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घर के मुखिया की मौत के बाद माँ-बेटियों ने मकान में कार्बन मोनो आक्साइड गैस भर कर जान दे दी!

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संजय सिन्हा-

दिल्ली का पॉश इलाका है बसंत विहार। वहां एक ही परिवार की तीन महिलाओं ने एक साथ खुद को खत्म कर लिया। ये खबर आपने पढ़ी होगी। मेरा मन नहीं था इस पर कुछ भी लिखने का। क्यों लिखूं? बहुत लिख चुका। बहुत बार लिख चुका। पर अपने परिजन Manohar Lal Ludhani जी की इच्छा थी कि मैं इस खबर को ठीक से पढ़ूं। ज़ाहिर है, ठीक से पढ़ने का मतलब मैं इस पर चर्चा करूं।

मैं खबर के विस्तार में नहीं जाना चाहता। इसकी वजह सिर्फ इतनी है कि मेरी नज़र में आत्म हत्या पाप है। मैं चाहता तो आत्म हत्या को कोई और अपराध बता देता पर पाप कह देने से यहां काम चल जाता है, और हम सभी जानते हैं कि धर्म प्रधान देश पाप और पुण्य से सिद्धांत से चला करते हैं। हम यहां अपनी खराब स्थिति के लिए सरकार को तो छोड़िए, भगवान को भी दोषी नहीं मानते। हम मानते हैं कि ये हमारा पाप है। कोई बीमार हो गया तो पापी। कोई गरीब है तो पापी। कोई दुखी है तो पापी। जो है, उसके पीछे कारण है। कारण इस जन्म का न सही, पूर्व जन्म का पाप। ऐसे भाव हमें जीने का सहारा देते हैं। हम हर परिस्थिति में अपनी कमी ढूंढ लेते हैं।

तो दिल्ली में तीन महिलाओं, एक मां और उसकी दो बेटियों ने अपने घर को गैस चैंबर में बदल कर अपनी जान दे दी। किसी महान पत्रकार ने पूरे मामले का पता नहीं लगाया है। मां और बेटियों ने ही मरने से पहले पूरा ब्योरा लिख कर बताया है कि वो कैसे मरने जा रही हैं। उन्होंने घर के बाहर पर्चा चिपकाया था कि घर में वो कार्बन मोनो आक्साइड गैस भर कर दम घोंट कर खुद की जान देने जा रही हैं।

अब सवाल ये कि आज इस खबर पर चर्चा की ज़रूरत क्यों?

अपने परिजन मनोहर लाल जी बहुत समझदार हैं। पिछले दो दिनों से संजय सिन्हा चर्चा कर रहे थे कि जिन घरों में महिलाएं पति से पहले संसार से चली जाती हैं वो घर घर नहीं रहता। पुरुष अपने को संभाल नहीं पाते। इस पर बहस, चर्चा हुई। मनोहर लाल जी ने कई उदाहरण दिए कि पुरुष के जाने के बाद महिलाओं की भी ज़िंदगी बिगड़ जाती है। उसी कड़ी में उन्होंने ये लिखा था कि उनके मुहल्ले में कोरोना से कई लोग, जो दुनिया से चले गए, उनके घर की महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय होकर रह गई है। और उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने मेरे पास अलग से ये खबर भेजी कि इसे ठीक से पढ़ लीजिए।

खबर तो मैं पढ़ चुका था। पर अब चर्चा कर रहा हूं। शायद इसी बहाने कुछ सार्थक बात हो।

घर का पुरुष जिसका नाम उमेश था, वो अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ दिल्ली के बसंत विहार इलाके के एक फ्लैट में रह रहा था। पिछले दिनों उमेश की मृत्यु हो गई।

उसके बाद क्या हुआ?

पूरा परिवार अवसाद में चला गया। उमेश की पत्नी और दो जवान बेटियां। सामने खाली खड़ी ज़िंदगी।

मां और बेटियों का आसपास के लोगों से अधिक संपर्क नहीं था। महानगरों में वैसे भी किसी का किसी से कहां सपंर्क होता है? यहां तो लोग काम से मिलते हैं, काम से अलग हो जाते हैं। यहां का सामाजिक दायरा ही काम से जुड़ा होता है। एक वर्ग इसे प्रोफेशनल होना कहता है।

आप सभी लोग इस विषय पर बहुत कुछ पहले भी पढ़ चुके हैं, चर्चा कर चुके हैं। मैं इसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ने वाला। ये हमारा बनाया समाज है। हमने यही चाहा था। हमने गांव के उस ताना-बाना से खुद को मुक्त किया था, जहां एक घर की रसोई का धुंआ दूसरे घर को बता देता था कि उसकी रसोई में क्या पक रहा है? जहां हर सुख-दुख में पूरा न सही, आधा गांव तो खड़ा हो ही जाता था।

