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उस वक्त मेरी फ्रेंडलिस्ट में कई कांग्रेसी भी थे पर मनमोहन सरकार की आलोचना पर कभी किसी ने पलटकर आपत्ति नहीं की!

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डॉ.अमिता नीरव-

उन दिनों मैं अखबार में काम करती थी और दुर्भाग्य से नईदुनिया को जागरण ने खरीद लिया था। जो छँटनी होनी थी वो हो चुकी थी औऱ हम कुछ ऐसे भाग्यशाली लोग थे, जो उस छँटनी में बचे रह गए थे।

उन्हीं दिनों अखबार में संपादक बदले गए थे। नए संपादक भास्कर से आए थे। एक साथी जो पहले ही भास्कर में काम कर चुकी थी, उसने आशंका जाहिर की थी कि ‘देखिएगा अब अपने अखबार का भी कल्चर बदल जाएगा।’

मैंने उसे आश्वस्त करते हुए कहा था कि ‘अरे नहीं, कर्मचारी तो सब पुराने ही हैं, एक व्यक्ति के आने से क्या कल्चर बदलेगा! सब वही रहेगा, बहुत घबराने की बात नहीं है।’ मगर उसने मायूसी से भास्कर के अपने दिनों को याद किया था।

बाद में मुझे महसूस हुआ कि उसने ठीक कहा था। देखते-देखते अखबार का दफ्तर जेल में तब्दील होने लगा। हम सब बिना तनाव के हल्के-फुल्के माहौल में अपना काम करने के आदी थे। डेडलाइन मीट करने के अलावा और कोई खींचतान नहीं हुआ करती थी।

मगर संपादक के बदलते ही कई तरह के तनाव, खींचतान, राजनीति… उठापटक का सामना करना पड़ा था। तब पहली बार यह लगा था कि किसी भी संस्था का प्रमुख, चाहे वह परिवार हो, कोई सामाजिक संस्था हो, आर्थिक संस्था हो या राज्य हो, उसके बदलने से सबकुछ बदल सकता है।

इसी तरह उस वक्त तक यह भी समझ थी कि चाहे कोई सरकार हो, ज्यादा कुछ बदलने वाला नहीं है। आखिर तो हर पार्टी का उद्देश्य हर हाल में सत्ता में आना औऱ सत्ता में बने रहना है, इसके लिए चाहे जो करना पड़े। सरकारें देश औऱ समाज को ज्यादा नहीं बदलती है।

उन्हीं दिनों यह विचार भी था कि सरकार के जिस निर्णय से सहमति हो उसकी तारीफ करो औऱ जिससे असहमति हो उसकी आलोचना… एक दौर ऐसा भी रहा, जब समझ यह कहने लगी कि ‘कोई नृप होऊ हमें का हानि…।’ मतलब तब तक अपनी समझ में तटस्थता या निष्पक्षता एक मूल्य था।

ये 2014 से पहले वाला दौर था। कांग्रेस की सरकार थी केंद्र में और मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री थे, वे कम कहते थे तो कम उड़ाए भी जाते थे, लेकिन आज पलटकर देखती हूँ तो पाती हूँ कि उस वक्त मेरी लिस्ट में कई कांग्रेसी भी थे। उनमें से कुछ तो कांग्रेस के पदाधिकारी भी थे, मगर किसी ने पलटकर सरकार की आलोचना पर कभी कोई आपत्ति ली हो याद नहीं आता। इस पर मैंने 2014 के बाद गौर किया, क्योंकि फर्क नजर आया। सोचती हूँ, उस वक्त आलोचना करना प्रिविलेज था।

धीरे-धीरे सरकार का विरोध करने वालों पर तमाम आक्रमण होने लगे। मैंने अपने इर्दगिर्द दोस्त, रिश्तेदारों को दूर होते देखा। दोस्त औऱ परिवारों के व्हाट्स एप ग्रुप में कभी शामिल थी, लेकिन उसमें भी वही राजनीतिक मैसेजेस… कुछ दिन विरोध किया, फिर खुद ही उस सबसे अलग हो गई।

मोदी-काल के शुरुआती दौर में वामपंथी लोकतंत्र को लेकर चिंता जाहिर करते थे तो लगता था कि ये अति-विरोध है। धीरे-धीरे उनकी चिंताएँ साकार रूप में हमारे सामने आने लगी। यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए एक वाक्य याद किया था, ‘राजनीति समाज में आधिकारिक मूल्यों का निर्धारण करती है।’

परीक्षा पास करनी थी, इसलिए इसे याद कर लिया था। समझ में अब आ रहा है। पहले भी लिख चुकी हूँ कि मूल्यों का प्रवाह शीर्ष से होता है। शिखर पर बैठा व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से आपके विचारों को चाहे उस गहराई में प्रभावित नहीं कर पाता हो, लेकिन व्यवहार को जरूर प्रभावित करता है।

नेहरू के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक व्यक्तित्व ने चाहे देश के आम आदमी के व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं किया हो, लेकिन मोटे तौर पर व्यवहार में संयम दिखाई देता था। इसे लोकलाज भी कह सकते हैं कि मोदी जी से पहले जो अंधविश्वास था, उसे बाकायदा अंध विश्वास ही कहा जाता था। उसका हमारी संस्कृति कहकर महिमामंडन नहीं किया जाता था।

राजनीतिक संस्कृति पूरे के पूरे समाज को प्रभावित करती है। मूल्यों का आधिकारिक निर्धारण कैसे होता है यह मोदीजी के काल में पूरे संदर्भ-प्रसंग सहित समझ आया। अंधविश्वास कब संस्कृति बन गए पता ही नहीं चला।

देखते-देखते लोकतंत्र के लिए तैयार होता देश, लोकतंत्र के विरोध में आकर खड़ा हो गया। इसे भी मोदीजी के काल की उपलब्धि समझी जानी चाहिए। उनके ही काल में मुझे राजनीतिक संस्कृति का विचार भी अच्छे से समझ आ गया।

इसी वक्त यह भी समझ आया कि पक्षधरता मूल्य है, निष्पक्षता गैर जिम्मेदारी है। औऱ यह भी कि राजा बदलने से बहुत कुछ बदलता है, क्योंकि सत्ता समाज की प्रकृति, समाज के किरदार को प्रभावित करती है। यदि पिता सख्त होंगे तो बच्चे सहज नहीं हो पाएँगे। यही क्रम आगे बढ़ेगा।

इन कुछ सालों में मैं खुद को अंडरप्रिविलेज्ड लगने लगी हूँ। क्योंकि विरोध करते ही बहुतों की आँखों में खटकने लगी हूँ, बहुत सारे रिश्ते खो चुकी हूँ। अब लगने लगा है कि सत्ता का विरोध करने के नुकसान क्या-क्या है?

अच्छी बात यह हुई है कि मेरी अपनी समझ स्पष्ट हुई है। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल्य पता चला है। यह भी जाना कि ‘कोऊ नृप होऊ हमें का हानि’ वाला एटिट्यूड भी एक किस्म का प्रिविलेज ही है।

तटस्थता भी विशेषाधिकार ही है। समाज, विचारों और विषयों की समझ के लिए मुझे मोदीजी का शुक्रगुजार होना चाहिए।

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