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ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों की गिनती अलग हो तो क्या होगा, मामला स्पष्ट नहीं और खबर भी गोल है!

ईवीएम में सुधार की मांग से भाजपा क्यों घबड़ा जाती है और खबर क्यों दब जाती है?

मतदान, एग्जिट पोल के नतीजों और मतगणना के बीच आज ईवीएम की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। कल सोशल मीडिया पर कई खबरें रहीं और आज के अखबारों में (राजस्थान पत्रिका में पहले पन्ने पर) यह खबर है कि “ईवीएम पर फिर रार : कांग्रेस ने कसा तंज”। इस खबर के मुताबिक, एग्जिट पोल के नतीजों के बाद (कल) विपक्षी दलों ने यह सवाल उछाला है कि वीवीपैट की पर्चियों और ईवीएम की गिनती अलग हुई तो क्या होगा। कुछ दिन पहले मुझसे एक मित्र ने इस बारे में जानना चाहा था। मैंने यही कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में रहा है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही वीवीपैट की पर्चियां गिनी जाएंगी कितनी पर्चियां गिनी जाएं यह भी सुप्रीम कोर्ट में तय हुआ है और अभी हाल में इससे संबंधित एक और मामला सुप्रीम कोर्ट में था पर अदालत ने गिनी जाने वाली पर्चियों की संख्या नहीं बढ़ाई। अंतर आने पर क्या होगा यह मुझे पता नहीं है। चेक करके बताऊंगा। आज के अंग्रेजी अखबार, द टेलीग्राफ में इससे संबंधित एक खबर पहले पन्ने पर है। ऑपोजिशन फोकस ऑन ईवीएम यानी विपक्ष का ध्यान अब ईवीएम पर। इस खबर को पढ़कर लगा कि आज यह महत्वपूर्ण खबर है, देखा जाए यह खबर किन अखबारों में पहले पन्ने पर है। पहले आपको खबर बताऊं फिर आप मानेंगे कि यह निश्चित रूप से पहले पन्ने की खबर है। इसके बाद बताऊंगा कि मैं जो अखबार देखता हूं उनमें यह किस अखबार में पहले पन्ने पर है और किस रूप में। आप अपने अखबार को भी देखिए।

द टेलीग्राफ की यह खबर संजय के झा की बाईलाइन वाली है। आमतौर पर इसका मतलब होता है कि यह उस रिपोर्टर ने खासतौर से की है और उसका अनुमान है कि यह खबर किसी दूसरे रिपोर्टर के पास अभी तक नहीं है, उसकी एक्सक्लूसिव है। इस लिहाज से यह खबर दूसरे अखबारों में नहीं हो सकती है। पर खबर पढ़ने से पता लगता है कि यह खबर दूसरे अखबारों के पास नहीं होना इस रिपोर्टर की खासियत के मुकाबले दूसरों की नालायकी ज्यादा है। पर वह अलग मुद्दा है। खबर इस प्रकार शुरू होती है, (अनुवाद मेरा) “विपक्षी दलों ने तय किया है कि वे ईवीएम की प्रामाणिकता और सुरक्षा के साथ वीवीपैट की पर्चियों के मिलान पर ध्यान देंगे ना कि एग्जिट पोल पर सवाल उठाने में फंसे रहेंगे।” खबर आगे कहती है, “मंगलवार को वे चुनाव आयोग से इस मामले में स्पष्टता की मांग करेंगे कि वीवीपैट की पर्चियों और ईवीएम के वोट की गिनती एक नहीं होने पर क्या करना है। साथ ही ईवीएम की अतिरिक्त सुरक्षा और मशीनों की जांच की मांग की जाएगी। सूत्रों ने कहा कि 23 मई को मतगणना शुरू होने से पहले चुनाव आयोग स्पष्ट निर्देश नहीं देगा तो विपक्ष सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।”

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कहने की जरूरत नहीं है कि आम पाठक और मतदाता के लिए यह एक महत्वपूर्ण सूचना है। आइए देखें यह किस अखबार में है। मामला दिल्ली का है और इससे संबंधित कार्रवाई और गतिविधि दिल्ली में होनी है इसलिए दिल्ली के अखबारों और दूसरे अखबारों के दिल्ली संस्करण में इसे वैसे भी पहले पन्ने पर होना चाहिए। अगर यह खबर वाकई एक्सक्लूसिव है तो भी कल सोशल मीडिया पर ईवीएम से संबंधित जो खबरें रहीं उनकी चर्चा सही और गलत होने पर भी आज अखबारों में होनी थी। हो सकता है अंदर के पन्नों पर हो भी लेकिन मैं पहला पन्ना देख रहा हूं। मेरे हिसाब से यह पहले पन्ने की खबर है। अगर आपको लगता है कि सोशल मीडिया की खबर अखबारों में क्यों होनी चाहिए तो अपने अखबार में देखिए विवेक ओबेराय के ऐश्वर्य राय से संबंधित घटिया ट्वीट को अखबारों ने कितना महत्व दिया है। इस मामले में मेरा मानना है कि विवेक ने तो गलती की ही अखबारों ने उसे छापकर और प्रचारित किया। इसके मुकाबले अखबारों को ईवीएम के मुद्दे को ज्यादा महत्व देना चाहिए था।

हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में ऐसी कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है। एक्सप्रेस में एक खबर है, सूरत हिन्दू महासभा के छह लोग गोड्से का जन्मदिन मनाने के लिए गिरफ्तार जो दूसरे अखबारों में नहीं दिखी। हिन्दी अखबारों में दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। राजस्थान पत्रिका की चर्चा पहले कर चुका हूं। इसके अलावा, अखबार के मुताबिक, कांग्रेस नेता राशिद अल्वी कहा है कि अगर एग्जिट पोल जैसे ही नतीजे आते हैं तो इसका साफ मतलब है कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है। ऐसा हुआ तो 2018 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की जीत एक साजिश थी, ताकि ईवीएम पर सवाल न उठे। अमर उजाला में आज लीड का शीर्षक है, बीजद (बीजू जनता दल) के एनडीए में आने के संकेत, विपक्ष का ईवीएम पर फिर निशाना। इसके ईवीएम वाले हिस्से में कहा गया है, एग्जिट पोल के नतीजों से असहज विपक्षी दलों ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। गठबंधन के प्रयास में लगे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू के नेतृत्व में 21 दलों के नेता मंगलवार को चुनाव आयोग से मुलाकात कर ईवीएम के साथ वीवीपैट की पर्ची के मिलान का मुद्दा उठाएंगे। दैनिक जागरण में यह खबर नहीं है पर, एक दिलचस्प खबर है, दो महीने के बाद रविवार को मोदी फिर करेंगे मन की बात।

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जहां तक ईवीएम पर खबर की बात है, हिन्दुस्तान में आज पहले पेज पर पूरा विज्ञापन है। तीसरे पेज को पहला पेज बनाया गया है और इस चक्कर में दूसरा पेज मुझे पहले से पहले दिखा और उसपर विस्तृत खबर है। आप भी देखिए।

15 अप्रैल को, “ईवीएम में सुधार की मांग से भाजपा क्यों घबड़ा जाती है” में मैंने लिखा था, (ईवीएम पर) भाजपा का रवैया चौंकाने वाला है। यह संभव है कि उसे ईवीएम से कोई एतराज नहीं हो पर कोई खास लाभ नहीं है तो ईवीएम पर उठने वाले हर सवाल का जवाब देने की क्या जरूरत है। ईवीएम के हर विरोधी और हर विरोध की विरोध क्यों करना? जिसे शिकायत है वह संबंधित संवैधानिक संस्थान से अपनी बात कह रहा है और उस संस्थान (चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट) का काम है कि शिकायत में दम लगे तो उसपर कार्रवाई करे। कार्रवाई होने का मतलब है कि शिकायत में दम है पर भाजपा वाले हमेशा ऐसे मामलों में कूद पड़ते हैं और आज भी भाजपा की प्रतिक्रिया ऐसी ही है। पर अखबारों ने ली और छापी क्यों? प्रतिक्रिया तो ईवीएम बनाने वाली कंपनी की होनी चाहिए थी या किसी कानून के जानकार की – जो बताता कि सुप्रीम कोर्ट जाने का क्या मतलब है?

…. ईवीएम से छेड़छाड़ सत्ता में आने से पहले भाजपा का प्रमुख मुद्दा रहा है और ईवीएम विरोध का विरोध करने के लिए लगा दिए गए जीवीएल अगर ईवीएम के पक्ष में या विरोध करने वालों के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं तो शायद इसलिए भी कि वे एक किताब ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?’ के लेखक हैं। यह विडंबना ही है कि ईवीएम की खामियों पर जो किताब लिख चुका है वह आज ईवीएम के विरोध का विरोध कर रहा है। भाजपा के विरोध में यह बात जरूर रहती है कि विपक्ष हार रहा है। इसलिए ईवीएम का मुद्दा उठा रहा है। यह बात आधिकारिक तौर पर कही जाती है छुटभैये समर्थक भी कहते हैं। दिल्ली, पंजाब और हाल में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत पर कहा गया कि यह ईवीएम के बावजूद हुआ है।….

जागरण डाट काम की एक खबर के अनुसार, दिल्ली विधानसभा में हार के बाद आम आदमी पार्टी ने ईवीएम पर आरोप लगाया था तब जागरण ने इस बारे में जीवीएल नरसिम्हा राव से बात की थी। “जीवीएल ने बताया कि उनकी किताब उनका व्यक्तिगत अकादमिक काम है, इसका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। इसके जरिए उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए कोशिश की। उन्होने कहा, ‘हमारी इस कोशिश का ही असर है कि आज ईवीएम की तकनीक में इतना इजाफा हुआ है। इसे और ज्यादा सुरक्षित करने के लिए कदम उठाए गए हैं। पेपर ट्रेल भी हमारी कोशिश का नतीजा है। जो लोग आज ईवीएम गड़बड़ी की बात उठाकर इसके पीछे अपनी हार को छिपाना चाहते हैं वे खुद को धोखा दे रहे हैं और कुछ नहीं।’ इससे जीवीएल पेपर ट्रेल का श्रेय लेते लग रहे हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है।

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पेपर ट्रेल का मतलब तभी है जब इसकी पूरी गिनती हो चुनाव घोषणा के बाद पेपर ट्रेल तो रद्दी ही हो जाने हैं और जीत घोषित होने के बाद पेपर ट्रेल का क्या मतलब? और भाजपा इसका बचाव क्यों कर रही है? एक ही बहाना है – समय लगेगा। पर जब चुनाव सात चरण में हो सकते हैं तो गिनती क्यों नहीं? जहां मतदान हो गए उनकी गिनती करते रहने में क्या दिक्कत है। नतीजे हमेशा गोपनीय रखे जा सकते हैं। इस मामले में चंद्रबाबू नायडू का कहना सही है कि हम प्रौद्योगिकी के मास्टर हो सकते हैं ना कि इसके गुलाम। …. इसके बावजूद भाजपा और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूरा तथ्य बताने की बजाय यह साबित करने में लगा है कि मशीन हैक नहीं की जा सकती है। या उसमें कुछ गड़बड़ नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट

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