उमेश ने गांव की ज़मीन बेच कर खुद को शहरी बना लिया था। दिल्ली शिफ्ट होने के बाद उसका जीवन अपने सीमित परिवार तक सिमट कर रह गया था। पत्नी, दो बेटियां। बेटियां बड़ी थीं। प्रोफेशनल पढ़ाई कर रही थीं। पढ़ाई के बाद नौकरी लगती, फिर शादी होती, फिर उमेश नाना बनते। पर ये सब नहीं हुआ। उमेश की मृत्यु हो गई और घर के सारे सपने टूट गए

मां और बेटियां इस सदमें में फंस गईं। सदमें और अवसाद में तीनों ने सामूहिक रूप से दम घोंट कर अपनी जान दे दी। अखबारों, चिंतकों ने इस पर टिप्पणी कर दी कि ये समाजिक तानाबाना टूटने का कुफल है। अगर समाज उनके अवसाद को समझ पाता तो शायद वो मरने से बच जातीं।

पर संजय सिन्हा का सवाल है कैसे? आपके घर के भीतर कौन-सा समाज आएगा? समाज से जुड़ने के लिए तो आपको बाहर निकलना होगा। आपको लोगों से जुड़ना होगा। आपने जब खुद ही तय कर लिया कि आप किसी से नहीं जुड़ेंगे तो कोई आपके भीतर कितना समा पाएगा?

और सबसे बड़ी बात ये कि समाज से जुड़ना, खुद सामाजिक होना एक लंबी प्रक्रिया है। आप एक दिन में वैसे नहीं हो सकते, जैसा सब सोच रहे हैं।

बहुत से लोग होते हैं जिन्हें दूसरे लोग अच्छे नहीं लगते। वो खुद में सिमट कर जीना चाहते हैं, जीते हैं। उमेश के परिवार के बाकी सदस्य चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे। मुहल्ले वाले भी कुछ नहीं कर सकते थे। महानगरों में किसी की ज़िंदगी में बिना कारण झांकना बुरा माना जाता है। किसी को कैसे पता चलता कि उमेश का परिवार अवसाद में है?

खैर, कहानी पूरी हो गई है। मनोहर जी की इच्छा का मैंने मान रख लिया है। मेरा मन नहीं है अवसाद की कहानी सुनाने का। पर इस बहाने आपसे सवाल है कि ऐसी समस्याओँ का समाधान क्या है? कैसे बचा जाए इससे?

मैं एक बात ज़रूर कहना चाहता हूं कि अवसाद एक बीमारी है। इस बीमारी के लक्षण पहचान में नहीं आते हैं। इसे पहचानिए। अगर आपके आसपास आपके घर में ऐसा कोई मरीज दिखे, जो अवसाद में है तो उसे समझाएं कि इसमें इलाज की ज़रूरत होती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी और बीमारी में होती है। अवसाद की दवाएं होती हैं। डॉक्टर बीमारी को देख कर, समझ कर इलाज करते हैं।

उमेश के परिवार की तीनों महिलाएं गहरे अवसाद में थीं। अगर वो लोगों से जुड़ी होतीं, मैं तो कहता हूं कि हमारे संजय सिन्हा फेसबुक परिवार से ही जुड़ी होतीं तो शायद उनकी बीमारी पकड़ी जाती। आदमी पर मुसीबतें आती हैं, पर आदमी को जीना होता है। मुसीबतों का सामना करना होता है। मर जाना समस्या का हल नहीं। खबर भी नहीं।

अवसाद को समय रहते पहचानिए। ये चुपके से किसी की ज़िंदगी में प्रवेश कर सकता है। समय पर इलाज कराइए। अपने घर में, परिवार में देखिए कि कोई अकेलेपन को गले तो नहीं लगा रहा?

घर में कई बार बुजुर्ग अवसाद के मरीज हो जाते हैं, हम उन पर उम्र की तोहमत लगा कर छोड़ देते हैं। ये बीमारी संक्रामक भी होती है। वंशानुगत भी होती है। पर जैसा कि संजय सिन्हा मानते हैं कि हर बीमारी का इलाज संभव है तो इसका भी इलाज संभव है। रोगी को पहचानिए। रोग को पहचानिए।

उमेश के परिवार के लिए मेरे मन में गहरी संवेदना है। काश ऐसा न होता!

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  • संजय जी के इस लेखन ने एक बार फिर तेजी से क्षरित हो रहे सामाजिक मूल्यों की परतें उधेड़ दी है। कई साल पहले कालकाजी में ऐसा प्रसंग उदघाटित हुआ था जिस पर लिखी पोस्ट याद आ गई।

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