसान नहीं होता हो, पर संपादक की तारीफ के दो शब्द और पाठक को संतुष्ट कर देने की चाहत ही उसके लिये सबसे बड़ा धन होता है। वर्षो से पत्रकार का पूरा परिवार गुरबत में दिन काटता चला आ रहा है। सच्चे और स्वाभिमानी पत्रकार की आज भी अलग पहचान होती है।

बात आजादी से पूर्व की की जाये तो हिन्दुस्तान को आजाद कराने में उस दौर की पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलती हैं। 1857 से पहले जब पत्रकारों को लगा कि उन्हें समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ लड़ना है तो राजा राममोहन रॉय, जुगल किशोर शुक्ल, बंकिमचंद्र चटर्जी, राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद जैसे दिग्गज कलमकारों ने अपने लेखनी को जनजागरण का हथियार बना लिया। इन पत्रकारों का मुख्य जोर समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर करना था। 1857 के बाद जब ब्रिटिश हुकूमत से देश को आजाद कराने की मुहिम में तेजी आई तो जितनी अहम भूमिका आंदोलनकारियों ने निभाई थी, उससे कम योगदान कवि, साहित्यकारों और पत्रकारों का भी नहीं रहा था।

पत्रकारों ने अपनी कलम के बल पर ऐसा माहौल तैयार किया कि सारा देश एक होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़ा हो गया। अखबार की ताकत का अंदाजा जब स्वतंत्रता सेनानियों को हुआ तो सारे देश में एक ऐसी लहर चल पड़ी कि कोने-कोने से पत्र-पत्रिकाएं निकलना शुरू हो गईं। सबका एक ही मिशन था, देश को गोरों से आजाद कराना। अंग्रेजों के दमन के कारण एक तरफ समाचार पत्र बंद हो जाते तो दूसरी तरफ उससे ज्यादा का प्रकाशन होने लगता था। तत्कालीन पत्रकारों की देश के प्रति भक्ति देख कर महान कवियत्री महादेवी वर्मा को कहना पड़ा था,‘पत्रकारों के पैरों के छालों से आज का इतिहास लिखा जायेगा।

आजादी के बाद से सब कुछ तेजी से बदलने लगा। आधुनिक समाज में पत्रकारिता और पत्रकार की परिभाषा बदल गई है। अब यह नहीं कहा जाता है कि पत्रकार जन्म से होता है। कई पत्रकार तो यह कहते सुने जाते हैं कि पत्रकारिता उनके डीएनए में नहीं है, जीवन यापन के लिये उन्हें कुछ न कुछ तो करना ही था। संयोग से यह क्षेत्र पत्रकारिता का है। इसी से रोजी-रोटी चल रही हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों की दखलंदाजी ने पत्रकारिता का पूरी तरह से व्यवसायीकरण कर दिया है। अब संपादक की कुर्सी पर खालिस पत्रकार नहीं बैठते। इनकी जगह पूंजीपतियों उनके प्रतिनिधियों, राजनैतिक दलों, नेताओं और माफियाओं के गुर्गो तक ने ले ली है। उन्हीं के चहेते संपादक की कुर्सी पर विराजमान रहते हैं।

ऐसे थोपे गये संपादक पीत पत्रकारिता के जनक बन जाते हैं। इनका एक मात्र लक्ष्य अपने लेखन से मालिकों के व्यवसायिक हितों को पूरा करना होता हैं। यहां हाल की एक घटना का संज्ञान लेना जरूरी है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक बड़े समाचार पत्र के संपादक महोदय का कार्यकाल सिर्फ इस लिये चार साल बढ़ा दिया गया, क्योंकि उनके भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से अच्छे संबंध हैं। यानी उक्त संपादक महोदय को अपने सेवा विस्तार के दौरान लिखने-पढ़ने से अधिक समाचार पत्र समूह के व्यवसायिक हितों का ख्याल रखना पड़ेगा। प्रिंट मीडिया का तो स्तर गिरा ही रही सही कसर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उभार ने पूरी कर दी है।

मीडिया के माध्यम से औद्योगिक घराने ब्लैक मनी को वाइट् बनाने का धंधा भी जोरो से कर रहे हैं। अब पत्रकारिता जनहित की बजाये उसका नुकसान करने लगी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को तो जैसे अखबारों में छपी खबरों को घुमा-फिराकर परोस देने में महारथ हासिल हो गई है। अब न्यूज चैनलों पर एंकर की योग्यता का पैमान उसकी शक्ल-सूरत भर रह गई है। कई एंकरों को तो पत्रकारिता की एबीसीडी भी नहीं पता है, फिर भी वह बड़े पत्रकार बने बैठे हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिये खबरों का मतलब विवादास्पद मुद्दों/बयानों को अनदेखा करने की बजाये उसे हवा देना भर रह गया है। आम जनता की समस्याओं से अधिक इनके पत्रकारों की रूचि नेताओं-अभिनेताओं के व्यक्तिगत जीवन में झांकना भर रह गई है।

