इस महिला पत्रकार को आपके समर्थन की जरूरत, थोड़ा-सा वक्त निकाल पढ़ लें ये हकीकत!

Satyendra P Singh

अपने आसपास की दुनिया देखता हूँ तो लगता है कि मेरा दुख कितना कम है! बिजनेस स्टैंडर्ड में पत्रकार हैं अजंता कृष्णमूर्ति। एक पखवाड़े पहले पता चला कि उसके पिता को कैंसर है। अचानक एक रोज एक सहकर्मी से जानकारी मिली कि उस लड़की को 2012 में कैंसर हुआ, वह भी चौथे स्टेज का, जब डॉक्टर सीधे कह देते हैं कि अब आप 6 महीने ही जिएंगे! उस उम्र में अजंता को कैंसर हो गया, जब लड़के लड़कियां रोमानी दुनिया में होते हैं, बेहतर जिंदगी, शादी विवाह के सपने देखते हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे शानदार ग्रुप में करियर के अवसर के बाद निश्चित रूप से बेहतर सपने देखे जा सकते हैं, लेकिन बीच में यह कैंसर नाम का हादसा आ गया। डॉक्टर के प्रिडिक्शन को मात देते हुए अजंता जब नए साल 2019 के स्वागत की तैयारी कर रही थी, तभी उसके पिता को कैंसर हो गया। एक कैंसर से जूझती लड़की। 70 साल की माँ, बुजुर्ग पिता। दिल्ली का एकाकी परिवार। और इलाज के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं! कितनी कठिन है जिंदगी? है न?

जब मैं अपने बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि कितना खुशनसीब हूँ। एक अच्छी सी नौकरी। हर परिस्थिति में मुझे झेल जाने वाली सुंदर सी बीवी। एक प्यारी सी संवेदनशील बेटी और नटखट शरारती भावुक बेटा। मां बाप का सर पर साया। केयर करने वाले दो भाई। बहन, बहनोई। सास, ससुर, साले, जो एक बार बोल देने पर हाजिर हो जाते हैं। और इन सबसे बढ़कर सोशल मीडिया पर हजारों की संख्या में मित्र। सैकड़ों ऐसे मित्र, जो वैचारिक मतभेद रखते हुए बेहद प्यार करते हैं। बीमार पड़ने पर कभी अकेलापन नहीं लगा। सबने मिलकर संभाल लिया। लोग चारों तरफ से घेरे रहे। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हर तरह का सहयोग देते रहे।

अजंता के परिवार में 3 लोग हैं। महज 30-35 साल उम्र की लड़की। परिवार में सिर्फ वो, उसके कैंसर पीड़ित पिता और बूढ़ी मां है। खुद कैंसर से जूझ रही वह लड़की अपने पिता का इलाज कराने जाती है। उनकी देखभाल करती है। मां बाप को खाना बनाकर खिलाती है। ऑफिस भी आती है और पूरे उत्साह से काम भी करती है। हमारा क्या दायित्व है? मुझे लगता है कि ईश्वर (या जिसने भी, जैसे भी सृजित किया हो) की उस रचना को उत्साह के साथ जी लेने में मदद करें। उसे दुःख न पहुंचने दें।

जानते हैं? ब्रेस्ट कैंसर जब फोर्थ स्टेज में होता है तो उसका एक इंजेक्शन 35,000 से 75,000 रुपये का हो जाता है, जो सम्भवतः हफ्ते या पखवाड़े में एक बार लगता है। अगर संकट से जूझ रहे व्यक्ति को थोड़ी बहुत भी समाज से मदद मिलती है तो खर्च का एक अंश निकल आता है।

और, जानते हैं कि आर्थिक मदद में सबसे बड़ी खुशी कब मिलती है? जब खाते में कोई व्यक्ति 100 रुपये ट्रांसफर करता है। वह मनी ट्रांसफर देखकर आदमी भावुक हो जाता है कि सम्भवतः यह किसी बच्चे ने किया होगा। अपनी किताब के पैसे में से, या छह महीने से फ़िल्म देखने के लिए बनी योजना को टालकर पैसे दिए होंगे। यह देखकर जीने का हौसला बढ़ जाता है। अकेलापन कम हो जाता है कि हमारे साथ कोई है।

मैं लिखने के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रहा था। कभी भी मेरी यह प्रवृत्ति नही रही कि यह सब लिखा जाए। जो बन पड़ता है, कर देता हूँ। वह भी सम्बंधित व्यक्ति को बिना बताए। जब खाते में दो तीन दर्जन बेनिफिशियरी जुड़ जाते हैं तो खुशी होती है और किसी रोज सभी बेनिफिशियरी को डिलीट कर देता हूँ। यह सब अपनी खुशी के लिए करता हूँ कि फील हो कि मैं जिंदा भी हूँ। यशवंत सिंह (फाउंडर और एडिटर, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम) ने भड़ास पर जब उसकी कहानी को प्रकाशित किया तो मुझे लगा कि अब लिखना चाहिए। अजंता का नीचे दिया गया खाता नम्बर मेरे खाते के बेनिफिशियरी लिस्ट में जुड़ गया है और मैंने अपना आर्थिक योगदान भेज दिया है। आप भी कुछ न कुछ जरूर करें… ये सामूहिकता और आपसी सहयोग की हम सबों को निजी दुखों से बचा पाएगा.

Account holder: Ajanta Krishnamurthy
Bank: Kotak Mahindra Bank
Branch: 14 KG Marg New Delhi 110001
SB account number: 6711590397
IFSC code: KKBK0000172

बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.


अजंता की पूरी कहानी जानने के लिए इसे जरूर पढ़ें….

बिजनेस स्टैंडर्ड की महिला पत्रकार अजंता कृष्णामूर्ति और उनके पिता बेहद मुश्किल दौर में, आर्थिक मदद की जरूरत

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Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶನಿವಾರ, ಜನವರಿ 26, 2019
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