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एक जमाने में विनोद दुआ का नाम चलता था। उनकी चुनावी रेल को एक दिन न देखिए तो लगता था ज़रूरी ख़ुराक छूट गई। उनकी सधी हुई भाषा, दो शब्‍दों के बीच का मौन, मीठा तंज और सहज विश्‍लेषण भारत में टीवी के इतिहास की विरल परिघटनाओं में से एक कहा जा सकता है। आज उनकी सांस उखड़ रही है, तंज गायब है, ओढ़ी हुई गंभीरता उनकी बात का वज़न कम कर रही है। सिद्धार्थ वरदराजन की वेबसाइट दि वायर पर मंगलवार से शुरू हुआ उनका वीडियो कार्यक्रम जन की बात दो दिन में ही हांफने लगा है।

‘जन की बात’ पर आगे बढ़ने से पहले हमें यह जानना बहुत ज़रूरी है कि दि वायर के जनवादी इंजन में किसका तेल फुंक रहा है। उसी से कंटेंट की दिशा भी तय होगी। दि वायर जिस कॉरपोरेट दबाव से मुक्‍त पत्रकारिता का दम भर रहा है, सबसे पहले उस पर सवाल उठाना बहुत ज़रूरी है। बेशक इस वेबसाइट में किसी कारोबारी खानदान का निवेश सीधा नहीं है, लेकिन इसे 1.95 करोड़ का अनुदान देने वाला इंडिपेंडेंट एंड पब्लिक स्पिरिटेड मीडिया फाउंडेशन उन्‍हीं कारोबारी घरानों से पैसे लेता है जो दाएं या बाएं से दूसरे संस्‍थानों में निवेश करते आए हैं।

आमिर खान, अज़ीम प्रेमजी, साइरस गुज्‍दर, किरण मजूमदार शॉ, लाल फैमिली फाउंडेशन, मणिपाल समूह, पिरामल एंटरप्राइजेज, पिरोजशा गोदरेज फाउंडेशन, क्‍वालिटी इनवेस्‍टमेंट, विदिति इनवेस्‍टमेंट, जनता की जासूसी करने वाले आधार कार्ड के सर्वेसर्वा रहे नंदन नीलकेणि की पत्‍नी रोहिणी नीलकेणि, विदिति इनवेस्‍टमेंट कुछ ऐसे नाम हैं जो फाउंडेशन को पैसा देते हैं। फाउंडेशन इसके बदले में जनता से जुड़े अच्‍छे कामों के लिए मीडिया संस्‍थानों को अनुदान देता है।

जब से कॉरपोरेट सोशल रेस्‍पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के मद में आय की एक निश्चित रकम सामाजिक कार्यो में लगाने की अनिवार्यता कारोबारी घरानों को हो गई है, तब से एक खेल ने तेजी पकड़ी है। आम तौर से सभी कारोबारी घराने अपने नाम से एक फाउंडेशन या धर्मार्थ संस्‍था खोल चुके हैं। अगर आप एनडीटीवी को ध्‍यान से देखते हों तो उसके रेवेन्‍यू मॉडल में ऐसे घरानों के सीएसआर का एक बड़ा हिस्‍सा लिप्‍त है। टोयोटा से लेकर वेदांता और पिरामल तक सारे घराने समाजसेवा के नाम पर मीडिया में पैसे लगा रहे हैं।

दि वायर भी वहीं से पैसे ले रहा है और उसके दम पर कॉरपोरेट दबाव से मुक्‍त पत्रकारिता का दावा कर रहा है। दावे की सच्‍चाई ‘जन की बात’ के पहले एपिसोड में ही खुल जाती है जब कुल नौ मिनट के एपिसोड में सिद्धार्थ वरदराजन पूरा एक मिनट एफसीआरए के मुद्दे पर खर्च करते हैं। एफसीआरए यानी एनजीओ को मिलने वाले विदेशी अनुदानों को नियंत्रित करने वाला भारतीय कानून। चूंकि इस कार्यक्रम में तीन वक्‍ता थे- विनोद दुआ, एमके वेणु और सिद्धार्थ, तो हर के खाते में औसतन तीन मिनट आते हैं। अपने तीन मिनट में से एक मिनट यानी एक तिहाई एफसीआरए पर खर्च करना सवाल खड़ा करता है क्‍योंकि इस देश के 70 फीसदी गरीब-गुरबा ‘जन’ का इस मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है।