यहां किसान की आत्महत्या खबर नहीं बनती है लेकिन किसी नेता पर जूता उछाल दिया जाये तो यह ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती है। इनके लिये खबर वही होती है जो रेटिंग बढ़ाती है। बड़े-बड़े मीडिया घरानों के चलते ही इलाकाई पत्रकारिता पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अब तो पत्रकारों के लिये समाचार ‘न्यूज आइटम’ बन गये हैं। तमाम सरकारों से मिलकर यह घराने ऐसे-ऐसे नियम-कानून अमल में ला देते हैं जिसके जाल में फंस कर छोटे-छोटे और मझोले समाचार पत्र और उनके पत्रकार दम तोड़ देते हैं। आज जो भी सरकारी गैर-सरकारी विज्ञापन निकलता है, वह इनकी झोली में आ जाता है। बड़े औद्योगिक घरानों के समाचार पत्र और चैनल विज्ञापन से ही प्रतिदिन करोड़ो रूपया कमा रहे हैं। 

आधुनिक मीडिया घरानों ने पत्रकारिता को चकाचैंध कर रखा है। मौजूदा दौर के पत्रकार एढि़यां घिसते हुए नहीं दिखते हैं। वह पांच सितारा संस्कृति में जीते हैं। उनके कंधों पर मात्र समाचार संकलन की जिम्मेदारी नहीं होती है। पत्र के लिये विज्ञापन, मीडिया मालिकों और सरकार-नौकरशाहों के लिये सैटिंग-गैटिंग, शासन प्रशासन में पैठ बनाकर रूकी हुई फाइलों को आगे बढ़ाने से लेकर मनचाहे अधिकारियों की तैनाती और तबादलों का भी काम संपादक को ही देखना और करना पड़ता है। अब तो पेड न्यूज़ भी खूब छपने लगी हैं। चुनावों के समय तो ऐसी न्यूजों की बाढ़ ही आ जाती है।

अक्सर, तमाम मंचों से मीडिया की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों, कॉर्पोरेट कंपनियों को इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया से दूर रखने की सिफारिश की जाती है। यहां दूरसंचार नियामक आयोग(ट्राई) का भी जिक्र करना जरूरी है। ट्राई ने तो अपनी सिफारिशों में यहां तक कह दिया है कि धार्मिक संगठनों और केंद्र व राज्य सरकार के विभागो को मीडिया कारोबार में नहीं आना चाहिए। हाल में ही सरकार को सौंपी  अपनी अहम सिफारिशों में ट्राई ने पेड न्यूज़ और संपादकीय को प्रभावित करने वाले कदमों पर  लगाम कसने के लिए एक स्वतंत्र संस्था बनाने का सुझाव भी दिया है। जिसके मुताबिक इस संस्था का  पेनाल्टी लगाने का अधिकार होना चाहिए।

ट्राई की नाराजगी का आलम यह है कि उसने अपनी सिफारिश में यह तक कह दिया है कि यदि  पहले से ही राजनीतिक दल, कॉर्पोरेट आदि को मीडिया कारोबार के लिए अनुमति मिल चुकी है, तो उन्हें इस कारोबार से निकलने का विकल्प देना चाहिए। ट्राई का कहना है कि सरकार को मीडिया संस्थान में कॉर्पोरेट की हिस्सेदारी पर गंभीरता से कदम उठाना चाहिए, वरना इसके चलते हितों का टकराव हो सकता है। मीडिया की पहुंच और प्रासंगिकता को समझने के लिए ट्राई ने एक इंडेक्स बनाने का सुझाव दिया है। ट्राई ने यह भी कहा है कि मीडिया में स्वामित्व को लेकर साल 2009 में सिफारिश की गई थी लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद  भी उचित कार्रवाई नहीं की गई हैं।

खैर, ट्राई की सिफारिशों पर अमल होगा इस बात की संभावना न के बराबर है क्योंकि मीडिया अपने ऊपर किसी तरह का दबाव बर्दाश्त करने को कभी तैयार नहीं होता है। यह सिलसिला वर्षो से चला आ रहा है। कई बार सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर यह विचार सामने आते रहते हैं कि मीडिया अपने लिये मापदंड तय कर ले, लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाया। यह हकीकत है कि अपवाद को छोड़कर मीडिया का भी वैसे ही पतन हो रहा है जैसे राजनेताओं और अन्य क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। अब कोई नहीं कहता है,‘खींचो ना कमानों को, ना तलवार निकालो,जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।



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Comments on “पत्रकारिता पस्त, मीडिया घराने मस्त

  • MUDIT MATHUR says:

    Save Journalism by uniting all media persons against exploitation and curbs on freedom of expression and conscience. Journalism is on ventilator and crony capital and big corporates are playing dirty role to demolish this institution of democracy just for the sake of lust to control all power livers. So every journalist must support initiative to bring unity among us and must raise above pity self interests.

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