विनोद दुआ ने पहले एपिसोड में सिद्धार्थ से सवाल किया था कि मीडिया किन मुद्दों को छोड़ दे रहा है। सिद्धार्थ ने 2014 से गिनवाना शुरू किया तो उन्‍हें दो बातें याद आईं। पहला अमित शाह के खिलाफ़ तुलसी प्रजापति और कौसर बी की हत्‍या में संलिप्‍तता वाला मुकदमा और उसके बाद एफसीआरए। अफ़सोस कि वे बस्‍तर और छत्‍तीसगढ़ को भूल गए जहां नंदिनी सुंदर समेत कई एक्टिविस्‍टों पर फर्जी मुकदमे लादे गए, सरेआम पुतले जलाए गए और मीडिया ने चूं तक नहीं की। उन्‍हें विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान नहीं याद आए। उन्‍हें श्रम कानूनों में बदलाव की याद नहीं आई जिसे मीडिया ब्‍लैकआउट कर चुका है। उन्‍हें मथुरा का जघन्‍य गोलीकांड याद नहीं आया जिसे समाजवाद के नाम पर मीडिया पचा गया। उन्‍हें याद आया तो एफसीआरए। इसे एजेंडा सेटिंग न कहें तो और क्‍या कहा जाए?

दूसरे एपिसोड में दैनिक जागरण के एग्जिट पोल के बहाने फिर से मीडिया पर बात हुई। उसके अलावा राजनीति के अपराधीकरण पर बात की गई। ये दोनों ही विषय कारोबारी घरानों के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। ठीक एक दिन पहले बुधवार को सिद्धार्थ ने इस प्रकरण पर अपनी वेबसाइट पर एक स्‍टोरी की थी जिसमें इकनॉमिक टाइम्‍स की पत्रकार रोहिणी सिंह के हवाले से बताया था कि 12 फरवरी को लखनऊ में हुई अमित शाह की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में देवेंद्र कुमार नाम का वह व्‍यक्ति भाजपा नेताओं के साथ मौजूद था, जिसकी कंपनी रिसर्च एंड डेवलपमेंट इनीशिएटिव पर जागरण का एग्जिट पोल कराने का कथित आरोप है।

सिद्धार्थ ने लिखित स्‍टोरी में देवेंद्र कुमार के अरुण जेटली और वसुंधरा राजे से करीबी रिश्‍ते गिनाए थे। सवाल उठता है कि वीडियो में वे इस बात को क्‍यों दबा गए। उन्‍होंने आखिर इस बात को क्‍यों नहीं कबूला कि उनकी जिस स्‍टोरी पर चुनाव आयोग ने संज्ञान लेकर जागरण के खिलाफ एफआइआर की, उसी स्‍टोरी के आधार पर एक गलत कंपनी के खिलाफ भी एफआइआर कर दी गई जिसे बाद में स्‍टोरी में दुरुस्‍त किया गया।

क्‍या लिखने की बातें और होती हैं, कहने की बातें और?

पहले एपिसोड में एमके वेणु नोटबंदी पर बात कर रहे थे। उसमें कुछ भी नया नहीं था। वही सब जो बीते डेढ़ महीनों में बार-बार दुहराया गया है। विनोद दुआ भी इसमें कोई नया आयाम नहीं जोड़ पाए। अंत में वे फैज़ अहमद फैज़ की रचना सुनवाकर चल दिए। बस एक चूक हो गई उनसे।

क्‍या फैज़ जनकवि हैं, जैसा कि दुआ ने कहा? फैज़ को जनकवि कहने की गुस्‍ताखी कैसे कोई कर सकता है? इससे भी बड़ा ब्‍लंडर ये हुआ कि मंगलवार यानी 14 फरवरी को प्रसारित प्रोग्राम की इस पहली कड़ी में विनोद दुआ ने कह डाला कि आज फैज़ की सालगिरह है। सालगिरह एक दिन पहले थी। जाहिर है, प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग सोमवार को हुई रही होगी तो उसके हिसाब से उन्‍होंने कहा होगा, लेकिन प्रसारण तो मंगलवार को हुआ!

अच्‍छा हुआ कि दूसरी कड़ी में विनोद दुआ ने गीत नहीं बजाया। बात सीधे खत्‍म हो गई। वैसे एक बात समझ में नहीं आई। विनोद दुआ ने शशिकला पर जो सवाल उठाया, उसका मतलब क्‍या था। वे कह रहे थे कि शशिकला मुख्‍यमंत्री क्‍यों बनेंगी? क्‍या सिर्फ इसलिए कि वे जयललिता की केयरटेकर थीं? मुझे नहीं याद है कि उन्‍होंने प्रतिभा पाटील के राष्‍ट्रपति बनने पर या राबड़ी देवी के मुख्‍यमंत्री बनने पर यह सवाल खड़ा किया था या नहीं। हो सकता है ईमानदारी से किया रहा हो।

शशिकला को मुख्‍यमंत्री आखिर कौन नहीं देखना चाहता था? ज़ाहिर है, केंद्र सरकार और बीजेपी। इसमें विनोद दुआ और दि वायर पार्टी क्‍यों बन रहा है? अगर आपकी दलील कुछ और है तो समझ में आता है वरना लोकतंत्र में जन प्रतिनिधि होने के लिए न तो जनरल नॉलेज दुरुस्‍त होना जरूरी होता है और न ही यह ज़रूरी है कि आपने पहले से चुनाव जीता हो। मनमोहन सिंह को याद कर लीजिए। अरुण जेटली पर तो कभी सवाल नहीं किया गया कि वे अमृतसर से चुनाव हार कर भी क्‍यों देश की तकदीर के नियंता बने बैठे हैं। फिर शशिकला को तो अभी चुनाव में जाना था। हो सकता है वे बम्‍पर मतों से जीत कर आतीं।

‘जन की बात’ अगर ऐसे ही चला तो नहीं चल पाएगा। सिद्धार्थ वरदराजन को संपादकीय लाइन तय करनी होगी और लिबरल एनजीओवादियों के पक्ष वाली एजेंडा सेटिंग छोड़नी होगी। विनोद दुआ वैसे भी अब बुजुर्ग हो चले हैं। इस उम्र में उनकी बाईं हथेली पर रची लाल मेंहदी अच्‍छी नहीं लगती। इस आखिरी ठिकाने पर उन्‍हें अगर भद्द नहीं पिटवानी है तो एनडीटीवी के दौर वाले तेवर को बहाल करें, वरना उनका यह कार्यक्रम एक बार जन के नाम पर धोखा साबित होगा।

उन्‍हें भूलना नहीं चाहिए कि उनके टीवी करियर की शुरुआत दूरदर्शन के जिस जिस कार्यक्रम से हुई थी, उसमें भी जन जुड़ा था। अब जन इतना मूर्ख नहीं रहा कि उसे कोई भी चरा ले जाए। जन बदल चुका है। उम्‍मीद है कि तीसरे एपिसोड में कार्यक्रम थोड़ा पटरी पर आ जाए। विनोद दुआ से अब भी हमारे जैसे अनुजों को उम्‍मीदें हैं, क्‍योंकि बात कहने का सलीका तो उन्‍हें ही आता है। उन्‍हें अपने मुरीदों का खयाल रखना चाहिए।

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव चर्चित मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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